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	<title>امامت‌پدیا - مشارکت‌های کاربر [fa]</title>
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		<title>ربوبیت در لغت</title>
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		<updated>2021-05-24T08:20:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ولایت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[ربوبیت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[ربوبیت]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[ربوبیت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0023.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0024.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==بررسی واژه [[رب]] در لغت==&lt;br /&gt;
*در کتب لغت ‏برای واژه &amp;quot;[[رب]]&amp;quot; معانی گوناگون [[نقل]] شده است، مانند: [[مصلح]]، مالک، [[صاحب]]، [[سید]]، [[مدبر]]، مربی، [[قیم]]، [[منعم]] و [[خالق]] که به [[نقل]] برخی از آنها می‌‏پردازیم: &lt;br /&gt;
#معجم مقاییس اللغه: {{عربی|&amp;quot;الراء و الباء يدلُّ على أُصولٍ. فالأول إصلاح الشى‏ءِ والقيامُ عليه. فالرّبُّ: المالكُ، والخالقُ. والصَّاحب. والرّبُّ: المُصْلِح للشّى‏ء. والرّبُّ: المُصْلِح للشّى‏ء. واللَّه جلّ ثناؤُه الرَّبُّ؛ لأنه مصلحُ أحوالِ خَلْقه‏&amp;quot;}}.&lt;br /&gt;
#المعجم الوسیط: {{عربی|&amp;quot; رب القوم: راسهم وساسهم، الرب اسم الله تعالى والمالك والسيد والمربي والقيم والمنعم والمدبر والمصلح‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]، [[حکومت اسلامی (نشریه)|فصلنامه حکومت اسلامی]]، ص۳۲۹ تا ۳۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#المصباح المنیر: {{عربی|&amp;quot; الرب: يطلق على مالك الشيء... و قد استعمل به معناي السيد‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&lt;br /&gt;
#لسان العرب: {{عربی|&amp;quot; الرب هو الله عزوجل، هو رب كل شي‏ء؛ اي مالكه ولا يقال الرب في غير الله الا بالاضافة. الرب يطلق في اللغة على المالك والسيد والمدبر والمربي والمنعم والقيم‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&lt;br /&gt;
*خلاصه اینکه لفظ [[رب]] در معانی متعددی به کار رفته است که در تمام این معانی، مشترک [[معنوی]] است و جامع آنها کلمه {{عربی|&amp;quot; من بيده امر التدبير و الادارة و التصرف‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}} است‏یاً کلمه {{عربی|&amp;quot; من فوض اليه امر الشي‏ء المربي من حيث الاصلاح والتدبير والتربية‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[رب]] یعنی کسی که امر [[تدبیر امور]] و اداره آن و [[تصرف]] در امور، به دست اوست. یکی از محققان در این باره می‌‏نویسد: &amp;quot;معنی [[حقیقی]] و اصیل لفظ [[رب]] {{عربی|&amp;quot; من بيده امر التدبير والادارة والتصرف‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}} است که یک مفهوم کلی است و معانی دیگر؛ مانند [[تربیت]]، [[اصلاح]]، [[حاکمیت]]، [[مالکیت]] و صاحبیت، همگی مصادیق این مفهوم کلی هستند&amp;quot; &amp;lt;ref&amp;gt;سبحانی، جعفر، الاسماء الثلاثه؛ الاله و الرب و العباده، مؤسسه امام صادق{{ع}}، چاپ اول، قم، ۱۴۱۷، س‏۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]، [[حکومت اسلامی (نشریه)|فصلنامه حکومت اسلامی]]، ص۳۲۹ تا ۳۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:11424.jpg|22px]] [[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:ربوبیت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
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		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B1%D8%A8%D9%88%D8%A8%DB%8C%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=503678</id>
		<title>ربوبیت در لغت</title>
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		<updated>2021-05-24T08:19:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ولایت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[ربوبیت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[ربوبیت]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[ربوبیت در لغت]] - [[ربوبیت در قرآن]] - [[ربوبیت در حدیث]] - [[ربوبیت در کلام اسلامی]] - [[ربوبیت در فلسفه اسلامی]] - [[ربوبیت در عرفان اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[ربوبیت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0023.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==بررسی واژه [[رب]] در لغت==&lt;br /&gt;
*در کتب لغت ‏برای واژه &amp;quot;[[رب]]&amp;quot; معانی گوناگون [[نقل]] شده است، مانند: [[مصلح]]، مالک، [[صاحب]]، [[سید]]، [[مدبر]]، مربی، [[قیم]]، [[منعم]] و [[خالق]] که به [[نقل]] برخی از آنها می‌‏پردازیم: &lt;br /&gt;
#معجم مقاییس اللغه: {{عربی|&amp;quot;الراء و الباء يدلُّ على أُصولٍ. فالأول إصلاح الشى‏ءِ والقيامُ عليه. فالرّبُّ: المالكُ، والخالقُ. والصَّاحب. والرّبُّ: المُصْلِح للشّى‏ء. والرّبُّ: المُصْلِح للشّى‏ء. واللَّه جلّ ثناؤُه الرَّبُّ؛ لأنه مصلحُ أحوالِ خَلْقه‏&amp;quot;}}.&lt;br /&gt;
#المعجم الوسیط: {{عربی|&amp;quot; رب القوم: راسهم وساسهم، الرب اسم الله تعالى والمالك والسيد والمربي والقيم والمنعم والمدبر والمصلح‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]، [[حکومت اسلامی (نشریه)|فصلنامه حکومت اسلامی]]، ص۳۲۹ تا ۳۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#المصباح المنیر: {{عربی|&amp;quot; الرب: يطلق على مالك الشيء... و قد استعمل به معناي السيد‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&lt;br /&gt;
#لسان العرب: {{عربی|&amp;quot; الرب هو الله عزوجل، هو رب كل شي‏ء؛ اي مالكه ولا يقال الرب في غير الله الا بالاضافة. الرب يطلق في اللغة على المالك والسيد والمدبر والمربي والمنعم والقيم‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}&lt;br /&gt;
*خلاصه اینکه لفظ [[رب]] در معانی متعددی به کار رفته است که در تمام این معانی، مشترک [[معنوی]] است و جامع آنها کلمه {{عربی|&amp;quot; من بيده امر التدبير و الادارة و التصرف‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}} است‏یاً کلمه {{عربی|&amp;quot; من فوض اليه امر الشي‏ء المربي من حيث الاصلاح والتدبير والتربية‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[رب]] یعنی کسی که امر [[تدبیر امور]] و اداره آن و [[تصرف]] در امور، به دست اوست. یکی از محققان در این باره می‌‏نویسد: &amp;quot;معنی [[حقیقی]] و اصیل لفظ [[رب]] {{عربی|&amp;quot; من بيده امر التدبير والادارة والتصرف‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}} است که یک مفهوم کلی است و معانی دیگر؛ مانند [[تربیت]]، [[اصلاح]]، [[حاکمیت]]، [[مالکیت]] و صاحبیت، همگی مصادیق این مفهوم کلی هستند&amp;quot; &amp;lt;ref&amp;gt;سبحانی، جعفر، الاسماء الثلاثه؛ الاله و الرب و العباده، مؤسسه امام صادق{{ع}}، چاپ اول، قم، ۱۴۱۷، س‏۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]، [[حکومت اسلامی (نشریه)|فصلنامه حکومت اسلامی]]، ص۳۲۹ تا ۳۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:11424.jpg|22px]] [[غفار شاهدی|شاهدی، غفار]]، [[توحید و حکومت دینی (مقاله)|توحید و حکومت دینی]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:ربوبیت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=503677</id>
		<title>عبادت در لغت</title>
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		<updated>2021-05-24T08:17:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[عبادت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] - [[عبادت در قرآن]] - [[عبادت در حدیث]] - [[عبادت در نهج البلاغه]] - [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] - [[عبادت در فقه سیاسی]] - [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] - [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0021.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0022.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
{{عربی|الْعُبُودِيَّةُ}}: اظهار [[ذلت]] و [[خواری]]، [[بندگی]] نمودن. {{عربی|الْعِبَادَةُ}} از آن رساتر است زیرا [[عبادت]] نهایت اظهار ذلت است و کسی [[شایسته]] آن نیست مگر کسی که نهایت [[فضل]] و [[بخشش]] را [نسبت به عبادت‌کننده] انجام داده باشد و آن کسی نیست جز [[خداوند متعال]] و به همین خاطر فرمود: {{متن قرآن|أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«که جز وی را نپرستید» سوره یوسف، آیه ۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
عبادت بر دو نوع است: نوع اول عبادت تسخیری است و آن همانند آن چیزی است که درباره [[سجده]] [موجودات عالم نسبت به [[خداوند]]] بیان کردیم. نوع دوم عبادت اختیاری است و این مخصوص ذی‌شعورها و دارندگان [[عقل]] است و به همین عبادت در [[آیات]] {{متن قرآن|اعْبُدُوا رَبَّكُمُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«پروردگارتان را بپرستید» سوره بقره، آیه ۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، {{متن قرآن|وَاعْبُدُوا اللَّهَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و خداوند را بپرستید» سوره نساء، آیه ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و مانند اینها مورد امر قرار گرفته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبد==&lt;br /&gt;
[[عبد]] [یعنی [[بنده]]] بر چهار نوع است: [راغب ابتدا بنده را بر سه نوع دانسته سپس نوع سوم را به دو قسم تقسیم کرده و مجموعاً چهار نوع به دست آمده است]:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع اول===&lt;br /&gt;
عبد [[شرعی]] و آن [[انسانی]] است که خرید و فروشش جایز است مانند: {{متن قرآن|الْعَبْدُ بِالْعَبْدِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«برده در برابر برده» سوره بقره، آیه ۱۷۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|عَبْدًا مَمْلُوكًا لَا يَقْدِرُ عَلَى شَيْءٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بنده‌ای زرخرید که توان هیچ کاری ندارد» سوره نحل، آیه ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع دوم===&lt;br /&gt;
عبد ایجادی [و تسخیری] و آن مخصوص خداوند متعال است و مقصود آیۀ {{متن قرآن|إِنْ كُلُّ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ إِلَّا آتِي الرَّحْمَنِ عَبْدًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«جز این نیست که هر که در آسمان‌ها و زمین است به بندگی به درگاه (خداوند) بخشنده می‌آید» سوره مریم، آیه ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; همین نوع است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع سوم===&lt;br /&gt;
عبد [[عبادی]] و خدمتی. و [[مردم]] در این نوع [[بندگی]] دو قسم هستند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;قسم اول:&#039;&#039;&#039; بنده [[مخلص]] خداوند و همین معنا، مقصود آیات زیر است: {{متن قرآن|وَاذْكُرْ عَبْدَنَا أَيُّوبَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و از بنده ما ایّوب یاد کن» سوره ص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِنَّهُ كَانَ عَبْدًا شَكُورًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(بدانید که) او بنده‌ای سپاسگزار بود» سوره اسراء، آیه ۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَى عَبْدِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«فرقان را بر بنده خویش فرو فرستاد» سوره فرقان، آیه ۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|عَلَى عَبْدِهِ الْكِتَابَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بر بنده خود این کتاب را» سوره کهف، آیه ۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بی‌گمان تو بر بندگان من چیرگی نداری» سوره حجر، آیه ۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|كُونُوا عِبَادًا لِي}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بندگان من باشید» سوره آل عمران، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بجز از میان آنان بندگان نابت را» سوره حجر، آیه ۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَعَدَ الرَّحْمَنُ عِبَادَهُ بِالْغَيْبِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بهشت‌هایی جاودان که (خداوند) بخشنده به بندگانش در (جهان) نهان وعده کرده است» سوره مریم، آیه ۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَعِبَادُ الرَّحْمَنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بندگان (خداوند) بخشنده آنانند که بر زمین فروتنانه گام برمی‌دارند» سوره فرقان، آیه ۶۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|فَأَسْرِ بِعِبَادِي لَيْلًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«پس، بندگانم را شبانه رهسپار کن» سوره دخان، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|فَوَجَدَا عَبْدًا مِنْ عِبَادِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بنده‌ای از بندگان ما را یافتند» سوره کهف، آیه ۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;قسم دوم:&#039;&#039;&#039; [[بنده]] [[دنیا]] و امور ناپایدار دنیا و آن کسی است که بر [[خدمت]] به دنیا و محافظت آن کمر [[همت]] بربسته است و چنین شخصی را [[رسول اکرم]]{{صل}} مورد توجه قرار داده است در آنجا که فرمود: {{متن حدیث|تَعِسَ عَبْدُ الدِّرْهَمِ، تَعِسَ عَبْدُ الدِّينَارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج ۷۰، ص۳۲۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &amp;quot;هلاک شد بنده [[درهم]]، هلاک شد بنده [[دینار]]&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حساب [و با توجه به معنای دوم و سوم [[عبد]]] می‌توان گفت که هم درست است که بگوییم: &amp;quot;هر [[انسانی]] [[عبد خدا]] نیست [بلکه فقط برخی افراد بنده [[خداوند]] هستند]&amp;quot; [در این جمله عبد به معنای سوم به کار رفته است]. عبد در این عبارت و امثال آن به معنای [[عابد]] است منتها بلیغ‌تر از عابد است [زیرا عابد یعنی پرستش‌کننده ولی عبد یعنی با تمام وجودش خداوند را می‌‌پرستد]. و هم درست است که بگوییم: &amp;quot;همه [[مردم]] [[عبد خداوند]] هستند بلکه بالاتر از آن همۀ موجودات عبد و بنده خداوند هستند&amp;quot; [عبد در این جمله به معنای دوم یعنی موجود مُسَخَّر به کار رفته است] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جمع عَبدی که به ملکیت گرفته می‌شود [[عبید]] است و برخی عِبِدَّی را [نیز] گفته‌اند. ولی جمع [[عبدی]] که پرستش‌کننده است عباد است. بنابراین هرگاه عبید به [[خداوند]] اضافه شود معنای آن اعم از عباد خواهد بود [چون همه [[انسان‌ها]] بل همه موجودات مملوک خداوند هستند] به همین خاطر فرمود: {{متن قرآن|وَمَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِلْعَبِيدِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و من با بندگان، ستمکاره نیستم» سوره ق، آیه ۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; تا روشن کند که او بر هیچ کس [[ظلم]] نمی‌کند چه کسانی که او را [[عبادت]] می‌‌کنند و چه کسانی که غیر او را اعم از [[خورشید]] و [[لات]] و غیره را عبادت می‌‌کنند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[علامه راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|ترجمه و تبیین مفردات القرآن]]، ص ۶۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 13681368.jpg|22px]] [[راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|&#039;&#039;&#039;مفردات القرآن (ترجمه و تبیین)&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=503676</id>
		<title>عبادت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=503676"/>
		<updated>2021-05-24T08:17:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] - [[عبادت در قرآن]] - [[عبادت در حدیث]] - [[عبادت در نهج البلاغه]] - [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] - [[عبادت در فقه سیاسی]] - [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] - [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039; به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و [[طاعت]] و [[پرستش]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] است. در آیات فراوانی به موضوع عبادت اشاره شده است: {{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}} و بیان شده که عبادت هدف اصلی خلقت است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==معناشناسی عبادت==&lt;br /&gt;
===معنای لغوی===&lt;br /&gt;
عبادت به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و خاکساری&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۵۴۲؛ فیومی، المصباح المنیر، ج۲، ص۳۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; در مقابل [[خداوند]]، [[طاعت]]&amp;lt;ref&amp;gt;فیروزآبادی، القاموس المحیط، ج۱، ص۳۱۱، ماده «عبد»؛ ابن منظور، لسان العرب، ج۳، ص۲۷۲، ماده «عبد»؛ صحاح اللغه جوهری، ماده «عبد».&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[پرستش]] و پرستیدن&amp;lt;ref&amp;gt;بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. اصل آن از &amp;quot;عبد&amp;quot; به‌معنای نهایت افتادگی در مقابل مولا&amp;lt;ref&amp;gt;حسن مصطفوی، التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۸، ص‌۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[نرمش]] و ذلیل شدن آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌فارس، معجم مقاییس اللغة، ج۴، ص۲۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===معنای اصطلاحی===&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح دینی یعنی [[اطاعت]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] و [[پرستش]]، [[خداپرستی]] و [[نیایش]] به درگاه او. عبادت عبارت است از مواظبت بر برخی [[اعمال]] که از [[ناحیه]] [[شارع]] [[دستور]] رسیده است&amp;lt;ref&amp;gt;مقالات فلسفی (۲)، ص۱۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. انجام تکالیفی همچون [[نماز]]، [[روزه]]، [[حج]] و [[جهاد]] عبادت است، البته تلاش برای تأمین [[زندگی]] از راه [[حلال]]، [[آموختن]] [[دانش]]، [[جهاد]] در [[راه خدا]]، رسیدگی به محرومان و [[نیکی]] به [[پدر]] و [[مادر]] نیز از بزرگترین عبادت‌هاست&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت در [[قرآن]]==&lt;br /&gt;
{{اصلی|عبادت در قرآن}}&lt;br /&gt;
از مجموع [[آیات]] [[قرآن کریم]] استفاده می‌شود مراد از عبادت در اصطلاح [[قرآنی]]، معنای لغوی آن است یعنی [[اطاعت]] خاضعانه و بدون چون و چرا. برخی از این آیات عبارت‌اند از:&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا با شما عهد نکردم ای فرزندان آدم که فرمانبری شیطان نکنید که دشمن آشکاری برای شماست * و اینکه فرمانبر من باشید که راه راست همین است؟» سوره یس، آیه ۶۰-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«شما و آنچه جز خداوند فرمانبری می‌کنید سوخت دوزخید که شما به دورن آن می‌روید.» سوره انبیاء، آیه ۹۸-۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بعضى از مردم خدا را تنها با زبان مى‌پرستند و اطاعت می‌کنند.» سوره حج، آیه ۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|فقه نظام سیاسی اسلام]]، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت هدف خلقت==&lt;br /&gt;
[[قرآن]]، [[فلسفه خلقت]] [[جن]] و انس را عبادت [[خدا]] می‌داند: {{متن قرآن|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;و پریان و آدمیان را نیافریدم جز برای آنکه مرا بپرستند؛ سوره ذاریات، آیه ۵۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; چرا که [[بندگی خدا]] [[انسان]] را به کمال روحی و [[معنوی]] و رشد [[اخلاقی]] می‌‌رساند و از [[گناهان]] و [[مفاسد]] باز می‌دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. به نظر می‌رسد، مراد از عبودیّت انسان که [[هدف خلقت]] بیان شده، تنها [[عبادت]] ظاهری و [[خداترسی]] نیست؛ بلکه رسیدن انسان به مقامی است که همه [[اعمال]] و [[رفتار]] او عبادت محسوب شود و به قصد [[قرب]] به [[حق‌تعالی]] انجام شود (رسد [[آدمی]] به جایی که به جز [[خدا]] نبیند) و هیچ شائبه‌ای در اعمال و رفتار فردی و [[اجتماعی]] او از [[ریا]] و [[عجب]]، [[خودبینی]]، [[تکبر]] و [[تجاوزگری]] و [[فساد]] و [[ظلم]] و... نباشد؛ چنین انسانی به [[حق]] می‌پیوندد&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبادت==&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح [[قرآن]] مفهوم گسترده‌ای دارد. یک [[درجه]] که عالی‌ترین درجه است، این است که [[انسان]] در مقابل چیزی [[سجده]] کند. ولی از آن مرحله که بگذریم، قرآن هر اطاعتی را عبادت می‌شمارد و لذا می‌فرماید: کسی که [[هوای نفس]] خویش را [[اطاعت]] کند، خودپرست است. {{متن قرآن|أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَهَهُ هَوَاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا آن کس را دیدی که هوای (نفس) خود را، خدای خویش گرفته است» سوره جاثیه، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;آشنایی با قرآن، ج۱-۲، ص۱۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. البته هر توجه یا [[خضوع]] نسبت به چیزی عبادت نیست، خضوع نسبت به چیزی اگر جنبه [[تقدیس]] پیدا کند عبادت است&amp;lt;ref&amp;gt;خدمات متقابل اسلام و ایران، ص۲۵۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==بندگی خدا==&lt;br /&gt;
{{اصلی|بندگی خدا}}&lt;br /&gt;
بنده و [[عبد خدا]] کسی است که راه را برای اجرای [[فرامین]] [[پروردگار]] عالم هموار می‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین.&amp;lt;/ref&amp;gt; و تنها خواست [[خداوند]] را انتخاب کند و از [[کمالات]] والای [[اخلاقی]] است. [[انسان]] در سایه [[عبودیت]] به کمال [[آفرینش]] که همان [[بندگی]] خداست، دست می‌یابد و براساس استعداد خود، مسیر کمال را می‌پیماید. [[پیامبر اسلام]]{{صل}} می‌فرمایند: «[[مؤمن]] اگر بخواهد بنده شایسته‌ای باشد باید حدود خدا را نگه دارد و در [[عمل]] [[بندگی]] خود را نشان دهد»&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج۱۷، ص۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[تقوای الهی]]، [[رضایت]] به [[خشنودی]] [[حق تعالی]]، عمل با [[بصیرت]] و ... از نشانه‌های بندگی و [[فریب خوردن]] از شیطان‌های گوناگون؛ [[عجب]] و [[خودبینی]]؛ [[سستی]] و کسالت و مشغول شدن به [[امور دنیا]] هم از موانع آن محسوب می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا دهدست|دهدست، محمد رضا]]، [[دانشنامه صحیفه سجادیه (کتاب)|مقاله «بندگان خدا»، دانشنامه صحیفه سجادیه]]، ص ۱۱۷-۱۲۰؛ [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۷-۴۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اهمیّت عبادت (ارزش و جایگاه عبادت)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ضرورت عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مراتب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==شرایط عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==موانع عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==لوازم عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آداب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آثار و نشانه‌های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==فواید و کارکردهای عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==گستره عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ویژگی های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عواقب ترک عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|7}}&lt;br /&gt;
* [[بندگی خدا]] ([[عبادت خدا]])&lt;br /&gt;
* [[عبادات شرعیه]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت اهل بهشت]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر مولی به امر مولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت بشر]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مشرکین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مقربین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت عملی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قلبی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت خدا]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر خدا]]&lt;br /&gt;
* [[یگانه پرستی]]&lt;br /&gt;
* [[استحقاق عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[اعمال عبادی]]&lt;br /&gt;
* [[تفاوت عبادت با تعظیم]]&lt;br /&gt;
* [[معبود]]&lt;br /&gt;
* [[وجوب عبادات]]&lt;br /&gt;
* [[بهترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[رکوع]]&lt;br /&gt;
* [[سجده]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت عالم]]&lt;br /&gt;
* [[نیکو ترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[استنکاف از عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[آفت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[برتری فضیلت علم از فضیلت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[تحرج]]&lt;br /&gt;
* [[دلبستگی]]&lt;br /&gt;
* [[رغبت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[سرکشی]]&lt;br /&gt;
* [[عابد]]&lt;br /&gt;
* [[فراغت برای عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت مؤمن]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:11123.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فقه نظام سیاسی اسلام ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1379779.jpg|22px]] [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100662.jpg|22px]] [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ مطهر&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{فضایل اخلاقی}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
{{فضیلت}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=503675</id>
		<title>عبادت در لغت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=503675"/>
		<updated>2021-05-24T08:14:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[عبادت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] - [[عبادت در قرآن]] - [[عبادت در حدیث]] - [[عبادت در نهج البلاغه]] - [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] - [[عبادت در فقه سیاسی]] - [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] - [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0021.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
{{عربی|الْعُبُودِيَّةُ}}: اظهار [[ذلت]] و [[خواری]]، [[بندگی]] نمودن. {{عربی|الْعِبَادَةُ}} از آن رساتر است زیرا [[عبادت]] نهایت اظهار ذلت است و کسی [[شایسته]] آن نیست مگر کسی که نهایت [[فضل]] و [[بخشش]] را [نسبت به عبادت‌کننده] انجام داده باشد و آن کسی نیست جز [[خداوند متعال]] و به همین خاطر فرمود: {{متن قرآن|أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«که جز وی را نپرستید» سوره یوسف، آیه ۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
عبادت بر دو نوع است: نوع اول عبادت تسخیری است و آن همانند آن چیزی است که درباره [[سجده]] [موجودات عالم نسبت به [[خداوند]]] بیان کردیم. نوع دوم عبادت اختیاری است و این مخصوص ذی‌شعورها و دارندگان [[عقل]] است و به همین عبادت در [[آیات]] {{متن قرآن|اعْبُدُوا رَبَّكُمُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«پروردگارتان را بپرستید» سوره بقره، آیه ۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، {{متن قرآن|وَاعْبُدُوا اللَّهَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و خداوند را بپرستید» سوره نساء، آیه ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و مانند اینها مورد امر قرار گرفته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبد==&lt;br /&gt;
[[عبد]] [یعنی [[بنده]]] بر چهار نوع است: [راغب ابتدا بنده را بر سه نوع دانسته سپس نوع سوم را به دو قسم تقسیم کرده و مجموعاً چهار نوع به دست آمده است]:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع اول===&lt;br /&gt;
عبد [[شرعی]] و آن [[انسانی]] است که خرید و فروشش جایز است مانند: {{متن قرآن|الْعَبْدُ بِالْعَبْدِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«برده در برابر برده» سوره بقره، آیه ۱۷۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|عَبْدًا مَمْلُوكًا لَا يَقْدِرُ عَلَى شَيْءٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بنده‌ای زرخرید که توان هیچ کاری ندارد» سوره نحل، آیه ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع دوم===&lt;br /&gt;
عبد ایجادی [و تسخیری] و آن مخصوص خداوند متعال است و مقصود آیۀ {{متن قرآن|إِنْ كُلُّ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ إِلَّا آتِي الرَّحْمَنِ عَبْدًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«جز این نیست که هر که در آسمان‌ها و زمین است به بندگی به درگاه (خداوند) بخشنده می‌آید» سوره مریم، آیه ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; همین نوع است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نوع سوم===&lt;br /&gt;
عبد [[عبادی]] و خدمتی. و [[مردم]] در این نوع [[بندگی]] دو قسم هستند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;قسم اول:&#039;&#039;&#039; بنده [[مخلص]] خداوند و همین معنا، مقصود آیات زیر است: {{متن قرآن|وَاذْكُرْ عَبْدَنَا أَيُّوبَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و از بنده ما ایّوب یاد کن» سوره ص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِنَّهُ كَانَ عَبْدًا شَكُورًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(بدانید که) او بنده‌ای سپاسگزار بود» سوره اسراء، آیه ۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَى عَبْدِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«فرقان را بر بنده خویش فرو فرستاد» سوره فرقان، آیه ۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|عَلَى عَبْدِهِ الْكِتَابَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بر بنده خود این کتاب را» سوره کهف، آیه ۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بی‌گمان تو بر بندگان من چیرگی نداری» سوره حجر، آیه ۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|كُونُوا عِبَادًا لِي}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بندگان من باشید» سوره آل عمران، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بجز از میان آنان بندگان نابت را» سوره حجر، آیه ۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَعَدَ الرَّحْمَنُ عِبَادَهُ بِالْغَيْبِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بهشت‌هایی جاودان که (خداوند) بخشنده به بندگانش در (جهان) نهان وعده کرده است» سوره مریم، آیه ۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَعِبَادُ الرَّحْمَنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بندگان (خداوند) بخشنده آنانند که بر زمین فروتنانه گام برمی‌دارند» سوره فرقان، آیه ۶۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|فَأَسْرِ بِعِبَادِي لَيْلًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«پس، بندگانم را شبانه رهسپار کن» سوره دخان، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|فَوَجَدَا عَبْدًا مِنْ عِبَادِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بنده‌ای از بندگان ما را یافتند» سوره کهف، آیه ۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;قسم دوم:&#039;&#039;&#039; [[بنده]] [[دنیا]] و امور ناپایدار دنیا و آن کسی است که بر [[خدمت]] به دنیا و محافظت آن کمر [[همت]] بربسته است و چنین شخصی را [[رسول اکرم]]{{صل}} مورد توجه قرار داده است در آنجا که فرمود: {{متن حدیث|تَعِسَ عَبْدُ الدِّرْهَمِ، تَعِسَ عَبْدُ الدِّينَارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج ۷۰، ص۳۲۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &amp;quot;هلاک شد بنده [[درهم]]، هلاک شد بنده [[دینار]]&amp;quot;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حساب [و با توجه به معنای دوم و سوم [[عبد]]] می‌توان گفت که هم درست است که بگوییم: &amp;quot;هر [[انسانی]] [[عبد خدا]] نیست [بلکه فقط برخی افراد بنده [[خداوند]] هستند]&amp;quot; [در این جمله عبد به معنای سوم به کار رفته است]. عبد در این عبارت و امثال آن به معنای [[عابد]] است منتها بلیغ‌تر از عابد است [زیرا عابد یعنی پرستش‌کننده ولی عبد یعنی با تمام وجودش خداوند را می‌‌پرستد]. و هم درست است که بگوییم: &amp;quot;همه [[مردم]] [[عبد خداوند]] هستند بلکه بالاتر از آن همۀ موجودات عبد و بنده خداوند هستند&amp;quot; [عبد در این جمله به معنای دوم یعنی موجود مُسَخَّر به کار رفته است] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جمع عَبدی که به ملکیت گرفته می‌شود [[عبید]] است و برخی عِبِدَّی را [نیز] گفته‌اند. ولی جمع [[عبدی]] که پرستش‌کننده است عباد است. بنابراین هرگاه عبید به [[خداوند]] اضافه شود معنای آن اعم از عباد خواهد بود [چون همه [[انسان‌ها]] بل همه موجودات مملوک خداوند هستند] به همین خاطر فرمود: {{متن قرآن|وَمَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِلْعَبِيدِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و من با بندگان، ستمکاره نیستم» سوره ق، آیه ۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; تا روشن کند که او بر هیچ کس [[ظلم]] نمی‌کند چه کسانی که او را [[عبادت]] می‌‌کنند و چه کسانی که غیر او را اعم از [[خورشید]] و [[لات]] و غیره را عبادت می‌‌کنند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[علامه راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|ترجمه و تبیین مفردات القرآن]]، ص ۶۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 13681368.jpg|22px]] [[راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|&#039;&#039;&#039;مفردات القرآن (ترجمه و تبیین)&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=503674</id>
		<title>عبادت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=503674"/>
		<updated>2021-05-24T08:14:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] - [[عبادت در قرآن]] - [[عبادت در حدیث]] - [[عبادت در نهج البلاغه]] - [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] - [[عبادت در فقه سیاسی]] - [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] - [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0022.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039; به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و [[طاعت]] و [[پرستش]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] است. در آیات فراوانی به موضوع عبادت اشاره شده است: {{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}} و بیان شده که عبادت هدف اصلی خلقت است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==معناشناسی عبادت==&lt;br /&gt;
===معنای لغوی===&lt;br /&gt;
عبادت به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و خاکساری&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۵۴۲؛ فیومی، المصباح المنیر، ج۲، ص۳۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; در مقابل [[خداوند]]، [[طاعت]]&amp;lt;ref&amp;gt;فیروزآبادی، القاموس المحیط، ج۱، ص۳۱۱، ماده «عبد»؛ ابن منظور، لسان العرب، ج۳، ص۲۷۲، ماده «عبد»؛ صحاح اللغه جوهری، ماده «عبد».&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[پرستش]] و پرستیدن&amp;lt;ref&amp;gt;بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. اصل آن از &amp;quot;عبد&amp;quot; به‌معنای نهایت افتادگی در مقابل مولا&amp;lt;ref&amp;gt;حسن مصطفوی، التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۸، ص‌۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[نرمش]] و ذلیل شدن آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌فارس، معجم مقاییس اللغة، ج۴، ص۲۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===معنای اصطلاحی===&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح دینی یعنی [[اطاعت]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] و [[پرستش]]، [[خداپرستی]] و [[نیایش]] به درگاه او. عبادت عبارت است از مواظبت بر برخی [[اعمال]] که از [[ناحیه]] [[شارع]] [[دستور]] رسیده است&amp;lt;ref&amp;gt;مقالات فلسفی (۲)، ص۱۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. انجام تکالیفی همچون [[نماز]]، [[روزه]]، [[حج]] و [[جهاد]] عبادت است، البته تلاش برای تأمین [[زندگی]] از راه [[حلال]]، [[آموختن]] [[دانش]]، [[جهاد]] در [[راه خدا]]، رسیدگی به محرومان و [[نیکی]] به [[پدر]] و [[مادر]] نیز از بزرگترین عبادت‌هاست&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت در [[قرآن]]==&lt;br /&gt;
{{اصلی|عبادت در قرآن}}&lt;br /&gt;
از مجموع [[آیات]] [[قرآن کریم]] استفاده می‌شود مراد از عبادت در اصطلاح [[قرآنی]]، معنای لغوی آن است یعنی [[اطاعت]] خاضعانه و بدون چون و چرا. برخی از این آیات عبارت‌اند از:&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا با شما عهد نکردم ای فرزندان آدم که فرمانبری شیطان نکنید که دشمن آشکاری برای شماست * و اینکه فرمانبر من باشید که راه راست همین است؟» سوره یس، آیه ۶۰-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«شما و آنچه جز خداوند فرمانبری می‌کنید سوخت دوزخید که شما به دورن آن می‌روید.» سوره انبیاء، آیه ۹۸-۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بعضى از مردم خدا را تنها با زبان مى‌پرستند و اطاعت می‌کنند.» سوره حج، آیه ۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|فقه نظام سیاسی اسلام]]، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت هدف خلقت==&lt;br /&gt;
[[قرآن]]، [[فلسفه خلقت]] [[جن]] و انس را عبادت [[خدا]] می‌داند: {{متن قرآن|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;و پریان و آدمیان را نیافریدم جز برای آنکه مرا بپرستند؛ سوره ذاریات، آیه ۵۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; چرا که [[بندگی خدا]] [[انسان]] را به کمال روحی و [[معنوی]] و رشد [[اخلاقی]] می‌‌رساند و از [[گناهان]] و [[مفاسد]] باز می‌دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. به نظر می‌رسد، مراد از عبودیّت انسان که [[هدف خلقت]] بیان شده، تنها [[عبادت]] ظاهری و [[خداترسی]] نیست؛ بلکه رسیدن انسان به مقامی است که همه [[اعمال]] و [[رفتار]] او عبادت محسوب شود و به قصد [[قرب]] به [[حق‌تعالی]] انجام شود (رسد [[آدمی]] به جایی که به جز [[خدا]] نبیند) و هیچ شائبه‌ای در اعمال و رفتار فردی و [[اجتماعی]] او از [[ریا]] و [[عجب]]، [[خودبینی]]، [[تکبر]] و [[تجاوزگری]] و [[فساد]] و [[ظلم]] و... نباشد؛ چنین انسانی به [[حق]] می‌پیوندد&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبادت==&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح [[قرآن]] مفهوم گسترده‌ای دارد. یک [[درجه]] که عالی‌ترین درجه است، این است که [[انسان]] در مقابل چیزی [[سجده]] کند. ولی از آن مرحله که بگذریم، قرآن هر اطاعتی را عبادت می‌شمارد و لذا می‌فرماید: کسی که [[هوای نفس]] خویش را [[اطاعت]] کند، خودپرست است. {{متن قرآن|أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَهَهُ هَوَاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا آن کس را دیدی که هوای (نفس) خود را، خدای خویش گرفته است» سوره جاثیه، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;آشنایی با قرآن، ج۱-۲، ص۱۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. البته هر توجه یا [[خضوع]] نسبت به چیزی عبادت نیست، خضوع نسبت به چیزی اگر جنبه [[تقدیس]] پیدا کند عبادت است&amp;lt;ref&amp;gt;خدمات متقابل اسلام و ایران، ص۲۵۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==بندگی خدا==&lt;br /&gt;
{{اصلی|بندگی خدا}}&lt;br /&gt;
بنده و [[عبد خدا]] کسی است که راه را برای اجرای [[فرامین]] [[پروردگار]] عالم هموار می‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین.&amp;lt;/ref&amp;gt; و تنها خواست [[خداوند]] را انتخاب کند و از [[کمالات]] والای [[اخلاقی]] است. [[انسان]] در سایه [[عبودیت]] به کمال [[آفرینش]] که همان [[بندگی]] خداست، دست می‌یابد و براساس استعداد خود، مسیر کمال را می‌پیماید. [[پیامبر اسلام]]{{صل}} می‌فرمایند: «[[مؤمن]] اگر بخواهد بنده شایسته‌ای باشد باید حدود خدا را نگه دارد و در [[عمل]] [[بندگی]] خود را نشان دهد»&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج۱۷، ص۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[تقوای الهی]]، [[رضایت]] به [[خشنودی]] [[حق تعالی]]، عمل با [[بصیرت]] و ... از نشانه‌های بندگی و [[فریب خوردن]] از شیطان‌های گوناگون؛ [[عجب]] و [[خودبینی]]؛ [[سستی]] و کسالت و مشغول شدن به [[امور دنیا]] هم از موانع آن محسوب می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا دهدست|دهدست، محمد رضا]]، [[دانشنامه صحیفه سجادیه (کتاب)|مقاله «بندگان خدا»، دانشنامه صحیفه سجادیه]]، ص ۱۱۷-۱۲۰؛ [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۷-۴۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اهمیّت عبادت (ارزش و جایگاه عبادت)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ضرورت عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مراتب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==شرایط عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==موانع عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==لوازم عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آداب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آثار و نشانه‌های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==فواید و کارکردهای عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==گستره عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ویژگی های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عواقب ترک عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|7}}&lt;br /&gt;
* [[بندگی خدا]] ([[عبادت خدا]])&lt;br /&gt;
* [[عبادات شرعیه]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت اهل بهشت]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر مولی به امر مولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت بشر]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مشرکین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مقربین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت عملی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قلبی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت خدا]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر خدا]]&lt;br /&gt;
* [[یگانه پرستی]]&lt;br /&gt;
* [[استحقاق عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[اعمال عبادی]]&lt;br /&gt;
* [[تفاوت عبادت با تعظیم]]&lt;br /&gt;
* [[معبود]]&lt;br /&gt;
* [[وجوب عبادات]]&lt;br /&gt;
* [[بهترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[رکوع]]&lt;br /&gt;
* [[سجده]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت عالم]]&lt;br /&gt;
* [[نیکو ترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[استنکاف از عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[آفت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[برتری فضیلت علم از فضیلت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[تحرج]]&lt;br /&gt;
* [[دلبستگی]]&lt;br /&gt;
* [[رغبت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[سرکشی]]&lt;br /&gt;
* [[عابد]]&lt;br /&gt;
* [[فراغت برای عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت مؤمن]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:11123.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فقه نظام سیاسی اسلام ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1379779.jpg|22px]] [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100662.jpg|22px]] [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ مطهر&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{فضایل اخلاقی}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
{{فضیلت}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%86%D8%B5%D8%A8_%D8%A7%D9%84%D9%87%DB%8C_%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503671</id>
		<title>نصب الهی امام در کلام اسلامی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%86%D8%B5%D8%A8_%D8%A7%D9%84%D9%87%DB%8C_%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503671"/>
		<updated>2021-05-24T08:08:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[نصب الهی امام در قرآن]] - [[نصب الهی امام در حدیث]] - [[نصب الهی امام در نهج البلاغه]] - [[نصب الهی امام در کلام اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0016.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0018.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[دلایل]] [[مؤمن الطاق]] بر [[نصب الهی امام]]==&lt;br /&gt;
*در مناظره‌ای که [[مؤمن الطاق]] با فردی از [[خوارج]] دارد در پاسخ به [[پرسش]] وی مبنی بر اینکه [[امام]] تو کیست؟ می‌گوید: &amp;quot;همو که [[خدا]] و رسولش در [[روز غدیر]] او را [[منصوب]] کردند&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|من نصبه الله و رسوله یوم الغدیر}}؛ مرزبانی خراسانی، مختصر أخبار شعراء الشیعة، ص۹۰-۹۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این بیان نشان می‌دهد [[مؤمن الطاق]] [[امام]] را فردی می‌داند که از جانب [[خداوند]] و [[رسول]] او [[منصوب]] می‌شود. در مناظره‌ای دیگر، [[زید]] از [[مؤمن الطاق]] می‌پرسد: &amp;quot;آیا تو معتقدی در میان [[آل محمد]]{{صل}} امامی وجود دارد که مصداقاً معین است؟&amp;quot; و [[ابوجعفر]] پاسخ می‌دهد: &amp;quot;آری، یکی از آنها پدرت [[علی بن حسین]]{{ع}} بود&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;طوسی، اختبار معرفة الرجال، ج۲، ص۴۲۶؛ طبرسی، الاحتجاج، ج۲، ص۳۰۸؛ مجلسی، بحار الانوار، ج۴۷، ص۴۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[اکبر اقوام کرباسی|اقوام کرباسی، اکبر]]، [[مؤمن الطاق (کتاب)|مؤمن الطاق]]، ص۱۹۵-۱۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== پرسش‌های وابسته ==&lt;br /&gt;
* [[نصب امام به چه معناست؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام در قرآن آمده است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام در روایات نبوی آمده است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام عامل تفرقه بین مسلمانان است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[اگر نصب امام اتفاق افتاده است پس چرا شهرت ندارد؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
* [[پرونده:1100522.jpg|22px]] [[اکبر اقوام کرباسی|اقوام کرباسی، اکبر]]، [[مؤمن الطاق (کتاب)|&#039;&#039;&#039;مؤمن الطاق&#039;&#039;&#039;]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
* [[تعیین امام]]&lt;br /&gt;
* [[انتخاب امام]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پرسش‌های وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست پرسش‌ها}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&#039;&#039;&#039;[[:رده:آثار نصب امام|منبع‌شناسی جامع نصب امام]]&#039;&#039;&#039;==&lt;br /&gt;
* [[:رده:کتاب‌شناسی کتاب‌های نصب امام|کتاب‌شناسی نصب امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:مقاله‌شناسی مقاله‌های نصب امام|مقاله‌شناسی نصب امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:پایان‌نامه‌شناسی پایان‌نامه‌های نصب امام|پایان‌نامه‌شناسی نصب امام]]. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{یادآوری پانویس}}&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[رده:امامت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل امامت پاسخ به شبهات کلامی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%86%D8%B5%D8%A8_%D8%A7%D9%84%D9%87%DB%8C_%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503670</id>
		<title>نصب الهی امام در کلام اسلامی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%86%D8%B5%D8%A8_%D8%A7%D9%84%D9%87%DB%8C_%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503670"/>
		<updated>2021-05-24T08:06:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[نصب الهی امام در قرآن]] - [[نصب الهی امام در حدیث]] - [[نصب الهی امام در نهج البلاغه]] - [[نصب الهی امام در کلام اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[نصب الهی امام (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[پرونده:V0016.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[دلایل]] [[مؤمن الطاق]] بر [[نصب الهی امام]]==&lt;br /&gt;
*در مناظره‌ای که [[مؤمن الطاق]] با فردی از [[خوارج]] دارد در پاسخ به [[پرسش]] وی مبنی بر اینکه [[امام]] تو کیست؟ می‌گوید: &amp;quot;همو که [[خدا]] و رسولش در [[روز غدیر]] او را [[منصوب]] کردند&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|من نصبه الله و رسوله یوم الغدیر}}؛ مرزبانی خراسانی، مختصر أخبار شعراء الشیعة، ص۹۰-۹۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این بیان نشان می‌دهد [[مؤمن الطاق]] [[امام]] را فردی می‌داند که از جانب [[خداوند]] و [[رسول]] او [[منصوب]] می‌شود. در مناظره‌ای دیگر، [[زید]] از [[مؤمن الطاق]] می‌پرسد: &amp;quot;آیا تو معتقدی در میان [[آل محمد]]{{صل}} امامی وجود دارد که مصداقاً معین است؟&amp;quot; و [[ابوجعفر]] پاسخ می‌دهد: &amp;quot;آری، یکی از آنها پدرت [[علی بن حسین]]{{ع}} بود&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;طوسی، اختبار معرفة الرجال، ج۲، ص۴۲۶؛ طبرسی، الاحتجاج، ج۲، ص۳۰۸؛ مجلسی، بحار الانوار، ج۴۷، ص۴۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[اکبر اقوام کرباسی|اقوام کرباسی، اکبر]]، [[مؤمن الطاق (کتاب)|مؤمن الطاق]]، ص۱۹۵-۱۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== پرسش‌های وابسته ==&lt;br /&gt;
* [[نصب امام به چه معناست؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام در قرآن آمده است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام در روایات نبوی آمده است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[آیا نصب امام عامل تفرقه بین مسلمانان است؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
* [[اگر نصب امام اتفاق افتاده است پس چرا شهرت ندارد؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
* [[پرونده:1100522.jpg|22px]] [[اکبر اقوام کرباسی|اقوام کرباسی، اکبر]]، [[مؤمن الطاق (کتاب)|&#039;&#039;&#039;مؤمن الطاق&#039;&#039;&#039;]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
* [[تعیین امام]]&lt;br /&gt;
* [[انتخاب امام]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پرسش‌های وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست پرسش‌ها}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&#039;&#039;&#039;[[:رده:آثار نصب امام|منبع‌شناسی جامع نصب امام]]&#039;&#039;&#039;==&lt;br /&gt;
* [[:رده:کتاب‌شناسی کتاب‌های نصب امام|کتاب‌شناسی نصب امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:مقاله‌شناسی مقاله‌های نصب امام|مقاله‌شناسی نصب امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:پایان‌نامه‌شناسی پایان‌نامه‌های نصب امام|پایان‌نامه‌شناسی نصب امام]]. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{یادآوری پانویس}}&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:نصب الهی امام]]&lt;br /&gt;
[[رده:امامت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل امامت پاسخ به شبهات کلامی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503669</id>
		<title>امامت در کلام اسلامی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503669"/>
		<updated>2021-05-24T08:03:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] - [[امامت در قرآن]] - [[امامت در حدیث]] - [[امامت در نهج البلاغه]] - [[امامت در معارف دعا و زیارات]] - [[امامت در کلام اسلامی]] - [[امامت در معارف و سیره رضوی]] - [[امامت از دیدگاه اهل سنت]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;[[پیشوا]]&#039;&#039;&#039; در [[زبان فارسی]]، ترجمه تحت‌اللفظی کلمه &#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039; است. در [[عربی]] کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; یا &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot; مفهوم مقدسی ندارد. [[پیشوا]]، یعنی کسی که پیشرو است و عده‌ای تابع و پیرو او هستند؛ اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]. [[قرآن کریم]] کلمه [[امام]] را در هر دو مورد به کار برده است. در یک‌جا می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و در جای دیگر می‌‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم  که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مورد اول در مورد [[پیشوایان]] به [[حق]] است و مورد دوم در مورد [[رهبران]] [[کافر]] و [[گمراه]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از [[اصول دین اسلام]] و [[مذهب تشیع]] است. در یکی از تعاریف، به معنای [[ریاست عامه]] در [[امور دنیوی]] و [[اخروی]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در تعاریفی دیگر، [[امامت]]، [[رهبری]] [[امت اسلامی]] پس از [[پیامبر گرامی اسلام]]{{صل}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0012.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0013.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
واژه [[امام]] در لغت از ریشه “ام” است که معانی گوناگونی دارد. یکی از آنها [[مقتدا]] و پیشواست. طریحی می‌گوید: “امام به کسر الف، بر وزن فِعال به معنای کسی است که از او [[پیروی]] می‌شود”&amp;lt;ref&amp;gt;فخرالدین الطریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مؤلف [[کتاب]] [[معانی الاخبار]] نیز در توضیح وجه تسمیه [[امام]] می‌گوید: “امام را [[امام]] نامیدند به [[دلیل]] اینکه او پیشرو و مقتدای [[مردم]] است”&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن علی بابویه قمی (شیخ صدوق)، معانی الأخبار، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین [[امامت]]، همان [[ریاست عامه]] بر همه [[مردم]] است که اگر لابشرط بیاید، منظور همان [[ریاست]] [[پیامبر]] و [[رسالت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإِمَامَةُ: هي الرئاسة العامة على جميع الناس، فإذا أخذت لا بشرط شي‏ء تجامع النبوة و الرسالة، و إذا أخذت بشرط لا شي‏ء لا تجامعهما}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵).&amp;lt;/ref&amp;gt;. پس به گروهی خاص که از نظر [[فکری]]، [[اعتقادی]]، [[سیاسی]] یا زبانی، زمانی و مکانی در یک امر یا اموری خاص با یکدیگر اشتراک دارند و با یکدیگر یکی شده‌اند [[امت]] می‌گویند و رهبرشان نیز [[امام]] نامیده می‌شود. بنابراین سه واژۀ [[امام]]، [[امامت]] و [[امت]] لازم و ملزوم یکدیگرند و بدون هم معنا ندارند. [[امت]] نیز به گروهی گفته می‌شود که اعضای آن به سبب [[پیروی از امام]] واحد به نوعی با یکدیگر انتساب داشته باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: لطف الله صافی، نظام امامت و رهبری، ص۱۱-۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
نکته مهم اینکه معنای [[پیشوا]] لزوماً مثبت نیست، بلکه ممکن است [[پیشوا]] [[عادل]] یا [[فاسق]] و [[ظالم]] باشد. در [[قرآن]] کلمه [[پیشوا]] به هر دو مورد گفته شده است. در آیه‌ای آمده است: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، و در جای دیگر می‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[آیه]] نخست [[امام]] به پیشوای خیر و در [[آیه]] دوم [[امام]] به پیشوای [[شر]] گفته شده است. [[امام]] به معنای مقدم نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴-۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[قرآن]] درباره [[فرعون]] همین تعبیر را به کار برده است: {{متن قرآن|يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید» سوره هود، آیه ۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین [[امام]] به معنای طریق و [[راه]] نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يقال للطريق إِمَامٌ، لأنّه يُؤَمُّ أي يقصد و يتبع}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt;. ابن‌منظور در لسان العرب [[معتقد]] است که [[امام]] (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم‌ریشه است و هر دو از ریشه “أمّ، یؤمّ” به معنای قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۶؛ جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر یزدی مطلق، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژه [[امام در قرآن]] در غالب معانی لغوی آن به کار رفته است. البته واژه [[امام در قرآن]] کاربردهای فراوانی دارد که تفلیسی در وجوه القرآن، پنج معنای آن را به شرح ذیل برشمرده است:&lt;br /&gt;
گاهی [[امام]] به معنای [[مقتدا]] و پیشواست: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، نیز در آیه‌ای دیگر به همین معنا آمده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به معنای [[نامه]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[لوح محفوظ]]: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[تورات]] نیز به کار رفته است: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مقصود از [[امام]] در [[آیه]] اخیر، [[تورات]] است. در [[قرآن]] [[امام]] به معنای [[راه]] آشکار و روشن نیز آمده است: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ مراد [[راه]] واضح و آشکار است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جیش بن ابراهیم تفلیسی، وجوه القرآن، ترجمه مهدی محقق، ص۲۸-۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنچه بیان شد، به معانی لغوی [[امام]] مربوط بود. [[متکلمان]] در تعریف اصطلاحی [[امام]] گفته‌اند: [[امام]] [[خلیفه رسول الله]] در [[اجرای دین]] است؛ به گونه‌ای که [[پیروی]] از وی بر همه [[مسلمانان]] [[واجب]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و عند المتكلمين هو خليفة الرسول{{صل}} في إقامة الدين بحيث يجب اتباعه على كافة الأمة}} (ر.ک: محمدعلی تهانوی، موسوعة کشاف اصطلاحات الفنون و العلوم، ج۱، ص۲۵۹).&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[امام]] در اصطلاح [[شیعه]] به کسی می‌گویند که [[پیشوا]] و مقتدای عالمیان در امور [[ظاهریه]] و [[باطنیه]]، اجتماعیه و معنویۀ روحانیه، مُلْکیه و ملکوتیه است. [[خداوند]] به وی در اثر [[اختیار]] عالی و ارادۀ انتخابیۀ آن [[پیشوا]] در جمیع امور چنین [[مصونیت]] و عصمتی را بخشیده است. این [[امامان]] به [[دوازده تن]] منحصرند. بنابر [[عقیده]] و [[ایمان راسخ]] [[شیعه]]، پس از [[غیبت کبری]] آن [[حضرت]] زنده است و [[ولایت]] [[امور معنوی]] و مَلَکوتی [[عوالم]] را در [[دست]] دارد، اما به سبب [[غصب خلافت]] و [[امامت]]، فعلاً در پردۀ [[غیبت]] [[نهان]] است تا [[ظهور]] کند و متصدیان و مباشران [[سلطنت]] و [[امارت]] [[باطل]] را کنار زند و خود بر اساس [[طهارت]] سِریَّه و [[عصمت]] الهیه و [[ولایت]] کبرای حقۀ حقیقیه، بر [[مردم]] [[حکومت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[سید محمد حسین حسینی تهرانی|حسینی تهرانی|سید محمد حسین]]، امام‌شناسی، ج۱۸، ص۲۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس با توجه به تعریف‌های یادشده، [[امام]] سه ویژگی خواهد داشت: ویژگی نخست، [[جانشینی]] [[پیامبر گرامی اسلام]] است. [[امام]] کسی است که پس از [[پیامبر اسلام]]{{صل}} بر [[مسند]] او می‌نشیند. [[ولایت]] و [[سرپرستی]] بر همۀ [[مکلفان]]، از دیگر [[ویژگی‌های امام]] است. [[متکلمان]]، اغلب [[ریاست عامه]] یا [[ولایت]] بر همۀ [[مکلفان]] را در [[تعریف امامت]]، اخذ کرده‌اند، لکن در برخی نکات جنبی، اختلاف‌نظر وجود دارد. ویژگی دیگر، [[واجب‌الاطاعه]] بودن [[امام]] است. برخی از [[متکلمان]]، این قید را نیز در [[تعریف امامت]] آورده‌اند. [[امام]]، [[جانشین پیامبر]]{{صل}} و [[ولیّ]] [[امت]] است؛ به گونه‌ای که [[اطاعت]] از [[فرمان]] او در حد [[اطاعت]] از [[فرمان پیامبر]]{{صل}} [[وجوب]] دارد. [[امام]]، تنها یک [[راهنما]] و [[هدایت‌گر]] نیست که [[امت]] در قبال وی هیچ وظیفه‌ای نداشته باشد، بلکه [[امت]]، هم در امور [[دین]] و هم در [[امور دنیا]] باید از وی [[اطاعت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر محمود یزدی مطلق، ص۴۹-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از نظر [[شیعه]]، [[جامعه]] در هر زمان به [[امام]] نیاز دارد و [[زمین]] نباید هیچ‌گاه از [[حجت خدا]] خالی باشد. پس چنان‌چه شرایط برای [[حضور امام معصوم]] فراهم نباشد، آن بزرگوار تا صدور [[امر الهی]] در پس پردۀ [[غیبت]] [[منتظر ظهور]] می‌نشیند. این دوره، [[عصر غیبت]] نام دارد. [[شیعه]] [[معتقد]] است در این دوره که وجود [[حکومت]] ضروری است، باید افرادی [[حکومت]] را اداره کنند که [[تالی]] تلو معصوم‌اند و شرایط لازم تصدیگری [[حکومت]] را دارند. این [[انتصاب]] در واقع [[نصب عام]] نامیده می‌شود. &lt;br /&gt;
[[نظام امامت]] از منظر [[شیعه]] ویژگی‌ها و مختصاتی دارد که در بخش کلیات بدان اشاره خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت]]، ص ۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف [[شیخ صدوق]]===&lt;br /&gt;
*شیخ [[صدوق]] در &amp;quot;معانی الأخبار&amp;quot; در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|سُمِّيَ الْإِمَامُ إِمَاماً لِأَنَّهُ قُدْوَةٌ لِلنَّاسِ، مَنْصُوبٌ مِنْ قِبَلِ الله - تَعَالَى ذِكْرُهُ - مُفْتَرَضُ الطَّاعَةِ عَلَى الْعِبَادِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌بابویه (صدوق)، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۴-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*حاصل این تعریف، اشاره به سه رکن مهم [[امامت]] در استعمالات شرعیه است؛ یکی: &amp;quot;[[قدوه]]&amp;quot; بودن؛ دومی: &amp;quot;[[منصوب]]&amp;quot; بودن از طرف [[خدا]] و رکن سوم: &amp;quot;[[واجب الاطاعه]]&amp;quot; بودن [[امام]] است. این تعریفِ دقیق، [[جامع‌ترین]] سخن در تعریف [[امام]] را آورده است. مرحوم [[صدوق]] این قیود مذکور در متن خود را از [[روایات]] استفاده کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;در روایات بسیاری به قدوه بودن، منصوب بودن و واجب‌الاطاعه بودن امامان تصریح شده است؛ از جمله: روایت از پیامبر اکرم{{صل}}: {{متن حدیث|إنَّ أئِمَّتَكُم قادَتُكُم إلَى الله؛ فَانظُروا بِمَن تَقتَدونَ في دينِكُم وصَلاتِكُم}}؛ پيشوايان شما زمام داران شما به سوى خدايند؛ پس بنگريد از چه كسانى در نماز و دينتان پيروى مى‌كنيد. صدوق، محمد بن علی، كمال الدين، ص۵؛ و روایت امام صادق{{ع}}: {{متن حدیث|لِأَنَّ اللهَ تَبارَكَ وتَعالى نَصَبَ الإِمامَ عَلَماً لِخَلقِهِ، وجَعَلَهُ حُجَّةً}}؛ چرا كه خداى تبارك و تعالى امام را به عنوان نشانى براى خَلق خويش بر نهاد و او را حجّت قرار داد. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۲۰۳؛ و روايت مفصّل امام رضا{{ع}} در معرفی امام و امامت: {{متن حدیث|هَل يَعرِفونَ قَدرَ الإِمامَةِ ومَحَلَّها مِنَ الاُمَّةِ فَيَجوزَ فيهَا اختِيارُهُم؟ إنَّ الإِمامَةَ أجَلُّ قَدراً، وأَعظَمُ شَأناً وأَعلى مَكاناً، وأَمنَعُ جانِباً، وأبعَدُ غَوراً مِن أن يَبلُغَهَا النّاسُ بِعُقولِهِم، أو يَنالوها بِآرائِهِم، أو يُقيموا إماماً بِاختِيارِهِم... فَكَيفَ لَهُم بِاختِيارِ الإِمامِ؟! وَالإِمامُ عالِمٌ لا يَجهَلُ... مُضطَلِعٌ بِالإِمامَةِ، عالِمٌ بِالسِّياسَةِ، مَفروضُ الطّاعَةِ}}؛ آيا مردم، مقام امامت و جايگاه آن در ميان امّت را مى‌دانند تا در نتيجه، انتخاب آنان در اين باره، روا باشد؟! امامت، مقامش بزرگ‌تر و شأنش والاتر و جايگاهش بلندتر و دست‌نيافتنى‌تر و ژرف‌تر از آن است كه مردم، با خردهايشان بدان برسند، يا با انديشه‌هايشان آن را دريابند، يا با انتخاب خود، امامى را برگمارند... پس مردم را چه رسد به انتخاب امام؟! امامى كه داناست و نادانى ندارد... در پيشوايى و رهبرى، نيرومند، و به سياست داناست. فرمان بردارى از او واجب است. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۹۸-۲۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*او در جای دیگری نیز گفته است: {{عربی|الإمامة إنّما هي مشتقّة من الإيتمام بالإنسان، والإيتمام هو الاتّباع، والاقتداء، والعمل بعمله، والقول بقوله}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. {{عربی|ويجب أن يُعتقد أنّه يلزمنا من طاعة الإمام ما يلزمنا من طاعة النبيّ{{صل}}، وأنّ كلّ [[فضل]] آتاه [[الله]] عَزَّ وَجَلَّ نبيَّه فقد آتاه الإمامَ إلا النبوّة}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، الهداية في الأصول و الفروع، ج۲، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* تعاریفی که در برخی کتب متقدّم [[علمای شیعه]] آمده، [[مؤیّد]] همین تعریف‌اند؛ از جمله: تعریف [[شیخ مفید]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي التقدّم فيما يقتضي طاعة صاحبه، والاقتداء به}}. مفید، علی بن محمد، الإفصاح في الإمامة، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[علامه]] [[طبرسی]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|المستفاد من لفظ الإمام أمران؛ أحدهما: أنّه المقتدى به في أفعاله وأقواله‌. والثاني: أنّه الذي يقوم بتدبير الأمّة وسياستها، والقيام بأمورها، وتأديب جناتها، وتولية ولاتها، وإقامة الحدود على مستحقّيها، ومحاربة من يكيدها ويعاديها}}. طبرسی، فضل بن حسن، مجمع البيان، ج۱، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف مشهور [[متکلمان]]===&lt;br /&gt;
*تعریفی که غالب علمای [[کلام]] از &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; کرده‌اند، دو عنصر اساسی در آن به چشم می‌خورد؛ یکی اینکه [[امامت]] &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; است و دیگر اینکه این [[ریاست]] در &amp;quot;امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. این تعریف، بیشتر نزد [[متکلمان]] [[اهل‌سنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: ماوردی در تعریف امامت گفته است: {{عربی|الإمامة موضوعة لخلافة النبوّة في حراسة الدين وسياسة الدنيا به}}. ماوردی، علی بن محمد، الأحكام السلطانية، ص۵؛ ابن خلدون نیز مشابه این عبارت را آورده است: {{عربی|نيابة عن صاحب الشريعة في حفظ الدين وسياسة الدنيا}}. [[ابن خلدون]]، عبدالرحمن بن محمد، المقدّمة، ص۱۹۰؛ امام‌الحرمین جويني نيز گفته است: {{عربی|الإمامة رياسة تامّة، وزعامة تتعلّق بالخاصّة والعامّة في مهمّات الدين والدنيا}}. جويني، عبدالملک بن عبدالله، غياث الأمم في التياث الظلم، ص۱۵؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: فخر رازی : {{عربی|الإمامة رئاسة في الدين والدنيا عامّة لشخص من الأشخاص}}. رازی، محمد بن عمر، نهاية العقول، ج۴، ص۳۲۱؛ مير سيد شريف جرجانى : {{عربی|الإمام: الذي له الرياسة العامّة في الدين والدنيا جميعاً}}. جرجانى، على بن محمود، التعريفات، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; آمده و از آنجا به [[متکلمان]] [[زیدیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: [[حمیدان بن یحیی]] در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|هو الشخص الجامع للرئاسة على الخلق في الدين والدنيا على وجه لا يكون فوق يده يد}}. قاسمی، حمیدان بن یحیی، جواب المسائل الشتوية والشبه الحشوية، ص۴۸۴؛ احمد بن یحیی المرتضی نیز گفته است: {{عربی|رئاسة عامّة لشخص مخصوص بحكم الشرع ليس فوقها يد}}. المرتضی، احمد بن یحیی، البحر الزخار، ج۲، ص۵۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امامیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: شیخ مفید در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|الإمام هو الإنسان الذي له رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا نيابةً عن النبيّ}}. مفید، محمد بن محمد، النكت الاعتقادية، ص۳۹؛ شیخ طوسی و به تبع او، ابن میثم بحرانی نیز در تعریف [[امامت]] گفته‌اند: {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في أمور الدين والدنيا}}. طوسی، محمد بن حسن، الرسائل العشر، ج۱، ص۱۰۳؛ بحرانی، میثم بن علی، النجاة في القيامة، ص۴۱؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: محقق حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في الدين والدنيا بحقّ الأصالة}}. حلی، جعفر بن حسن، المسلك في أصول الدين، ص۳۰۶؛ علامه حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا لشخص من الأشخاص نيابةً عن النبيّ}}. حلی، حسن بن یوسف، نهج المسترشدين، ص۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نیز منتقل شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[سعد الدین تفتازانی]] در &amp;quot;شرح المقاصد&amp;quot; و [[قوشچی]] در &amp;quot;شرح تجرید&amp;quot;، [[امامت]] را چنین تعریف می‌کنند:{{عربی|الإمامةُ رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا، خلافةً عن النبيّ{{صل}}، وبهذا القيد خرجت النبوّة، وبقيد العموم مثل القضاء والرئاسة في بعض النواحي، وكذا رئاسة من جعلة الإمام نائباً عنه على الإطلاق؛ فإنّها لا تعمّ الإمامة}}&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، سعدالدین، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۴؛ قوشچی، علی بن محمد، شرح تجريد العقائد، ص۳۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*صاحبان این تعریف، معتقدند با قید {{عربی|عامّة}} ریاست‌های خُرد و با قید {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} [[نبوّت]] خارج می‌شود. پس [[امام]] آن کسی است که به صورت [[خلافت]] از [[رسول الله]]، [[ریاست عامه]] داشته باشد. در اغلب منابع [[اهل]] [[کلام]]، [[امامت]] را {{عربی|رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا}} تعریف کرده‌اند و گاهی برای دقت بیشتر، بعضی‌ها عبارت {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} را هم اضافه کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot; نیز پس از بیان تعریف لغوی، به استعمال اصطلاحی [[امامت]] نزد [[اهل]] [[کلام]] اشاره کرده و می‌گوید: {{عربی|الإمامة هي الرئاسة العامّة على جميع الناس، فإذا أُخذت لا بشرط شيء تجامع النبوّة والرسالة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: [[امامت]] به استعمال مستعمل بستگی دارد؛ اگر به‌طور کلی و عمومی بررسی شود (به تعبیر او: اگر &amp;quot;لا بشرط&amp;quot; در نظر گرفته شود)، با [[نبوت]] و [[رسالت]] قابل جمع است؛ یعنی [[نبی]] می‌تواند علاوه بر [[مقام نبوت]]، [[امام]] نیز باشد؛ البته [[امام]] غیر [[نبی]] نیز متصوَّر است. اما اگر [[امامت]] با قطع نظر از [[نبوت]] بررسی شود (به تعبیر او: &amp;quot;بشرط لا عن النبوة&amp;quot; در نظر گرفته شود)، قابل جمع با [[نبوت]] نخواهد بود. البته [[حق]] این است که در ذات مفهوم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، &amp;quot;بشرط لا&amp;quot; نهفته نیست؛ یعنی هنگامی که کلمه [[امام]] اطلاق می‌شود [[امام]]، لا بشرط مراد است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;اشکالات این تعریف&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
*بر تعریف [[متکلمان]] اشکالاتی وارد است؛ چه با قید &amp;quot;{{عربی|خلافةً عن النبيّ}}&amp;quot; و چه بدون آن. پیش از بیان این اشکالات، لازم است به مقدمه‌ای توجه شود:&lt;br /&gt;
*پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
#[[اسلام]] محمدی که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
#[[اسلام جاهلی]]&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پيمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این [[اسلام جاهلی]] بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] محمدی بود. حوادثی که [[اسلام جاهلی]] پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس شکیبایی گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با [[اسلام جاهلی]]، [[نزاع]] بر &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] آشکار [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] پنهان و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین [[اسلام]] محمدی و [[اسلام جاهلی]] و به بیانی دیگر: بین [[اسلام]] [[علوی]] و [[اسلام]] [[اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. [[اسلام جاهلی]] - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از مهم‌ترین این دست‌اندازی‌ها:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبيدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، على بن محمد، الكامل في التاريخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان [[اسلام جاهلی]]، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به [[ریاست]] و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این [[ریاست]] و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پس از این مقدمه، روشن می‌شود اشکالات اساسی تعریف مذکور از [[امامت]] به دو نکته ذیل برمی‌گردند:&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۱. [[تفسیر]] [[امامت]] به [[ریاست]] (تعریف به لازم؛ نه به [[حقیقت]]):&#039;&#039;&#039; بی‌شک، مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است و نمی‌توان این مفهوم را از [[امامت]] جدا انگاشت، لکن جنبه مهمی که در [[حقیقت امامت]] باید لحاظ شود، جنبه ریاستش نیست؛ جنبه مهم‌تری که می‌تواند گویای ماهیت و [[حقیقت امامت]] باشد، بحث ولایت‌ الامری است. [[امامت]] چیزی جز &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; نیست و [[ولایت امر]] عقلاً و نقلاً [[حق]] انحصاری [[خدای متعال]] و مقامی [[الهی]] است. البته در نگاه مردمی که [[خدا]] را از زندگی‌شان حذف می‌کنند، [[امامت]] - خواه ناخواه - تنها [[ریاست]] و [[امارت]] خواهد بود و هنگامی که [[حقوق]] و [[حدود الهی]] در محاسبات [[جامعه]] نباشند، شیخ [[قبیله]] یا هر شخص دیگری نیز می‌تواند [[رئیس]] باشد و اگر کسی [[رئیس]] شد به هر حال، باید به [[فرمان]] او رفت و از او [[تبعیت]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[انتخاب]] واژه [[ریاست]] یا [[سلطنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;پیش از این روایت طبری (م۳۱۰ق) از گفته عمر بن خطاب در سقیفه نقل شد که گفته بود: {{عربی|من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته...}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوک، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[تفسیر]] [[حقیقت امامت]]، انعکاسی از واقعیت تلخ [[جامعه اسلامی]] پس ار [[رسول الله]]{{صل}} است. حوادث [[غصب]] [[امامت]] از [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} آغازگر [[انحراف]] [[امامت]] از [[جایگاه]] اصلی‌اش شد و چون [[امامت]] را از [[جایگاه]] [[حقیقی]] و بلندش جابجا کردند، تمام این [[تحریف‌ها]] دامن‌گیر [[جامعه اسلامی]] شد. به همین [[دلیل]]، [[حضرت زهرا]]{{س}} در خطبه‌ای، به [[مردم]] عصر خود نهیب زد و فرمود: {{متن حدیث|وَيْحَهُم! أَنَّى زَحْزَحُوهَا عَنْ رَوَاسِي الرِّسَالَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۳۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ شگفتا از آنان! چگونه [[خلافت]] را از جایگاه‌های [[استوار]] [[رسالت]] دور راندند؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، عبارت [[ریاست]] یا [[سلطنت]] با مفاهیمی که در [[اسلام]] برای مسأله [[امامت]] آمده است سازگار نیست و هنگامی که به [[قرآن کریم]] و [[حدیث]] [[معصومان]]{{عم}} مراجعه می‌کنیم، می‌بینیم در مسأله [[امامت]] چیز دیگری مطرح است&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال: خدای متعال در قرآن کریم امامت را عهد الهی معرفی کند: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظّالِمِينَ}}، روايات منقول از معصومین{{عم}} نیز از امامت به عنوان جایگاه انبیا، میراث اوصیا و خلافت خدا و رسول ياد شده است: {{متن حدیث|الإِمامَةَ هِيَ مَنزِلَةُ الأَنبِياءِ، وإرثُ الأَوصِياءِ، إنَّ الإِمامَةَ خِلافَةُ الله وخِلافَةُ الرَّسولِ}}. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ حتی یک بار هم در تعابیر [[رسول اکرم]]{{صل}} کلمه [[ریاست]] به چشم نمی‌خورد و با وجود اینکه مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است، اما در [[آیات]] کریمه و [[احادیث]] [[پیامبر اکرم]] و [[اهل بیت]]{{عم}} از زاویه [[ریاست]] به آن [[مقام]] بلند نگاه نشده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از سوی دیگری، تعریف جامع و مانع، باید به جوهر و اصلِ معنا اشاره کند و واژگانی به‌کار بگیرد که مقوّم ماهیت آن مفهوم باشند؛ نه آنکه آثار یا نتایج و تبعات آن مفهوم را محور تعریف خود قرار دهد. ریاستی که در تعریف گذشته ذکر شد، نتیجه [[امامت]] است یا عَرَض عام آن؛ اما نه جوهر اصلی و مقوم ماهیتش&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[ریاست]] نیز از آن جهت که می‌تواند گسترده و کلان باشد یا نباشد، قابل تقسیم بر [[عامه]] و [[خاصه]] است. به همین [[دلیل]]، [[برادران]] [[اهل‌سنت]] چون [[امامت]] را به [[ریاست]] تبدیل کردند، ناچار شدند قید [[عامه]] را بیاورند؛ تا شامل ریاست‌های خاص و [[خرد]] نشود؛ زیرا مدیر مدرسه یا [[مسئول]] اداره نیز [[رئیس]] است و هر رئیسی [[امام]] نیست. ازاین‌رو، ناچار شدند [[ریاست]] را به قید [[عامه]] تقیید کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۲. توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]] ([[میراث]] [[اسلام جاهلی]]):&#039;&#039;&#039; همان‌گونه که اشاره شد، جداسازی [[دین الهی]] از دنیای [[مردم]] یکی از تحریف‌هایی است که دامنگیر [[امت اسلام]] شد. بنابر این، عبارت {{عربی|في أمر الدين والدنيا}} که در [[تعریف امامت]] آورده‌اند، بی‌اساس و از میراث‌های [[اسلام جاهلی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[منابع حدیثی]] و [[تاریخی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] [[نقل]] کرده‌اند از همان روزهای اولی که [[ابوبکر]] سر کار آمد، [[مردم]] و [[صحابه]] از او درباره [[دین]] سؤال می‌کردند و چون [[ابوبکر]] پاسخ آن مسائل [[شرعی]] را نمی‌دانست، به دیگران مراجعه می‌کرد. در زمان عمربن‌خطاب نیز [[رجوع]] به دیگران بیشتر اتفاق افتاد. مرحوم امینی  مسأله [[رجوع]] [[عمر]] به دیگران به‌ویژه، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} را در کتاب [[شریف]] &amp;quot;[[الغدیر]]&amp;quot; جمع کرده است؛ تقریباً یک جلد از این کتاب&amp;lt;ref&amp;gt;امینی، عبدالحسین، الغدیر، ج۶، ص۸۲ - ۳۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مختص به همین مسئله است و این سخن [[عمر]] که {{عربی|لَو لَا عَلِيٌّ لَهَلَكَ عُمَرُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه، عبدالله بن مسلم، تأویل مختلف الحدیث، ج۱، ص۱۵۲ و ص۱۶۲؛ باقلانی، ابوبکر، تمهید الأوائل فی تلخیص الدلائل، ج۱، ص۵۰۲ و ص۵۴۷؛ ابن‌مردویه اصفهانی، احمد بن موسی، مناقب علی ابن أبی طالب، ص۸۸؛ ماوردی شافعی، علی بن محمد، الحاوی الکبیر، ج۱۲، ص۱۱۵ و ج۱۳، ص۲۱۳؛ سمعانی، أبوالمظفر، التفسیر، ج۵، ص۱۵۴؛ زمخشری، محمود، المفصل فی صنعة الإعراب، ج۱، ص۴۳۲؛ ابن‌عربی، ابوبکر، العواصم من القواصم، ج۱، ص۱۹۴؛ رازی، فخرالدین، التفسیر الکبیر، ج۲۱، ص۳۸۰؛ ابن ابی‌الحدید، عبدالحمید، شرح نهج‌البلاغه، ج۱، ص۱۸ و ج۱۲، ص۲۰۵؛ قندوزی، سلیمان بن ابراهیم، ینابیع المودة، ج۱، ص۲۱۶ و ج۲، ص۱۷۲ و ج۳، ص۱۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; را آنجا مطرح و بررسی کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*به [[دلیل]] همین مطلب؛ یعنی عدم اطلاع کافی [[خلیفه اول]] و [[خلیفه دوم]] به [[کتاب خدا]] و [[سنت]] [[رسول الله]] و [[رجوع]] آنان به دیگران، [[رجال]] [[مکتب]] [[اهل‌سنت]] بین [[دین]] و [[دنیا]] جدایی قائل شدند و در نتیجه &amp;quot;[[مرجعیت سیاسی]]&amp;quot; از &amp;quot;[[مرجعیت دینی]]&amp;quot; جدا شد و این آغاز تناقض آشکاری بود که درون این [[مکتب]] اتفاق افتاد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[مکتب]] [[روایی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] برای توجیه این رویکرد، [[روایات]] مجعولی نیز [[نقل]] شده که اساس این دوگانگی را تحکیم بخشید و بر انگاره جدایی [[دنیا]] از [[دین]] صحه گذاشته است. از جمله آنها، [[روایت]] معروف &amp;quot;تأبیر النخل&amp;quot; است که [[اهل]] [[صحاح]] نیز [[نقل]] می‌کنند. در [[صحیح مسلم]] آمده است: &amp;quot;[[رسول الله]] به [[مدینه]] آمد؛ در حالی که آنان درختان [[نخل]] را بارور می‌کردند. [[رسول الله]] گفت: &amp;quot;چه کار می‌کنید؟&amp;quot; گفتند: درختان را بارور می‌کنیم. گفت: &amp;quot;شاید اگر چنین نکنید، بهتر باشد&amp;quot;. آنان نیز از آن عمل دست کشیدند در آن سال میوه درختان ریخت یا ناقص شد. [[راوی]] می‌گوید: قضیه را برای [[رسول الله]] توضیح دادند. [[پیامبر]] گفت: &amp;quot;من هم بشرم؛ هرگاه چیزی در مورد دینتان را به شما امر کردم، آن را بپذیرید و هرگاه مطابق [[رأی]] و نظر خویش چیزی را به شما گفتم؛ بدانید که من نیز بشری هستم مانند شما&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|قَدِمَ نَبِيُّ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةَ، وَهُمْ يَأْبُرُونَ النَّخْلَ، يَقُولُونَ يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ، فَقَالَ: مَا تَصْنَعُونَ؟ قَالُوا: كُنَّا نَصْنَعُهُ، قَالَ: لَعَلَّكُمْ لَوْ لَمْ تَفْعَلُوا كَانَ خَيْرًا فَتَرَكُوهُ، فَنَفَضَتْ أَوْ فَنَقَصَتْ، قَالَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ: إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ، إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ نیشابوری، مسلم بن حجاج، الجامع الصحيح، ج۴، ص۱۸۳۵. همچنین رجوع شود به: بستی، محمد بن حبان، صحيح ابن حبان، ج۱، ص۲۰۲؛ طبرانی، سلیمان بن احمد، المعجم الکبیر، ج۴، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[روایت]] و امثال آن، از جعل‌های جنایت‌آمیزی است که در [[حق]] [[حضرت رسول]]{{صل}} انجام شده و با عبارات متفاوتی [[نقل]] شده است؛ از جمله: {{متن حدیث|إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ {{متن حدیث|إِنَّمَا ظَنَنْتُ ظَنًّا، فَلَا تُؤَاخِذُونِي بِالظَّنِّ، وَلَكِنْ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنِ اللهِ شَيْئًا فَخُذُوا بِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۱؛ مسند احمد (۳/۱۵)؛ مسند عبد بن حميد، المنتخب (ص۶۴)؛ مسند ابوداود طيالسي (۱/۱۸۶)؛ طحاوي در شرح معاني الآثار (۳/۴۸)؛ ابن أبي عاصم در الآحاد والمثاني (۱/۱۶۵)؛ مسند ابي يعلى (۲/۱۲)، مسند الشاشي (۱/۶۸، ۷۰)، ابو نعيم در حلية الأولياء (۴/ ۳۷۲).&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن حدیث|أَنْتُمْ أَعْلَمُ بِأَمْرِ دُنْيَاكُمْ&amp;quot; يا: &amp;quot;إِذَا كَانَ شَيْءٌ مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَأَنْتُمْ أَعْلَمُ بِهِ، فَإِذَا كَانَ مِنْ أَمْرِ دِينِكُمْ فَإِلَيَّ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۳؛ مسند احمد (۲۰/۱۹)، سنن ابن ماجة، ح۲۴۷۱، بزار در البحر الزخار (۱۳/۳۵۵) (۱۸/۹۹)، مسند ابي يعلى (۶/۱۹۸) (۶/۲۳۷)، طحاوي در شرح مشكل الآثار (۴/۴۲۴)، صحيح ابن حبان (۱/۲۰۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مضمون کلی این [[نقل]] قول‌های تحریف‌آمیز این است که اگر در مورد دینتان فرمانی صادر کردم، آن را بپذیرید و اگر در مورد [[دنیا]] به شما دستوری دادم پس از من [[اطاعت]] نکنید! و مفاد نهایی آن، اصل &amp;quot;جدایی [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است که در [[روایات]] مجعولی [[نقل]] شده است. متأسفانه این از [[روایات]] متفق‌ علیه [[برادران]] [[اهل‌سنت]] است و با صریح [[قرآن]] تناقض دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پرسشی که اینجا باید مطرح شود اینکه: &amp;quot;بیع&amp;quot;، &amp;quot;[[تجارت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[زکات]]&amp;quot; و &amp;quot;[[خمس]]&amp;quot; از [[امور دنیوی]] شمرده می‌‌شوند یا از [[امور دینی]]؟ [[قرآن]] درباره بیع سخن گفته است، آیا بیع [[دنیوی]] است و [[دینی]] نیست؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(همان) کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند» سوره حج، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[اداره امور]] [[کشور]] یعنی عمل به [[احکام اسلام]]. حال اگر [[احکام اسلام]] به‌گونه‌ای بیان کنیم که مربوط به [[دین]] باشد و ربطی به [[دنیا]] نداشته باشد، تناقض است. متأسفانه در [[کلام]] و [[حدیث]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] تناقضاتی دیده می‌شود؛ تناقض‌هایی در مسائل [[توحید]]، [[نبوت]]، [[خلافت]] و [[امامت]] که حتی به [[فروع دین]] نیز کشیده شده است &amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال، برادران اهل سنت حدیث عشره مبشره را روایت می‌کند که ده نفر از جمله طلحه و زبیر، همگی در بهشت هستند. از طرفی قرآن می‌گوید که {{متن قرآن|وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا}}؛ «و آنان که با خداوند و پیامبر او نافرمانی کنند بی‌گمان آتش دوزخ، آنان راست که هماره در آن جاودانند» سوره جن، آیه ۲۳. خدا و رسول را اینها معصیت کردند؛ با اینکه خدا دستور داده بود از پیامبر و اولی‌الامر اطاعت کنند: {{متن قرآن|أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ}}؛ «از خداوند فرمان برید و از پیامبر و صاحبان امری که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹. اما اینان اطاعت نکردند؛ اکنون اهل سنت این تناقض را چگونه حل می‌کند؟ چطور می‌شود اینها هم بهشتی باشند و هم جهنمی؟! امثال این تناقض‌ها بسیارند که تنها راه برون رفت از آنان بازگشت به اسلام اصیل و قرآن و عترت است. این‌گونه بود که تقابل بین دین و دنیا در تفکر اسلامی رخنه کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[اسلام]] محمدی{{صل}}، [[دین]] همان شریعتی است که دنیای [[مردم]] را اداره می‌کند؛ بنابر این، در نگاه [[اسلام]] محمدی{{صل}} دو مقوله جدا از یک‌دیگر به نام &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; و &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; وجود ندارد. بی‌گمان، [[رسول الله]]{{صل}} چون [[رئیس]] [[دین]] بود، [[رئیس]] [[دنیا]] نیز بود و چون این [[خلافت]]، [[خلافت]] [[رسول]] خداست، باید &amp;quot;[[ریاست عامه]] در [[دین]]&amp;quot; باشد که همان &amp;quot;[[ولایت امر]] بر دنیای [[مردم]]&amp;quot; است، لکن در [[تفسیری]] که بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} از [[دین]] ارائه شد، [[دین]] و [[دنیا]] از یک‌دیگر تفکیک شدند و از اینجا بود که میان [[دین]] و [[دنیا]] [[تقابل]] ایجاد شد و باعث اندیشه‌های [[انحرافی]] فراوانی گردید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اما [[امامت]] در [[مکتب]] [[اهل‌بیت]]{{عم}} این‌گونه تعریف نشده است. همان‌گونه که خواهد آمد، [[امامت]]، ولایت‌الامر است و اساساً [[تقابل]] [[دین]] و [[دنیا]] در این [[مکتب]] معنا و مفهوم ندارد؛ آن [[دینی]] که [[قرآن کریم]] معرفی می‌کند همین [[شریعت]] است و [[شریعت]] شامل همه امور دنیاست و [[رسول اکرم]]{{صل}} [[مبعوث]] شد تا [[مردم]] را در [[دنیا]] [[هدایت]] کند تا بتوانند در [[دنیا]] و [[آخرت]] [[سعادتمند]] باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*طبق آموزه‌های قرآنی و حدیثی، [[امامت]]، [[استمرار نبوت]] است در همه جزئیات و کلیات و تنها تفاوت آن با [[نبوت]] این است که بر شخص [[امام]] [[وحی]] فرود نمی‌آید و [[نزول وحی]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} پایان یافته است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از گذر [[علم لدنی]] و [[الهام الهی]] و [[مصونیت از خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]]، از [[آیین]] [[پیامبر اسلام]]{{صل}} [[پاسداری]] می‌کند و [[مصالح دینی]] و [[دنیوی]] [[مردم]] را محفوظ می‌دارد. [[تعالیم]] [[راستین]] آسمانی در روزگار پس از [[پیامبر]]{{صل}} تنها از این گذر به دست [[انسان]] می‌رسد و [[قرآن کریم]] و [[سنت پیامبر]] از این طریق [[تفسیر]] و [[تبیین]] می‌شود. [[شیعیان]] معتقدند که [[مقام امامت]] تنها به [[معصومین]] می‌رسد. [[متکلمان امامیه]] بر این [[اعتقاد]] دلایلی آورده‌اند؛ از جمله اینکه [[مردم]] از آن رو به [[امام]] محتاج‌اند، که [[معصوم]] نیستند و بدون او به [[خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]] می‌لغزند. حال، اگر [[امام]]، [[معصوم]] نباشد، خود به امامی دیگر [[نیازمند]] است و این [[باطل]] است؛ زیرا مستلزم دور است. چون [[متکلمان امامیه]] این مدعا را ثابت می‌کنند، از آن نتیجه می‌گیرند که [[مردم]] را در [[انتخاب]] شخص [[امام]]، [[حق]] و سهمی نیست؛ زیرا او باید [[معصوم]] باشد و [[عصمت]] حالتی است [[باطنی]] و جز [[خداوند]] کسی از [[باطن]] [[انسان]] خبر ندارد و [[مردم]] توانِ آن ندارند که [[معصوم]] را از غیر [[معصوم]] بازشناسند&amp;lt;ref&amp;gt;بدایة المعارف الالهیة فی شرح عقائد الامامیه‌، ۱۰۰؛ فرهنگ معارف اسلامی، ۱/ ۲۸۵ و ۲۸۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲-۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بدین‌سان، [[امامت]] همانند [[نبوت]] محتاج [[نص]] [[خداوند]] است و این [[نص]] یا به واسطه [[پیامبر]] تحقق می‌یابد و او به صراحت [[امام]] را معرفی می‌کند و یا به واسطه امامی که خود [[منصوب]] به [[نص]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مفهوم [[امامت]] در [[علم کلام]]==&lt;br /&gt;
*کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; در [[زبان فارسی]] یعنی &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در [[زبان عربی]] به معنای &amp;quot;[[رهبر]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. [[امام]] و [[امامت]] بر حسبِ لغت، مشتق از &amp;quot;أمّ&amp;quot; به معنای هر چیزی است که چیزهای دیگر به آن ضمیمه و نسبت داده می‌شوند، یا از او پیدا می‌شوند، یا [[الهام]] می‌گیرند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به همین منظور، کلمه [[امام]] یا [[پیشوا]] به خودی خود مفهوم مقدسی ندارد، زیرا [[پیشوا]] یعنی کسی که پیش روست، عده‌ای تابع و پیرو او هستند، اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] و راه یافته و درست‌رو باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]، [[قرآن]] هم کلمه [[امام]] را در هر دو مورد اطلاق کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در یک [[آیه]] می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; در آیه‌ای دیگر: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنان مردم را به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; از این رو، لفظ &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; دارای مفهوم لغوی اختصاصی نیست بلکه مفهومی عام دارد و به همه [[رهبران]] [[حق و باطل]] اطلاق می‌شود.&lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] در چند مورد است که در پاره‌ای موارد [[اهل تسنن]] هم قائل به [[پیشوایی]] و [[امامت]] هستند ولی در کیفیت و شخصش با ما [[اختلاف]] دارند، اما در بعضی مفاهیم [[امامت]] اصلاً آنها منکر چنین امامتی هستند. [[امامت]] در معانی: &amp;quot;[[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]]، [[مرجعیت دینی]]، [[ولایت]]&amp;quot; استعمال شده است که [[اهل تسنن]] فقط معنای [[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]] را قبول دارند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶–۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[شیعه]] قائل است که [[پیغمبر]]{{صل}} [[رهبر]] و [[زعیم]] بعد از خودش را [[تعیین]] کرد و گفت بعد از من زمام امور [[مسلمانان]] باید به دست [[علی]]{{ع}} باشد و [[اهل تسنن]] با [[اختلاف]] منطقی که دارند این مطلب را لااقل به شکلی که [[شیعه]] قبول دارد، قبول ندارند و می‌گویند در این جهت [[پیغمبر]] شخص معیّنی را [[تعیین]] نکرد و [[وظیفه]] خود [[مسلمانان]] بوده است که [[رهبر]] را بعد از [[پیغمبر]] [[انتخاب]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با بیان فوق روشن گردید که [[امامت]] نسبت به [[ولایت]] اعم مطلق است و وقتی [[متکلم]] از [[ولایت]] بحث می‌کند در واقع منظورش جنبه [[زعامت]] و رهبریِ [[اجتماعی]] [[امام]] است. [[متکلمین]]، تعاریف گوناگونی از [[امامت]] ارائه می‌دهند که به برخی از آنها اشاره می‌شود:&lt;br /&gt;
#تعریف مختارِ &amp;quot;[[محقق بحرانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کمال‌الدین ابن‌میثم بحرانی، متوفای ۶۷۹ ق است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] المرام: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در [[دین]] و [[دنیا]] اصالتاً (نه بر [[سبیل]] [[نیابت]])&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|وهي رئاسة عامّة في أمور الدّين والدنيا بالإصالة}}؛ میثم بن علی بن البحرانی، قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۴ و ر.ک: محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف مربوط به &amp;quot;[[تفتازانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;سعدالدّین تفتازانی (۷۱۲ - ۷۹۳) متکلم برجسته اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در شرح المقاصد: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در امر [[دین]] و [[دنیا]] از باب [[جانشینی پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي رِئاسَة عامّةٌ فی امُورِ الدِّینِ وَ الدُّنْیا، خَلافَة عَنِ النَّبی{{صل}}}}؛ محمد حسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف جناب &amp;quot;[[ایجی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;عضدالدین ایجی (۴۵۰ - ۵۰۵) متکلم نام‌دار اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در المواقف: &amp;quot;[[امامت]] یعنی [[نیابت]] و [[جانشینی پیامبر]] در برپا داشتن [[احکام دین]]، به‌طوری که [[تبعیت]] از او بر عموم [[مسلمین]] [[واجب]] است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي خلافة الرّسول في اقامة الدين بحيث يجب اتّباعه علی كافّة الامّة}}؛ عضدالدین ایجی، المواقف فی علم کلام، ص۶۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#&amp;quot;[[ابن خلدون]]&amp;quot; می‌نویسد: &amp;quot;[[خلافت]] یعنی [[نیابت]] از صاحب [[شریعت]] در [[حفظ دین]] و [[سیاست]] [[دنیا]]. به این اعتبار [[خلافت]] و [[امامت]] گفته می‌شود و متصدی آن [[مقام]] را [[امام]] و [[خلیفه]] می‌گویند&amp;lt;ref&amp;gt;مقدمه ابن‌خلدون، ص۱۹۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#تعریف [[متکلمین]] [[شیعه]] و [[سنّی]] از [[امامت]] که در آن اختلافی ندارند این است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از یک [[ریاست]] و اولی بالتصرف بودن در جمیع [[شئون]] [[دین]] و دنیای [[مردم]] (اعم از [[بیان احکام]]، [[اجرای حدود]]، اداره [[جامعه]]، ایجاد [[عدالت اجتماعی]]، [[جنگ]] و [[صلح]] و...) برای شخص معیّنی از [[انسان‌ها]] به عنوان [[نیابت]] و [[جانشینی]] از [[پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامامة رئاسة عامّة في امور الدّين والدنيا، لشخص من الأشخاص نيابة عن النبي{{صل}}}}؛ علی محمدی، شرح کشف المراد، ص۴۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در این تعریف، [[ولایت]] و [[امامت]] [[ریاست عامه]] الهیه معرفی شده، لذا مستلزم اجزایی است که عبارتند از: تقدم، [[علم]]، [[قدرت]] و [[حُکم]]، که بدون این اجزا، ریاستی متصور نیست. پس &amp;quot;[[ولیّ]]&amp;quot; کسی است که در [[خلقت]] خود، متقدم، عالِم، [[قادر]]، [[حاکم]] و نسبت به دیگر مخلوقات تصرف‌کننده علی‌الاطلاق باشد. اما تقدم او برای آن است که ولیِّ مطلق، [[انسانی]] است که [[خداوند]] او را خلعت [[جمال]] و کمال پوشانیده، و [[قلب]] او را مکان [[مشیت]] خود قرار داده و خزینه [[علم]] خود گردانیده و [[لباس]] [[تصرف]] [در [[آفرینش]]] و [[حکم]] [بر مخلوقات] را بر قامت او پوشانیده است. [[امر الهی]] در عالَم بشری در [[اختیار]] اوست. او مانند آفتابی درخشان است که [[خالق]] [[جهان]] در آن درخشش، [[نور]] [[حیات]] و [[اشراق]] و احتراق برای [[اهل]] روزگارها قرار داده است&amp;lt;ref&amp;gt;ماهنامه موعود، شماره ۶۶، اسفند ۱۳۸۵، مقاله &amp;quot;امامت و ولایت خاتم الانبیا&amp;quot; تلخیصی از کتاب ولایت کلّیه، سید حسن میرجهانی اصفهانی.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#[[متکلم]] بزرگ [[شیعه]] &amp;quot;[[خواجه نصیر طوسی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;خواجه نصیرالدّین طوسی (۵۹۷ -۶۷۲) سلطان المحققین، استادالبشر، حکیم و ریاضی‌دان، فیلسوف و متکلم بزرگ شیعی، مؤلف گران‌قدر کتاب کلامی ارزشمند تجریدالاعتقاد و شارح اشارات بوعلی سیناست.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] العقائد تعریف مُتقن و جامعی را مطرح کرده است که از تعاریف پیش مناسب‌تر است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست]] عمومی [[دینی]] که عهده‌دار [[ترغیب]] همه [[مردم]] در [[حفظ]] و حراست از [[مصالح دینی]] و [[دنیایی]] بوده و آنان را بر حسب همان [[مصالح]] از آنچه برای‌شان ضرر دارد، برحذر می‌نماید&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإمامة رئاسة عامّة دينية مشتملة على ترغيب عموم الناس في حفظ مصالحهم الدينية و الدنياوية، وزجرهم عمّا نصرهم بحسبها}}؛ خواجه نصیر طوسی، قواعد العقائد، ص۱۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با دقت و نظر اجمالی به تعریف مزبور می‌توان به [[جامعیت]] و تمامیت آن [[اذعان]] نمود، چه آنکه در این تعریف [[مقید]] نمودن [[ریاست]] به &amp;quot;[[ریاست]] [[دینی]]&amp;quot; کاشف این معناست که [[امامت]]، منصبی است [[الهی]]، نه [[مقام]] و منصبی [[اجتماعی]] که [[مردم]] در [[انتخاب]] آن نقش داشته باشند. و این نکته مهم و برجسته‌ای است که [[علمای شیعه]] به آن اهتمام داشته و ادله‌ای بر [[اثبات]] آن اقامه کرده‌اند. و اصولاً همین نقطه محلّ [[اختلاف]] [[شیعه]] و [[اهل سنّت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۱ و ۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*هم‌چنین برخلاف نظریه اکثر علمای [[اهل سنت]] که [[امامت]] و [[خلافت]] را مرادف دانسته و گفته‌اند [[خلافت]] و [[امامت]] یک معنا دارد&amp;lt;ref&amp;gt;جعفر سبحانی، رهبری امت، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، هر گاه یکی از آنها صادق باشد دیگری نیز صادق خواهد بود. [[عالمان]] [[شیعی]] این مطلب را رد کرده و گفته‌اند که در تحقق معنای [[امامت]]، [[پیشوایی]] شرط است. [[امام]] باید به آنچه می‌گوید عمل کند و قولاً و عملاً [[مردم]] را [[رهبری]] کند. اما در تحقق معنای لغوی [[خلافت]] همین اندازه کافی است که شخص [[خلیفه]] برای [[جانشینی]] از [[پیغمبر]] [[تعیین]] شده باشد و در غیاب او کارهایش را انجام دهد. پس، این دو معنا مرادف نیستند، هر چند ممکن است در یک شخص جمع شوند&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در نتیجه می‌توان [[اذعان]] داشت که اگر [[امام]] به‌طور مطلق بر کسی گفته شد و قرینه‌ای وجود نداشت که موضوع امامتش را محدود کند باید گفت [[پیشوا]] و [[رهبر]] کلی است و در کلّیه [[امور معنوی]] و [[مادّی]] [[پیشوایی]] دارد. همان‌طوری که [[امام رضا]]{{ع}} در [[تعریف امامت]] می‌فرماید: &amp;quot;[[مقام امامت]] بزرگ‌تر و عالی‌تر و دقیق‌تر از آن است که [[عقول]] [[مردم]] بدان برسد، یا به واسطه آرای خودشان بتوانند آن را [[درک]] کنند یا امامی را [[اختیار]] نمایند... [[امامت]] یعنی نگه‌داری [[دین]] و [[حفظ نظام]] [[مسلمانان]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، ج۱، ص۱۹۹-۲۰۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۰-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==معانی [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای نخست:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[اخلاقی]] محض به معنای الگوی [[اخلاقی]]. در این صورت مقصود از {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که من تو را الگویی [[اخلاقی]] قرار دادم که بدون داشتن اختیارات [[حکومت]] و [[سیاست]] و [[تدبیر امور]]، به او [[اقتدا]] می‌شود.&lt;br /&gt;
حتی بدون توجه به قرینه‌هایی که پیش از این گفتیم نیز این معنا نمی‌تواند مدنظر باشد؛ زیرا&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] [[اخلاقی]] برای همۀ [[پیامبران]] نسبت به دیگر [[مردم]] ثابت است؛ زیرا [[انبیا]] [[برترین]] [[بندگان]] و بهترین‌هایی هستند که [[خداوند]] از میان آفریدگانش [[برگزیده]] است. [[خدای سبحان]] می‌فرماید:&lt;br /&gt;
{{متن قرآن|اللَّهُ يَصْطَفِي مِنَ الْمَلَائِكَةِ رُسُلًا وَمِنَ النَّاسِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند از فرشتگان رسولانی برمی‌گزیند، و همچنین از مردم» سوره حج، آیه ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لازمۀ اصطفا و [[گزینش الهی]]، کمال [[اخلاقی]] است که دارندۀ آن را در جایگاهی قرار می‌دهد که باید به او [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[الگو]] گرفت. این [[گزینش]] نیز برای [[ابراهیم]] ثابت بوده است؛ چه اینکه او [[پیامبری]] بود که [[خداوند سبحان]] پیش از [[عهد امامت]]، او را برای [[نبوت]] و [[رسالت]] [[برگزیده]] بود. پس درست نیست که از این [[امامت]]، تنها الگوی [[اخلاقی]] محض قصد شده باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۹-۱۷۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*با روشن شدن این مطلب، می‌گوییم: در این [[آیه]] قرینه‌های روشنی وجود دارد که نشان می‌دهد [[امامت]] در اینجا منصبی قانونی است و تنها یک ویژگی [[اخلاقی]] [[تکوینی]] نیست. از جمله:&lt;br /&gt;
#تعبیر از [[امامت]] به “عهد”؛ این تعبیر به صراحت بیان می‌کند که [[امامت]] نه ویژگی [[تکوینی]] بیرونی، بلکه منصبی اعتباری و قانونی است که [[خداوند]] [[عهد]] و [[پیمان]] بر آن را به هر کس بخواهد عطا می‌کند.&lt;br /&gt;
#[[نفی]] [[امامت]] از [[ظالمان]]؛ زیرا کمال [[اخلاقی]] و الگوگری [[معنوی]]، اساساً و به خودی خود از [[ظالمان]]، [[نفی]] شده است و اگر مقصود از عبارت {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} چنین معنایی می‌بود، تحصیل حاصل بوده، بیان آن از سوی حکیمی [[فصیح]] و [[بلیغ]]، [[زشت]] و نارواست؛ چرا که [[ظالم]] از پایه، ویژگی الگوگری [[اخلاقی]] را ندارد و نیازی نیست که [[خداوند متعال]] با این سخن آن را [[نفی]] کند: {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۰-۱۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای دوم:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[فکری]] و [[اعتقادی]]. مقصود از این [[پیشوایی]]، [[رهبری]] [[مردم]] در [[باور]] به [[توحید]] است؛ یعنی همان [[دین ابراهیم]] که [[مأمور]] به [[پیروی]] از آن هستیم.&amp;lt;ref&amp;gt;اشاره به آیه:{{متن قرآن|قُلْ صَدَقَ اللَّهُ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا}} «بگو: خدا راست گفته است. بنابراین، از آیین ابراهیم پیروی کنید، که به حق گرایش داشت» سوره آل عمران، آیه ۹۵. (مترجم)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ممکن نیست مقصود از [[امامت]] در آیۀ [[عهد]]، صرف [[پیشوایی]] [[فکری]] در [[باور]] به [[توحید]] باشد. پیش از آنکه [[دلایل]] این مطلب را توضیح دهیم، باید به نکته‌ای اساسی اشاره کنیم و آن اینکه گاهی مقصود از [[توحید]]، [[توحید نظری]] محض است؛ یعنی [[باور]] [[ذهنی]] به [[توحید]]، حتی اگر عملاً در واقعیت محقق نشود. گاه نیز منظور از [[توحید]]، [[باور]] [[توحیدی]] محقَّق و مجسَّم در واقعیت [[انسانی]] است که آن را [[توحید عملی]] می‌نامیم.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۱-۱۷۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای سوم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] به معنای [[نبوت]] که در این صورت مقصود از آیۀ {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که تو را [[پیامبر]] قرار دادیم.&lt;br /&gt;
*بطلان این احتمال، روشن و [[مورد اتفاق]] است. [[یقین]] به این [[حقیقت]] که [[نبوت]] پیش از [[آزمون]] [[ذبح]] [[اسماعیل]] برای [[ابراهیم]] ثابت بوده، برای بطلان این معنا کافی است؛ زیرا این [[آیه]] به صراحت تأکید می‌کند که [[امامت]] پس از موفقیت [[ابراهیم]] در آزمون‌ها و بلاهایش برای او قرار داده شد؛ آزمون‌هایی که بی‌شک ابتلای [[ذبح]] [[اسماعیل]] از مهم‌ترین و بزرگ‌ترین آنها بود و [[قرآن کریم]] نیز با این عبارت بر آن تصریح می‌کند: {{متن قرآن|إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ}}. پس [[امامت]] مدت‌ها بعد از [[پیامبری]] برای [[ابراهیم]] قرار داده شد و از این‌رو ممکن نیست که مقصود از [[امامت]] در اینجا، [[پیامبری]] باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۵-۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای چهارم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] شامل [[پیشوایی]] در [[سیاست]] و [[حکومت]]. با [[اثبات]] بطلان دیگر معانی، این تنها معنای ممکنی است که می‌توان از مجموع معانی بیان شده برای واژۀ [[امامت]] در این [[آیه]] فرض کرد؛ معنایی که ظاهر [[آیه]] و قرینه‌های پرشماری که برخی از آنها را پیش از این بیان کردیم نیز بر آن دلالت می‌کنند.&lt;br /&gt;
از آنچه گفتیم روشن شد که عبارت {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} دلالت دارد که [[منصب]] [[ریاست]] و [[رهبری سیاسی]] برای [[ابراهیم]]{{ع}} قرار داده شده است و این دلالت به اندازه‌ای روشن است که جایی برای [[شک و تردید]] باقی نمی‌گذارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تجلی [[توحید]] در [[نظام امامت]]==&lt;br /&gt;
*چون [[خداوند]] موجودی ادراک ‌نشدنی است و با کسی روبه‌رو و طرف [[گفت‌وگو]] نمی‌شود، پس ناگزیر کسانی از خود [[مردم]] را بر آنان می‌گمارد تا به جای خودِ او با [[مردم]] گفت‌وشنود کنند و [[حقّ حاکمیت]] و فرمان‌دهی [[خداوند]] را به مرحله [[اجرا]] و تحقق برسانند و فرستادن آنها [[لطف]]&amp;lt;ref&amp;gt;علامه حلی در این باره میفرمایند: {{عربی|الإمام لطف فيجب نصبه على الله تعالى تحصيلا للغرض}}. [وجود] امام لطف است؛ پس نصب او بر خدای متعال واجب است، برای آنکه غرض (و هدف الهی از هدایت بندگان) حاصل گردد، ر.ک: علی شیروانی، ترجمه و شرح کشف المراد، ج۲، ص۵۹-۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[مهربانی]] از سوی او به [[مردم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;نشریه همشهری، شماره ۸، اردیبهشت ۱۳۷۷، مقاله امامت در چشم‌انداز کلام شیعی برگرفته از کتاب جستاری در فلسفه امامت، نوشته اصغر دادبه.&amp;lt;/ref&amp;gt;، لذا [[ولایت]] [[نبویه]] به نوعی [[ولایت]] الهیه است و [[ولایت]] [[امامیه]] نیز استمرار [[ولایت]] [[نبویه]] می‌باشد.&lt;br /&gt;
*برحسب [[عقیده]] [[توحید]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] حقیقیّه مطلقه، مختص به خداست و [[حق]] و [[حقیقت]] این صفات، بنابر [[آیات قرآنی]]: {{متن قرآن|فَاللَّهُ هُوَ الْوَلِيُّ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «اما خداوند است که سرور (راستین) است» سوره شوری، آیه ۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; فقط برای او ثابت است&amp;lt;ref&amp;gt;آیت الله جوادی آملی در کتاب شمیم ولایت، ص۹۴-۱۰۰ انحصار ولایت را برای خداوند با ادله عقلی و نقلی اثبات می‌کند.&amp;lt;/ref&amp;gt;. و هیچ کس در عوض [[خدا]]، حتی بر نفس خود، نه [[سلطنت]] و [[ولایت تکوینی]] دارد و نه [[ولایت تشریعی]]؛ تا چه رسد به اینکه بر دیگری [[ولایت]] و [[حکومت]] داشته باشد، یا مالک امر او باشد&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[ولایت]] [[حقیقی]]، اوّلاً و بالذّات از آنِ خداست و [[ولایت]] و [[حکومت]] و مالکیتی که به [[اذن خدا]] برای بعضی از بندگانش اعتبار می‌شود، اعتباری و قراردادی بوده و [[حقیقی]] نیست&amp;lt;ref&amp;gt;عبدالله جوادی آملی، شمیم ولایت، ص۱۰۵-۱۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لذا به [[عزل]] و اسباب دیگر، قابل زوال و انتقال است. این [[ولایت]] از نوع [[ولایت]] و [[حکومت]] الهیه نیست، چون [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] [[حقیقی]] و خودبه‌خود و دائم و [[ابدی]] است و مقتضای [[ارتباط]] و تعلق مخلوق به [[خالق]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] [[حقیقی]] [[خالق]] است. مخلوق، هویتش مملوکیت و [[نیازمندی]] و [[فرمان‌پذیری]] و عنایت‌خواهی است، نه مملوکیت [[بنده]] و تحت [[ولایت]] [[خدا]] بودن او قابل سلب شدن است، چون ذات او، هویتش و واقعیتش همین است؛ و نه [[مالکیت]] و [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] بر بندگانش قابل سلب و اعطا و انتزاع است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و خلاصه اینکه [[تصرف در امور]] [[عامه]] و رتق و فتق امور و حلّ و فصل [[کارها]] و اِعمال [[ولایت]] بر خلق‌الله، اگرچه یک نفر هم باشد، [[تصرف]] در [[سلطنت الهی]] و [[مُلک]] خدایی است که باید به اِذن [[خدا]] باشد؛ چنان‌که برحسب [[آیات قرآن کریم]]&amp;lt;ref&amp;gt;مانند آیات ولایت، اولوالامر و تطهیر.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[احادیث متواتر]]&amp;lt;ref&amp;gt;برای نمونه ر.ک: اصول کافی، کتاب الحجه، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; که از طریق [[شیعه]] و [[سنّی]] [[روایت]] شده است، در [[امت]] این برنامه انجام شده و [[حضرت رسول]]{{صل}} [[نظام امامت]] را به [[مردم]] [[ابلاغ]] کرده و &amp;quot;اولوالامری&amp;quot; که تا [[روز قیامت]] عهده‌دار این منصب‌اند و [[دوازده]] نفرند، به [[امت]] معرفی شده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از بیانات پیشین می‌توان نتیجه گرفت که رابطه بین [[شناخت امام]] و [[یگانگی خداوند]] [[متعال]] رابطه‌ای دو طرفه است، زیرا از طرفی باید [[توحید خداوند]] و [[حاکمیت]] مطلق باری‌تعالی را پذیرفت و از طرفی نیز باید [[ایمان]] که [[معرفت خداوند]] فقط در پرتو [[شناخت]] و [[پیروی]] از [[ائمه اطهار]]{{عم}} امکان‌پذیر است. در لسان [[روایات]] این مطلب به صراحت مطرح شده است؛ چنان‌که [[ابوحمزه]] می‌گوید: [[امام باقر]]{{ع}} به من فرمود: &amp;quot;[[خدا]] را یقیناً کسی پرستد که او را بشناسد و کسی که به [[خدا]] [[معرفت]] پیدا نکند او را گمراهانه می‌پرستد&amp;quot;. عرض کردم: فدایت شَوم؛ [[معرفت خدا]] چیست؟ فرمود: &amp;quot;[[باور]] داشتن [[خدای متعال]] و [[باور]] داشتن [[پیغمبر]]{{صل}} و [[دوست داشتن علی]] و [[پیروی]] از او و [[ائمه اطهار]]{{عم}} و [[بیزاری جستن]] به [[خدای سبحان]] از [[دشمن]] آنان. این چنین شناخته می‌شود [[خدای عزوجل]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، کتاب الحجه، بابُ معرفة الإمام و الرَّد إلیه.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۵-۶۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مباحث [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*مباحث [[امامت]] بر پنج محور کلی [[استوار]] است:&lt;br /&gt;
# [[حقیقت امامت|حقیقت]] یا [[چیستی امامت]] (ما الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[وجوب وجود امام]] یا [[ضرورت امامت]] (هل الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[غایت امامت]] یا [[کارکردهای امام]] و در ذیل آن، [[شئون امام|شئون]] و [[وظایف امام]] (لم یجب وجود الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[صفات امام|صفات]] و [[ویژگی‌های امام]] و در ذیل آن، [[راه‌های شناخت امام]] (کیف الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[تعیین امام]] در هر زمان و در ذیل آن، [[نصوص امامت]] و [[افضلیت امیرالمؤمنین]]{{ع}} و یازده [[امام]] بعد، [[معجزات]] هر یک از [[امامان]] [[دوازده گانه]] و [[مهدویت]] و مباحث مرتبط با آن (مَنِ الإمام؟)&amp;lt;ref&amp;gt;تلخیص المحصل، ص۴۲۶- ۴۲۷؛ قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۳- ۱۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*چهار مبحث نخست، مباحث کلی [[امامت]] ([[امامت عامه]]) را تشکیل می‌دهد و مبحث اخیر مربوط به [[امامت خاصه]] است. به عبارت دیگر مسایل کلی و عمومی [[امامت]]، مربوط به [[امامت عامه]] است و مسایل مربوط به مصداق‌شناسی [[امام]] و این که [[امامان]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} چه کسانی بوده‌اند، مسایل [[امامت خاصه]] است. مباحث [[امامت خاصه]] در مدخل‌های مناسب [[تبیین]] خواهد شد. چنان که پاره‌ای از مباحث کلی [[امامت]] نیز که از اهمیت یا گستردگی خاصی برخوردارند مدخل‌های مستقلی خواهند داشت.&lt;br /&gt;
* [[عصمت امام]]، [[افضلیت امام]] و [[علم امام]] از این گونه مباحث‌اند. در این مقاله دیگر مباحث کلی [[امامت]] بررسی خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴؛ [[عبدالمجید زهادت|زهادت، عبدالمجید]]، [[معارف و عقاید ۵ ج۱ (کتاب)|معارف و عقاید ۵]] ص ۲۵-۳۰&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==نخست: [[حقیقت امامت]]==&lt;br /&gt;
==دوم: [[ضرورت امامت]]==&lt;br /&gt;
==سوم: [[غایت امامت]]==&lt;br /&gt;
==چهارم: [[صفات امام]]==&lt;br /&gt;
*درباره [[صفات امام]] در منابع [[شیعه]] و [[اهل سنت]] بحث‌های فراوانی شده است. [[تفتازانی]] [[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]]، [[مرد بودن]]، [[اجتهاد]]، [[شجاعت]]، [[با کفایت]] و [[قریشی بودن]] را شرط می‌داند. از نظر ایشان چهار شرط نخست ([[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]] و [[مرد بودن]]) [[مورد اتفاق]] است؛ ولی شرط‌های دیگر را برخی [[متکلمان]]، به خاطر [[تکلیف مالایطاق]] یا لغویت، لازم نمی‌دانند. [[وصف]] [[قریشی بودن]] مورد قبول تمام [[مذاهب اسلامی]] (به جز [[خوارج]] و گروهی از [[معتزله]]) می‌‌باشد&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در میان [[متکلمین]] [[شیعه]]، [[خواجه نصیر]]، [[جامع‌ترین]] فهرست را در هشت عنوان برای صفات و [[شرایط امام]] تدوین کرده است که عبارتند از: [[عصمت]]، [[علم به احکام شریعت]] و روش [[سیاست]] و [[مدیریت]]، [[شجاعت]]، [[افضلیت]]، بری بودن از [[عیوب]] جسمی و [[روحی]] و نسبی، مقرب‌ترین افراد بودن در پیشگاه [[خدا]] و [[استحقاق]] پاداش‌های [[اخروی]]، [[توانایی]] برآوردن [[معجزه]] برای [[اثبات امامت]] خود در مواقع [[لزوم]] و یگانه بودن در [[منصب امامت]]&amp;lt;ref&amp;gt;طوسی، تلخیص المحصل، ص۴۳۰ - ۴۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پنجم: [[تعیین امام]]==&lt;br /&gt;
===[[راه تعیین امام]]===&lt;br /&gt;
====[[نصب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[انتخاب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[غلبه]] و [[استیلا]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اثبات امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[جایگاه امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[امامت]] از دیدگاه فرق و [[مذاهب]] ==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه امامیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه زیدیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اسماعیلیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه غلات}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اهل سنت}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه خوارج}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
*از دیدگاه [[شیعه]] [[امامت]] از اصول [[عقاید اسلامی]] است، ولی [[معتزله]] و [[اشاعره]] و دیگر [[مذاهب اسلامی]] آن را از [[فروع دین]] می‌دانند. بر این اساس‌، [[شیعه]] برای [[امامت]] [[جایگاه]] برجسته‌تری در مقایسه با [[اهل سنت]] قائل است، ولی همان‌گونه که اشاره شد از دیدگاه [[اهل سنت]] نیز [[امامت]] مسئله‌ای مهم و برجسته است، زیرا از [[فروع دین]] بودن یک مسئله با مهم بودن آن منافات ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*درباره [[نظریه سیاسی]] [[زیدیه]] و [[اندیشه]] امامت نزد آنان‌، مقدمتاً باید توضیح داد که زیدیه از تحولات و دگرگونی‌های فکری و مذهبی گوناگونی در طول تاریخ خود برخوردار بوده‌اند. در سده ۲ ق جدا از شخصیت محوری [[زید بن علی‌]]، گروه‌ها و گرایش‌های مختلفی از جمله جارودیه و ابتریه در میان [[زیدیه]] وجود داشتند که هر یک دارای [[عقاید]] ویژه خود در باب امامت بودند. در همان سده و نیز در سده ۳ ق نیز وجود برخی شخصیت‌های محوری در [[زیدیه]] [[عراق]] و [[حجاز]] و یمن همچون [[محمد بن عبدالله نفس زکیه‌]]، [[قاسم رسی]] و [[یحیی هادی الی الحق‌]]، پیشوای دولت زیدی یمن‌، تحولاتی در عقیده و [[اندیشه]] دینی زیدیه ایجاد کرد که طبعاً مسأله امامت نیز بر کنار از آن نبود. این تحولات البته به دلایل شرایط خاص تاریخی به وجود می‌آمد و تحت تأثیر اندیشه‌های محافل [[امامی‌]]، یا [[معتزلی]] و حتی [[سنی]] بود&amp;lt;ref&amp;gt;نک: مادلونگ‌۱، جم.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از دیدگاه [[اسماعیلیه]] [[منصب الهی|منصبی الهی]] است و [[امام]] از جانب [[خداوند]]، [[هدایت]] و [[برگزیده]] می‌شود، و مسلمانان به وساطت او می‌توانند به وظایف دینی خود عمل کنند و درکی کامل و جامع از ابعاد ظاهری و باطنی [[قرآن]] - که تحقق آرمان‌های الهی در زمین مبتنی بر آن است - حاصل نمایند. [[اسماعیلیه]] [[ولایت امام]] را یکی از ارکان دین می‌دانند و معتقدند که امامت برترین ارکان دین است و حتی آن را عین [[ایمان]] می‌انگارند و بر آنند که امامت تا ابد ادامه دارد و جهان هستی بدون [[وجود امام]] لحظه‌ای دوام ندارد و اگر فرضاً [[امام]] از دست رود، بی‌درنگ همه عالم نابود می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;قاضی نعمان‌، دعائم الاسلام‌، به کوشش [[آصف بن علی اصغر فیضی‌]]، ص۲؛ تامر، عارف‌، الامامه فی الاسلام‌،ص: ۶۵ -۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از این‌رو، یکی از اصول اعتقادی اسماعیلیه این است که بعد از وفات [[پیامبر|پیامبر اکرم‌]]{{صل}}، [[امام علی]]{{ع}} به امر الهی و با نص [[پیامبر]]{{صل}} در زمان حیاتش به عنوان [[امام]] برگزیده شد و امامت باید به صورت موروثی در نسل [[امام علی|علی‌]]{{ع}} و [[فاطمه زهرا|فاطمه‌]]{{ع}} ادامه یابد و [[جانشینی امام]] لاحق مبتنی بر [[نص]] [[امام]] سابق است&amp;lt;ref&amp;gt;نک: قاضی نعمان‌، شرح الاخبار، به کوشش محمد حسینی جلالی‌، ج۱، ۸۹ بب.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*تاریخ اندیشه و فعالیت‌های دینی و سیاسی [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] چنان‌که باید هنوز مورد مطالعه همه‌جانبه قرار نگرفته است و از این‌رو، به درستی نمی‌توان تاریخ دقیق [[ظهور]] اندیشه‌های آنان را به دست داد. درباره موضوع امامت‌، پیش از هر چیز باید به این نکته توجه داشت که [[اندیشه]] [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] در [[ارتباط]] مستقیم با موضوع امامت قرار دارد و از این رو، بررسی تاریخ شکل‌گیری و اندیشه‌های دینی و سیاسی غلات‌، در حقیقت بررسی موضوع امامت در میان ایشان است‌، با این‌همه‌، نباید از یاد برد که [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] گرچه در بستر اختلافات دینی - سیاسی در قرن اول هجری به صحنه آمدند، ولی در طول زمان و در طی تحول در اندیشه‌های خود و تحت تأثیر شرایط سیاسی و اجتماعی و محیطی‌، دگرگونی‌های فکری فراوانی را [[شاهد]] بودند که عمده‌ترین آن تحول [[اندیشه]] امامت محوری در میان آنان به منظومه‌ای فکری و کلامی از نوع ویژه خود بود. در این منظومه دینی درباره اساسی‌ترین محور [[اندیشه]] [[اسلامی]]، یعنی [[توحید]]، سخن بسیار رفته بود و با توجه به هندسه معرفت دینی آنان و جایگاه [[توحید]] و [[ارتباط]] آن با [[اندیشه]] امامت‌، طبعاً درباره مسائل دیگر الهیات از جمله [[وحی]] و [[نبوت]] و [[ارتباط]] انسان با [[خدا]]، و نیز اندیشه [[معاد]] و روز واپسین مواضعی اتخاذ شده بود&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پیش از بررسی تاریخ تحول [[اندیشه سیاسی]] [[اهل سنت]] &amp;lt;ref&amp;gt;که در اینجا مقصود از آنان همه گروه‌های غیر [[شیعه]] و [[محکمه]] است‌.&amp;lt;/ref&amp;gt;باید به این نکته توجه داشت که امامت در نظر [[اهل سنت]] بر شالوده تجربه تاریخی [[امت اسلامی ]] پس از [[پیامبر|حضرت رسول]]{{صل}} [[استوار]] است و از این‌رو، توجه به [[سیر]] تحولات نهاد [[خلافت]] در [[اسلام]] می‌تواند به ارزیابی دقیق‌تری از موضوع امامت در میان [[اهل سنت]] رهنمون گردد. [[معتزله‌]]، [[مرجئه]] و حتی عالمان [[اشعری]] و گاه [[حنبلی]] [[مذهب]] نسبت به این تجربه موضع خود را بیان کرده‌اند و هر یک فراخور [[منظومه دینی]] و [[منظومه فکری‌|فکری]] خود نسبت به این تجربه ابراز نظر نموده‌اند. مهم‌ترین نکته در این باره منظر این گروه‌ها نسبت به عصر نخستین [[خلافت‌]]، یعنی عصر [[خلفای راشدین]] و گذار از آن به [[دوره اموی]] است‌؛ به ویژه اینکه برای گروه‌های غیر [[معتزلی]] [[اهل سنت]] که نسبت به «[[سنت‌]]» [[جماعت]] حساسیت دارند، این عصر به عنوان الگوی همیشگی «[[جماعت‌]]»، و به عبارت دیگر [[سلف صالح]] «[[امت‌]]» تلقی می‌شود. به هر حال‌، از آنجا که [[خلافت‌]]، صورت تاریخی [[اندیشه]] امامت در اسلام است‌، باید مفهوم امامت را در راستای [[ظهور]] تاریخی آن در [[خلافت]] جست‌وجو کرد؛ اما از سویی دیگر باید دانست که امامت در [[اسلام]] [[سنی]] مفهومی عام‌تر از [[خلافت]] است و در مقام نظر می‌تواند خارج از چارچوب مفهومی تاریخی خلافت تحقق پیدا کند؛ گرچه [[خلافت]] همیشه از سوی [[اهل سنت]] به عنوان نهاد مشروع امامت معرفی شده است‌&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] نزد گروه‌های گوناگون [[خوارج]] ([[اهل تحکیم‌]])، از نظر مفهومی‌، کاملاً پیوسته با [[حکومت]] بوده‌، اما آنچه امامت [[خوارج]] ([[محکمه‌|مُحَکِّمه‌]]) را از [[اهل سنت]] متمایز می‌ساخته‌، نوع آرمانهایی بوده است که هر یک در سایه امامت دنبال می‌کرده‌اند. در صحنه تاریخ نیز همین اختلاف در [[آرمان‌ها]] موجب شده است تا [[محکمه]] از همان [[عصر خلفای نخستین‌]]، راه خود را از [[عامه مسلمانان]] جدا سازند و در صدد برآیند تا امامتی کوچک‌، متناسب با آرمان‌های خویش بنیان گذارند. [[تصور]] موجود در میان گروهی از [[صحابه]] در عصر دو [[خلیفه]] نخست‌، مبنی بر اینکه بر ایشان لازم است تا با حساسیت‌، عملکرد [[امام]] در [[جامعه اسلامی]] را پی‌گیری کنند و در صورت [[مشاهده]] تخلفی از جانب او، واکنشی مناسب از خود نشان دهند، مبنای آرمان [[امامت]] در میان [[محکمه]] است‌. به عنوان نمونه‌، در خطبه‌ای از [[خلیفه]] [[عمر]] چنین آمده است که در صورت [[وفا]] نکردن [[امام]] [[مسلمانان]] به وظایف و تخطی از [[حدود شریعت‌]]، بر [[مؤمنان]] واجب می‌گردد که او را از امامت [[خلع]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مثلاً نک: ابن‌شبه‌، عمر، تاریخ المدینة، به کوشش فهیم محمد شلتوت‌، ج۲، ۶۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==رابطه [[امامت]] و [[دموکراسی]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امامت]] در گفتگوی دو مذهب==&lt;br /&gt;
*[[امامت]] ریاستی فراگیر در [[امور دنیا]] و [[دین]] است و جامعه‌ای که ساختار آن بر پایۀ [[دین]] بنیان گرفته است، جز این نمی‌تواند باشد؛ چرا که در [[ریاست]] این [[جامعه]] و [[امامت]] بر آن نمی‌توان [[امور دنیا]] را از امور [[دین]] جدا نمود. [[رهبری]] [[رسول خدا]]{{صل}} بر [[جامعه]] اسلامیِ نخست، نیز همین‌گونه بود. و هیچ جدایی بین [[سیاست]] و [[دین]] وجود نداشت. از این‌رو بود که [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[سیاست]]، [[اقتصاد]]، [[تربیت]]، [[آموزش]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و دیگر امور [[جامعه اسلامی]] همان اندازه جزو [[قلمرو دین]] به شمار می‌رفت که [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر [[عبادات]] امری [[دینی]] قلمداد می‌شد.&lt;br /&gt;
*[[رسول خدا]]{{صل}} همان‌طور که در [[عبادات]] و [[احکام]] آن - که چه بسا صرفاً از آن به &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; تعبیر شود - [[مرجع]] [[مردم]] بود و آنها از ایشان [[احکام]] [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر عباداتی از این [[دست]] را می‌پرسیدند، [[مرجع]] [[مردم]] در دیگر ساحت‌های [[زندگی]] - که گاه مقصود از &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; همین بخش است - نیز بود؛ عرصه‌هایی چون [[حکومت]]، [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[اقتصاد]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و مانند آن.&lt;br /&gt;
*و صد البته از [[رسول خدا]]{{صل}} به دور است که در [[رفتار]] یا گفتار خود از سر [[هوی و هوس]] کاری کند یا سخنی بگوید. و این همان است که [[خداوند متعال]] درباره آن فرموده است: {{متن قرآن|وَمَا يَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى * إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هرگز از روی هوای نفس سخن نمی‌گوید * آنچه می‌گوید چیزی جز وحی که بر او نازل شده نیست» سوره نجم، آیه ۳-۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و نیز فرموده است: {{متن قرآن|مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«کسی که از پیامبر اطاعت کند، خدا را اطاعت کرده» سوره نساء، آیه ۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: اگر خدا را دوست می‌دارید، از من پیروی کنید، تا خدا [نیز] شما را دوست بدارد» سوره آل عمران، آیه ۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین کارهایی که آن [[حضرت]] انجام داد صرفاً بر پایۀ [[دستور خداوند]] بوده است و در نتیجه، همۀ آن [[کارها]] در قلمرو &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; قرار دارد که [[خداوند]] ما را به [[پیروی]] از آن، [[امر]] و از [[سرپیچی]] از آن، [[نهی]] فرموده است. پس [[رهبری سیاسی]] و [[امامت فراگیر]] آن [[حضرت]] بر [[جامعه اسلامی]] تنها بر اساس [[تعیین]] از سوی [[خداوند متعال]] و بنا بر امر او بوده است.&lt;br /&gt;
*بر این اساس [[باور]] داریم که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که از [[بندگان]] [[برگزیده]] خود را بخواهد برای آن [[انتخاب]] می‌کند و این‌طور نیست که امری بشری باشد که به [[مردم]] سپرده شده و آنها خود بر مبنای [[هوای نفس]] و به [[دل]] خواهشان کسی را برای آن برگزینند تا در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] از هوا هایشان و [[پیروی]] ایشان از او، [[پیروی]] از آرایشان باشد. این چیزی است که [[عقل]] و [[نقل]] بر آن گواهند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۴-۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==[[دلایل]] [[عهد الهی]] بودن [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*[[عقل]] بر این [[حقیقت]] بدین‌سان [[گواهی]] می‌دهد: از آنجا که مسألۀ [[امامت]]، مسألۀ [[اطاعت]] و [[پیروی]] است، اگر امر [[انتخاب امام]] به [[مردم]] واگذار شده باشد تا آنها هر که را به او میل دارند برای آن [[انتخاب]] کنند، پس در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] و [[پیروی]] از هوی و میل خودشان است و پر واضح است که [[اطاعت]] از هوی، [[قبیح]] است و چنان که تجربۀ [[جوامع بشری]] در گذشته و حال نشان می‌دهد و [[عقل]] [[سلیم]] نیز بر آن دلالت دارد، سبب [[فساد]] [[بندگان خدا]] و [[سرزمین]] هایشان می‌شود.&lt;br /&gt;
*همچنین [[امامت]] یا [[حکومت]]، [[ولایت]] و [[سرپرستی]] [[مردمان]] است و این [[ولایت]]، به [[گواه]] [[عقل]]، جز برای [[خداوند متعال]] و هر که او [[منصوب]] فرماید، ثابت نمی‌گردد؛ چرا که [[مردم]] به خودی خود همه با هم یکسانند و هیچ یک از آنها بر دیگری [[برتری]] ندارد تا [[شایسته]] آن باشد که در مرتبه‌ای والاتر از دیگران قرار بگیرد و آنها را در برابر [[دستورات]] خود رام سازد و به [[اطاعت]] از خویش وادارد.&lt;br /&gt;
[[نقل]] نیز این [[حقیقت]] را [[تأیید]] می‌کند. بسیاری از [[آیات قرآن کریم]] و [[روایات]] [[شریف]] تصریح دارند که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است، نه گزینشی بشری. ما در اینجا تنها به بیان شماری از [[آیات]] [[قرآن مجید]] که حاکی از این حقیقت‌اند بسنده می‌کنیم&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۶-۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;:&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] اول===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«[به یاد آورید] هنگامی که خداوند، ابراهیم را با وسایل گوناگونی آزمود. و او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم عرض کرد: از دودمان من [نیز امامانی قرار بده] خداوند فرمود: پیمان من، به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت [[آیه کریمه]] به این نکات باید توجه داشت:&lt;br /&gt;
#[[امامت]] زمانی برای [[حضرت ابراهیم]] -[[سلام]] [[خدا]] بر [[پیامبر]] ما و خاندانش و بر [[ابراهیم]] باد - قرار داده شد که [[پیامبر]] بود. قرینۀ این سخن آن است که او این [[مقام]] را برای فرزندانش نیز خواست و این خود [[گواهی]] است بر آنکه وی در زمان این درخواست و [[جعل امامت]] برای او، فرزندانی داشته است و می‌دانیم که [[ابراهیم]] در [[پیری]] و پس از آنکه دوره‌ای دراز از پیامبریش را گذرانده بود، صاحب [[فرزند]] شد.&lt;br /&gt;
#[[امامت]] در این آیۀ [[شریف]] تنها به معنای [[اقتدا]] به [[هدایت]] و [[پیروی]] از [[رفتار]] [[حضرت ابراهیم]] نیست. بلکه به معنای [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] است؛ زیرا [[امامت]] به معنای [[اقتدا]] و [[پیروی]]، پیش از آن نیز با همان [[مقام]] [[پیامبری]] برای او ثابت بود؛ چرا که باید به [[هدایت]] هر [[پیامبری]]، حتی اگر [[امام]] هم نباشد، [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[پیروی]] نمود؛ بنابراین [[آیه]] [[شریف]] دلالت بر آن دارد که [[خداوند متعال]] [[منصب]] [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] را به [[ابراهیم]] داده است.&lt;br /&gt;
#این [[آیه]] دلالت دارد که [[منصب ولایت]] و [[رهبری]] در [[جامعه]]، عهدی [[الهی]] است که [[خدای سبحان]] آن را در آنجا که خود بخواهد، قرار می‌دهد و هرگز این [[منصب]]، گزینشی بشری نیست؛ وگرنه نیازی نبود که [[حضرت ابراهیم]] از [[خداوند متعال]] درخواست کند که [[امامت]] را در [[فرزندان]] وی نیز قرار دهد. در آن صورت [[ابراهیم]] می‌توانست به جای آنکه از [[خداوند]] چنین درخواستی کند، با [[تعیین]] از سوی خودش، [[امامت]] و [[رهبری]] [[جامعه]] را در فرزندانش قرار دهد یا مثلاً به مؤمنینی که از او [[اطاعت]] می‌کردند [[وصیت]] کند که آنها [[فرزندان]] و [[نسل]] وی را برای این [[منصب]] [[انتخاب]] کنند؛ اما او می‌دانست که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که راهی برای رسیدن به آن جز با [[تعیین]] و [[گزینش]] صریح [[خدای سبحان]] نیست.&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، اینکه [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که را بخواهد برای آن برمی‌گزیند، تنها به دوران [[ابراهیم]]{{ع}} اختصاص ندارد. [[دلیل]] این سخن آن است که [[ابراهیم]]{{ع}} [[امامت]] را برای &amp;quot;ذریه&amp;quot;اش که [[فرزندان]] و [[نسل]] او در طول زمان هستند، درخواست کرد و گفت: {{متن قرآن|وَمِنْ ذُرِّيَّتِي}} پاسخ این خواسته منفی نبود و [[خداوند متعال]] در جواب او نفرمود که [[امامت]] تنها به تو و زمان تو اختصاص دارد، بلکه پاسخ دربردارندۀ این معنا بود که خواسته او برای ادامه یافتن [[امامت]] تنها در [[نسل]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش، پذیرفته شده است و ستم‌کاران [[نسل]] او از این [[اجابت]] و رسیدن به [[مقام امامت]] استثنا شده‌اند. پس [[آیه]] دلالت دارد که [[امامت]] در [[فرزندان]] [[صالح]] از [[نسل ابراهیم]] و با عهدی از جانب [[خداوند متعال]] ادامه خواهد داشت.&lt;br /&gt;
#یکی از طرفه‌های ظریف این [[آیه]]، آن است که توهمی را که چه بسا در خیال‌ها [[راه]] یابد پس می‌زند و پاسخ می‌گوید. ممکن است برخی بپندارند که قرار داده شدن [[امامت]] در [[فرزندان]] [[ابراهیم]] به این معناست که [[امامت]] نیز همچون پادشاهی‌های موروثی که [[فرزندان]] بی‌هیچ قید و شرط ویژه‌ای [[جانشین]] [[پدران]] می‌شوند، امری ارثی و نسلی است. اما [[آیه]] [[کریم]] در پاسخ به این [[گمان]] [[نادرست]] به تفاوت ذاتی میان این دو اشاره می‌کند و بیان می‌دارد که ادامه یافتن [[امامت]] در [[نسل ابراهیم]] یک میراث‌بری نَسَبی نیست، بلکه وراثتی [[دینی]] و رسالتی است و به همین [[دلیل]] است که [[فرزندان]] [[ستم]] کار [[ابراهیم]] به این [[مقام]] [[دست]] نخواهند یافت؛ بنابراین [[امامت]] نه با معیار &amp;quot;پیوند نَسَبی&amp;quot; که بنا بر &amp;quot;شایستگی دینی&amp;quot; به [[فرزندان]] [[ابراهیم]] داده شد؛ زیرا این [[خاندان]] [[نبوی]] [[پاک]] در طول [[تاریخ]] سرشار از [[هدایت]] می‌ماند و توان آن را خواهد داشت که رهبرانی [[صالح]] و لایق بپروراند؛ کسانی که [[خداوند متعال]] در برابر این [[پاکی]] و شایستگیِ ادامه یافته در نسلشان، ایشان را به [[لطف]] [[امامت]] ویژه گرداند. این همان معنایی است که آیۀ [[شریف]] بدان اشاره دارد؛ آنجا که می‌فرماید: {{متن قرآن|إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَى آدَمَ وَنُوحًا وَآلَ إِبْرَاهِيمَ وَآلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ * ذُرِّيَّةً بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند، آدم و نوح و آل ابراهیم و آل عمران را بر جهانیان برگزید. دودمانی از جنس یکدیگر [از نظر پاکی و تقوا و فضیلت] و خداوند، شنوا و داناست» سوره آل عمران، آیه ۳۳-۳۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در این آیۀ [[شریف]] مقصود از عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} این است که هر یک از [[فرزندان]] این [[نسل]] در [[شایستگی]] و سزاواری [[رهبری]] و [[گزینش الهی]] همانند دیگری هستند و مقصود از این عبارت، [[پیوستگی]] نَسَبی نیست، که اگر بود اصلاً نیازی به بیان و تصریح بر عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} وجود نداشت.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۷-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] دوم===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟ ما به آل ابراهیم، کتاب و حکمت دادیم؛ و حکومت عظیمی در اختیار آنها قرار دادیم» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت این [[آیه]] چند نکته، شایان توجه است:&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، [[خداوند]] به [[خاندان ابراهیم]] دو [[مقام]] داده است؛ نخست، [[منصب]] [[نبوت]] است که با این عبارت به آن اشاره شده است: {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ}} [[منصب]] دوم نیز، [[منصب امامت]] است که با عبارت {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} از آن یاد شده است. &amp;quot;مُلک&amp;quot; در واژه‌شناسی به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و بنابراین، مقصود از &amp;quot;ملک عظیم&amp;quot; [[امامت]] است. افزون بر بکارگیری واژه [[مُلک]]، موارد زیر نیز [[گواه]] این معنا است:&lt;br /&gt;
##ساختار خود [[آیه]] نشان می‌دهد که مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; [[امامت]] است؛ زیرا در آن کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَا}} دو بار به کار گرفته شده است و درست نیست که مقصود از دومی همان معنایی باشد که در اولی نیز آمده است؛ چرا که در این صورت تکراری بی‌فایده است. از سویی صحیح نیست که از عبارت اول معنایی جز [[نبوت]] قصد شده باشد؛ زیرا افزون بر اینکه این معنا با کتاب و [[حکمت]] هم خوانی دارد، در [[آیات]] پرشمار دیگری نیز [[مقام نبوت]] با مفهوم عطا کردن کتاب و [[حکمت]] بیان شده است؛ مانند: {{متن قرآن|وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُمْ مِنْ كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنْصُرُنَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، از پیامبران، پیمان مؤکد گرفت، که همانا کتاب و دانش به شما دادم، پس آنگاه که پیامبری به سوی شما آمد که آنچه را با شماست تصدیق می‌کند، به او ایمان بیاورید و او را یاری کنید» سوره آل عمران، آیه ۸۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین جز [[امامت]] که [[خداوند]] برای [[ابراهیم]] و فرزندانش قرار داده است، معنای دیگری از عبارت دوم {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} برداشت نمی‌شود.&lt;br /&gt;
##این آیۀ شریفه نیز [[گواه]] دیگری بر مدعا است: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، ابراهیم را با کلماتی آزمود. پس او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم گفت: و از دودمان من؟ خداوند فرمود: پیمان من، به ستمکاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این [[آیه]] به صراحت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] به [[حضرت ابراهیم]]، افزون بر [[نبوت]]، [[منصب امامت]] را نیز عطا فرموده و آن را در نسلش هم قرار داده است و از آنجا که برخی از [[فرزندان]] او [[پیامبر]] بودند، برای [[خاندان ابراهیم]] دو [[منصب]] گرد آمد؛ [[نبوت]] و [[امامت]]. این [[فضل]] و بخششی [[الهی]] است که بنا بر این [[آیه]] [[خداوند سبحان]] تنها به [[آل ابراهیم]]، و نه دیگران، این ویژگی را بخشیده و با آن ایشان را [[تکریم]] فرموده است.&lt;br /&gt;
##آیۀ پیش از آیۀ مورد بحث، شاهدی دیگر است. [[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«مگر برای آنها (مدّعیان) نصیبی از حکومت است؟ که در آن صورت حتی به اندازۀ نقطۀ پشت هستۀ خرما به مردم نمی‌دادند» سوره نساء، آیه ۵۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. &amp;quot;نقیر&amp;quot; به معنای نقطه‌ای است که پشت هستۀ خرما قرار دارد و در اینجا استعاره‌ای برای بیان مقدار بسیار ناچیز است. مقصود از [[آیه]] این است که اگر آنها ([[عالمان]] [[یهود]]) [[نصیبی]] از [[مُلک]] داشتند، حتی مقدار بسیار ناچیزی از [[ملک]] را هم به دیگران نمی‌دادند. پس بی‌شک [[مُلک]] در اینجا به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است. این [[آیه]] دلیلی روشن است بر اینکه مقصود از [[مُلک]] در آیۀ بعدی که ما از آن بحث می‌کنیم، [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و هرگز به معنای [[نبوت]] نیست.&lt;br /&gt;
#دومین نکته‌ای که آیۀ مورد استناد ما به روشنی بر آن دلالت دارد این است که [[امامت]]، یعنی همان &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot;، [[عهد الهی]] ویژه‌ای است که [[خداوند]] آن را در هر جا بخواهد قرار می‌دهد و [[انسان]] در آن [[حق]] [[انتخاب]] یا سهم و [[نصیبی]] ندارد. آنچه بر این نکته دلالت می‌کند عبارت است از:&lt;br /&gt;
##این بخش از آیۀ شریفه: {{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این عبارت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] گروهی از [[مردم]] ([[خاندان ابراهیم]]) را با آنچه از [[فضل]] خویش به ایشان داده [[برتری]] بخشیده است. سپس &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; را مصداقی از آن [[فضل]] برشمرده است. حال اگر [[امامت]]، مسأله‌ای بود که دیگر [[مردمان]] نیز در آن سهم و بهره‌ای داشتند، دیگر این [[مُلک]]، فضلی نبود که [[خداوند]] آن را تنها به [[خاندان ابراهیم]] داده باشد و آنها به واسطه آن بر دیگران [[برتری]] یافته، مورد [[حسادت]] واقع شوند.&lt;br /&gt;
##بکارگیری واژۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} در این سخن [[خداوند متعال]] {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}، نشان می‌دهد که [[امامت]]، منّت و لطفی [[الهی]] است که [[خداوند]] آن را تنها به گروه مشخصی از [[مردم]] [[عنایت]] فرموده و نیز عهدی ویژه است که فقط به کسی می‌رسد که [[خدا]] بخواهد؛ زیرا آنچه از کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} فهمیده می‌شوده، این است که این واژه در [[مقام]] توضیح لطفی است که [[خداوند متعال]] تنها به [[خاندان ابراهیم]] عطا فرموده و با آن ایشان را بر دیگران [[برتری]] بخشیده، به گونه‌ای که مورد [[حسادت]] واقع شده‌اند. حال اگر &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; چیزی بود که بدون [[لطف خدا]] و به شکلی غیر از [[عهد]] ویژه [[الهی]] به کسی داده می‌شد، دیگر دلیلی وجود نداشت که [[خداوند]] با اعطای آن به [[خاندان ابراهیم]]، بر آنها منّت نهد و این‌گونه ابراز لطفی ویژه کند.&lt;br /&gt;
##عطف &amp;quot;اعطای [[مُلک]] عظیم&amp;quot; بر &amp;quot;اعطای کتاب و حکمت&amp;quot; و قرار دادن آنها در یک [[سیاق]] و ترکیب مفهومی قرینۀ روشن دیگری است بر اینکه [[امامت]] نیز همچون [[نبوت]] است و به هیچ کس داده نمی‌شود مگر کسی که [[خداوند]] او را به‌طور ویژه برگزیند و با این [[مقام]] او را بر دیگران [[برتری]] بخشد.&lt;br /&gt;
##اینکه &amp;quot;مُلک&amp;quot; به &amp;quot;عظیم&amp;quot; توصیف شده است نیز به روشنی نشان می‌دهد که این [[مُلک]] [[موهبت الهی]] بزرگی است که [[خدا]] هر یک از [[بندگان]] مخلصش را که بخواهد بدان ویژه می‌گرداند؛ زیرا [[وصف]] [[عظمت]] برای [[مُلک]] تنها با [[مُلک]] [[الهی]] مناسبت دارد و [[مُلک]] و [[سلطنت]] بشری که در آن [[انسان‌ها]] خود هر که را بخواهند برمی‌گزینند و آن را به هرکه میلشان باشد می‌دهند، چیزی نیست که در [[کلام]] [[خدای سبحان]] به [[عظمت]] توصیف شود.&lt;br /&gt;
*حال اگر این همه را - با [[چشم‌پوشی]] از [[روایات]] رسیده از [[رسول خدا]]{{صل}} دربارۀ این موضوع - تنها به همان مباحثی که دربارۀ آیۀ شریفه {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} و دیگر [[آیات]] گذشت بیفزاییم، جای هیچ [[شک]] و تردیدی باقی نخواهد ماند که دلالت آیۀ کریمه این است که [[امامت]] و [[حکومت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند متعال]] آن را برای گروه مشخصی از [[مردم]] قرار داده است و آنها را با صفاتی توصیف نموده و شخص آنان را نیز معیّن فرموده است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این در [[تفسیر]] این [[آیه]] [[روایات معتبر]] پرشماری از سوی [[امامان]] [[خاندان وحی]] - که به مقاصد [[وحی]] و معانی [[تنزیل]]، از همه [[آگاه]] ترند - به [[دست]] ما رسیده است که همین معنا را [[تأیید]] می‌کند. در این میان تنها یکی از آن بسیار را بیان می‌کنیم: &lt;br /&gt;
*[[کلینی]] با سندی صحیح از [[ابوجعفر محمد بن علی الباقر]]{{ع}} دربارۀ آیۀ {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} [[نقل]] می‌کند که ایشان فرمود: مقصود از این [[آیه]] آن است که برخی از [[خاندان ابراهیم]] را [[رسول]] و [[نبی]] و [[امام]] قرار داد. حال چگونه است که برخی [[امامت]] را برای [[خاندان ابراهیم]]{{ع}} می‌پذیرند، اما برای [[دودمان]] [[محمد]]{{صل}} [[انکار]] می‌کنند؟! [[راوی]] می‌گوید: گفتم: مقصود از {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} چیست؟ فرمود: [[مُلک]] [[عظیم]] این است که امامانی را در میان ایشان قرار داد که هر که از آنان [[اطاعت]] کند، [[خداوند]] را [[اطاعت]] کرده و هر کس از ایشان [[سرپیچی]] نماید از [[اطاعت خداوند]] سر باز زده است. این، آن [[مُلک]] [[عظیم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج١، ص٢٠۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۰-۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] سوم===&lt;br /&gt;
*[[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ وَتَنْزِعُ الْمُلْكَ مِمَّنْ تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ بِيَدِكَ الْخَيْرُ إِنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: بارالها! ای یگانه مالک مُلک [و فرمانروایی]! تو به هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] عطا می‌کنی و از هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] را می‌ستانی و هر که را اراده کنی عزت می‌دهی و هر کس را بخواهی ذلیل می‌کنی؛ خیر، به دست توست و تو بر هر چیز توانایی» سوره آل عمران، آیه ۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این آیه بر این دلالت دارد که [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که تنها در [[اختیار]] [[خداوند متعال]] است و این، اوست که با [[حکمت]] خود آن را در آنجا که بخواهد قرار می‌دهد و [[مردم]] در این مسأله هیچ اختیاری ندارند. *توضیح این مطلب بدین شرح است:&lt;br /&gt;
#مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; در [[آیه]]، بنا بر معنای لغوی آن، [[حکومت]] و [[سلطنت]] است و این مطلب در نهایت روشنی است.&lt;br /&gt;
#مقصود از مفهوم &amp;quot;ایتاء؛ عطا کردن&amp;quot; در عبارت {{متن قرآن|تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ}}، اعطای [[تشریعی]] است و منظور از اعطای [[تشریعی]] این است که [[خداوند سبحان]] گروهی از [[بندگان]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش را به عنوان [[رهبران]] و [[حاکمان]] [[مردم]] برمی‌گزیند و به ایشان[[حق]] [[امر و نهی]] و [[حکومت]] و [[فرمانروایی]] بر [[جامعۀ انسانی]] را می‌دهد؛ اما اعطای [[تکوینی]]، حکمرانی‌هایی است که تاکنون در [[جوامع انسانی]] روی داده - و پس از این نیز روی خواهد داد - و بنا بر وقایع [[تاریخی]] در بیشتر موارد و به استثنای بازه‌هایی بسیار اندک، حکومت‌های ناحقی بوده که تنها [[طاغوت‌ها]] را بر [[ملّت‌ها]] مسلط کرده است؛ بنابراین مقصود از اعطا در این [[آیه]]، اعطای [[تکوینی]] نیست که به معنای مطلق [[حکومت]] به هر شکل ممکن است، حتی اگر به ناحق باشد، بلکه مقصود اعطای [[تشریعی]] است؛ یعنی [[واجب]] ساختن [[شرعی]] [[اطاعت]] و [[پیروی]]. این سخن چنین [[دلایل]] و قرائنی دارد:&lt;br /&gt;
##[[آیه]] دربردارندۀ [[سپاس]] و [[ستایش]] [[خداوند متعال]] برای این ویژگی‌ها است و آنچه با [[سپاسگزاری]] از [[خداوند متعال]] و [[ستایش]] او هماهنگ است بیان [[رحمت]] و یاد کرد نعمت‌های او بر [[بندگان]] است. در این میان تنها اعطای [[تشریعی]] [[مُلک]]، نعمتی [[الهی]] و رحمتی از سوی او بر [[بندگان]] است؛ زیرا [[رهبری الهی]] [[صالح]] را در پی دارد که از بزرگترین [[نعمت‌های خداوند سبحان]] بر [[بندگان]] است و در این امر میان آنان که خود به این [[تکریم]] [[الهی]] مشرَّف شده، [[منصب]] [[رهبری]] را به [[دست]] آورده‌اند، با دیگر مردمانی که از [[نعمت]] این [[رهبری]] برخوردار می‌شوند و در سایۀ [[عدالت]] گسترده‌اش آرام می‌گیرند و از زلال گوارای حکومتش بهره می‌گیرند، تفاوتی نیست. [[آیات]] بسیاری از [[قرآن]] [[حکیم]] اشاره دارد که [[امامت]] و [[رهبری الهی]] نعمتی بزرگ از سوی [[خداوند]] است؛ از جمله آیاتی که در اُم الکتاب، سورۀ مبارکۀ [[حمد]]، آمده است: {{متن قرآن|اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ * صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«ما را به راه راست هدایت کن * راه کسانی که آنان را مشمول نعمت خود ساختی» سوره فاتحه، آیه ۶-۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. اما اعطای [[تکوینی]] با [[مقام]] [[سپاس]] و [[ستایش]] مناسبتی ندارد؛ زیرا بیشتر مصداق‌های آن، هم برای [[حاکمان]] [[سلطه]] یافته و هم برای [[مردمان]] تحت [[سلطه]]، [[عذاب]] و [[عقاب الهی]] است. از آن رو برای [[سلطه]] یافتگان [[عقاب]] و [[عذاب]] است که باعث افزایش [[گمراهی]] و [[خسران]] ایشان می‌شود. برای [[مردم]] نیز [[عذاب]] است؛ چرا که [[حکومت]] [[طاغوت‌ها]] آنها را از [[سعادت دنیا]] [[محروم]] می‌کند و [[راه خدا]] را بر ایشان می‌بندد و آنها را از [[دست]] یافتن به رضای [[خدای سبحان]] و برخورداری از آن نعمت‌های [[دنیوی]] و [[اخروی]] که [[خداوند متعال]] برای [[نیکان]] فراهم آورده، باز می‌دارد؛ مگر شماری اندک از آنان که بتوانند به‌طور کامل جانب [[حق]] را نگه دارند و در &amp;quot;صراط مستقیم&amp;quot; پایدار بمانند.&lt;br /&gt;
##این بخش از سخن [[خداوند متعال]] که فرمود: {{متن قرآن|تُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ}} نیز [[گواه]] مدعا است؛ زیرا یکسانی [[سیاق]] [[سخن]]، بایسته می‌دارد که بین &amp;quot;عزت بخشیدن و [[ذلیل]] نمودن&amp;quot; با &amp;quot;اعطای [[مُلک]] و گرفتن آن&amp;quot; به این شکل [[ارتباط]] و همانندی وجود داشته باشد که اعطای [[مُلک]]، [[عزت]] و ستاندن آن، [[ذلت]] قلمداد شود. و بی‌شک همان‌سان که [[خداوند متعال]] تنها [[کافران]] و سرکشان را [[خوار]] می‌کند، [[عزت]] بخشی او نیز جز به [[بندگان]] مؤمنش نمی‌رسد. این مطلبی است که [[آیات]] پرشماری از [[قرآن مجید]] بر آن تصریح می‌کند؛ از جمله:{{متن قرآن|يَقُولُونَ لَئِنْ رَجَعْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ لَيُخْرِجَنَّ الْأَعَزُّ مِنْهَا الْأَذَلَّ وَلِلَّهِ الْعِزَّةُ وَلِرَسُولِهِ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَلَكِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَا يَعْلَمُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنها می‌گویند: اگر به مدینه بازگردیم، عزیزتر، ذلیل‌تر را بیرون می‌کند، در حالی که عزت مخصوص خدا و رسول او و مؤمنان است؛ ولی منافقان نمی‌دانند» سوره منافقون، آیه ۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|بَشِّرِ الْمُنَافِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا * الَّذِينَ يَتَّخِذُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ أَيَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«به منافقان بشارت ده که مجازات دردناکی در انتظار آنهاست * همان‌ها که کافران را به جای مؤمنان، به عنوان ولی خود انتخاب می‌کنند. آیا با اینکه همۀ عزت‌ها از آن خداست، عزت و آبرو نزد آنان می‌جویند؟» سوره نساء، آیه ۱۳۸-۱۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این مطلب، قرینه‌ای روشن است بر اینکه اعطای [[مُلک]] که در [[آیه]] از آن سخن رفته است، اعطای [[تشریعی]] و به معنای [[واجب]] ساختن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است که از بزرگترین مصداق‌های [[عزت]] بخشی [[الهی]] است. پس مقصود، اعطای [[تکوینی]] نیست؛ چرا که بیشتر مصادیق اعطای [[تکوینی]] &amp;quot;سرکشی&amp;quot; و &amp;quot;کفر&amp;quot; و &amp;quot;عصیان&amp;quot; و &amp;quot;اعتداء&amp;quot; است که بنا بر این [[آیه قرآن]] موجب [[خوار]] گشتن از سوی [[خداوند متعال]] است: {{متن قرآن|وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ وَالْمَسْكَنَةُ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ الْحَقِّ ذَلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و [مهر] ذلت و نیاز، بر پیشانی آنها زده شد؛ و گرفتار خشم خدا شدند؛ چرا که آنان نسبت به آیات الهی، کفر می‌ورزیدند؛ و پیامبران را به ناحق می‌کشتند. اینها به خاطر آن بود که گناهکار و متجاوز بودند» سوره بقره، آیه ۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنا بر این [[آیه]]، گناهکاری، [[تجاوز]]، [[کفر]] ورزیدن نسبت به [[آیات الهی]] و کشتن به ناحق [[صالحان]] و فراخوانندگان به [[عدالت]] که در صدر همۀ ایشان [[انبیا]] هستند، سبب آن شد که [[خداوند متعال]] آن مهر [[ذلت]] را بر پیشانی [[یهودیان]] بنشاند و ایشان را دچار [[خشم]] خویش کند. این ویژگی‌ها معمولاً در حکومت‌های طاغوتی وجود دارد و بنابراین مهر [[ذلت]] از سوی [[خداوند متعال]] بر پیشانی این [[طاغوت‌ها]] که در ویژگی هایشان همانند [[یهودیان]] هستند نیز زده شده است و ایشان هم گرفتار [[خشم]] [[خداوند سبحان]] هستند و بی‌اندازه از آن [[عزت]] [[الهی]] و [[رحمت]] خدای [[کریم]] به دورند. با وجود این، چگونه ممکن است مقصود از اعطای [[مُلک]] که [[عزت]] بخشی [[الهی]] است، همان اعطای [[تکوینی]] باشد که بیشتر مصداق هایش حکومت‌های [[طاغوت]] است؟&lt;br /&gt;
##بخش سوم سخن [[خدای سبحان]] {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} نشان روشن دیگری است بر [[درستی]] آنچه گفته شد. [[سیاق]] [[سخن]] و [[قوانین]] عرفی [[حاکم]] بر [[کلام]]، حاکی از آن است که &amp;quot;خیر&amp;quot;ی که در [[آیه]] بیان شده با [[مُلک]] و عزتی که در همان [[آیه]] است، منطبق بوده، عبارت {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} بیان مفهوم کلی بعد از مصداق جزئی است و بر این اساس مقصود [[آیه]] چیزی جز این نیست: [[مُلک]] و [[عزت]] و همۀ خیرها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و او خیر را به هر که بخواهد می‌دهد؛ که او بر هر کاری توانا است.&lt;br /&gt;
*بنابراین از آنجا که مقتضای این قرینه آن است که [[مُلک]] و عزتی که در [[آیه]] آمده در قلمرو مفهوم &amp;quot;خیر&amp;quot; باشد، تنها احتمال ممکن در مورد اعطای [[مُلک]]، اعطای [[تشریعی]] خواهد بود که به معنای [[واجب]] بودن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است؛ چرا که فقط همین معنا &amp;quot;خیر&amp;quot; است، نه اعطای [[تکوینی]] که بیشتر مصداق‌های آن [[شر]] و [[عذاب]] است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این، در [[آیات]] پیشین و پسین نیز قرینه‌هایی وجود دارد که مقصود بودن اعطای [[تشریعی]] را [[تأیید]] می‌کند، اما همین قرینه‌ها و شاهدهایی که بیان کردیم، بس است.&lt;br /&gt;
#شکی در این نیست که [[آیه]] با عبارت {{متن قرآن|مَالِكَ الْمُلْكِ}}  در ابتدا، که نشان از مخصوص بودن [[مُلک]] به [[خداوند متعال]] است، و نیز جمله {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} در انتها، که بیان می‌دارد خیر جز به [[دست خدا]] نیست، و دیگر قرینه‌هایی از این [[دست]]، بر انحصار دلالت می‌کند و به روشنی و صراحت بیان می‌دارد که زمام [[سلطه]] و [[حکومت]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در آن [[شریک]] او نیست و فقط اوست که [[مُلک]] و [[سلطنت]] را به هر کس بخواهد می‌دهد و از هر که [[اراده]] کند باز می‌دارد و [[مردم]] نمی‌توانند [[مُلک]] و [[عزت]] را به هر کس میلشان باشد بدهند، بلکه این [[اختیار]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و نه هیچ کس جز او. اگر زمام [[حکومت]] به [[دست]] [[مردم]] بود و آنان هر که را می‌خواستند برای آن [[انتخاب]] می‌کردند، درست نبود که در آیه بر این انحصار تأکید شود که [[اختیار]] اعطای [[مُلک]] و [[عزت]] تنها از آن [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در این مسأله با او شراکتی ندارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۵-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:11142.jpg|22px]] [[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[گفتگوی دو مذهب (کتاب)|&#039;&#039;&#039;گفتگوی دو مذهب&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1414.jpg|22px]] [[فرهنگ شیعه (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ شیعه&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:10119661.jpg|22px]] [[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات علم کلام&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:440259451.jpg|22px]] [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:978964298273.jpg|22px]] [[محمد حسن قدردان قراملکی|قدردان قراملکی، محمد حسن]]، [[امامت ۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 1100453.jpg|22px]] [[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)|&#039;&#039;&#039; ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی &#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100538.jpg|22px]] [[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
* [[مبادی امامت]]&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصوریه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[اله]] ([[الوهیت]])&lt;br /&gt;
*** [[رب]] ([[ربوبیت]])&lt;br /&gt;
*** [[ملک]] ([[مالکیت]])&lt;br /&gt;
*** [[حکم]] ([[حاکمیت]] و [[حکومت]])&lt;br /&gt;
*** [[ولی]] ([[ولایت]])&lt;br /&gt;
*** [[حجت]]&lt;br /&gt;
*** [[رسالت]]&lt;br /&gt;
*** [[خلافت]]&lt;br /&gt;
*** [[امارت]]&lt;br /&gt;
*** [[قدوه]] ([[اسوه]])&lt;br /&gt;
*** [[رهبری]] ([[قیادت]])&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصدیقیه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[حق عبادت و اطاعت]]&lt;br /&gt;
*** [[حق امر و نهی]]&lt;br /&gt;
*** [[حق الزام]]&lt;br /&gt;
*** [[حق پاداش و کیفر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق ابلاغ و تبیین امر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق نصرت الهی]]&lt;br /&gt;
* [[ویژگی‌های لازم امامت]] ([[صفات ضروری امام]]) &lt;br /&gt;
* [[نصب امام]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام بر خدا]]&lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام از سوی خدا]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام پس از پیامبر]] &lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام پس از پیامبر]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امامت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مفاهیم در کلام اسلامی]]&lt;br /&gt;
[[رده:مقاله‌های اولویت سه]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;onlyinclude&amp;gt;{{درجه‌بندی&lt;br /&gt;
 | نویسنده اصلی=&amp;lt;!--جوکار،پورانزاب،واثق،امینی،بهمنی--&amp;gt;واثق&lt;br /&gt;
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 | توضیحات = &lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/onlyinclude&amp;gt;&amp;lt;/pre&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<title>امام در کلام اسلامی</title>
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		<updated>2021-05-24T08:00:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امام در قرآن]] - [[امام در حدیث]] - [[امام در کلام اسلامی]] - [[امام در نهج البلاغه]] - [[امام در فلسفه اسلامی]] - [[امام در عرفان اسلامی]] - [[مقام امام]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امام (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0007.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==معناشناسی امام==&lt;br /&gt;
===معنای لغوی===&lt;br /&gt;
*&amp;quot;[[امام]]&amp;quot; به معنای &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot;، &amp;quot;پیشرو&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;فرهنگ فارسی، ج۱، ص۳۴۶ ـ ۳۴۷، «امامت».&amp;lt;/ref&amp;gt;، &amp;quot;[[مقتدا]]&amp;quot;، &amp;quot;[[قیّم]]&amp;quot;، &amp;quot;[[مصلح]]&amp;quot;، &amp;quot;[[الگو]]&amp;quot;، &amp;quot;راه اصلی&amp;quot; و &amp;quot;[[راهنما]]&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج ۱، ص ۲۱۳ ـ ۲۱۵، «امم».&amp;lt;/ref&amp;gt;. کسی یا چیزی که مورد [[پیروی]] واقع می‌گردد یا اساس و مبدأ حرکت چیز دیگری قرار می‌‌گیرد، [[انسان]] باشد یا کتاب یا چیزی دیگر، به [[حق]] باشد یا بر [[باطل]]&amp;lt;ref&amp;gt;مفردات، ص ۸۷، «ام».&amp;lt;/ref&amp;gt; [[امام]] است&amp;lt;ref&amp;gt;المنجد، ص ۱۷، «ام».&amp;lt;/ref&amp;gt;. ریشه این واژه &amp;quot;ا ـ م ـ م&amp;quot; و به معنای قصد&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج ۱، ص ۲۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; یا قصد با توجه خاص و این معنا در همه مشتقات آن محفوظ است. واژه [[امام]] بر [[زن]] و مرد اطلاق می‌شود و جمع آن &amp;quot;[[ائمه]]&amp;quot; و &amp;quot;ایمّه&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۱۹-۲۲۰؛ [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۳۰-۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===معنای اصطلاحی===&lt;br /&gt;
* [[امام]] کسی است که همواره مقصود و [[هدف]] حرکت و تلاش دیگران قرار گیرد. در کتاب‌های لغت برای [[امام]] مصادیقی برشمرده اند: [[قرآن کریم]]، [[پیامبر گرامی اسلام]]{{صل}}، [[جانشین پیامبر]]{{صل}}، [[امام]] در [[نماز جماعت]]، [[فرمانده سپاه]]، راهنمای مسافران، ساربان و راهنمای شتران، چوب و ریسمان، تراز در ساختمان، راه پهن و آشکار، دانشمندی که از او [[پیروی]] می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;معجم المقاییس فی اللغة، ص۴۸، المصباح المنیر، ج۱، ص۳۱ ـ ۳۲؛ لسان العرب، ج۱، ص۱۵۷؛ المفردات فی غریب القرآن، ص۲۴، اقرب الموارد، ج۱، ص۱۹؛ المعجم الوسیط، ج۱، ص۲۷؛ فرهنگ عمید، ص۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین، کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; بیانگر این واقعیت‌ است که رهبریِ [[جامعه]]، در [[حقیقت]]، اصل و اساس [[جامعه]] است که [[مردم]] از او [[پیروی]] می‌کنند و در امور خود، به سراغ او می‌روند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک:  [[محمد محمدی ری‌شهری|محمدی ری‌شهری، محمد]]، دانشنامه قرآن و حدیث، ج ۱۰، ص۲۱۳ – ۲۱۴؛ [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ص ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] به معنای [[ریاست]] عمومی فردی خاص بر امور [[دین]] و دنیای [[مردم]] در [[دنیا]] [[بالاصاله]] یا به [[جانشینی]] از [[پیامبر]]{{صل}} است، زیرا [[امامت]] دارای شؤونی همچون [[رهبری سیاسی]] و [[زعامت]] [[اجتماعی]] و [[مرجعیت دینی]] و [[تبیین]] و [[تفسیر وحی]] و [[ولایت باطنی]] و [[معنوی]] است که از این جهت [[امام]] [[حجت خدا]] در زمان، [[ولیّ]] [[الله]]، [[انسان]] کاملِ حامل [[معنویت]] کلی [[انسانیت]] و [[قطب]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۲۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مجموع تعریف‌هایی که برای [[امامت]] بیان کرده‌اند دو دسته است: تعریف‌های عام که [[نبوت]] را نیز در برمی‌گیرد و تعریف‌های خاصی که شامل [[نبوت]] نمی‌شود. عبارت: &amp;quot;[[امام]] کسی که دارای [[رهبری عمومی]] در مسائل [[دینی]] و [[دنیوی]] است&amp;quot; و عبارت‌های دیگری همانند آن تعریف‌های عام [[امامت]] است. در این تعریف‌ها به [[خلافت]] یا [[نیابت]] از [[پیامبر]]{{صل}} اشاره نشده است، بدین جهت، [[نبوت]] را نیز شامل می‌شود، ولی دستۀ دوم، تعریف‌هایی است که قید [[خلافت]] یا [[نیابت]] از [[پیامبر]]{{صل}} در آنها آمده است و بدین جهت شامل [[نبوت]] نمی‌شود. &lt;br /&gt;
* [[رهبری]] [[امت اسلامی]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} هم &amp;quot;[[خلافت]]&amp;quot; نامیده می‌شود و هم &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot;؛ چنانکه کسی عهده‌دار این [[مقام]] شود هم &amp;quot;[[خلیفه]]&amp;quot; نام دارد و هم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;. از آن جهت که [[مردم]] باید از او [[پیروی]] کنند و او پیشوای آنان است، [[امام]] نامیده می‌شود‌، و از آن جهت که [[رهبری]] او به عنوان [[جانشینی]] از [[پیامبر]]{{صل}} است، [[خلیفه]] نام دارد. بر این اساس، [[امام]] در [[شریعت اسلامی]] خلیفة الرسول است. در اینکه آیا می‌توان او را [[خلیفة اللّه]] نیز نامید دو قول است، برخی آن را جایز دانسته و برخی دیگر آن را مجاز نشمرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ص ۶۹؛ [[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۱-۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*البته [[امامت]]، با [[خلافت]] متفاوت است. [[خلیفه]] کسی است که فقط [[حکومت]] می‌کند و [[رهبری]] [[اجتماعی]] و [[سیاسی]] را برعهده دارد؛ اما [[امامت]]، مقامی [[دینی]] است و در ادامۀ [[مناصب]] [[پیامبری]]. [[امام]] [[رهبر]] [[جامعه]] در [[امور دنیوی]] و [[اخروی]] است. برخی [[پیامبران]]، [[امام]] نیز بوده‌اند مانند [[پیامبر اسلام]]{{صل}} و [[حضرت ابراهیم]]{{ع}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ص ۶۹؛ [[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۱-۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==تعریف [[امامت]] به ریاست==&lt;br /&gt;
*تعریفی که غالب علمای [[کلام]] از &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; کرده‌اند، دو عنصر اساسی در آن به چشم می‌خورد؛ یکی اینکه [[امامت]] &amp;quot;ریاست&amp;quot; است و دیگر اینکه این ریاست در &amp;quot;امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. این تعریف، بیشتر نزد [[متکلمان]] [[اهل‌سنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: ماوردی در تعریف امامت گفته است: {{عربی|الإمامة موضوعة لخلافة النبوّة في حراسة الدين وسياسة الدنيا به}}. ماوردی، علی بن محمد، الأحكام السلطانیة، ص۵؛ ابن خلدون نیز مشابه این عبارت را آورده است: {{عربی|نيابة عن صاحب الشريعة في حفظ الدين وسياسة الدنيا}}. [[ابن خلدون]]، عبدالرحمن بن محمد، المقدّمة، ص۱۹۰؛ امام‌الحرمین جوینی نیز گفته است: {{عربی|الإمامة رياسة تامّة، وزعامة تتعلّق بالخاصّة والعامّة في مهمّات الدين والدنيا}}. جوینی، عبدالملک بن عبدالله، غیاث الأمم فی التیاث الظلم، ص۱۵؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: فخر رازی : {{عربی|الإمامة رئاسة في الدين والدنيا عامّة لشخص من الأشخاص}}. رازی، محمد بن عمر، نهایة العقول، ج۴، ص۳۲۱؛ میر سید شریف جرجانی : {{عربی|الإمام: الذي له الرياسة العامّة في الدين والدنيا جميعاً}}. جرجانی، علی بن محمود، التعریفات، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; آمده و از آنجا به [[متکلمان]] [[زیدیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: [[حمیدان بن یحیی]] در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|هو الشخص الجامع للرئاسة على الخلق في الدين والدنيا على وجه لا يكون فوق يده يد}}. قاسمی، حمیدان بن یحیی، جواب المسائل الشتویة والشبه الحشویة، ص۴۸۴؛ احمد بن یحیی المرتضی نیز گفته است: {{عربی|رئاسة عامّة لشخص مخصوص بحكم الشرع ليس فوقها يد}}. المرتضی، احمد بن یحیی، البحر الزخار، ج۲، ص۵۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امامیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: شیخ مفید در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|الإمام هو الإنسان الذي له رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا نيابةً عن النبيّ}}. مفید، محمد بن محمد، النكت الاعتقادية، ص۳۹؛ شیخ طوسی و به تبع او، ابن میثم بحرانی نیز در تعریف [[امامت]] گفته‌اند: {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في أمور الدين والدنيا}}. طوسی، محمد بن حسن، الرسائل العشر، ج۱، ص۱۰۳؛ بحرانی، میثم بن علی، النجاة فی القیامة، ص۴۱؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: محقق حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في الدين والدنيا بحقّ الأصالة}}. حلی، جعفر بن حسن، المسلک فی أصول الدین، ص۳۰۶؛ علامه حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا لشخص من الأشخاص نيابةً عن النبيّ}}. حلی، حسن بن یوسف، نهج المسترشدين، ص۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نیز منتقل شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[سعد الدین تفتازانی]] در &amp;quot;شرح المقاصد&amp;quot; و [[قوشچی]] در &amp;quot;شرح تجرید&amp;quot;، [[امامت]] را چنین تعریف می‌کنند:{{عربی|الإمامةُ رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا، خلافةً عن النبيّ{{صل}}، وبهذا القيد خرجت النبوّة، وبقيد العموم مثل القضاء والرئاسة في بعض النواحي، وكذا رئاسة من جعلة الإمام نائباً عنه على الإطلاق؛ فإنّها لا تعمّ الإمامة}}&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، سعدالدین، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۴؛ قوشچی، علی بن محمد، شرح تجرید العقائد، ص۳۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*صاحبان این تعریف، معتقدند با قید {{عربی|عامّة}} ریاست‌های خُرد و با قید {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} [[نبوّت]] خارج می‌شود. پس [[امام]] آن کسی است که به صورت [[خلافت]] از [[رسول الله]]، [[ریاست عامه]] داشته باشد. در اغلب منابع [[اهل]] [[کلام]]، [[امامت]] را {{عربی|رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا}} تعریف کرده‌اند و گاهی برای دقت بیشتر، بعضی‌ها عبارت {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} را هم اضافه کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot; نیز پس از بیان تعریف لغوی، به استعمال اصطلاحی [[امامت]] نزد [[اهل]] [[کلام]] اشاره کرده و می‌گوید: {{عربی|الإمامة هي الرئاسة العامّة على جميع الناس، فإذا أُخذت لا بشرط شيء تجامع النبوّة والرسالة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: [[امامت]] به استعمال مستعمل بستگی دارد؛ اگر به‌طور کلی و عمومی بررسی شود (به تعبیر او: اگر &amp;quot;لا بشرط&amp;quot; در نظر گرفته شود)، با [[نبوت]] و [[رسالت]] قابل جمع است؛ یعنی [[نبی]] می‌تواند علاوه بر [[مقام نبوت]]، [[امام]] نیز باشد؛ البته [[امام]] غیر [[نبی]] نیز متصوَّر است. اما اگر [[امامت]] با قطع نظر از [[نبوت]] بررسی شود (به تعبیر او: &amp;quot;بشرط لا عن النبوة&amp;quot; در نظر گرفته شود)، قابل جمع با [[نبوت]] نخواهد بود. البته [[حق]] این است که در ذات مفهوم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، &amp;quot;بشرط لا&amp;quot; نهفته نیست؛ یعنی هنگامی که کلمه [[امام]] اطلاق می‌شود [[امام]]، لا بشرط مراد است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
===اشکالات این تعریف===&lt;br /&gt;
*بر تعریف [[متکلمان]] اشکالاتی وارد است؛ چه با قید &amp;quot;{{عربی|خلافةً عن النبيّ}}&amp;quot; و چه بدون آن. پیش از بیان این اشکالات، لازم است به مقدمه‌ای توجه شود:&lt;br /&gt;
*پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
# [[اسلام محمدی]] که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
# [[اسلام جاهلی]]&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پیمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این [[اسلام جاهلی]] بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] [[محمدی]] بود. حوادثی که [[اسلام جاهلی]] پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس [[شکیبایی]] گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با [[اسلام جاهلی]]، [[نزاع]] بر &amp;quot;ریاست&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] آشکار [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] پنهان و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین [[اسلام محمدی]] و [[اسلام جاهلی]] و به بیانی دیگر: بین [[اسلام علوی]] و [[اسلام اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. [[اسلام جاهلی]] - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از مهم‌ترین این دست‌اندازی‌ها:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;ریاست&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبیدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، علی بن محمد، الكامل فی التاریخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;ریاست&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان [[اسلام جاهلی]]، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به ریاست و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این ریاست و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پس از این مقدمه، روشن می‌شود اشکالات اساسی تعریف مذکور از [[امامت]] به دو نکته ذیل برمی‌گردند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نخست: [[تفسیر]] [[امامت]] به ریاست (تعریف به لازم؛ نه به [[حقیقت]])=== &lt;br /&gt;
* بی‌شک، مفهوم &amp;quot;ریاست&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است و نمی‌توان این مفهوم را از [[امامت]] جدا انگاشت، لکن جنبه مهمی که در [[حقیقت امامت]] باید لحاظ شود، جنبه ریاستش نیست؛ جنبه مهم‌تری که می‌تواند گویای ماهیت و [[حقیقت امامت]] باشد، بحث ولایت‌ الامری است. [[امامت]] چیزی جز &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; نیست و [[ولایت امر]] عقلاً و نقلاً [[حق]] انحصاری [[خدای متعال]] و مقامی [[الهی]] است. البته در نگاه مردمی که [[خدا]] را از زندگی‌شان حذف می‌کنند، [[امامت]] - خواه ناخواه - تنها ریاست و [[امارت]] خواهد بود و هنگامی که [[حقوق]] و [[حدود الهی]] در محاسبات [[جامعه]] نباشند، شیخ [[قبیله]] یا هر شخص دیگری نیز می‌تواند [[رئیس]] باشد و اگر کسی [[رئیس]] شد به هر حال، باید به [[فرمان]] او رفت و از او [[تبعیت]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[انتخاب]] واژه ریاست یا [[سلطنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;پیش از این روایت طبری (م۳۱۰ق) از گفته عمر بن خطاب در سقیفه نقل شد که گفته بود: {{عربی|من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته...}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوک، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[تفسیر]] [[حقیقت امامت]]، انعکاسی از واقعیت تلخ [[جامعه اسلامی]] پس ار [[رسول الله]]{{صل}} است. حوادث [[غصب]] [[امامت]] از [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} آغازگر [[انحراف]] [[امامت]] از [[جایگاه]] اصلی‌اش شد و چون [[امامت]] را از [[جایگاه]] [[حقیقی]] و بلندش جابجا کردند، تمام این [[تحریف‌ها]] دامن‌گیر [[جامعه اسلامی]] شد. به همین [[دلیل]]، [[حضرت زهرا]]{{س}} در خطبه‌ای، به [[مردم]] عصر خود نهیب زد و فرمود: {{متن حدیث|وَيْحَهُم! أَنَّى زَحْزَحُوهَا عَنْ رَوَاسِي الرِّسَالَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۳۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ شگفتا از آنان! چگونه [[خلافت]] را از جایگاه‌های [[استوار]] [[رسالت]] دور راندند؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، عبارت ریاست یا [[سلطنت]] با مفاهیمی که در [[اسلام]] برای مسأله [[امامت]] آمده است سازگار نیست و هنگامی که به [[قرآن کریم]] و [[حدیث]] [[معصومان]]{{عم}} مراجعه می‌کنیم، می‌بینیم در مسأله [[امامت]] چیز دیگری مطرح است&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال: خدای متعال در قرآن کریم امامت را عهد الهی معرفی کند: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظّالِمِينَ}}، روایات منقول از معصومین{{عم}} نیز از امامت به عنوان جایگاه انبیا، میراث اوصیا و خلافت خدا و رسول یاد شده است: {{متن حدیث|الإِمامَةَ هِيَ مَنزِلَةُ الأَنبِياءِ، وإرثُ الأَوصِياءِ، إنَّ الإِمامَةَ خِلافَةُ الله وخِلافَةُ الرَّسولِ}}. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافی، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ حتی یک بار هم در تعابیر [[رسول اکرم]]{{صل}} کلمه ریاست به چشم نمی‌خورد و با وجود اینکه مفهوم &amp;quot;ریاست&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است، اما در [[آیات]] کریمه و [[احادیث]] [[پیامبر اکرم]] و [[اهل بیت]]{{عم}} از زاویه ریاست به آن [[مقام]] بلند نگاه نشده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از سوی دیگری، تعریف جامع و [[مانع]]، باید به جوهر و اصلِ معنا اشاره کند و واژگانی به‌کار بگیرد که مقوّم ماهیت آن مفهوم باشند؛ نه آنکه آثار یا نتایج و تبعات آن مفهوم را محور تعریف خود قرار دهد. ریاستی که در تعریف گذشته ذکر شد، نتیجه [[امامت]] است یا عَرَض عام آن؛ اما نه جوهر اصلی و مقوم ماهیتش&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* ریاست نیز از آن جهت که می‌تواند گسترده و کلان باشد یا نباشد، قابل تقسیم بر [[ریاست عامه|عامه]] و [[ریاست خاصه|خاصه]] است. به همین [[دلیل]]، [[برادران]] [[اهل‌سنت]] چون [[امامت]] را به ریاست تبدیل کردند، ناچار شدند قید [[عامه]] را بیاورند؛ تا شامل ریاست‌های خاص و [[خرد]] نشود؛ زیرا مدیر مدرسه یا [[مسئول]] اداره نیز [[رئیس]] است و هر رئیسی [[امام]] نیست. ازاین‌رو، ناچار شدند ریاست را به قید [[عامه]] تقیید کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===دوم: توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]] ([[میراث]] [[اسلام جاهلی]])===&lt;br /&gt;
* همان‌گونه که اشاره شد، جداسازی [[دین الهی]] از دنیای [[مردم]] یکی از تحریف‌هایی است که دامنگیر [[امت اسلام]] شد. بنابر این، عبارت {{عربی|في أمر الدين والدنيا}} که در [[تعریف امامت]] آورده‌اند، بی‌اساس و از میراث‌های [[اسلام جاهلی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[منابع حدیثی]] و [[تاریخی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] [[نقل]] کرده‌اند از همان روزهای اولی که [[ابوبکر]] سر کار آمد، [[مردم]] و [[صحابه]] از او درباره [[دین]] سؤال می‌کردند و چون [[ابوبکر]] پاسخ آن مسائل [[شرعی]] را نمی‌دانست، به دیگران مراجعه می‌کرد. در زمان عمربن‌خطاب نیز [[رجوع]] به دیگران بیشتر اتفاق افتاد. مرحوم امینی  مسأله [[رجوع]] [[عمر]] به دیگران به‌ویژه، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} را در [[کتاب]] [[شریف]] &amp;quot;[[الغدیر]]&amp;quot; جمع کرده است؛ تقریباً یک جلد از این کتاب&amp;lt;ref&amp;gt;امینی، عبدالحسین، الغدیر، ج۶، ص۸۲ - ۳۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مختص به همین مسئله است و این سخن [[عمر]] که {{عربی|لَو لَا عَلِيٌّ لَهَلَكَ عُمَرُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه، عبدالله بن مسلم، تأویل مختلف الحدیث، ج۱، ص۱۵۲ و ص۱۶۲؛ باقلانی، ابوبکر، تمهید الأوائل فی تلخیص الدلائل، ج۱، ص۵۰۲ و ص۵۴۷؛ ابن‌مردویه اصفهانی، احمد بن موسی، مناقب علی ابن أبی طالب، ص۸۸؛ ماوردی شافعی، علی بن محمد، الحاوی الکبیر، ج۱۲، ص۱۱۵ و ج۱۳، ص۲۱۳؛ سمعانی، أبوالمظفر، التفسیر، ج۵، ص۱۵۴؛ زمخشری، محمود، المفصل فی صنعة الإعراب، ج۱، ص۴۳۲؛ ابن‌عربی، ابوبکر، العواصم من القواصم، ج۱، ص۱۹۴؛ رازی، فخرالدین، التفسیر الکبیر، ج۲۱، ص۳۸۰؛ ابن ابی‌الحدید، عبدالحمید، شرح نهج‌البلاغه، ج۱، ص۱۸ و ج۱۲، ص۲۰۵؛ قندوزی، سلیمان بن ابراهیم، ینابیع المودة، ج۱، ص۲۱۶ و ج۲، ص۱۷۲ و ج۳، ص۱۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; را آنجا مطرح و بررسی کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*به [[دلیل]] همین مطلب؛ یعنی عدم اطلاع کافی [[خلیفه اول]] و [[خلیفه دوم]] به [[کتاب خدا]] و [[سنت]] [[رسول الله]] و [[رجوع]] آنان به دیگران، [[رجال]] [[مکتب]] [[اهل‌سنت]] بین [[دین]] و [[دنیا]] جدایی قائل شدند و در نتیجه &amp;quot;[[مرجعیت سیاسی]]&amp;quot; از &amp;quot;[[مرجعیت دینی]]&amp;quot; جدا شد و این آغاز تناقض آشکاری بود که درون این [[مکتب]] اتفاق افتاد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[مکتب]] [[روایی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] برای توجیه این رویکرد، [[روایات]] مجعولی نیز [[نقل]] شده که اساس این دوگانگی را تحکیم بخشید و بر انگاره جدایی [[دنیا]] از [[دین]] صحه گذاشته است. از جمله آنها، [[روایت]] معروف &amp;quot;تأبیر النخل&amp;quot; است که [[اهل]] [[صحاح]] نیز [[نقل]] می‌کنند. در [[صحیح مسلم]] آمده است: &amp;quot;[[رسول الله]] به [[مدینه]] آمد؛ در حالی که آنان درختان [[نخل]] را بارور می‌کردند. [[رسول الله]] گفت: &amp;quot;چه کار می‌کنید؟&amp;quot; گفتند: درختان را بارور می‌کنیم. گفت: &amp;quot;شاید اگر چنین نکنید، بهتر باشد&amp;quot;. آنان نیز از آن عمل دست کشیدند در آن سال میوه درختان ریخت یا ناقص شد. [[راوی]] می‌گوید: قضیه را برای [[رسول الله]] توضیح دادند. [[پیامبر]] گفت: &amp;quot;من هم بشرم؛ هرگاه چیزی در مورد دینتان را به شما امر کردم، آن را بپذیرید و هرگاه مطابق [[رأی]] و نظر خویش چیزی را به شما گفتم؛ بدانید که من نیز بشری هستم مانند شما&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|قَدِمَ نَبِيُّ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةَ، وَهُمْ يَأْبُرُونَ النَّخْلَ، يَقُولُونَ يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ، فَقَالَ: مَا تَصْنَعُونَ؟ قَالُوا: كُنَّا نَصْنَعُهُ، قَالَ: لَعَلَّكُمْ لَوْ لَمْ تَفْعَلُوا كَانَ خَيْرًا فَتَرَكُوهُ، فَنَفَضَتْ أَوْ فَنَقَصَتْ، قَالَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ: إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ، إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ نیشابوری، مسلم بن حجاج، الجامع الصحیح، ج۴، ص۱۸۳۵. همچنین رجوع شود به: بستی، محمد بن حبان، صحیح ابن حبان، ج۱، ص۲۰۲؛ طبرانی، سلیمان بن احمد، المعجم الکبیر، ج۴، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[روایت]] و امثال آن، از جعل‌های جنایت‌آمیزی است که در [[حق]] [[حضرت رسول]]{{صل}} انجام شده و با عبارات متفاوتی [[نقل]] شده است؛ از جمله: {{متن حدیث|إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ {{متن حدیث|إِنَّمَا ظَنَنْتُ ظَنًّا، فَلَا تُؤَاخِذُونِي بِالظَّنِّ، وَلَكِنْ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنِ اللهِ شَيْئًا فَخُذُوا بِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحیح مسلم ح۲۳۶۱؛ مسند احمد (۳/۱۵)؛ مسند عبد بن حمید، المنتخب (ص۶۴)؛ مسند ابوداود طیالسی (۱/۱۸۶)؛ طحاوی در شرح معانی الآثار (۳/۴۸)؛ ابن أبی عاصم در الآحاد والمثانی (۱/۱۶۵)؛ مسند ابی یعلی (۲/۱۲)، مسند الشاشی (۱/۶۸، ۷۰)، ابو نعیم در حلیة الأولیاء (۴/ ۳۷۲).&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن حدیث|أَنْتُمْ أَعْلَمُ بِأَمْرِ دُنْيَاكُمْ&amp;quot; يا: &amp;quot;إِذَا كَانَ شَيْءٌ مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَأَنْتُمْ أَعْلَمُ بِهِ، فَإِذَا كَانَ مِنْ أَمْرِ دِينِكُمْ فَإِلَيَّ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحیح مسلم ح۲۳۶۳؛ مسند احمد (۲۰/۱۹)، سنن ابن ماجة، ح۲۴۷۱، بزار در البحر الزخار (۱۳/۳۵۵) (۱۸/۹۹)، مسند ابی یعلی (۶/۱۹۸) (۶/۲۳۷)، طحاوی در شرح مشكل الآثار (۴/۴۲۴)، صحیح ابن حبان (۱/۲۰۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مضمون کلی این [[نقل]] قول‌های تحریف‌آمیز این است که اگر در مورد دینتان فرمانی صادر کردم، آن را بپذیرید و اگر در مورد [[دنیا]] به شما دستوری دادم پس از من [[اطاعت]] نکنید! و مفاد نهایی آن، اصل &amp;quot;جدایی [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است که در [[روایات]] مجعولی [[نقل]] شده است. متأسفانه این از [[روایات]] متفق‌ علیه [[برادران]] [[اهل‌سنت]] است و با صریح [[قرآن]] تناقض دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پرسشی که اینجا باید مطرح شود اینکه: &amp;quot;بیع&amp;quot;، &amp;quot;[[تجارت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[زکات]]&amp;quot; و &amp;quot;[[خمس]]&amp;quot; از [[امور دنیوی]] شمرده می‌‌شوند یا از [[امور دینی]]؟ [[قرآن]] درباره بیع سخن گفته است، آیا بیع [[دنیوی]] است و [[دینی]] نیست؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(همان) کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند» سوره حج، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[اداره امور]] [[کشور]] یعنی عمل به [[احکام اسلام]]. حال اگر [[احکام اسلام]] به‌گونه‌ای بیان کنیم که مربوط به [[دین]] باشد و ربطی به [[دنیا]] نداشته باشد، تناقض است. متأسفانه در [[کلام]] و [[حدیث]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] تناقضاتی دیده می‌شود؛ تناقض‌هایی در مسائل [[توحید]]، [[نبوت]]، [[خلافت]] و [[امامت]] که حتی به [[فروع دین]] نیز کشیده شده است &amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال، برادران اهل سنت حدیث عشره مبشره را روایت می‌کند که ده نفر از جمله طلحه و زبیر، همگی در بهشت هستند. از طرفی قرآن می‌گوید که {{متن قرآن|وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا}}؛ «و آنان که با خداوند و پیامبر او نافرمانی کنند بی‌گمان آتش دوزخ، آنان راست که هماره در آن جاودانند» سوره جن، آیه ۲۳. خدا و رسول را اینها معصیت کردند؛ با اینکه خدا دستور داده بود از پیامبر و اولی‌الامر اطاعت کنند: {{متن قرآن|أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ}}؛ «از خداوند فرمان برید و از پیامبر و صاحبان امری که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹. اما اینان اطاعت نکردند؛ اکنون اهل سنت این تناقض را چگونه حل می‌کند؟ چطور می‌شود اینها هم بهشتی باشند و هم جهنمی؟! امثال این تناقض‌ها بسیارند که تنها راه برون رفت از آنان بازگشت به اسلام اصیل و قرآن و عترت است. این‌گونه بود که تقابل بین دین و دنیا در تفکر اسلامی رخنه کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[اسلام محمدی]]{{صل}}، [[دین]] همان شریعتی است که دنیای [[مردم]] را اداره می‌کند؛ بنابر این، در نگاه [[اسلام محمدی]]{{صل}} دو مقوله جدا از یک‌دیگر به نام &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; و &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; وجود ندارد. بی‌گمان، [[رسول الله]]{{صل}} چون [[رئیس]] [[دین]] بود، [[رئیس]] [[دنیا]] نیز بود و چون این [[خلافت]]، [[خلافت]] [[رسول]] خداست، باید &amp;quot;[[ریاست عامه]] در [[دین]]&amp;quot; باشد که همان &amp;quot;[[ولایت امر]] بر دنیای [[مردم]]&amp;quot; است، لکن در [[تفسیری]] که بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} از [[دین]] ارائه شد، [[دین]] و [[دنیا]] از یک‌دیگر تفکیک شدند و از اینجا بود که میان [[دین]] و [[دنیا]] [[تقابل]] ایجاد شد و باعث اندیشه‌های [[انحرافی]] فراوانی گردید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اما [[امامت]] در [[مکتب]] [[اهل‌بیت]]{{عم}} این‌گونه تعریف نشده است. همان‌گونه که خواهد آمد، [[امامت]]، ولایت‌الامر است و اساساً [[تقابل]] [[دین]] و [[دنیا]] در این [[مکتب]] معنا و مفهوم ندارد؛ آن [[دینی]] که [[قرآن کریم]] معرفی می‌کند همین [[شریعت]] است و [[شریعت]] شامل همه امور دنیاست و [[رسول اکرم]]{{صل}} [[مبعوث]] شد تا [[مردم]] را در [[دنیا]] [[هدایت]] کند تا بتوانند در [[دنیا]] و [[آخرت]] [[سعادتمند]] باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امام در قرآن]] و [[روایات]]==&lt;br /&gt;
*لفظ &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; در [[قرآن]] به‌کار نرفته؛ ولی واژه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; به صورت مفرد و جمع در ۱۲ مورد استعمال شده است که برخی از آنها و نیز [[آیات]] متعدد دیگر به موضوع [[امامت]] [[ارتباط]] دارد. [[آیات]] مربوط گاهی به [[پیشوایی]] بر [[حق]] [[بالاصاله]]: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم که به فرمان ما (مردم را) رهنمایی می‌کردند» سوره سجده، آیه ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به [[پیشوایی]] به [[حق]] به نحو [[جانشینی]]: {{متن قرآن|وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«ای مؤمنان، از خداوند فرمان برید و از پیامبر و زمامدارانی که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به [[پیشوایی]] [[باطل]]: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم  که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به مفهوم جامع میان [[پیشوایی]] بر [[حق و باطل]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای  را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; اشاره دارد&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[قرآن]] و [[احادیث اسلامی]]، کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، فی الجمله در معنای لغویِ آن به کار رفته است؛ یعنی هر چیزی که مورد [[پیروی]] واقع شود اعم از [[انسان]] و غیر [[انسان]]؛ ولی غالبا این واژه به [[پیشوایان]] [[حق]] و کسانی که به بالاترین نقطۀ قلّه [[انسانیت]] [[صعود]] کرده‌اند، اطلاق می‌گردد و استعمال آن در معنای لغوی، اندک است و نیز استعمال آن در &amp;quot;[[امامان]] [[آتش]]&amp;quot;، به لحاظ نشان دادن نقطۀ نهاییِ [[انحطاط]] [[انسان]]، در مقابل نقطۀ اوج [[تکامل]] اوست&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۲۰-۲۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[روایات اهل بیت]]{{ع}} از [[امامت]] به عنوان [[خلافة اللّه]] و [[خلافة الرسول]] یاد شده است: {{متن حدیث|الْإِمَامَةَ خِلَافَةُ اللَّهِ‏ وَ خِلَافَةُ الرَّسُول}}&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرموده است: «[[امامان]]{{ع}}، [[رهبران]] و [[راهنمایان]] [[خداوند]] بر [[بندگان]] او هستند و کسی داخل [[بهشت]] نخواهد شد، مگر اینکه آنان را بشناسد و آنان نیز او را بشناسند، و کسی داخل [[دوزخ]] نخواهد شد، مگر اینکه آنان را [[انکار]] کند و آنان نیز او را [[انکار]] نمایند»&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه، خطبه ۲۵۲: {{متن حدیث|وَ إِنَّمَا الْأَئِمَّةُ قُوَّامُ اللَّهِ عَلَی خَلْقِهِ وَ عُرَفَاؤُهُ عَلَی عِبَادِهِ، وَ لَا یَدْخُلُ الْجَنَّةَ إِلَّا مَنْ عَرَفَهُمْ وَ عَرَفُوهُ، وَ لَا یَدْخُلُ النَّارَ إِلَّا مَنْ أَنْکَرَهُمْ وَ أَنْکَرُوهُ}}&amp;lt;/ref&amp;gt;. بر این اساس، [[امامان]]{{ع}} در [[قیامت]] [[پیروان]] خود را می‌شناسند هر چند در [[دنیا]] آنان را ندیده باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ص ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[احادیث]] متعددی از [[امامان اهل بیت]]{{ع}} [[روایت]] شده که [[نماز]]، [[زکات]]، [[روزه]]، [[حج]] و [[ولایت]] [[ارکان اسلام]] به شمار می‌روند و در این میان [[ولایت]] از [[جایگاه]] [[برتری]] برخوردار است، زیرا کلید و راهنمای آنهاست&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|بُنِیَ الْإِسْلَامُ عَلَی خَمْسٍ عَلَی الصَّلَاةِ وَ الزَّکَاةِ وَ الصَّوْمِ وَ الْحَجِّ وَ الْوَلَایَةِ وَ لَمْ یُنَادَ بِشَیْ‏ءٍ کَمَا نُودِیَ بِالْوَلَایَة}}؛ اصول کافی، ج۲، ص۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ص ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==[[جایگاه]] و [[شأن]] [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*اصل [[امامت]]، [[مورد اتفاق]] [[شیعه]] و [[سنی]] است. وجه [[ضرورت]] [[امام]]، علاوه بر بیان [[شئون]] و [[وظایف امام]]، تعیین‌کنندۀ [[شرایط امام]] نیز هست. به منظور ایجاد زمینه برای رسیدن [[انسان]] به [[سعادت]] [[حقیقی]]، فلسفۀ [[امامت]] همان فلسفۀ [[نبوت]] است. [[امام]]، [[جانشین پیامبر]] برای تحقق [[اهداف]] [[دین]] است و لذا [[وظایف]] اصلی [[پیامبر]] برای [[امام]] هم ثابت است. با توجه به [[ضرورت]] [[امام]] برای [[برقراری نظم]]، [[حفظ دین]] و [[اجرای حدود الهی]]، چه شرایطی برای تحقق این [[وظایف]] لازم است؟ هر شخصی با هر سطحی از [[معرفت]] و از [[اخلاق]] و [[بصیرت]] نمی‌تواند در این [[مقام]] قرار بگیرد. بنابراین، [[امام]] از جانب [[خدا]] [[منصوب]] می‌گردد و [[نص]] صریح [[پیغمبر]]، بر [[امامت]] او، مهر صحت می‌نهد، [[امام]]، معجزه‌ای را ظاهر و آشکار می‌کند تا [[حجت]] را بر [[مردم]] تمام نماید&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک. [[علی قربانی|قربانی، علی]]، [[امامت‌پژوهی (کتاب)|امامت‌پژوهی]]، ص۱۶۹؛ [[محمد اسحاق عارفی|عارفی، اسحاق]]، [[امامت‌پژوهی (کتاب)|امامت‌پژوهی]]، ص۷۸؛ [[صفدر الهی راد|الهی راد، صفدر]]، [[انسان‌شناسی (کتاب)|انسان‌شناسی]]، ص ۲۰۳؛ [[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۱-۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امام]] در [[نظام آفرینش]] دارای [[شؤون]] گوناگونی است که عمدتاً به دو بخش [[تکوینی]] و [[تشریعی]] تقسیم می‌شود. [[امام]] واسطۀ [[فیض]] بین [[خدا]] و [[خلق]] است و افزون بر اینکه با وساطت خویش وجود و استمرار وجودی آفریدگان را تضمین می‌کند، [[کمالات وجودی]] آنها را نیز از [[قوه]] به فعلیت می‌رساند، چنانکه برخی [[هدایت]] را در [[آیات]] {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِمْ فِعْلَ الْخَيْرَاتِ وَإِقَامَ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءَ الزَّكَاةِ وَكَانُوا لَنَا عَابِدِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند و به آنها انجام کارهای نیک و برپا داشتن نماز و دادن زکات را وحی کردیم و آنان پرستندگان ما بودند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم که به فرمان ما (مردم را) رهنمایی می‌کردند» سوره سجده، آیه ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; ایصال به مطلوب دانسته‌اند که نوعی [[تصرف]] تکوینیِ [[امام]] در [[نفوس]] [[انسان]] هاست که آنان را در [[مسیر کمال]] قرار می‌دهد، به‌گونه‌ای که ایشان از موقفی به موقف دیگر انتقال می‌یابند، بنابراین، مقصود از امر در دو آیۀ مزبور امر اعتباری [[تشریعی]] نیست، بلکه فیض‌های [[معنوی]] و مقام‌های [[باطنی]] است که [[مؤمنان]] با [[اعمال نیک]] خود به سوی آنها [[هدایت]] می‌شوند و [[امام]] اولاً و بالذات از آنها برخوردار است و از او به دیگران می‌رسد، به همین [[دلیل]] [[امامت در قرآن]] به [[هدایت]] [[تبیین]] شده است. در واقع [[امامان]]{{ع}} [[مؤیّد]] به [[روح القدس]] و دارای [[طهارت]] و مسدّد به نیروی ربّانی هستند که آنان را به کارهای خیر فرا می‌خواند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با توجه به اینکه کار [[امام]] ایصال به مطلوب است برخی گفته‌اند: برای تحقق این امر [[امام]] باید برنامۀ [[الهی]] را محقق سازد و این [[هدف]] با [[تشکیل حکومت]] و [[اجرای احکام الهی]] و [[تربیت]] و پرورش [[نفوس]] [[انسان‌ها]] در ظاهر و [[باطن]] تأمین می‌شود، براین اساس افزون بر وساطت [[باطنی]]، [[امام]] در بخش [[تشریع]]، برنامۀ [[الهی]] را به مرحلۀ [[اجرا]] درمی‌آورد؛ خواه از طریق [[تشکیل حکومت]] [[عدل]] باشد یا بدون آن. آنها در این مرحله عهده‌دار [[تربیت]] [[مردم]] و [[اجرای احکام الهی]] و پرورش دهندۀ [[انسان‌ها]] و به وجود آورندۀ محیطی [[پاک]]، منزه و [[انسانی]] هستند. [[روایات]] نیز به بیان آثار و [[شؤون امامت]] پرداخته است؛ از جمله در [[حدیثی]] از [[امام رضا]]{{ع}} آمده است: «[[امامت]] همان [[منزلت]] [[انبیاء]] و [[وراثت]] [[اوصیا]] و [[خلافت خدا]] و [[رسول]]{{صل}}، [[زمام دین]] و [[نظام]] [[مسلمین]] و [[صلاح]] [[دنیا]] و [[عزت]] [[مؤمنان]] است. [[امامت]] اساس بالندۀ [[اسلام]] و شاخۀ بلند آن است. با [[امام]] [[نماز]] و [[زکات]] و [[روزه]] و [[حج]] و [[جهاد]] کامل می‌شود، [[اموال]] [[بیت المال]] و [[انفاق]] به [[نیازمندان]] فراوان می‌گردد. [[اجرای حدود]] و [[احکام]] و [[حفظ مرزها]] و جوانب [[کشور]] صورت می‌گیرد، [[امام]] [[حلال]] [[خدا]] را [[حلال و حرام]] [[خدا]] را [[حرام]] می‌شمارد و با [[حکمت]] و [[اندرز]] [[نیکو]] و [[دلیل]] رسا و محکم [[آدمیان]] را به راه [[پروردگار]] خویش فرا می‌خواند، [[امام]] بسان [[خورشید]] درخشانی است که با [[نور]] آن [[جهان]] روشن می‌شود، ستارۀ روشنی است که در [[دل]] تاریکی‌ها [[انسان‌ها]] را [[هدایت]] می‌کند، [[امام]] [[امین]] [[خدا]] در میان آفریدگان و [[حجت خدا]] بر [[بندگان]] و مدافع [[حریم]] [[الهی]] است»&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|إِنَّ الْإِمَامَةَ هِیَ مَنْزِلَةُ الْأَنْبِیَاءِ وَ إِرْثُ الْأَوْصِیَاءِ إِنَّ الْإِمَامَةَ خِلَافَةُ اللَّهِ وَ خِلَافَةُ الرَّسُولِ ص وَ مَقَامُ أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ{{ع}}وَ مِیرَاثُ الْحَسَنِ وَ الْحُسَیْنِ{{ع}}إِنَّ الْإِمَامَةَ زِمَامُ الدِّینِ وَ نِظَامُ الْمُسْلِمِینَ وَ صَلَاحُ الدُّنْیَا وَ عِزُّ الْمُؤْمِنِینَ إِنَّ الْإِمَامَةَ أُسُّ الْإِسْلَامِ النَّامِی وَ فَرْعُهُ السَّامِی بِالْإِمَامِ تَمَامُ الصَّلَاةِ وَ الزَّکَاةِ وَ الصِّیَامِ وَ الْحَجِّ وَ الْجِهَادِ وَ تَوْفِیرُ الْفَیْ‏ءِ وَ الصَّدَقَاتِ وَ إِمْضَاءُ الْحُدُودِ وَ الْأَحْکَامِ وَ مَنْعُ الثُّغُورِ وَ الْأَطْرَافِ الْإِمَامُ یُحِلُّ حَلَالَ اللَّهِ وَ یُحَرِّمُ حَرَامَ اللَّهِ وَ یُقِیمُ حُدُودَ اللَّهِ وَ یَذُبُّ عَنْ دِینِ اللَّهِ}}؛ کافی، ج ۱، ص ۲۰۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*با توجه به اینکه تنها خداست که به وجود زمینه‌ها و ویژگی‌های [[امامت]] در شخصی به طور کامل [[علم]] دارد، تنها او می‌تواند [[امام]] را [[نصب]] و [[جعل]] کند، ازاین‌رو براساس [[تعالیم]] [[مذهب]] [[شیعه امامیه]]، [[انتخاب مردم]] در [[تعیین امام]] هیچ نقش و اعتباری ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==فرق میان [[نبی]] و [[امام]]==&lt;br /&gt;
*گرچه [[پیامبر]] و [[امام]] هر دو هدایتگرند، منتها [[هدایت]] [[پیامبر]] فقط &amp;quot;[[راهنمایی]]&amp;quot; و به معنای نشان دادن راه است؛ اما [[هدایت]] [[امامان]] &amp;quot;راهبری&amp;quot; به معنای رساندن به مقصود است. با این همه گفتنی است [[امامت]] [[ریاست عامه]] در امر [[دین]] و دنیاست؛ ولی [[مُلک]] منصبی اجرایی در امر [[حکومت]] است که گاهی [[امام]] خود آن را بر عهده می‌گیرد؛ مانند [[حضرت ابراهیم]]{{ع}}، [[پیامبر اکرم]]{{صل}} و [[امام علی بن ابی‌طالب]]{{ع}} و گاهی به [[اذن]] [[خدا]] و با توجه به ملاک‌های خاص، دیگری را به جای خود [[منصوب]] می‌کند؛ مانند [[نصب]] [[طالوت]]&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ص۲۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امام]]؛ [[امیر]] قافله [[ولایت]]==&lt;br /&gt;
*در ثبوت و تحقق [[صراط]] [[ولایت]] که در وی [[انسان]] مراتب کمال [[باطنی]] خود را طی کرده، و در موقف قُرب [[الهی]] جایگزین می‌شود، تردیدی نیست، زیرا [[ظواهر]] [[اعمال]] [[دینی]]، بدون یک واقعیت [[باطنی]] و [[زندگی]] [[معنوی]] [[تصور]] ندارد، و دستگاه [[آفرینش]] که برای [[انسان]] [[ظواهر دینی]] را تهیه و وی را به سوی آن [[دعوت]] کرده است، ضرورتاً این واقعیت [[باطنی]] را که نسبت به [[ظواهر دینی]] به منزله [[روح]] است، آماده خواهد ساخت&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج۱، ص۱۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*هم‌چنین دلیلی که دلالت بر ثبوت و دوام [[نبوت]] در عالَم [[انسانی]] کرده، و سازمان [[دینی]] را نگه می‌دارد، دلالت بر ثبوت و دوام و فعالیت سازمان [[ولایت]] می‌کند، و چگونه متصور است که مرتبه‌ای از [[مراتب توحید]]، یا حکمی از [[احکام دین]]، [[امر]] زنده‌ای بالفعل داشته باشد، در حالی‌که واقعیت باطنی‌ای که در بردارد، در وجود نباشد و یا رابطه عالَم [[انسانی]] با آن مرتبه مقطوع بوده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج۱، ص۱۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*کسی که حامل درجات [[قرب]]، و [[امیر]] قافله [[اهل ولایت]] بوده، و رابطه [[انسانیت]] را با این واقعیت [[حفظ]] می‌کند، در [[زبان قرآن]] &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; نامیده می‌شود. [[امام]] یعنی کسی که از جانب [[حق]]، سبحانه، برای پیش‌روی [[صراط]] [[ولایت]] [[اختیار]] شده، و زمام هدایتِ معنا را در دست گرفته، و [[انوار ولایت]] که به [[قلوب]] [[بندگان]] [[حق]] می‌تابد، اشعه و خطوط نوری هستند، از کانون نوری که پیشِ اوست و موهبت‌های [[معنوی]] متفرق، جوی‌هایی هستند متصل به دریای بیکرانی که نزد وی است&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج۱، ص۱۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[ولایت امام]]، [[موهوبی]] بوده، و بی‌اینکه تدریجاً از راه [[سعی]] و کوشش تحصیل شود، تنها به واسطه [[لیاقت]] ذاتی و استعداد [[فطری]]، و به عبارت دیگر، از راه اختصاص [[الهی]] و [[اختیار]] ربانی به دست آمده و تلاش [[انسانی]] در وی تأثیر ندارد. ولی در عین حال مرتبه‌ای از [[ولایت]]، یعنی انکشاف این واقعیت [[باطنی]]، برای افراد دیگر غیر از [[امام]] نیز ممکن است و میتوان بعضی از [[مراتب ولایت]] [[الهی]] را با تلاش و کوشش به دست آورد. پس چنانچه هر امتی معلومات [[دینی]] خود را از [[پیشوایان دینی]] می‌گیرد، در [[مقامات معنوی]] هم قدم به قدم دنبال آنها را خواهد گرفت&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج۱، ص۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[امام]] چنان‌که نسبت به ظاهر [[اعمال]] [[مردم]] [[پیشوا]] و راهنماست، در [[باطن]] نیز سِمَت [[پیشوایی]] و [[رهبری]] دارد و اوست قافله‌سالار کاروان [[انسانیت]] که از راه [[باطن]] به سوی [[خدا]] [[سیر]] می‌کند&amp;lt;ref&amp;gt;محمد حسین طباطبائی، شیعه در اسلام، ص۱۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*درباره [[مقام امامت]] می‌توان گفت:&lt;br /&gt;
#در هر امتی، [[پیغمبر]] و [[امام]] آن [[امت]] در کمال [[حیات معنوی]] [[دینی]] که به سوی آن [[دعوت]] و [[هدایت]] می‌کند، [[مقام]] اوّل را حائز هستند، زیرا چنان‌که شاید و باید به [[دعوت]] خودشان عامل بوده و [[حیات]] معنویِ آن را واجدند.&lt;br /&gt;
#چون آنان اوّلند و پیش‌رو و [[راهبر]] همه هستند، از همه افضل‌اند.&lt;br /&gt;
#کسی که [[رهبری]] امتی را به امر [[خدا]] به عهده دارد چنان‌که در مرحله [[اعمال]] ظاهری [[رهبر]] و راهنماست، در مرحله [[حیات معنوی]] نیز [[رهبر]] و حقایق [[اعمال]] با [[رهبری]] او [[سیر]] می‌کند&amp;lt;ref&amp;gt;شیعه در اسلام، ص۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۲۱۰-۲۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|2}} &lt;br /&gt;
* [[پرونده: 1100453.jpg|22px]] [[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)|&#039;&#039;&#039; ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی &#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:110015.jpeg|22px]] [[محمد محمدی ری‌شهری|محمدی ری‌شهری، محمد]]، &#039;&#039;&#039;[http://lib.eshia.ir/27255/6/214 [[دانشنامه]] [[قرآن]] و [[حدیث]] ج ۱۰]&#039;&#039;&#039;؛&lt;br /&gt;
* [[پرونده:426310763.jpg|22px]] [[عبدالحسین خسروپناه|خسروپناه، عبدالحسین]]، [[کلام نوین اسلامی ج۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;کلام نوین اسلامی ج۲&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:Imamat.jpg|22px]] جمعی از نویسندگان، [[امامت‌پژوهی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت‌پژوهی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:Ka2-m17 91815.jpg|22px]] [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[کلام تطبیقی ج۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;کلام تطبیقی ج۲&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:000055.jpg|22px]] [[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:440259451.jpg|22px]] جمعی از نویسندگان، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی ج۱ &#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:1368921.jpg|22px]] [[صفدر الهی راد|الهی راد، صفدر]]، [[انسان‌شناسی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;انسان‌شناسی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
* [[پرونده:1414.jpg|22px]] [[فرهنگ شیعه (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ شیعه&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
* [[امام]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امام]]&lt;br /&gt;
[[رده:مفاهیم در کلام اسلامی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503667</id>
		<title>امامت در کلام اسلامی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=503667"/>
		<updated>2021-05-24T07:59:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] - [[امامت در قرآن]] - [[امامت در حدیث]] - [[امامت در نهج البلاغه]] - [[امامت در معارف دعا و زیارات]] - [[امامت در کلام اسلامی]] - [[امامت در معارف و سیره رضوی]] - [[امامت از دیدگاه اهل سنت]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;[[پیشوا]]&#039;&#039;&#039; در [[زبان فارسی]]، ترجمه تحت‌اللفظی کلمه &#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039; است. در [[عربی]] کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; یا &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot; مفهوم مقدسی ندارد. [[پیشوا]]، یعنی کسی که پیشرو است و عده‌ای تابع و پیرو او هستند؛ اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]. [[قرآن کریم]] کلمه [[امام]] را در هر دو مورد به کار برده است. در یک‌جا می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و در جای دیگر می‌‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم  که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مورد اول در مورد [[پیشوایان]] به [[حق]] است و مورد دوم در مورد [[رهبران]] [[کافر]] و [[گمراه]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از [[اصول دین اسلام]] و [[مذهب تشیع]] است. در یکی از تعاریف، به معنای [[ریاست عامه]] در [[امور دنیوی]] و [[اخروی]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در تعاریفی دیگر، [[امامت]]، [[رهبری]] [[امت اسلامی]] پس از [[پیامبر گرامی اسلام]]{{صل}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0012.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
واژه [[امام]] در لغت از ریشه “ام” است که معانی گوناگونی دارد. یکی از آنها [[مقتدا]] و پیشواست. طریحی می‌گوید: “امام به کسر الف، بر وزن فِعال به معنای کسی است که از او [[پیروی]] می‌شود”&amp;lt;ref&amp;gt;فخرالدین الطریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مؤلف [[کتاب]] [[معانی الاخبار]] نیز در توضیح وجه تسمیه [[امام]] می‌گوید: “امام را [[امام]] نامیدند به [[دلیل]] اینکه او پیشرو و مقتدای [[مردم]] است”&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن علی بابویه قمی (شیخ صدوق)، معانی الأخبار، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین [[امامت]]، همان [[ریاست عامه]] بر همه [[مردم]] است که اگر لابشرط بیاید، منظور همان [[ریاست]] [[پیامبر]] و [[رسالت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإِمَامَةُ: هي الرئاسة العامة على جميع الناس، فإذا أخذت لا بشرط شي‏ء تجامع النبوة و الرسالة، و إذا أخذت بشرط لا شي‏ء لا تجامعهما}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵).&amp;lt;/ref&amp;gt;. پس به گروهی خاص که از نظر [[فکری]]، [[اعتقادی]]، [[سیاسی]] یا زبانی، زمانی و مکانی در یک امر یا اموری خاص با یکدیگر اشتراک دارند و با یکدیگر یکی شده‌اند [[امت]] می‌گویند و رهبرشان نیز [[امام]] نامیده می‌شود. بنابراین سه واژۀ [[امام]]، [[امامت]] و [[امت]] لازم و ملزوم یکدیگرند و بدون هم معنا ندارند. [[امت]] نیز به گروهی گفته می‌شود که اعضای آن به سبب [[پیروی از امام]] واحد به نوعی با یکدیگر انتساب داشته باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: لطف الله صافی، نظام امامت و رهبری، ص۱۱-۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
نکته مهم اینکه معنای [[پیشوا]] لزوماً مثبت نیست، بلکه ممکن است [[پیشوا]] [[عادل]] یا [[فاسق]] و [[ظالم]] باشد. در [[قرآن]] کلمه [[پیشوا]] به هر دو مورد گفته شده است. در آیه‌ای آمده است: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، و در جای دیگر می‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[آیه]] نخست [[امام]] به پیشوای خیر و در [[آیه]] دوم [[امام]] به پیشوای [[شر]] گفته شده است. [[امام]] به معنای مقدم نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴-۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[قرآن]] درباره [[فرعون]] همین تعبیر را به کار برده است: {{متن قرآن|يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید» سوره هود، آیه ۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین [[امام]] به معنای طریق و [[راه]] نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يقال للطريق إِمَامٌ، لأنّه يُؤَمُّ أي يقصد و يتبع}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt;. ابن‌منظور در لسان العرب [[معتقد]] است که [[امام]] (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم‌ریشه است و هر دو از ریشه “أمّ، یؤمّ” به معنای قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۶؛ جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر یزدی مطلق، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژه [[امام در قرآن]] در غالب معانی لغوی آن به کار رفته است. البته واژه [[امام در قرآن]] کاربردهای فراوانی دارد که تفلیسی در وجوه القرآن، پنج معنای آن را به شرح ذیل برشمرده است:&lt;br /&gt;
گاهی [[امام]] به معنای [[مقتدا]] و پیشواست: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، نیز در آیه‌ای دیگر به همین معنا آمده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به معنای [[نامه]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[لوح محفوظ]]: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[تورات]] نیز به کار رفته است: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مقصود از [[امام]] در [[آیه]] اخیر، [[تورات]] است. در [[قرآن]] [[امام]] به معنای [[راه]] آشکار و روشن نیز آمده است: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ مراد [[راه]] واضح و آشکار است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جیش بن ابراهیم تفلیسی، وجوه القرآن، ترجمه مهدی محقق، ص۲۸-۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنچه بیان شد، به معانی لغوی [[امام]] مربوط بود. [[متکلمان]] در تعریف اصطلاحی [[امام]] گفته‌اند: [[امام]] [[خلیفه رسول الله]] در [[اجرای دین]] است؛ به گونه‌ای که [[پیروی]] از وی بر همه [[مسلمانان]] [[واجب]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و عند المتكلمين هو خليفة الرسول{{صل}} في إقامة الدين بحيث يجب اتباعه على كافة الأمة}} (ر.ک: محمدعلی تهانوی، موسوعة کشاف اصطلاحات الفنون و العلوم، ج۱، ص۲۵۹).&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[امام]] در اصطلاح [[شیعه]] به کسی می‌گویند که [[پیشوا]] و مقتدای عالمیان در امور [[ظاهریه]] و [[باطنیه]]، اجتماعیه و معنویۀ روحانیه، مُلْکیه و ملکوتیه است. [[خداوند]] به وی در اثر [[اختیار]] عالی و ارادۀ انتخابیۀ آن [[پیشوا]] در جمیع امور چنین [[مصونیت]] و عصمتی را بخشیده است. این [[امامان]] به [[دوازده تن]] منحصرند. بنابر [[عقیده]] و [[ایمان راسخ]] [[شیعه]]، پس از [[غیبت کبری]] آن [[حضرت]] زنده است و [[ولایت]] [[امور معنوی]] و مَلَکوتی [[عوالم]] را در [[دست]] دارد، اما به سبب [[غصب خلافت]] و [[امامت]]، فعلاً در پردۀ [[غیبت]] [[نهان]] است تا [[ظهور]] کند و متصدیان و مباشران [[سلطنت]] و [[امارت]] [[باطل]] را کنار زند و خود بر اساس [[طهارت]] سِریَّه و [[عصمت]] الهیه و [[ولایت]] کبرای حقۀ حقیقیه، بر [[مردم]] [[حکومت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[سید محمد حسین حسینی تهرانی|حسینی تهرانی|سید محمد حسین]]، امام‌شناسی، ج۱۸، ص۲۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس با توجه به تعریف‌های یادشده، [[امام]] سه ویژگی خواهد داشت: ویژگی نخست، [[جانشینی]] [[پیامبر گرامی اسلام]] است. [[امام]] کسی است که پس از [[پیامبر اسلام]]{{صل}} بر [[مسند]] او می‌نشیند. [[ولایت]] و [[سرپرستی]] بر همۀ [[مکلفان]]، از دیگر [[ویژگی‌های امام]] است. [[متکلمان]]، اغلب [[ریاست عامه]] یا [[ولایت]] بر همۀ [[مکلفان]] را در [[تعریف امامت]]، اخذ کرده‌اند، لکن در برخی نکات جنبی، اختلاف‌نظر وجود دارد. ویژگی دیگر، [[واجب‌الاطاعه]] بودن [[امام]] است. برخی از [[متکلمان]]، این قید را نیز در [[تعریف امامت]] آورده‌اند. [[امام]]، [[جانشین پیامبر]]{{صل}} و [[ولیّ]] [[امت]] است؛ به گونه‌ای که [[اطاعت]] از [[فرمان]] او در حد [[اطاعت]] از [[فرمان پیامبر]]{{صل}} [[وجوب]] دارد. [[امام]]، تنها یک [[راهنما]] و [[هدایت‌گر]] نیست که [[امت]] در قبال وی هیچ وظیفه‌ای نداشته باشد، بلکه [[امت]]، هم در امور [[دین]] و هم در [[امور دنیا]] باید از وی [[اطاعت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر محمود یزدی مطلق، ص۴۹-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از نظر [[شیعه]]، [[جامعه]] در هر زمان به [[امام]] نیاز دارد و [[زمین]] نباید هیچ‌گاه از [[حجت خدا]] خالی باشد. پس چنان‌چه شرایط برای [[حضور امام معصوم]] فراهم نباشد، آن بزرگوار تا صدور [[امر الهی]] در پس پردۀ [[غیبت]] [[منتظر ظهور]] می‌نشیند. این دوره، [[عصر غیبت]] نام دارد. [[شیعه]] [[معتقد]] است در این دوره که وجود [[حکومت]] ضروری است، باید افرادی [[حکومت]] را اداره کنند که [[تالی]] تلو معصوم‌اند و شرایط لازم تصدیگری [[حکومت]] را دارند. این [[انتصاب]] در واقع [[نصب عام]] نامیده می‌شود. &lt;br /&gt;
[[نظام امامت]] از منظر [[شیعه]] ویژگی‌ها و مختصاتی دارد که در بخش کلیات بدان اشاره خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت]]، ص ۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف [[شیخ صدوق]]===&lt;br /&gt;
*شیخ [[صدوق]] در &amp;quot;معانی الأخبار&amp;quot; در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|سُمِّيَ الْإِمَامُ إِمَاماً لِأَنَّهُ قُدْوَةٌ لِلنَّاسِ، مَنْصُوبٌ مِنْ قِبَلِ الله - تَعَالَى ذِكْرُهُ - مُفْتَرَضُ الطَّاعَةِ عَلَى الْعِبَادِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌بابویه (صدوق)، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۴-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*حاصل این تعریف، اشاره به سه رکن مهم [[امامت]] در استعمالات شرعیه است؛ یکی: &amp;quot;[[قدوه]]&amp;quot; بودن؛ دومی: &amp;quot;[[منصوب]]&amp;quot; بودن از طرف [[خدا]] و رکن سوم: &amp;quot;[[واجب الاطاعه]]&amp;quot; بودن [[امام]] است. این تعریفِ دقیق، [[جامع‌ترین]] سخن در تعریف [[امام]] را آورده است. مرحوم [[صدوق]] این قیود مذکور در متن خود را از [[روایات]] استفاده کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;در روایات بسیاری به قدوه بودن، منصوب بودن و واجب‌الاطاعه بودن امامان تصریح شده است؛ از جمله: روایت از پیامبر اکرم{{صل}}: {{متن حدیث|إنَّ أئِمَّتَكُم قادَتُكُم إلَى الله؛ فَانظُروا بِمَن تَقتَدونَ في دينِكُم وصَلاتِكُم}}؛ پيشوايان شما زمام داران شما به سوى خدايند؛ پس بنگريد از چه كسانى در نماز و دينتان پيروى مى‌كنيد. صدوق، محمد بن علی، كمال الدين، ص۵؛ و روایت امام صادق{{ع}}: {{متن حدیث|لِأَنَّ اللهَ تَبارَكَ وتَعالى نَصَبَ الإِمامَ عَلَماً لِخَلقِهِ، وجَعَلَهُ حُجَّةً}}؛ چرا كه خداى تبارك و تعالى امام را به عنوان نشانى براى خَلق خويش بر نهاد و او را حجّت قرار داد. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۲۰۳؛ و روايت مفصّل امام رضا{{ع}} در معرفی امام و امامت: {{متن حدیث|هَل يَعرِفونَ قَدرَ الإِمامَةِ ومَحَلَّها مِنَ الاُمَّةِ فَيَجوزَ فيهَا اختِيارُهُم؟ إنَّ الإِمامَةَ أجَلُّ قَدراً، وأَعظَمُ شَأناً وأَعلى مَكاناً، وأَمنَعُ جانِباً، وأبعَدُ غَوراً مِن أن يَبلُغَهَا النّاسُ بِعُقولِهِم، أو يَنالوها بِآرائِهِم، أو يُقيموا إماماً بِاختِيارِهِم... فَكَيفَ لَهُم بِاختِيارِ الإِمامِ؟! وَالإِمامُ عالِمٌ لا يَجهَلُ... مُضطَلِعٌ بِالإِمامَةِ، عالِمٌ بِالسِّياسَةِ، مَفروضُ الطّاعَةِ}}؛ آيا مردم، مقام امامت و جايگاه آن در ميان امّت را مى‌دانند تا در نتيجه، انتخاب آنان در اين باره، روا باشد؟! امامت، مقامش بزرگ‌تر و شأنش والاتر و جايگاهش بلندتر و دست‌نيافتنى‌تر و ژرف‌تر از آن است كه مردم، با خردهايشان بدان برسند، يا با انديشه‌هايشان آن را دريابند، يا با انتخاب خود، امامى را برگمارند... پس مردم را چه رسد به انتخاب امام؟! امامى كه داناست و نادانى ندارد... در پيشوايى و رهبرى، نيرومند، و به سياست داناست. فرمان بردارى از او واجب است. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۹۸-۲۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*او در جای دیگری نیز گفته است: {{عربی|الإمامة إنّما هي مشتقّة من الإيتمام بالإنسان، والإيتمام هو الاتّباع، والاقتداء، والعمل بعمله، والقول بقوله}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. {{عربی|ويجب أن يُعتقد أنّه يلزمنا من طاعة الإمام ما يلزمنا من طاعة النبيّ{{صل}}، وأنّ كلّ [[فضل]] آتاه [[الله]] عَزَّ وَجَلَّ نبيَّه فقد آتاه الإمامَ إلا النبوّة}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، الهداية في الأصول و الفروع، ج۲، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* تعاریفی که در برخی کتب متقدّم [[علمای شیعه]] آمده، [[مؤیّد]] همین تعریف‌اند؛ از جمله: تعریف [[شیخ مفید]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي التقدّم فيما يقتضي طاعة صاحبه، والاقتداء به}}. مفید، علی بن محمد، الإفصاح في الإمامة، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[علامه]] [[طبرسی]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|المستفاد من لفظ الإمام أمران؛ أحدهما: أنّه المقتدى به في أفعاله وأقواله‌. والثاني: أنّه الذي يقوم بتدبير الأمّة وسياستها، والقيام بأمورها، وتأديب جناتها، وتولية ولاتها، وإقامة الحدود على مستحقّيها، ومحاربة من يكيدها ويعاديها}}. طبرسی، فضل بن حسن، مجمع البيان، ج۱، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف مشهور [[متکلمان]]===&lt;br /&gt;
*تعریفی که غالب علمای [[کلام]] از &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; کرده‌اند، دو عنصر اساسی در آن به چشم می‌خورد؛ یکی اینکه [[امامت]] &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; است و دیگر اینکه این [[ریاست]] در &amp;quot;امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. این تعریف، بیشتر نزد [[متکلمان]] [[اهل‌سنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: ماوردی در تعریف امامت گفته است: {{عربی|الإمامة موضوعة لخلافة النبوّة في حراسة الدين وسياسة الدنيا به}}. ماوردی، علی بن محمد، الأحكام السلطانية، ص۵؛ ابن خلدون نیز مشابه این عبارت را آورده است: {{عربی|نيابة عن صاحب الشريعة في حفظ الدين وسياسة الدنيا}}. [[ابن خلدون]]، عبدالرحمن بن محمد، المقدّمة، ص۱۹۰؛ امام‌الحرمین جويني نيز گفته است: {{عربی|الإمامة رياسة تامّة، وزعامة تتعلّق بالخاصّة والعامّة في مهمّات الدين والدنيا}}. جويني، عبدالملک بن عبدالله، غياث الأمم في التياث الظلم، ص۱۵؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: فخر رازی : {{عربی|الإمامة رئاسة في الدين والدنيا عامّة لشخص من الأشخاص}}. رازی، محمد بن عمر، نهاية العقول، ج۴، ص۳۲۱؛ مير سيد شريف جرجانى : {{عربی|الإمام: الذي له الرياسة العامّة في الدين والدنيا جميعاً}}. جرجانى، على بن محمود، التعريفات، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; آمده و از آنجا به [[متکلمان]] [[زیدیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: [[حمیدان بن یحیی]] در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|هو الشخص الجامع للرئاسة على الخلق في الدين والدنيا على وجه لا يكون فوق يده يد}}. قاسمی، حمیدان بن یحیی، جواب المسائل الشتوية والشبه الحشوية، ص۴۸۴؛ احمد بن یحیی المرتضی نیز گفته است: {{عربی|رئاسة عامّة لشخص مخصوص بحكم الشرع ليس فوقها يد}}. المرتضی، احمد بن یحیی، البحر الزخار، ج۲، ص۵۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امامیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: شیخ مفید در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|الإمام هو الإنسان الذي له رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا نيابةً عن النبيّ}}. مفید، محمد بن محمد، النكت الاعتقادية، ص۳۹؛ شیخ طوسی و به تبع او، ابن میثم بحرانی نیز در تعریف [[امامت]] گفته‌اند: {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في أمور الدين والدنيا}}. طوسی، محمد بن حسن، الرسائل العشر، ج۱، ص۱۰۳؛ بحرانی، میثم بن علی، النجاة في القيامة، ص۴۱؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: محقق حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في الدين والدنيا بحقّ الأصالة}}. حلی، جعفر بن حسن، المسلك في أصول الدين، ص۳۰۶؛ علامه حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا لشخص من الأشخاص نيابةً عن النبيّ}}. حلی، حسن بن یوسف، نهج المسترشدين، ص۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نیز منتقل شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[سعد الدین تفتازانی]] در &amp;quot;شرح المقاصد&amp;quot; و [[قوشچی]] در &amp;quot;شرح تجرید&amp;quot;، [[امامت]] را چنین تعریف می‌کنند:{{عربی|الإمامةُ رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا، خلافةً عن النبيّ{{صل}}، وبهذا القيد خرجت النبوّة، وبقيد العموم مثل القضاء والرئاسة في بعض النواحي، وكذا رئاسة من جعلة الإمام نائباً عنه على الإطلاق؛ فإنّها لا تعمّ الإمامة}}&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، سعدالدین، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۴؛ قوشچی، علی بن محمد، شرح تجريد العقائد، ص۳۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*صاحبان این تعریف، معتقدند با قید {{عربی|عامّة}} ریاست‌های خُرد و با قید {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} [[نبوّت]] خارج می‌شود. پس [[امام]] آن کسی است که به صورت [[خلافت]] از [[رسول الله]]، [[ریاست عامه]] داشته باشد. در اغلب منابع [[اهل]] [[کلام]]، [[امامت]] را {{عربی|رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا}} تعریف کرده‌اند و گاهی برای دقت بیشتر، بعضی‌ها عبارت {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} را هم اضافه کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot; نیز پس از بیان تعریف لغوی، به استعمال اصطلاحی [[امامت]] نزد [[اهل]] [[کلام]] اشاره کرده و می‌گوید: {{عربی|الإمامة هي الرئاسة العامّة على جميع الناس، فإذا أُخذت لا بشرط شيء تجامع النبوّة والرسالة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: [[امامت]] به استعمال مستعمل بستگی دارد؛ اگر به‌طور کلی و عمومی بررسی شود (به تعبیر او: اگر &amp;quot;لا بشرط&amp;quot; در نظر گرفته شود)، با [[نبوت]] و [[رسالت]] قابل جمع است؛ یعنی [[نبی]] می‌تواند علاوه بر [[مقام نبوت]]، [[امام]] نیز باشد؛ البته [[امام]] غیر [[نبی]] نیز متصوَّر است. اما اگر [[امامت]] با قطع نظر از [[نبوت]] بررسی شود (به تعبیر او: &amp;quot;بشرط لا عن النبوة&amp;quot; در نظر گرفته شود)، قابل جمع با [[نبوت]] نخواهد بود. البته [[حق]] این است که در ذات مفهوم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، &amp;quot;بشرط لا&amp;quot; نهفته نیست؛ یعنی هنگامی که کلمه [[امام]] اطلاق می‌شود [[امام]]، لا بشرط مراد است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;اشکالات این تعریف&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
*بر تعریف [[متکلمان]] اشکالاتی وارد است؛ چه با قید &amp;quot;{{عربی|خلافةً عن النبيّ}}&amp;quot; و چه بدون آن. پیش از بیان این اشکالات، لازم است به مقدمه‌ای توجه شود:&lt;br /&gt;
*پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
#[[اسلام]] محمدی که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
#[[اسلام جاهلی]]&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پيمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این [[اسلام جاهلی]] بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] محمدی بود. حوادثی که [[اسلام جاهلی]] پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس شکیبایی گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با [[اسلام جاهلی]]، [[نزاع]] بر &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] آشکار [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] پنهان و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین [[اسلام]] محمدی و [[اسلام جاهلی]] و به بیانی دیگر: بین [[اسلام]] [[علوی]] و [[اسلام]] [[اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. [[اسلام جاهلی]] - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از مهم‌ترین این دست‌اندازی‌ها:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبيدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، على بن محمد، الكامل في التاريخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان [[اسلام جاهلی]]، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به [[ریاست]] و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این [[ریاست]] و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پس از این مقدمه، روشن می‌شود اشکالات اساسی تعریف مذکور از [[امامت]] به دو نکته ذیل برمی‌گردند:&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۱. [[تفسیر]] [[امامت]] به [[ریاست]] (تعریف به لازم؛ نه به [[حقیقت]]):&#039;&#039;&#039; بی‌شک، مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است و نمی‌توان این مفهوم را از [[امامت]] جدا انگاشت، لکن جنبه مهمی که در [[حقیقت امامت]] باید لحاظ شود، جنبه ریاستش نیست؛ جنبه مهم‌تری که می‌تواند گویای ماهیت و [[حقیقت امامت]] باشد، بحث ولایت‌ الامری است. [[امامت]] چیزی جز &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; نیست و [[ولایت امر]] عقلاً و نقلاً [[حق]] انحصاری [[خدای متعال]] و مقامی [[الهی]] است. البته در نگاه مردمی که [[خدا]] را از زندگی‌شان حذف می‌کنند، [[امامت]] - خواه ناخواه - تنها [[ریاست]] و [[امارت]] خواهد بود و هنگامی که [[حقوق]] و [[حدود الهی]] در محاسبات [[جامعه]] نباشند، شیخ [[قبیله]] یا هر شخص دیگری نیز می‌تواند [[رئیس]] باشد و اگر کسی [[رئیس]] شد به هر حال، باید به [[فرمان]] او رفت و از او [[تبعیت]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[انتخاب]] واژه [[ریاست]] یا [[سلطنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;پیش از این روایت طبری (م۳۱۰ق) از گفته عمر بن خطاب در سقیفه نقل شد که گفته بود: {{عربی|من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته...}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوک، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[تفسیر]] [[حقیقت امامت]]، انعکاسی از واقعیت تلخ [[جامعه اسلامی]] پس ار [[رسول الله]]{{صل}} است. حوادث [[غصب]] [[امامت]] از [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} آغازگر [[انحراف]] [[امامت]] از [[جایگاه]] اصلی‌اش شد و چون [[امامت]] را از [[جایگاه]] [[حقیقی]] و بلندش جابجا کردند، تمام این [[تحریف‌ها]] دامن‌گیر [[جامعه اسلامی]] شد. به همین [[دلیل]]، [[حضرت زهرا]]{{س}} در خطبه‌ای، به [[مردم]] عصر خود نهیب زد و فرمود: {{متن حدیث|وَيْحَهُم! أَنَّى زَحْزَحُوهَا عَنْ رَوَاسِي الرِّسَالَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۳۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ شگفتا از آنان! چگونه [[خلافت]] را از جایگاه‌های [[استوار]] [[رسالت]] دور راندند؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، عبارت [[ریاست]] یا [[سلطنت]] با مفاهیمی که در [[اسلام]] برای مسأله [[امامت]] آمده است سازگار نیست و هنگامی که به [[قرآن کریم]] و [[حدیث]] [[معصومان]]{{عم}} مراجعه می‌کنیم، می‌بینیم در مسأله [[امامت]] چیز دیگری مطرح است&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال: خدای متعال در قرآن کریم امامت را عهد الهی معرفی کند: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظّالِمِينَ}}، روايات منقول از معصومین{{عم}} نیز از امامت به عنوان جایگاه انبیا، میراث اوصیا و خلافت خدا و رسول ياد شده است: {{متن حدیث|الإِمامَةَ هِيَ مَنزِلَةُ الأَنبِياءِ، وإرثُ الأَوصِياءِ، إنَّ الإِمامَةَ خِلافَةُ الله وخِلافَةُ الرَّسولِ}}. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ حتی یک بار هم در تعابیر [[رسول اکرم]]{{صل}} کلمه [[ریاست]] به چشم نمی‌خورد و با وجود اینکه مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است، اما در [[آیات]] کریمه و [[احادیث]] [[پیامبر اکرم]] و [[اهل بیت]]{{عم}} از زاویه [[ریاست]] به آن [[مقام]] بلند نگاه نشده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از سوی دیگری، تعریف جامع و مانع، باید به جوهر و اصلِ معنا اشاره کند و واژگانی به‌کار بگیرد که مقوّم ماهیت آن مفهوم باشند؛ نه آنکه آثار یا نتایج و تبعات آن مفهوم را محور تعریف خود قرار دهد. ریاستی که در تعریف گذشته ذکر شد، نتیجه [[امامت]] است یا عَرَض عام آن؛ اما نه جوهر اصلی و مقوم ماهیتش&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[ریاست]] نیز از آن جهت که می‌تواند گسترده و کلان باشد یا نباشد، قابل تقسیم بر [[عامه]] و [[خاصه]] است. به همین [[دلیل]]، [[برادران]] [[اهل‌سنت]] چون [[امامت]] را به [[ریاست]] تبدیل کردند، ناچار شدند قید [[عامه]] را بیاورند؛ تا شامل ریاست‌های خاص و [[خرد]] نشود؛ زیرا مدیر مدرسه یا [[مسئول]] اداره نیز [[رئیس]] است و هر رئیسی [[امام]] نیست. ازاین‌رو، ناچار شدند [[ریاست]] را به قید [[عامه]] تقیید کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۲. توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]] ([[میراث]] [[اسلام جاهلی]]):&#039;&#039;&#039; همان‌گونه که اشاره شد، جداسازی [[دین الهی]] از دنیای [[مردم]] یکی از تحریف‌هایی است که دامنگیر [[امت اسلام]] شد. بنابر این، عبارت {{عربی|في أمر الدين والدنيا}} که در [[تعریف امامت]] آورده‌اند، بی‌اساس و از میراث‌های [[اسلام جاهلی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[منابع حدیثی]] و [[تاریخی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] [[نقل]] کرده‌اند از همان روزهای اولی که [[ابوبکر]] سر کار آمد، [[مردم]] و [[صحابه]] از او درباره [[دین]] سؤال می‌کردند و چون [[ابوبکر]] پاسخ آن مسائل [[شرعی]] را نمی‌دانست، به دیگران مراجعه می‌کرد. در زمان عمربن‌خطاب نیز [[رجوع]] به دیگران بیشتر اتفاق افتاد. مرحوم امینی  مسأله [[رجوع]] [[عمر]] به دیگران به‌ویژه، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} را در کتاب [[شریف]] &amp;quot;[[الغدیر]]&amp;quot; جمع کرده است؛ تقریباً یک جلد از این کتاب&amp;lt;ref&amp;gt;امینی، عبدالحسین، الغدیر، ج۶، ص۸۲ - ۳۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مختص به همین مسئله است و این سخن [[عمر]] که {{عربی|لَو لَا عَلِيٌّ لَهَلَكَ عُمَرُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه، عبدالله بن مسلم، تأویل مختلف الحدیث، ج۱، ص۱۵۲ و ص۱۶۲؛ باقلانی، ابوبکر، تمهید الأوائل فی تلخیص الدلائل، ج۱، ص۵۰۲ و ص۵۴۷؛ ابن‌مردویه اصفهانی، احمد بن موسی، مناقب علی ابن أبی طالب، ص۸۸؛ ماوردی شافعی، علی بن محمد، الحاوی الکبیر، ج۱۲، ص۱۱۵ و ج۱۳، ص۲۱۳؛ سمعانی، أبوالمظفر، التفسیر، ج۵، ص۱۵۴؛ زمخشری، محمود، المفصل فی صنعة الإعراب، ج۱، ص۴۳۲؛ ابن‌عربی، ابوبکر، العواصم من القواصم، ج۱، ص۱۹۴؛ رازی، فخرالدین، التفسیر الکبیر، ج۲۱، ص۳۸۰؛ ابن ابی‌الحدید، عبدالحمید، شرح نهج‌البلاغه، ج۱، ص۱۸ و ج۱۲، ص۲۰۵؛ قندوزی، سلیمان بن ابراهیم، ینابیع المودة، ج۱، ص۲۱۶ و ج۲، ص۱۷۲ و ج۳، ص۱۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; را آنجا مطرح و بررسی کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*به [[دلیل]] همین مطلب؛ یعنی عدم اطلاع کافی [[خلیفه اول]] و [[خلیفه دوم]] به [[کتاب خدا]] و [[سنت]] [[رسول الله]] و [[رجوع]] آنان به دیگران، [[رجال]] [[مکتب]] [[اهل‌سنت]] بین [[دین]] و [[دنیا]] جدایی قائل شدند و در نتیجه &amp;quot;[[مرجعیت سیاسی]]&amp;quot; از &amp;quot;[[مرجعیت دینی]]&amp;quot; جدا شد و این آغاز تناقض آشکاری بود که درون این [[مکتب]] اتفاق افتاد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[مکتب]] [[روایی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] برای توجیه این رویکرد، [[روایات]] مجعولی نیز [[نقل]] شده که اساس این دوگانگی را تحکیم بخشید و بر انگاره جدایی [[دنیا]] از [[دین]] صحه گذاشته است. از جمله آنها، [[روایت]] معروف &amp;quot;تأبیر النخل&amp;quot; است که [[اهل]] [[صحاح]] نیز [[نقل]] می‌کنند. در [[صحیح مسلم]] آمده است: &amp;quot;[[رسول الله]] به [[مدینه]] آمد؛ در حالی که آنان درختان [[نخل]] را بارور می‌کردند. [[رسول الله]] گفت: &amp;quot;چه کار می‌کنید؟&amp;quot; گفتند: درختان را بارور می‌کنیم. گفت: &amp;quot;شاید اگر چنین نکنید، بهتر باشد&amp;quot;. آنان نیز از آن عمل دست کشیدند در آن سال میوه درختان ریخت یا ناقص شد. [[راوی]] می‌گوید: قضیه را برای [[رسول الله]] توضیح دادند. [[پیامبر]] گفت: &amp;quot;من هم بشرم؛ هرگاه چیزی در مورد دینتان را به شما امر کردم، آن را بپذیرید و هرگاه مطابق [[رأی]] و نظر خویش چیزی را به شما گفتم؛ بدانید که من نیز بشری هستم مانند شما&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|قَدِمَ نَبِيُّ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةَ، وَهُمْ يَأْبُرُونَ النَّخْلَ، يَقُولُونَ يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ، فَقَالَ: مَا تَصْنَعُونَ؟ قَالُوا: كُنَّا نَصْنَعُهُ، قَالَ: لَعَلَّكُمْ لَوْ لَمْ تَفْعَلُوا كَانَ خَيْرًا فَتَرَكُوهُ، فَنَفَضَتْ أَوْ فَنَقَصَتْ، قَالَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ: إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ، إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ نیشابوری، مسلم بن حجاج، الجامع الصحيح، ج۴، ص۱۸۳۵. همچنین رجوع شود به: بستی، محمد بن حبان، صحيح ابن حبان، ج۱، ص۲۰۲؛ طبرانی، سلیمان بن احمد، المعجم الکبیر، ج۴، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[روایت]] و امثال آن، از جعل‌های جنایت‌آمیزی است که در [[حق]] [[حضرت رسول]]{{صل}} انجام شده و با عبارات متفاوتی [[نقل]] شده است؛ از جمله: {{متن حدیث|إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ {{متن حدیث|إِنَّمَا ظَنَنْتُ ظَنًّا، فَلَا تُؤَاخِذُونِي بِالظَّنِّ، وَلَكِنْ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنِ اللهِ شَيْئًا فَخُذُوا بِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۱؛ مسند احمد (۳/۱۵)؛ مسند عبد بن حميد، المنتخب (ص۶۴)؛ مسند ابوداود طيالسي (۱/۱۸۶)؛ طحاوي در شرح معاني الآثار (۳/۴۸)؛ ابن أبي عاصم در الآحاد والمثاني (۱/۱۶۵)؛ مسند ابي يعلى (۲/۱۲)، مسند الشاشي (۱/۶۸، ۷۰)، ابو نعيم در حلية الأولياء (۴/ ۳۷۲).&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن حدیث|أَنْتُمْ أَعْلَمُ بِأَمْرِ دُنْيَاكُمْ&amp;quot; يا: &amp;quot;إِذَا كَانَ شَيْءٌ مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَأَنْتُمْ أَعْلَمُ بِهِ، فَإِذَا كَانَ مِنْ أَمْرِ دِينِكُمْ فَإِلَيَّ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۳؛ مسند احمد (۲۰/۱۹)، سنن ابن ماجة، ح۲۴۷۱، بزار در البحر الزخار (۱۳/۳۵۵) (۱۸/۹۹)، مسند ابي يعلى (۶/۱۹۸) (۶/۲۳۷)، طحاوي در شرح مشكل الآثار (۴/۴۲۴)، صحيح ابن حبان (۱/۲۰۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مضمون کلی این [[نقل]] قول‌های تحریف‌آمیز این است که اگر در مورد دینتان فرمانی صادر کردم، آن را بپذیرید و اگر در مورد [[دنیا]] به شما دستوری دادم پس از من [[اطاعت]] نکنید! و مفاد نهایی آن، اصل &amp;quot;جدایی [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است که در [[روایات]] مجعولی [[نقل]] شده است. متأسفانه این از [[روایات]] متفق‌ علیه [[برادران]] [[اهل‌سنت]] است و با صریح [[قرآن]] تناقض دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پرسشی که اینجا باید مطرح شود اینکه: &amp;quot;بیع&amp;quot;، &amp;quot;[[تجارت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[زکات]]&amp;quot; و &amp;quot;[[خمس]]&amp;quot; از [[امور دنیوی]] شمرده می‌‌شوند یا از [[امور دینی]]؟ [[قرآن]] درباره بیع سخن گفته است، آیا بیع [[دنیوی]] است و [[دینی]] نیست؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(همان) کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند» سوره حج، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[اداره امور]] [[کشور]] یعنی عمل به [[احکام اسلام]]. حال اگر [[احکام اسلام]] به‌گونه‌ای بیان کنیم که مربوط به [[دین]] باشد و ربطی به [[دنیا]] نداشته باشد، تناقض است. متأسفانه در [[کلام]] و [[حدیث]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] تناقضاتی دیده می‌شود؛ تناقض‌هایی در مسائل [[توحید]]، [[نبوت]]، [[خلافت]] و [[امامت]] که حتی به [[فروع دین]] نیز کشیده شده است &amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال، برادران اهل سنت حدیث عشره مبشره را روایت می‌کند که ده نفر از جمله طلحه و زبیر، همگی در بهشت هستند. از طرفی قرآن می‌گوید که {{متن قرآن|وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا}}؛ «و آنان که با خداوند و پیامبر او نافرمانی کنند بی‌گمان آتش دوزخ، آنان راست که هماره در آن جاودانند» سوره جن، آیه ۲۳. خدا و رسول را اینها معصیت کردند؛ با اینکه خدا دستور داده بود از پیامبر و اولی‌الامر اطاعت کنند: {{متن قرآن|أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ}}؛ «از خداوند فرمان برید و از پیامبر و صاحبان امری که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹. اما اینان اطاعت نکردند؛ اکنون اهل سنت این تناقض را چگونه حل می‌کند؟ چطور می‌شود اینها هم بهشتی باشند و هم جهنمی؟! امثال این تناقض‌ها بسیارند که تنها راه برون رفت از آنان بازگشت به اسلام اصیل و قرآن و عترت است. این‌گونه بود که تقابل بین دین و دنیا در تفکر اسلامی رخنه کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[اسلام]] محمدی{{صل}}، [[دین]] همان شریعتی است که دنیای [[مردم]] را اداره می‌کند؛ بنابر این، در نگاه [[اسلام]] محمدی{{صل}} دو مقوله جدا از یک‌دیگر به نام &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; و &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; وجود ندارد. بی‌گمان، [[رسول الله]]{{صل}} چون [[رئیس]] [[دین]] بود، [[رئیس]] [[دنیا]] نیز بود و چون این [[خلافت]]، [[خلافت]] [[رسول]] خداست، باید &amp;quot;[[ریاست عامه]] در [[دین]]&amp;quot; باشد که همان &amp;quot;[[ولایت امر]] بر دنیای [[مردم]]&amp;quot; است، لکن در [[تفسیری]] که بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} از [[دین]] ارائه شد، [[دین]] و [[دنیا]] از یک‌دیگر تفکیک شدند و از اینجا بود که میان [[دین]] و [[دنیا]] [[تقابل]] ایجاد شد و باعث اندیشه‌های [[انحرافی]] فراوانی گردید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اما [[امامت]] در [[مکتب]] [[اهل‌بیت]]{{عم}} این‌گونه تعریف نشده است. همان‌گونه که خواهد آمد، [[امامت]]، ولایت‌الامر است و اساساً [[تقابل]] [[دین]] و [[دنیا]] در این [[مکتب]] معنا و مفهوم ندارد؛ آن [[دینی]] که [[قرآن کریم]] معرفی می‌کند همین [[شریعت]] است و [[شریعت]] شامل همه امور دنیاست و [[رسول اکرم]]{{صل}} [[مبعوث]] شد تا [[مردم]] را در [[دنیا]] [[هدایت]] کند تا بتوانند در [[دنیا]] و [[آخرت]] [[سعادتمند]] باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*طبق آموزه‌های قرآنی و حدیثی، [[امامت]]، [[استمرار نبوت]] است در همه جزئیات و کلیات و تنها تفاوت آن با [[نبوت]] این است که بر شخص [[امام]] [[وحی]] فرود نمی‌آید و [[نزول وحی]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} پایان یافته است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از گذر [[علم لدنی]] و [[الهام الهی]] و [[مصونیت از خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]]، از [[آیین]] [[پیامبر اسلام]]{{صل}} [[پاسداری]] می‌کند و [[مصالح دینی]] و [[دنیوی]] [[مردم]] را محفوظ می‌دارد. [[تعالیم]] [[راستین]] آسمانی در روزگار پس از [[پیامبر]]{{صل}} تنها از این گذر به دست [[انسان]] می‌رسد و [[قرآن کریم]] و [[سنت پیامبر]] از این طریق [[تفسیر]] و [[تبیین]] می‌شود. [[شیعیان]] معتقدند که [[مقام امامت]] تنها به [[معصومین]] می‌رسد. [[متکلمان امامیه]] بر این [[اعتقاد]] دلایلی آورده‌اند؛ از جمله اینکه [[مردم]] از آن رو به [[امام]] محتاج‌اند، که [[معصوم]] نیستند و بدون او به [[خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]] می‌لغزند. حال، اگر [[امام]]، [[معصوم]] نباشد، خود به امامی دیگر [[نیازمند]] است و این [[باطل]] است؛ زیرا مستلزم دور است. چون [[متکلمان امامیه]] این مدعا را ثابت می‌کنند، از آن نتیجه می‌گیرند که [[مردم]] را در [[انتخاب]] شخص [[امام]]، [[حق]] و سهمی نیست؛ زیرا او باید [[معصوم]] باشد و [[عصمت]] حالتی است [[باطنی]] و جز [[خداوند]] کسی از [[باطن]] [[انسان]] خبر ندارد و [[مردم]] توانِ آن ندارند که [[معصوم]] را از غیر [[معصوم]] بازشناسند&amp;lt;ref&amp;gt;بدایة المعارف الالهیة فی شرح عقائد الامامیه‌، ۱۰۰؛ فرهنگ معارف اسلامی، ۱/ ۲۸۵ و ۲۸۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲-۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بدین‌سان، [[امامت]] همانند [[نبوت]] محتاج [[نص]] [[خداوند]] است و این [[نص]] یا به واسطه [[پیامبر]] تحقق می‌یابد و او به صراحت [[امام]] را معرفی می‌کند و یا به واسطه امامی که خود [[منصوب]] به [[نص]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مفهوم [[امامت]] در [[علم کلام]]==&lt;br /&gt;
*کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; در [[زبان فارسی]] یعنی &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در [[زبان عربی]] به معنای &amp;quot;[[رهبر]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. [[امام]] و [[امامت]] بر حسبِ لغت، مشتق از &amp;quot;أمّ&amp;quot; به معنای هر چیزی است که چیزهای دیگر به آن ضمیمه و نسبت داده می‌شوند، یا از او پیدا می‌شوند، یا [[الهام]] می‌گیرند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به همین منظور، کلمه [[امام]] یا [[پیشوا]] به خودی خود مفهوم مقدسی ندارد، زیرا [[پیشوا]] یعنی کسی که پیش روست، عده‌ای تابع و پیرو او هستند، اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] و راه یافته و درست‌رو باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]، [[قرآن]] هم کلمه [[امام]] را در هر دو مورد اطلاق کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در یک [[آیه]] می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; در آیه‌ای دیگر: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنان مردم را به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; از این رو، لفظ &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; دارای مفهوم لغوی اختصاصی نیست بلکه مفهومی عام دارد و به همه [[رهبران]] [[حق و باطل]] اطلاق می‌شود.&lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] در چند مورد است که در پاره‌ای موارد [[اهل تسنن]] هم قائل به [[پیشوایی]] و [[امامت]] هستند ولی در کیفیت و شخصش با ما [[اختلاف]] دارند، اما در بعضی مفاهیم [[امامت]] اصلاً آنها منکر چنین امامتی هستند. [[امامت]] در معانی: &amp;quot;[[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]]، [[مرجعیت دینی]]، [[ولایت]]&amp;quot; استعمال شده است که [[اهل تسنن]] فقط معنای [[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]] را قبول دارند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶–۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[شیعه]] قائل است که [[پیغمبر]]{{صل}} [[رهبر]] و [[زعیم]] بعد از خودش را [[تعیین]] کرد و گفت بعد از من زمام امور [[مسلمانان]] باید به دست [[علی]]{{ع}} باشد و [[اهل تسنن]] با [[اختلاف]] منطقی که دارند این مطلب را لااقل به شکلی که [[شیعه]] قبول دارد، قبول ندارند و می‌گویند در این جهت [[پیغمبر]] شخص معیّنی را [[تعیین]] نکرد و [[وظیفه]] خود [[مسلمانان]] بوده است که [[رهبر]] را بعد از [[پیغمبر]] [[انتخاب]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با بیان فوق روشن گردید که [[امامت]] نسبت به [[ولایت]] اعم مطلق است و وقتی [[متکلم]] از [[ولایت]] بحث می‌کند در واقع منظورش جنبه [[زعامت]] و رهبریِ [[اجتماعی]] [[امام]] است. [[متکلمین]]، تعاریف گوناگونی از [[امامت]] ارائه می‌دهند که به برخی از آنها اشاره می‌شود:&lt;br /&gt;
#تعریف مختارِ &amp;quot;[[محقق بحرانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کمال‌الدین ابن‌میثم بحرانی، متوفای ۶۷۹ ق است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] المرام: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در [[دین]] و [[دنیا]] اصالتاً (نه بر [[سبیل]] [[نیابت]])&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|وهي رئاسة عامّة في أمور الدّين والدنيا بالإصالة}}؛ میثم بن علی بن البحرانی، قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۴ و ر.ک: محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف مربوط به &amp;quot;[[تفتازانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;سعدالدّین تفتازانی (۷۱۲ - ۷۹۳) متکلم برجسته اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در شرح المقاصد: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در امر [[دین]] و [[دنیا]] از باب [[جانشینی پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي رِئاسَة عامّةٌ فی امُورِ الدِّینِ وَ الدُّنْیا، خَلافَة عَنِ النَّبی{{صل}}}}؛ محمد حسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف جناب &amp;quot;[[ایجی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;عضدالدین ایجی (۴۵۰ - ۵۰۵) متکلم نام‌دار اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در المواقف: &amp;quot;[[امامت]] یعنی [[نیابت]] و [[جانشینی پیامبر]] در برپا داشتن [[احکام دین]]، به‌طوری که [[تبعیت]] از او بر عموم [[مسلمین]] [[واجب]] است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي خلافة الرّسول في اقامة الدين بحيث يجب اتّباعه علی كافّة الامّة}}؛ عضدالدین ایجی، المواقف فی علم کلام، ص۶۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#&amp;quot;[[ابن خلدون]]&amp;quot; می‌نویسد: &amp;quot;[[خلافت]] یعنی [[نیابت]] از صاحب [[شریعت]] در [[حفظ دین]] و [[سیاست]] [[دنیا]]. به این اعتبار [[خلافت]] و [[امامت]] گفته می‌شود و متصدی آن [[مقام]] را [[امام]] و [[خلیفه]] می‌گویند&amp;lt;ref&amp;gt;مقدمه ابن‌خلدون، ص۱۹۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#تعریف [[متکلمین]] [[شیعه]] و [[سنّی]] از [[امامت]] که در آن اختلافی ندارند این است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از یک [[ریاست]] و اولی بالتصرف بودن در جمیع [[شئون]] [[دین]] و دنیای [[مردم]] (اعم از [[بیان احکام]]، [[اجرای حدود]]، اداره [[جامعه]]، ایجاد [[عدالت اجتماعی]]، [[جنگ]] و [[صلح]] و...) برای شخص معیّنی از [[انسان‌ها]] به عنوان [[نیابت]] و [[جانشینی]] از [[پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامامة رئاسة عامّة في امور الدّين والدنيا، لشخص من الأشخاص نيابة عن النبي{{صل}}}}؛ علی محمدی، شرح کشف المراد، ص۴۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در این تعریف، [[ولایت]] و [[امامت]] [[ریاست عامه]] الهیه معرفی شده، لذا مستلزم اجزایی است که عبارتند از: تقدم، [[علم]]، [[قدرت]] و [[حُکم]]، که بدون این اجزا، ریاستی متصور نیست. پس &amp;quot;[[ولیّ]]&amp;quot; کسی است که در [[خلقت]] خود، متقدم، عالِم، [[قادر]]، [[حاکم]] و نسبت به دیگر مخلوقات تصرف‌کننده علی‌الاطلاق باشد. اما تقدم او برای آن است که ولیِّ مطلق، [[انسانی]] است که [[خداوند]] او را خلعت [[جمال]] و کمال پوشانیده، و [[قلب]] او را مکان [[مشیت]] خود قرار داده و خزینه [[علم]] خود گردانیده و [[لباس]] [[تصرف]] [در [[آفرینش]]] و [[حکم]] [بر مخلوقات] را بر قامت او پوشانیده است. [[امر الهی]] در عالَم بشری در [[اختیار]] اوست. او مانند آفتابی درخشان است که [[خالق]] [[جهان]] در آن درخشش، [[نور]] [[حیات]] و [[اشراق]] و احتراق برای [[اهل]] روزگارها قرار داده است&amp;lt;ref&amp;gt;ماهنامه موعود، شماره ۶۶، اسفند ۱۳۸۵، مقاله &amp;quot;امامت و ولایت خاتم الانبیا&amp;quot; تلخیصی از کتاب ولایت کلّیه، سید حسن میرجهانی اصفهانی.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#[[متکلم]] بزرگ [[شیعه]] &amp;quot;[[خواجه نصیر طوسی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;خواجه نصیرالدّین طوسی (۵۹۷ -۶۷۲) سلطان المحققین، استادالبشر، حکیم و ریاضی‌دان، فیلسوف و متکلم بزرگ شیعی، مؤلف گران‌قدر کتاب کلامی ارزشمند تجریدالاعتقاد و شارح اشارات بوعلی سیناست.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] العقائد تعریف مُتقن و جامعی را مطرح کرده است که از تعاریف پیش مناسب‌تر است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست]] عمومی [[دینی]] که عهده‌دار [[ترغیب]] همه [[مردم]] در [[حفظ]] و حراست از [[مصالح دینی]] و [[دنیایی]] بوده و آنان را بر حسب همان [[مصالح]] از آنچه برای‌شان ضرر دارد، برحذر می‌نماید&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإمامة رئاسة عامّة دينية مشتملة على ترغيب عموم الناس في حفظ مصالحهم الدينية و الدنياوية، وزجرهم عمّا نصرهم بحسبها}}؛ خواجه نصیر طوسی، قواعد العقائد، ص۱۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با دقت و نظر اجمالی به تعریف مزبور می‌توان به [[جامعیت]] و تمامیت آن [[اذعان]] نمود، چه آنکه در این تعریف [[مقید]] نمودن [[ریاست]] به &amp;quot;[[ریاست]] [[دینی]]&amp;quot; کاشف این معناست که [[امامت]]، منصبی است [[الهی]]، نه [[مقام]] و منصبی [[اجتماعی]] که [[مردم]] در [[انتخاب]] آن نقش داشته باشند. و این نکته مهم و برجسته‌ای است که [[علمای شیعه]] به آن اهتمام داشته و ادله‌ای بر [[اثبات]] آن اقامه کرده‌اند. و اصولاً همین نقطه محلّ [[اختلاف]] [[شیعه]] و [[اهل سنّت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۱ و ۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*هم‌چنین برخلاف نظریه اکثر علمای [[اهل سنت]] که [[امامت]] و [[خلافت]] را مرادف دانسته و گفته‌اند [[خلافت]] و [[امامت]] یک معنا دارد&amp;lt;ref&amp;gt;جعفر سبحانی، رهبری امت، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، هر گاه یکی از آنها صادق باشد دیگری نیز صادق خواهد بود. [[عالمان]] [[شیعی]] این مطلب را رد کرده و گفته‌اند که در تحقق معنای [[امامت]]، [[پیشوایی]] شرط است. [[امام]] باید به آنچه می‌گوید عمل کند و قولاً و عملاً [[مردم]] را [[رهبری]] کند. اما در تحقق معنای لغوی [[خلافت]] همین اندازه کافی است که شخص [[خلیفه]] برای [[جانشینی]] از [[پیغمبر]] [[تعیین]] شده باشد و در غیاب او کارهایش را انجام دهد. پس، این دو معنا مرادف نیستند، هر چند ممکن است در یک شخص جمع شوند&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در نتیجه می‌توان [[اذعان]] داشت که اگر [[امام]] به‌طور مطلق بر کسی گفته شد و قرینه‌ای وجود نداشت که موضوع امامتش را محدود کند باید گفت [[پیشوا]] و [[رهبر]] کلی است و در کلّیه [[امور معنوی]] و [[مادّی]] [[پیشوایی]] دارد. همان‌طوری که [[امام رضا]]{{ع}} در [[تعریف امامت]] می‌فرماید: &amp;quot;[[مقام امامت]] بزرگ‌تر و عالی‌تر و دقیق‌تر از آن است که [[عقول]] [[مردم]] بدان برسد، یا به واسطه آرای خودشان بتوانند آن را [[درک]] کنند یا امامی را [[اختیار]] نمایند... [[امامت]] یعنی نگه‌داری [[دین]] و [[حفظ نظام]] [[مسلمانان]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، ج۱، ص۱۹۹-۲۰۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۰-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==معانی [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای نخست:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[اخلاقی]] محض به معنای الگوی [[اخلاقی]]. در این صورت مقصود از {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که من تو را الگویی [[اخلاقی]] قرار دادم که بدون داشتن اختیارات [[حکومت]] و [[سیاست]] و [[تدبیر امور]]، به او [[اقتدا]] می‌شود.&lt;br /&gt;
حتی بدون توجه به قرینه‌هایی که پیش از این گفتیم نیز این معنا نمی‌تواند مدنظر باشد؛ زیرا&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] [[اخلاقی]] برای همۀ [[پیامبران]] نسبت به دیگر [[مردم]] ثابت است؛ زیرا [[انبیا]] [[برترین]] [[بندگان]] و بهترین‌هایی هستند که [[خداوند]] از میان آفریدگانش [[برگزیده]] است. [[خدای سبحان]] می‌فرماید:&lt;br /&gt;
{{متن قرآن|اللَّهُ يَصْطَفِي مِنَ الْمَلَائِكَةِ رُسُلًا وَمِنَ النَّاسِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند از فرشتگان رسولانی برمی‌گزیند، و همچنین از مردم» سوره حج، آیه ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لازمۀ اصطفا و [[گزینش الهی]]، کمال [[اخلاقی]] است که دارندۀ آن را در جایگاهی قرار می‌دهد که باید به او [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[الگو]] گرفت. این [[گزینش]] نیز برای [[ابراهیم]] ثابت بوده است؛ چه اینکه او [[پیامبری]] بود که [[خداوند سبحان]] پیش از [[عهد امامت]]، او را برای [[نبوت]] و [[رسالت]] [[برگزیده]] بود. پس درست نیست که از این [[امامت]]، تنها الگوی [[اخلاقی]] محض قصد شده باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۹-۱۷۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*با روشن شدن این مطلب، می‌گوییم: در این [[آیه]] قرینه‌های روشنی وجود دارد که نشان می‌دهد [[امامت]] در اینجا منصبی قانونی است و تنها یک ویژگی [[اخلاقی]] [[تکوینی]] نیست. از جمله:&lt;br /&gt;
#تعبیر از [[امامت]] به “عهد”؛ این تعبیر به صراحت بیان می‌کند که [[امامت]] نه ویژگی [[تکوینی]] بیرونی، بلکه منصبی اعتباری و قانونی است که [[خداوند]] [[عهد]] و [[پیمان]] بر آن را به هر کس بخواهد عطا می‌کند.&lt;br /&gt;
#[[نفی]] [[امامت]] از [[ظالمان]]؛ زیرا کمال [[اخلاقی]] و الگوگری [[معنوی]]، اساساً و به خودی خود از [[ظالمان]]، [[نفی]] شده است و اگر مقصود از عبارت {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} چنین معنایی می‌بود، تحصیل حاصل بوده، بیان آن از سوی حکیمی [[فصیح]] و [[بلیغ]]، [[زشت]] و نارواست؛ چرا که [[ظالم]] از پایه، ویژگی الگوگری [[اخلاقی]] را ندارد و نیازی نیست که [[خداوند متعال]] با این سخن آن را [[نفی]] کند: {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۰-۱۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای دوم:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[فکری]] و [[اعتقادی]]. مقصود از این [[پیشوایی]]، [[رهبری]] [[مردم]] در [[باور]] به [[توحید]] است؛ یعنی همان [[دین ابراهیم]] که [[مأمور]] به [[پیروی]] از آن هستیم.&amp;lt;ref&amp;gt;اشاره به آیه:{{متن قرآن|قُلْ صَدَقَ اللَّهُ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا}} «بگو: خدا راست گفته است. بنابراین، از آیین ابراهیم پیروی کنید، که به حق گرایش داشت» سوره آل عمران، آیه ۹۵. (مترجم)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ممکن نیست مقصود از [[امامت]] در آیۀ [[عهد]]، صرف [[پیشوایی]] [[فکری]] در [[باور]] به [[توحید]] باشد. پیش از آنکه [[دلایل]] این مطلب را توضیح دهیم، باید به نکته‌ای اساسی اشاره کنیم و آن اینکه گاهی مقصود از [[توحید]]، [[توحید نظری]] محض است؛ یعنی [[باور]] [[ذهنی]] به [[توحید]]، حتی اگر عملاً در واقعیت محقق نشود. گاه نیز منظور از [[توحید]]، [[باور]] [[توحیدی]] محقَّق و مجسَّم در واقعیت [[انسانی]] است که آن را [[توحید عملی]] می‌نامیم.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۱-۱۷۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای سوم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] به معنای [[نبوت]] که در این صورت مقصود از آیۀ {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که تو را [[پیامبر]] قرار دادیم.&lt;br /&gt;
*بطلان این احتمال، روشن و [[مورد اتفاق]] است. [[یقین]] به این [[حقیقت]] که [[نبوت]] پیش از [[آزمون]] [[ذبح]] [[اسماعیل]] برای [[ابراهیم]] ثابت بوده، برای بطلان این معنا کافی است؛ زیرا این [[آیه]] به صراحت تأکید می‌کند که [[امامت]] پس از موفقیت [[ابراهیم]] در آزمون‌ها و بلاهایش برای او قرار داده شد؛ آزمون‌هایی که بی‌شک ابتلای [[ذبح]] [[اسماعیل]] از مهم‌ترین و بزرگ‌ترین آنها بود و [[قرآن کریم]] نیز با این عبارت بر آن تصریح می‌کند: {{متن قرآن|إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ}}. پس [[امامت]] مدت‌ها بعد از [[پیامبری]] برای [[ابراهیم]] قرار داده شد و از این‌رو ممکن نیست که مقصود از [[امامت]] در اینجا، [[پیامبری]] باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۵-۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای چهارم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] شامل [[پیشوایی]] در [[سیاست]] و [[حکومت]]. با [[اثبات]] بطلان دیگر معانی، این تنها معنای ممکنی است که می‌توان از مجموع معانی بیان شده برای واژۀ [[امامت]] در این [[آیه]] فرض کرد؛ معنایی که ظاهر [[آیه]] و قرینه‌های پرشماری که برخی از آنها را پیش از این بیان کردیم نیز بر آن دلالت می‌کنند.&lt;br /&gt;
از آنچه گفتیم روشن شد که عبارت {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} دلالت دارد که [[منصب]] [[ریاست]] و [[رهبری سیاسی]] برای [[ابراهیم]]{{ع}} قرار داده شده است و این دلالت به اندازه‌ای روشن است که جایی برای [[شک و تردید]] باقی نمی‌گذارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تجلی [[توحید]] در [[نظام امامت]]==&lt;br /&gt;
*چون [[خداوند]] موجودی ادراک ‌نشدنی است و با کسی روبه‌رو و طرف [[گفت‌وگو]] نمی‌شود، پس ناگزیر کسانی از خود [[مردم]] را بر آنان می‌گمارد تا به جای خودِ او با [[مردم]] گفت‌وشنود کنند و [[حقّ حاکمیت]] و فرمان‌دهی [[خداوند]] را به مرحله [[اجرا]] و تحقق برسانند و فرستادن آنها [[لطف]]&amp;lt;ref&amp;gt;علامه حلی در این باره میفرمایند: {{عربی|الإمام لطف فيجب نصبه على الله تعالى تحصيلا للغرض}}. [وجود] امام لطف است؛ پس نصب او بر خدای متعال واجب است، برای آنکه غرض (و هدف الهی از هدایت بندگان) حاصل گردد، ر.ک: علی شیروانی، ترجمه و شرح کشف المراد، ج۲، ص۵۹-۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[مهربانی]] از سوی او به [[مردم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;نشریه همشهری، شماره ۸، اردیبهشت ۱۳۷۷، مقاله امامت در چشم‌انداز کلام شیعی برگرفته از کتاب جستاری در فلسفه امامت، نوشته اصغر دادبه.&amp;lt;/ref&amp;gt;، لذا [[ولایت]] [[نبویه]] به نوعی [[ولایت]] الهیه است و [[ولایت]] [[امامیه]] نیز استمرار [[ولایت]] [[نبویه]] می‌باشد.&lt;br /&gt;
*برحسب [[عقیده]] [[توحید]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] حقیقیّه مطلقه، مختص به خداست و [[حق]] و [[حقیقت]] این صفات، بنابر [[آیات قرآنی]]: {{متن قرآن|فَاللَّهُ هُوَ الْوَلِيُّ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «اما خداوند است که سرور (راستین) است» سوره شوری، آیه ۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; فقط برای او ثابت است&amp;lt;ref&amp;gt;آیت الله جوادی آملی در کتاب شمیم ولایت، ص۹۴-۱۰۰ انحصار ولایت را برای خداوند با ادله عقلی و نقلی اثبات می‌کند.&amp;lt;/ref&amp;gt;. و هیچ کس در عوض [[خدا]]، حتی بر نفس خود، نه [[سلطنت]] و [[ولایت تکوینی]] دارد و نه [[ولایت تشریعی]]؛ تا چه رسد به اینکه بر دیگری [[ولایت]] و [[حکومت]] داشته باشد، یا مالک امر او باشد&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[ولایت]] [[حقیقی]]، اوّلاً و بالذّات از آنِ خداست و [[ولایت]] و [[حکومت]] و مالکیتی که به [[اذن خدا]] برای بعضی از بندگانش اعتبار می‌شود، اعتباری و قراردادی بوده و [[حقیقی]] نیست&amp;lt;ref&amp;gt;عبدالله جوادی آملی، شمیم ولایت، ص۱۰۵-۱۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لذا به [[عزل]] و اسباب دیگر، قابل زوال و انتقال است. این [[ولایت]] از نوع [[ولایت]] و [[حکومت]] الهیه نیست، چون [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] [[حقیقی]] و خودبه‌خود و دائم و [[ابدی]] است و مقتضای [[ارتباط]] و تعلق مخلوق به [[خالق]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] [[حقیقی]] [[خالق]] است. مخلوق، هویتش مملوکیت و [[نیازمندی]] و [[فرمان‌پذیری]] و عنایت‌خواهی است، نه مملوکیت [[بنده]] و تحت [[ولایت]] [[خدا]] بودن او قابل سلب شدن است، چون ذات او، هویتش و واقعیتش همین است؛ و نه [[مالکیت]] و [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] بر بندگانش قابل سلب و اعطا و انتزاع است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و خلاصه اینکه [[تصرف در امور]] [[عامه]] و رتق و فتق امور و حلّ و فصل [[کارها]] و اِعمال [[ولایت]] بر خلق‌الله، اگرچه یک نفر هم باشد، [[تصرف]] در [[سلطنت الهی]] و [[مُلک]] خدایی است که باید به اِذن [[خدا]] باشد؛ چنان‌که برحسب [[آیات قرآن کریم]]&amp;lt;ref&amp;gt;مانند آیات ولایت، اولوالامر و تطهیر.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[احادیث متواتر]]&amp;lt;ref&amp;gt;برای نمونه ر.ک: اصول کافی، کتاب الحجه، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; که از طریق [[شیعه]] و [[سنّی]] [[روایت]] شده است، در [[امت]] این برنامه انجام شده و [[حضرت رسول]]{{صل}} [[نظام امامت]] را به [[مردم]] [[ابلاغ]] کرده و &amp;quot;اولوالامری&amp;quot; که تا [[روز قیامت]] عهده‌دار این منصب‌اند و [[دوازده]] نفرند، به [[امت]] معرفی شده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از بیانات پیشین می‌توان نتیجه گرفت که رابطه بین [[شناخت امام]] و [[یگانگی خداوند]] [[متعال]] رابطه‌ای دو طرفه است، زیرا از طرفی باید [[توحید خداوند]] و [[حاکمیت]] مطلق باری‌تعالی را پذیرفت و از طرفی نیز باید [[ایمان]] که [[معرفت خداوند]] فقط در پرتو [[شناخت]] و [[پیروی]] از [[ائمه اطهار]]{{عم}} امکان‌پذیر است. در لسان [[روایات]] این مطلب به صراحت مطرح شده است؛ چنان‌که [[ابوحمزه]] می‌گوید: [[امام باقر]]{{ع}} به من فرمود: &amp;quot;[[خدا]] را یقیناً کسی پرستد که او را بشناسد و کسی که به [[خدا]] [[معرفت]] پیدا نکند او را گمراهانه می‌پرستد&amp;quot;. عرض کردم: فدایت شَوم؛ [[معرفت خدا]] چیست؟ فرمود: &amp;quot;[[باور]] داشتن [[خدای متعال]] و [[باور]] داشتن [[پیغمبر]]{{صل}} و [[دوست داشتن علی]] و [[پیروی]] از او و [[ائمه اطهار]]{{عم}} و [[بیزاری جستن]] به [[خدای سبحان]] از [[دشمن]] آنان. این چنین شناخته می‌شود [[خدای عزوجل]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، کتاب الحجه، بابُ معرفة الإمام و الرَّد إلیه.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۵-۶۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مباحث [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*مباحث [[امامت]] بر پنج محور کلی [[استوار]] است:&lt;br /&gt;
# [[حقیقت امامت|حقیقت]] یا [[چیستی امامت]] (ما الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[وجوب وجود امام]] یا [[ضرورت امامت]] (هل الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[غایت امامت]] یا [[کارکردهای امام]] و در ذیل آن، [[شئون امام|شئون]] و [[وظایف امام]] (لم یجب وجود الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[صفات امام|صفات]] و [[ویژگی‌های امام]] و در ذیل آن، [[راه‌های شناخت امام]] (کیف الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[تعیین امام]] در هر زمان و در ذیل آن، [[نصوص امامت]] و [[افضلیت امیرالمؤمنین]]{{ع}} و یازده [[امام]] بعد، [[معجزات]] هر یک از [[امامان]] [[دوازده گانه]] و [[مهدویت]] و مباحث مرتبط با آن (مَنِ الإمام؟)&amp;lt;ref&amp;gt;تلخیص المحصل، ص۴۲۶- ۴۲۷؛ قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۳- ۱۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*چهار مبحث نخست، مباحث کلی [[امامت]] ([[امامت عامه]]) را تشکیل می‌دهد و مبحث اخیر مربوط به [[امامت خاصه]] است. به عبارت دیگر مسایل کلی و عمومی [[امامت]]، مربوط به [[امامت عامه]] است و مسایل مربوط به مصداق‌شناسی [[امام]] و این که [[امامان]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} چه کسانی بوده‌اند، مسایل [[امامت خاصه]] است. مباحث [[امامت خاصه]] در مدخل‌های مناسب [[تبیین]] خواهد شد. چنان که پاره‌ای از مباحث کلی [[امامت]] نیز که از اهمیت یا گستردگی خاصی برخوردارند مدخل‌های مستقلی خواهند داشت.&lt;br /&gt;
* [[عصمت امام]]، [[افضلیت امام]] و [[علم امام]] از این گونه مباحث‌اند. در این مقاله دیگر مباحث کلی [[امامت]] بررسی خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴؛ [[عبدالمجید زهادت|زهادت، عبدالمجید]]، [[معارف و عقاید ۵ ج۱ (کتاب)|معارف و عقاید ۵]] ص ۲۵-۳۰&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==نخست: [[حقیقت امامت]]==&lt;br /&gt;
==دوم: [[ضرورت امامت]]==&lt;br /&gt;
==سوم: [[غایت امامت]]==&lt;br /&gt;
==چهارم: [[صفات امام]]==&lt;br /&gt;
*درباره [[صفات امام]] در منابع [[شیعه]] و [[اهل سنت]] بحث‌های فراوانی شده است. [[تفتازانی]] [[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]]، [[مرد بودن]]، [[اجتهاد]]، [[شجاعت]]، [[با کفایت]] و [[قریشی بودن]] را شرط می‌داند. از نظر ایشان چهار شرط نخست ([[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]] و [[مرد بودن]]) [[مورد اتفاق]] است؛ ولی شرط‌های دیگر را برخی [[متکلمان]]، به خاطر [[تکلیف مالایطاق]] یا لغویت، لازم نمی‌دانند. [[وصف]] [[قریشی بودن]] مورد قبول تمام [[مذاهب اسلامی]] (به جز [[خوارج]] و گروهی از [[معتزله]]) می‌‌باشد&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در میان [[متکلمین]] [[شیعه]]، [[خواجه نصیر]]، [[جامع‌ترین]] فهرست را در هشت عنوان برای صفات و [[شرایط امام]] تدوین کرده است که عبارتند از: [[عصمت]]، [[علم به احکام شریعت]] و روش [[سیاست]] و [[مدیریت]]، [[شجاعت]]، [[افضلیت]]، بری بودن از [[عیوب]] جسمی و [[روحی]] و نسبی، مقرب‌ترین افراد بودن در پیشگاه [[خدا]] و [[استحقاق]] پاداش‌های [[اخروی]]، [[توانایی]] برآوردن [[معجزه]] برای [[اثبات امامت]] خود در مواقع [[لزوم]] و یگانه بودن در [[منصب امامت]]&amp;lt;ref&amp;gt;طوسی، تلخیص المحصل، ص۴۳۰ - ۴۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پنجم: [[تعیین امام]]==&lt;br /&gt;
===[[راه تعیین امام]]===&lt;br /&gt;
====[[نصب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[انتخاب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[غلبه]] و [[استیلا]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اثبات امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[جایگاه امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[امامت]] از دیدگاه فرق و [[مذاهب]] ==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه امامیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه زیدیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اسماعیلیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه غلات}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اهل سنت}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه خوارج}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
*از دیدگاه [[شیعه]] [[امامت]] از اصول [[عقاید اسلامی]] است، ولی [[معتزله]] و [[اشاعره]] و دیگر [[مذاهب اسلامی]] آن را از [[فروع دین]] می‌دانند. بر این اساس‌، [[شیعه]] برای [[امامت]] [[جایگاه]] برجسته‌تری در مقایسه با [[اهل سنت]] قائل است، ولی همان‌گونه که اشاره شد از دیدگاه [[اهل سنت]] نیز [[امامت]] مسئله‌ای مهم و برجسته است، زیرا از [[فروع دین]] بودن یک مسئله با مهم بودن آن منافات ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*درباره [[نظریه سیاسی]] [[زیدیه]] و [[اندیشه]] امامت نزد آنان‌، مقدمتاً باید توضیح داد که زیدیه از تحولات و دگرگونی‌های فکری و مذهبی گوناگونی در طول تاریخ خود برخوردار بوده‌اند. در سده ۲ ق جدا از شخصیت محوری [[زید بن علی‌]]، گروه‌ها و گرایش‌های مختلفی از جمله جارودیه و ابتریه در میان [[زیدیه]] وجود داشتند که هر یک دارای [[عقاید]] ویژه خود در باب امامت بودند. در همان سده و نیز در سده ۳ ق نیز وجود برخی شخصیت‌های محوری در [[زیدیه]] [[عراق]] و [[حجاز]] و یمن همچون [[محمد بن عبدالله نفس زکیه‌]]، [[قاسم رسی]] و [[یحیی هادی الی الحق‌]]، پیشوای دولت زیدی یمن‌، تحولاتی در عقیده و [[اندیشه]] دینی زیدیه ایجاد کرد که طبعاً مسأله امامت نیز بر کنار از آن نبود. این تحولات البته به دلایل شرایط خاص تاریخی به وجود می‌آمد و تحت تأثیر اندیشه‌های محافل [[امامی‌]]، یا [[معتزلی]] و حتی [[سنی]] بود&amp;lt;ref&amp;gt;نک: مادلونگ‌۱، جم.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از دیدگاه [[اسماعیلیه]] [[منصب الهی|منصبی الهی]] است و [[امام]] از جانب [[خداوند]]، [[هدایت]] و [[برگزیده]] می‌شود، و مسلمانان به وساطت او می‌توانند به وظایف دینی خود عمل کنند و درکی کامل و جامع از ابعاد ظاهری و باطنی [[قرآن]] - که تحقق آرمان‌های الهی در زمین مبتنی بر آن است - حاصل نمایند. [[اسماعیلیه]] [[ولایت امام]] را یکی از ارکان دین می‌دانند و معتقدند که امامت برترین ارکان دین است و حتی آن را عین [[ایمان]] می‌انگارند و بر آنند که امامت تا ابد ادامه دارد و جهان هستی بدون [[وجود امام]] لحظه‌ای دوام ندارد و اگر فرضاً [[امام]] از دست رود، بی‌درنگ همه عالم نابود می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;قاضی نعمان‌، دعائم الاسلام‌، به کوشش [[آصف بن علی اصغر فیضی‌]]، ص۲؛ تامر، عارف‌، الامامه فی الاسلام‌،ص: ۶۵ -۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از این‌رو، یکی از اصول اعتقادی اسماعیلیه این است که بعد از وفات [[پیامبر|پیامبر اکرم‌]]{{صل}}، [[امام علی]]{{ع}} به امر الهی و با نص [[پیامبر]]{{صل}} در زمان حیاتش به عنوان [[امام]] برگزیده شد و امامت باید به صورت موروثی در نسل [[امام علی|علی‌]]{{ع}} و [[فاطمه زهرا|فاطمه‌]]{{ع}} ادامه یابد و [[جانشینی امام]] لاحق مبتنی بر [[نص]] [[امام]] سابق است&amp;lt;ref&amp;gt;نک: قاضی نعمان‌، شرح الاخبار، به کوشش محمد حسینی جلالی‌، ج۱، ۸۹ بب.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*تاریخ اندیشه و فعالیت‌های دینی و سیاسی [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] چنان‌که باید هنوز مورد مطالعه همه‌جانبه قرار نگرفته است و از این‌رو، به درستی نمی‌توان تاریخ دقیق [[ظهور]] اندیشه‌های آنان را به دست داد. درباره موضوع امامت‌، پیش از هر چیز باید به این نکته توجه داشت که [[اندیشه]] [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] در [[ارتباط]] مستقیم با موضوع امامت قرار دارد و از این رو، بررسی تاریخ شکل‌گیری و اندیشه‌های دینی و سیاسی غلات‌، در حقیقت بررسی موضوع امامت در میان ایشان است‌، با این‌همه‌، نباید از یاد برد که [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] گرچه در بستر اختلافات دینی - سیاسی در قرن اول هجری به صحنه آمدند، ولی در طول زمان و در طی تحول در اندیشه‌های خود و تحت تأثیر شرایط سیاسی و اجتماعی و محیطی‌، دگرگونی‌های فکری فراوانی را [[شاهد]] بودند که عمده‌ترین آن تحول [[اندیشه]] امامت محوری در میان آنان به منظومه‌ای فکری و کلامی از نوع ویژه خود بود. در این منظومه دینی درباره اساسی‌ترین محور [[اندیشه]] [[اسلامی]]، یعنی [[توحید]]، سخن بسیار رفته بود و با توجه به هندسه معرفت دینی آنان و جایگاه [[توحید]] و [[ارتباط]] آن با [[اندیشه]] امامت‌، طبعاً درباره مسائل دیگر الهیات از جمله [[وحی]] و [[نبوت]] و [[ارتباط]] انسان با [[خدا]]، و نیز اندیشه [[معاد]] و روز واپسین مواضعی اتخاذ شده بود&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پیش از بررسی تاریخ تحول [[اندیشه سیاسی]] [[اهل سنت]] &amp;lt;ref&amp;gt;که در اینجا مقصود از آنان همه گروه‌های غیر [[شیعه]] و [[محکمه]] است‌.&amp;lt;/ref&amp;gt;باید به این نکته توجه داشت که امامت در نظر [[اهل سنت]] بر شالوده تجربه تاریخی [[امت اسلامی ]] پس از [[پیامبر|حضرت رسول]]{{صل}} [[استوار]] است و از این‌رو، توجه به [[سیر]] تحولات نهاد [[خلافت]] در [[اسلام]] می‌تواند به ارزیابی دقیق‌تری از موضوع امامت در میان [[اهل سنت]] رهنمون گردد. [[معتزله‌]]، [[مرجئه]] و حتی عالمان [[اشعری]] و گاه [[حنبلی]] [[مذهب]] نسبت به این تجربه موضع خود را بیان کرده‌اند و هر یک فراخور [[منظومه دینی]] و [[منظومه فکری‌|فکری]] خود نسبت به این تجربه ابراز نظر نموده‌اند. مهم‌ترین نکته در این باره منظر این گروه‌ها نسبت به عصر نخستین [[خلافت‌]]، یعنی عصر [[خلفای راشدین]] و گذار از آن به [[دوره اموی]] است‌؛ به ویژه اینکه برای گروه‌های غیر [[معتزلی]] [[اهل سنت]] که نسبت به «[[سنت‌]]» [[جماعت]] حساسیت دارند، این عصر به عنوان الگوی همیشگی «[[جماعت‌]]»، و به عبارت دیگر [[سلف صالح]] «[[امت‌]]» تلقی می‌شود. به هر حال‌، از آنجا که [[خلافت‌]]، صورت تاریخی [[اندیشه]] امامت در اسلام است‌، باید مفهوم امامت را در راستای [[ظهور]] تاریخی آن در [[خلافت]] جست‌وجو کرد؛ اما از سویی دیگر باید دانست که امامت در [[اسلام]] [[سنی]] مفهومی عام‌تر از [[خلافت]] است و در مقام نظر می‌تواند خارج از چارچوب مفهومی تاریخی خلافت تحقق پیدا کند؛ گرچه [[خلافت]] همیشه از سوی [[اهل سنت]] به عنوان نهاد مشروع امامت معرفی شده است‌&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] نزد گروه‌های گوناگون [[خوارج]] ([[اهل تحکیم‌]])، از نظر مفهومی‌، کاملاً پیوسته با [[حکومت]] بوده‌، اما آنچه امامت [[خوارج]] ([[محکمه‌|مُحَکِّمه‌]]) را از [[اهل سنت]] متمایز می‌ساخته‌، نوع آرمانهایی بوده است که هر یک در سایه امامت دنبال می‌کرده‌اند. در صحنه تاریخ نیز همین اختلاف در [[آرمان‌ها]] موجب شده است تا [[محکمه]] از همان [[عصر خلفای نخستین‌]]، راه خود را از [[عامه مسلمانان]] جدا سازند و در صدد برآیند تا امامتی کوچک‌، متناسب با آرمان‌های خویش بنیان گذارند. [[تصور]] موجود در میان گروهی از [[صحابه]] در عصر دو [[خلیفه]] نخست‌، مبنی بر اینکه بر ایشان لازم است تا با حساسیت‌، عملکرد [[امام]] در [[جامعه اسلامی]] را پی‌گیری کنند و در صورت [[مشاهده]] تخلفی از جانب او، واکنشی مناسب از خود نشان دهند، مبنای آرمان [[امامت]] در میان [[محکمه]] است‌. به عنوان نمونه‌، در خطبه‌ای از [[خلیفه]] [[عمر]] چنین آمده است که در صورت [[وفا]] نکردن [[امام]] [[مسلمانان]] به وظایف و تخطی از [[حدود شریعت‌]]، بر [[مؤمنان]] واجب می‌گردد که او را از امامت [[خلع]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مثلاً نک: ابن‌شبه‌، عمر، تاریخ المدینة، به کوشش فهیم محمد شلتوت‌، ج۲، ۶۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==رابطه [[امامت]] و [[دموکراسی]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امامت]] در گفتگوی دو مذهب==&lt;br /&gt;
*[[امامت]] ریاستی فراگیر در [[امور دنیا]] و [[دین]] است و جامعه‌ای که ساختار آن بر پایۀ [[دین]] بنیان گرفته است، جز این نمی‌تواند باشد؛ چرا که در [[ریاست]] این [[جامعه]] و [[امامت]] بر آن نمی‌توان [[امور دنیا]] را از امور [[دین]] جدا نمود. [[رهبری]] [[رسول خدا]]{{صل}} بر [[جامعه]] اسلامیِ نخست، نیز همین‌گونه بود. و هیچ جدایی بین [[سیاست]] و [[دین]] وجود نداشت. از این‌رو بود که [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[سیاست]]، [[اقتصاد]]، [[تربیت]]، [[آموزش]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و دیگر امور [[جامعه اسلامی]] همان اندازه جزو [[قلمرو دین]] به شمار می‌رفت که [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر [[عبادات]] امری [[دینی]] قلمداد می‌شد.&lt;br /&gt;
*[[رسول خدا]]{{صل}} همان‌طور که در [[عبادات]] و [[احکام]] آن - که چه بسا صرفاً از آن به &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; تعبیر شود - [[مرجع]] [[مردم]] بود و آنها از ایشان [[احکام]] [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر عباداتی از این [[دست]] را می‌پرسیدند، [[مرجع]] [[مردم]] در دیگر ساحت‌های [[زندگی]] - که گاه مقصود از &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; همین بخش است - نیز بود؛ عرصه‌هایی چون [[حکومت]]، [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[اقتصاد]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و مانند آن.&lt;br /&gt;
*و صد البته از [[رسول خدا]]{{صل}} به دور است که در [[رفتار]] یا گفتار خود از سر [[هوی و هوس]] کاری کند یا سخنی بگوید. و این همان است که [[خداوند متعال]] درباره آن فرموده است: {{متن قرآن|وَمَا يَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى * إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هرگز از روی هوای نفس سخن نمی‌گوید * آنچه می‌گوید چیزی جز وحی که بر او نازل شده نیست» سوره نجم، آیه ۳-۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و نیز فرموده است: {{متن قرآن|مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«کسی که از پیامبر اطاعت کند، خدا را اطاعت کرده» سوره نساء، آیه ۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: اگر خدا را دوست می‌دارید، از من پیروی کنید، تا خدا [نیز] شما را دوست بدارد» سوره آل عمران، آیه ۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین کارهایی که آن [[حضرت]] انجام داد صرفاً بر پایۀ [[دستور خداوند]] بوده است و در نتیجه، همۀ آن [[کارها]] در قلمرو &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; قرار دارد که [[خداوند]] ما را به [[پیروی]] از آن، [[امر]] و از [[سرپیچی]] از آن، [[نهی]] فرموده است. پس [[رهبری سیاسی]] و [[امامت فراگیر]] آن [[حضرت]] بر [[جامعه اسلامی]] تنها بر اساس [[تعیین]] از سوی [[خداوند متعال]] و بنا بر امر او بوده است.&lt;br /&gt;
*بر این اساس [[باور]] داریم که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که از [[بندگان]] [[برگزیده]] خود را بخواهد برای آن [[انتخاب]] می‌کند و این‌طور نیست که امری بشری باشد که به [[مردم]] سپرده شده و آنها خود بر مبنای [[هوای نفس]] و به [[دل]] خواهشان کسی را برای آن برگزینند تا در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] از هوا هایشان و [[پیروی]] ایشان از او، [[پیروی]] از آرایشان باشد. این چیزی است که [[عقل]] و [[نقل]] بر آن گواهند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۴-۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==[[دلایل]] [[عهد الهی]] بودن [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*[[عقل]] بر این [[حقیقت]] بدین‌سان [[گواهی]] می‌دهد: از آنجا که مسألۀ [[امامت]]، مسألۀ [[اطاعت]] و [[پیروی]] است، اگر امر [[انتخاب امام]] به [[مردم]] واگذار شده باشد تا آنها هر که را به او میل دارند برای آن [[انتخاب]] کنند، پس در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] و [[پیروی]] از هوی و میل خودشان است و پر واضح است که [[اطاعت]] از هوی، [[قبیح]] است و چنان که تجربۀ [[جوامع بشری]] در گذشته و حال نشان می‌دهد و [[عقل]] [[سلیم]] نیز بر آن دلالت دارد، سبب [[فساد]] [[بندگان خدا]] و [[سرزمین]] هایشان می‌شود.&lt;br /&gt;
*همچنین [[امامت]] یا [[حکومت]]، [[ولایت]] و [[سرپرستی]] [[مردمان]] است و این [[ولایت]]، به [[گواه]] [[عقل]]، جز برای [[خداوند متعال]] و هر که او [[منصوب]] فرماید، ثابت نمی‌گردد؛ چرا که [[مردم]] به خودی خود همه با هم یکسانند و هیچ یک از آنها بر دیگری [[برتری]] ندارد تا [[شایسته]] آن باشد که در مرتبه‌ای والاتر از دیگران قرار بگیرد و آنها را در برابر [[دستورات]] خود رام سازد و به [[اطاعت]] از خویش وادارد.&lt;br /&gt;
[[نقل]] نیز این [[حقیقت]] را [[تأیید]] می‌کند. بسیاری از [[آیات قرآن کریم]] و [[روایات]] [[شریف]] تصریح دارند که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است، نه گزینشی بشری. ما در اینجا تنها به بیان شماری از [[آیات]] [[قرآن مجید]] که حاکی از این حقیقت‌اند بسنده می‌کنیم&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۶-۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;:&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] اول===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«[به یاد آورید] هنگامی که خداوند، ابراهیم را با وسایل گوناگونی آزمود. و او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم عرض کرد: از دودمان من [نیز امامانی قرار بده] خداوند فرمود: پیمان من، به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت [[آیه کریمه]] به این نکات باید توجه داشت:&lt;br /&gt;
#[[امامت]] زمانی برای [[حضرت ابراهیم]] -[[سلام]] [[خدا]] بر [[پیامبر]] ما و خاندانش و بر [[ابراهیم]] باد - قرار داده شد که [[پیامبر]] بود. قرینۀ این سخن آن است که او این [[مقام]] را برای فرزندانش نیز خواست و این خود [[گواهی]] است بر آنکه وی در زمان این درخواست و [[جعل امامت]] برای او، فرزندانی داشته است و می‌دانیم که [[ابراهیم]] در [[پیری]] و پس از آنکه دوره‌ای دراز از پیامبریش را گذرانده بود، صاحب [[فرزند]] شد.&lt;br /&gt;
#[[امامت]] در این آیۀ [[شریف]] تنها به معنای [[اقتدا]] به [[هدایت]] و [[پیروی]] از [[رفتار]] [[حضرت ابراهیم]] نیست. بلکه به معنای [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] است؛ زیرا [[امامت]] به معنای [[اقتدا]] و [[پیروی]]، پیش از آن نیز با همان [[مقام]] [[پیامبری]] برای او ثابت بود؛ چرا که باید به [[هدایت]] هر [[پیامبری]]، حتی اگر [[امام]] هم نباشد، [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[پیروی]] نمود؛ بنابراین [[آیه]] [[شریف]] دلالت بر آن دارد که [[خداوند متعال]] [[منصب]] [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] را به [[ابراهیم]] داده است.&lt;br /&gt;
#این [[آیه]] دلالت دارد که [[منصب ولایت]] و [[رهبری]] در [[جامعه]]، عهدی [[الهی]] است که [[خدای سبحان]] آن را در آنجا که خود بخواهد، قرار می‌دهد و هرگز این [[منصب]]، گزینشی بشری نیست؛ وگرنه نیازی نبود که [[حضرت ابراهیم]] از [[خداوند متعال]] درخواست کند که [[امامت]] را در [[فرزندان]] وی نیز قرار دهد. در آن صورت [[ابراهیم]] می‌توانست به جای آنکه از [[خداوند]] چنین درخواستی کند، با [[تعیین]] از سوی خودش، [[امامت]] و [[رهبری]] [[جامعه]] را در فرزندانش قرار دهد یا مثلاً به مؤمنینی که از او [[اطاعت]] می‌کردند [[وصیت]] کند که آنها [[فرزندان]] و [[نسل]] وی را برای این [[منصب]] [[انتخاب]] کنند؛ اما او می‌دانست که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که راهی برای رسیدن به آن جز با [[تعیین]] و [[گزینش]] صریح [[خدای سبحان]] نیست.&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، اینکه [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که را بخواهد برای آن برمی‌گزیند، تنها به دوران [[ابراهیم]]{{ع}} اختصاص ندارد. [[دلیل]] این سخن آن است که [[ابراهیم]]{{ع}} [[امامت]] را برای &amp;quot;ذریه&amp;quot;اش که [[فرزندان]] و [[نسل]] او در طول زمان هستند، درخواست کرد و گفت: {{متن قرآن|وَمِنْ ذُرِّيَّتِي}} پاسخ این خواسته منفی نبود و [[خداوند متعال]] در جواب او نفرمود که [[امامت]] تنها به تو و زمان تو اختصاص دارد، بلکه پاسخ دربردارندۀ این معنا بود که خواسته او برای ادامه یافتن [[امامت]] تنها در [[نسل]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش، پذیرفته شده است و ستم‌کاران [[نسل]] او از این [[اجابت]] و رسیدن به [[مقام امامت]] استثنا شده‌اند. پس [[آیه]] دلالت دارد که [[امامت]] در [[فرزندان]] [[صالح]] از [[نسل ابراهیم]] و با عهدی از جانب [[خداوند متعال]] ادامه خواهد داشت.&lt;br /&gt;
#یکی از طرفه‌های ظریف این [[آیه]]، آن است که توهمی را که چه بسا در خیال‌ها [[راه]] یابد پس می‌زند و پاسخ می‌گوید. ممکن است برخی بپندارند که قرار داده شدن [[امامت]] در [[فرزندان]] [[ابراهیم]] به این معناست که [[امامت]] نیز همچون پادشاهی‌های موروثی که [[فرزندان]] بی‌هیچ قید و شرط ویژه‌ای [[جانشین]] [[پدران]] می‌شوند، امری ارثی و نسلی است. اما [[آیه]] [[کریم]] در پاسخ به این [[گمان]] [[نادرست]] به تفاوت ذاتی میان این دو اشاره می‌کند و بیان می‌دارد که ادامه یافتن [[امامت]] در [[نسل ابراهیم]] یک میراث‌بری نَسَبی نیست، بلکه وراثتی [[دینی]] و رسالتی است و به همین [[دلیل]] است که [[فرزندان]] [[ستم]] کار [[ابراهیم]] به این [[مقام]] [[دست]] نخواهند یافت؛ بنابراین [[امامت]] نه با معیار &amp;quot;پیوند نَسَبی&amp;quot; که بنا بر &amp;quot;شایستگی دینی&amp;quot; به [[فرزندان]] [[ابراهیم]] داده شد؛ زیرا این [[خاندان]] [[نبوی]] [[پاک]] در طول [[تاریخ]] سرشار از [[هدایت]] می‌ماند و توان آن را خواهد داشت که رهبرانی [[صالح]] و لایق بپروراند؛ کسانی که [[خداوند متعال]] در برابر این [[پاکی]] و شایستگیِ ادامه یافته در نسلشان، ایشان را به [[لطف]] [[امامت]] ویژه گرداند. این همان معنایی است که آیۀ [[شریف]] بدان اشاره دارد؛ آنجا که می‌فرماید: {{متن قرآن|إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَى آدَمَ وَنُوحًا وَآلَ إِبْرَاهِيمَ وَآلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ * ذُرِّيَّةً بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند، آدم و نوح و آل ابراهیم و آل عمران را بر جهانیان برگزید. دودمانی از جنس یکدیگر [از نظر پاکی و تقوا و فضیلت] و خداوند، شنوا و داناست» سوره آل عمران، آیه ۳۳-۳۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در این آیۀ [[شریف]] مقصود از عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} این است که هر یک از [[فرزندان]] این [[نسل]] در [[شایستگی]] و سزاواری [[رهبری]] و [[گزینش الهی]] همانند دیگری هستند و مقصود از این عبارت، [[پیوستگی]] نَسَبی نیست، که اگر بود اصلاً نیازی به بیان و تصریح بر عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} وجود نداشت.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۷-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] دوم===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟ ما به آل ابراهیم، کتاب و حکمت دادیم؛ و حکومت عظیمی در اختیار آنها قرار دادیم» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت این [[آیه]] چند نکته، شایان توجه است:&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، [[خداوند]] به [[خاندان ابراهیم]] دو [[مقام]] داده است؛ نخست، [[منصب]] [[نبوت]] است که با این عبارت به آن اشاره شده است: {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ}} [[منصب]] دوم نیز، [[منصب امامت]] است که با عبارت {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} از آن یاد شده است. &amp;quot;مُلک&amp;quot; در واژه‌شناسی به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و بنابراین، مقصود از &amp;quot;ملک عظیم&amp;quot; [[امامت]] است. افزون بر بکارگیری واژه [[مُلک]]، موارد زیر نیز [[گواه]] این معنا است:&lt;br /&gt;
##ساختار خود [[آیه]] نشان می‌دهد که مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; [[امامت]] است؛ زیرا در آن کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَا}} دو بار به کار گرفته شده است و درست نیست که مقصود از دومی همان معنایی باشد که در اولی نیز آمده است؛ چرا که در این صورت تکراری بی‌فایده است. از سویی صحیح نیست که از عبارت اول معنایی جز [[نبوت]] قصد شده باشد؛ زیرا افزون بر اینکه این معنا با کتاب و [[حکمت]] هم خوانی دارد، در [[آیات]] پرشمار دیگری نیز [[مقام نبوت]] با مفهوم عطا کردن کتاب و [[حکمت]] بیان شده است؛ مانند: {{متن قرآن|وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُمْ مِنْ كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنْصُرُنَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، از پیامبران، پیمان مؤکد گرفت، که همانا کتاب و دانش به شما دادم، پس آنگاه که پیامبری به سوی شما آمد که آنچه را با شماست تصدیق می‌کند، به او ایمان بیاورید و او را یاری کنید» سوره آل عمران، آیه ۸۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین جز [[امامت]] که [[خداوند]] برای [[ابراهیم]] و فرزندانش قرار داده است، معنای دیگری از عبارت دوم {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} برداشت نمی‌شود.&lt;br /&gt;
##این آیۀ شریفه نیز [[گواه]] دیگری بر مدعا است: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، ابراهیم را با کلماتی آزمود. پس او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم گفت: و از دودمان من؟ خداوند فرمود: پیمان من، به ستمکاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این [[آیه]] به صراحت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] به [[حضرت ابراهیم]]، افزون بر [[نبوت]]، [[منصب امامت]] را نیز عطا فرموده و آن را در نسلش هم قرار داده است و از آنجا که برخی از [[فرزندان]] او [[پیامبر]] بودند، برای [[خاندان ابراهیم]] دو [[منصب]] گرد آمد؛ [[نبوت]] و [[امامت]]. این [[فضل]] و بخششی [[الهی]] است که بنا بر این [[آیه]] [[خداوند سبحان]] تنها به [[آل ابراهیم]]، و نه دیگران، این ویژگی را بخشیده و با آن ایشان را [[تکریم]] فرموده است.&lt;br /&gt;
##آیۀ پیش از آیۀ مورد بحث، شاهدی دیگر است. [[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«مگر برای آنها (مدّعیان) نصیبی از حکومت است؟ که در آن صورت حتی به اندازۀ نقطۀ پشت هستۀ خرما به مردم نمی‌دادند» سوره نساء، آیه ۵۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. &amp;quot;نقیر&amp;quot; به معنای نقطه‌ای است که پشت هستۀ خرما قرار دارد و در اینجا استعاره‌ای برای بیان مقدار بسیار ناچیز است. مقصود از [[آیه]] این است که اگر آنها ([[عالمان]] [[یهود]]) [[نصیبی]] از [[مُلک]] داشتند، حتی مقدار بسیار ناچیزی از [[ملک]] را هم به دیگران نمی‌دادند. پس بی‌شک [[مُلک]] در اینجا به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است. این [[آیه]] دلیلی روشن است بر اینکه مقصود از [[مُلک]] در آیۀ بعدی که ما از آن بحث می‌کنیم، [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و هرگز به معنای [[نبوت]] نیست.&lt;br /&gt;
#دومین نکته‌ای که آیۀ مورد استناد ما به روشنی بر آن دلالت دارد این است که [[امامت]]، یعنی همان &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot;، [[عهد الهی]] ویژه‌ای است که [[خداوند]] آن را در هر جا بخواهد قرار می‌دهد و [[انسان]] در آن [[حق]] [[انتخاب]] یا سهم و [[نصیبی]] ندارد. آنچه بر این نکته دلالت می‌کند عبارت است از:&lt;br /&gt;
##این بخش از آیۀ شریفه: {{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این عبارت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] گروهی از [[مردم]] ([[خاندان ابراهیم]]) را با آنچه از [[فضل]] خویش به ایشان داده [[برتری]] بخشیده است. سپس &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; را مصداقی از آن [[فضل]] برشمرده است. حال اگر [[امامت]]، مسأله‌ای بود که دیگر [[مردمان]] نیز در آن سهم و بهره‌ای داشتند، دیگر این [[مُلک]]، فضلی نبود که [[خداوند]] آن را تنها به [[خاندان ابراهیم]] داده باشد و آنها به واسطه آن بر دیگران [[برتری]] یافته، مورد [[حسادت]] واقع شوند.&lt;br /&gt;
##بکارگیری واژۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} در این سخن [[خداوند متعال]] {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}، نشان می‌دهد که [[امامت]]، منّت و لطفی [[الهی]] است که [[خداوند]] آن را تنها به گروه مشخصی از [[مردم]] [[عنایت]] فرموده و نیز عهدی ویژه است که فقط به کسی می‌رسد که [[خدا]] بخواهد؛ زیرا آنچه از کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} فهمیده می‌شوده، این است که این واژه در [[مقام]] توضیح لطفی است که [[خداوند متعال]] تنها به [[خاندان ابراهیم]] عطا فرموده و با آن ایشان را بر دیگران [[برتری]] بخشیده، به گونه‌ای که مورد [[حسادت]] واقع شده‌اند. حال اگر &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; چیزی بود که بدون [[لطف خدا]] و به شکلی غیر از [[عهد]] ویژه [[الهی]] به کسی داده می‌شد، دیگر دلیلی وجود نداشت که [[خداوند]] با اعطای آن به [[خاندان ابراهیم]]، بر آنها منّت نهد و این‌گونه ابراز لطفی ویژه کند.&lt;br /&gt;
##عطف &amp;quot;اعطای [[مُلک]] عظیم&amp;quot; بر &amp;quot;اعطای کتاب و حکمت&amp;quot; و قرار دادن آنها در یک [[سیاق]] و ترکیب مفهومی قرینۀ روشن دیگری است بر اینکه [[امامت]] نیز همچون [[نبوت]] است و به هیچ کس داده نمی‌شود مگر کسی که [[خداوند]] او را به‌طور ویژه برگزیند و با این [[مقام]] او را بر دیگران [[برتری]] بخشد.&lt;br /&gt;
##اینکه &amp;quot;مُلک&amp;quot; به &amp;quot;عظیم&amp;quot; توصیف شده است نیز به روشنی نشان می‌دهد که این [[مُلک]] [[موهبت الهی]] بزرگی است که [[خدا]] هر یک از [[بندگان]] مخلصش را که بخواهد بدان ویژه می‌گرداند؛ زیرا [[وصف]] [[عظمت]] برای [[مُلک]] تنها با [[مُلک]] [[الهی]] مناسبت دارد و [[مُلک]] و [[سلطنت]] بشری که در آن [[انسان‌ها]] خود هر که را بخواهند برمی‌گزینند و آن را به هرکه میلشان باشد می‌دهند، چیزی نیست که در [[کلام]] [[خدای سبحان]] به [[عظمت]] توصیف شود.&lt;br /&gt;
*حال اگر این همه را - با [[چشم‌پوشی]] از [[روایات]] رسیده از [[رسول خدا]]{{صل}} دربارۀ این موضوع - تنها به همان مباحثی که دربارۀ آیۀ شریفه {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} و دیگر [[آیات]] گذشت بیفزاییم، جای هیچ [[شک]] و تردیدی باقی نخواهد ماند که دلالت آیۀ کریمه این است که [[امامت]] و [[حکومت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند متعال]] آن را برای گروه مشخصی از [[مردم]] قرار داده است و آنها را با صفاتی توصیف نموده و شخص آنان را نیز معیّن فرموده است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این در [[تفسیر]] این [[آیه]] [[روایات معتبر]] پرشماری از سوی [[امامان]] [[خاندان وحی]] - که به مقاصد [[وحی]] و معانی [[تنزیل]]، از همه [[آگاه]] ترند - به [[دست]] ما رسیده است که همین معنا را [[تأیید]] می‌کند. در این میان تنها یکی از آن بسیار را بیان می‌کنیم: &lt;br /&gt;
*[[کلینی]] با سندی صحیح از [[ابوجعفر محمد بن علی الباقر]]{{ع}} دربارۀ آیۀ {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} [[نقل]] می‌کند که ایشان فرمود: مقصود از این [[آیه]] آن است که برخی از [[خاندان ابراهیم]] را [[رسول]] و [[نبی]] و [[امام]] قرار داد. حال چگونه است که برخی [[امامت]] را برای [[خاندان ابراهیم]]{{ع}} می‌پذیرند، اما برای [[دودمان]] [[محمد]]{{صل}} [[انکار]] می‌کنند؟! [[راوی]] می‌گوید: گفتم: مقصود از {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} چیست؟ فرمود: [[مُلک]] [[عظیم]] این است که امامانی را در میان ایشان قرار داد که هر که از آنان [[اطاعت]] کند، [[خداوند]] را [[اطاعت]] کرده و هر کس از ایشان [[سرپیچی]] نماید از [[اطاعت خداوند]] سر باز زده است. این، آن [[مُلک]] [[عظیم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج١، ص٢٠۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۰-۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] سوم===&lt;br /&gt;
*[[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ وَتَنْزِعُ الْمُلْكَ مِمَّنْ تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ بِيَدِكَ الْخَيْرُ إِنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: بارالها! ای یگانه مالک مُلک [و فرمانروایی]! تو به هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] عطا می‌کنی و از هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] را می‌ستانی و هر که را اراده کنی عزت می‌دهی و هر کس را بخواهی ذلیل می‌کنی؛ خیر، به دست توست و تو بر هر چیز توانایی» سوره آل عمران، آیه ۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این آیه بر این دلالت دارد که [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که تنها در [[اختیار]] [[خداوند متعال]] است و این، اوست که با [[حکمت]] خود آن را در آنجا که بخواهد قرار می‌دهد و [[مردم]] در این مسأله هیچ اختیاری ندارند. *توضیح این مطلب بدین شرح است:&lt;br /&gt;
#مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; در [[آیه]]، بنا بر معنای لغوی آن، [[حکومت]] و [[سلطنت]] است و این مطلب در نهایت روشنی است.&lt;br /&gt;
#مقصود از مفهوم &amp;quot;ایتاء؛ عطا کردن&amp;quot; در عبارت {{متن قرآن|تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ}}، اعطای [[تشریعی]] است و منظور از اعطای [[تشریعی]] این است که [[خداوند سبحان]] گروهی از [[بندگان]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش را به عنوان [[رهبران]] و [[حاکمان]] [[مردم]] برمی‌گزیند و به ایشان[[حق]] [[امر و نهی]] و [[حکومت]] و [[فرمانروایی]] بر [[جامعۀ انسانی]] را می‌دهد؛ اما اعطای [[تکوینی]]، حکمرانی‌هایی است که تاکنون در [[جوامع انسانی]] روی داده - و پس از این نیز روی خواهد داد - و بنا بر وقایع [[تاریخی]] در بیشتر موارد و به استثنای بازه‌هایی بسیار اندک، حکومت‌های ناحقی بوده که تنها [[طاغوت‌ها]] را بر [[ملّت‌ها]] مسلط کرده است؛ بنابراین مقصود از اعطا در این [[آیه]]، اعطای [[تکوینی]] نیست که به معنای مطلق [[حکومت]] به هر شکل ممکن است، حتی اگر به ناحق باشد، بلکه مقصود اعطای [[تشریعی]] است؛ یعنی [[واجب]] ساختن [[شرعی]] [[اطاعت]] و [[پیروی]]. این سخن چنین [[دلایل]] و قرائنی دارد:&lt;br /&gt;
##[[آیه]] دربردارندۀ [[سپاس]] و [[ستایش]] [[خداوند متعال]] برای این ویژگی‌ها است و آنچه با [[سپاسگزاری]] از [[خداوند متعال]] و [[ستایش]] او هماهنگ است بیان [[رحمت]] و یاد کرد نعمت‌های او بر [[بندگان]] است. در این میان تنها اعطای [[تشریعی]] [[مُلک]]، نعمتی [[الهی]] و رحمتی از سوی او بر [[بندگان]] است؛ زیرا [[رهبری الهی]] [[صالح]] را در پی دارد که از بزرگترین [[نعمت‌های خداوند سبحان]] بر [[بندگان]] است و در این امر میان آنان که خود به این [[تکریم]] [[الهی]] مشرَّف شده، [[منصب]] [[رهبری]] را به [[دست]] آورده‌اند، با دیگر مردمانی که از [[نعمت]] این [[رهبری]] برخوردار می‌شوند و در سایۀ [[عدالت]] گسترده‌اش آرام می‌گیرند و از زلال گوارای حکومتش بهره می‌گیرند، تفاوتی نیست. [[آیات]] بسیاری از [[قرآن]] [[حکیم]] اشاره دارد که [[امامت]] و [[رهبری الهی]] نعمتی بزرگ از سوی [[خداوند]] است؛ از جمله آیاتی که در اُم الکتاب، سورۀ مبارکۀ [[حمد]]، آمده است: {{متن قرآن|اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ * صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«ما را به راه راست هدایت کن * راه کسانی که آنان را مشمول نعمت خود ساختی» سوره فاتحه، آیه ۶-۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. اما اعطای [[تکوینی]] با [[مقام]] [[سپاس]] و [[ستایش]] مناسبتی ندارد؛ زیرا بیشتر مصداق‌های آن، هم برای [[حاکمان]] [[سلطه]] یافته و هم برای [[مردمان]] تحت [[سلطه]]، [[عذاب]] و [[عقاب الهی]] است. از آن رو برای [[سلطه]] یافتگان [[عقاب]] و [[عذاب]] است که باعث افزایش [[گمراهی]] و [[خسران]] ایشان می‌شود. برای [[مردم]] نیز [[عذاب]] است؛ چرا که [[حکومت]] [[طاغوت‌ها]] آنها را از [[سعادت دنیا]] [[محروم]] می‌کند و [[راه خدا]] را بر ایشان می‌بندد و آنها را از [[دست]] یافتن به رضای [[خدای سبحان]] و برخورداری از آن نعمت‌های [[دنیوی]] و [[اخروی]] که [[خداوند متعال]] برای [[نیکان]] فراهم آورده، باز می‌دارد؛ مگر شماری اندک از آنان که بتوانند به‌طور کامل جانب [[حق]] را نگه دارند و در &amp;quot;صراط مستقیم&amp;quot; پایدار بمانند.&lt;br /&gt;
##این بخش از سخن [[خداوند متعال]] که فرمود: {{متن قرآن|تُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ}} نیز [[گواه]] مدعا است؛ زیرا یکسانی [[سیاق]] [[سخن]]، بایسته می‌دارد که بین &amp;quot;عزت بخشیدن و [[ذلیل]] نمودن&amp;quot; با &amp;quot;اعطای [[مُلک]] و گرفتن آن&amp;quot; به این شکل [[ارتباط]] و همانندی وجود داشته باشد که اعطای [[مُلک]]، [[عزت]] و ستاندن آن، [[ذلت]] قلمداد شود. و بی‌شک همان‌سان که [[خداوند متعال]] تنها [[کافران]] و سرکشان را [[خوار]] می‌کند، [[عزت]] بخشی او نیز جز به [[بندگان]] مؤمنش نمی‌رسد. این مطلبی است که [[آیات]] پرشماری از [[قرآن مجید]] بر آن تصریح می‌کند؛ از جمله:{{متن قرآن|يَقُولُونَ لَئِنْ رَجَعْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ لَيُخْرِجَنَّ الْأَعَزُّ مِنْهَا الْأَذَلَّ وَلِلَّهِ الْعِزَّةُ وَلِرَسُولِهِ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَلَكِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَا يَعْلَمُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنها می‌گویند: اگر به مدینه بازگردیم، عزیزتر، ذلیل‌تر را بیرون می‌کند، در حالی که عزت مخصوص خدا و رسول او و مؤمنان است؛ ولی منافقان نمی‌دانند» سوره منافقون، آیه ۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|بَشِّرِ الْمُنَافِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا * الَّذِينَ يَتَّخِذُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ أَيَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«به منافقان بشارت ده که مجازات دردناکی در انتظار آنهاست * همان‌ها که کافران را به جای مؤمنان، به عنوان ولی خود انتخاب می‌کنند. آیا با اینکه همۀ عزت‌ها از آن خداست، عزت و آبرو نزد آنان می‌جویند؟» سوره نساء، آیه ۱۳۸-۱۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این مطلب، قرینه‌ای روشن است بر اینکه اعطای [[مُلک]] که در [[آیه]] از آن سخن رفته است، اعطای [[تشریعی]] و به معنای [[واجب]] ساختن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است که از بزرگترین مصداق‌های [[عزت]] بخشی [[الهی]] است. پس مقصود، اعطای [[تکوینی]] نیست؛ چرا که بیشتر مصادیق اعطای [[تکوینی]] &amp;quot;سرکشی&amp;quot; و &amp;quot;کفر&amp;quot; و &amp;quot;عصیان&amp;quot; و &amp;quot;اعتداء&amp;quot; است که بنا بر این [[آیه قرآن]] موجب [[خوار]] گشتن از سوی [[خداوند متعال]] است: {{متن قرآن|وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ وَالْمَسْكَنَةُ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ الْحَقِّ ذَلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و [مهر] ذلت و نیاز، بر پیشانی آنها زده شد؛ و گرفتار خشم خدا شدند؛ چرا که آنان نسبت به آیات الهی، کفر می‌ورزیدند؛ و پیامبران را به ناحق می‌کشتند. اینها به خاطر آن بود که گناهکار و متجاوز بودند» سوره بقره، آیه ۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنا بر این [[آیه]]، گناهکاری، [[تجاوز]]، [[کفر]] ورزیدن نسبت به [[آیات الهی]] و کشتن به ناحق [[صالحان]] و فراخوانندگان به [[عدالت]] که در صدر همۀ ایشان [[انبیا]] هستند، سبب آن شد که [[خداوند متعال]] آن مهر [[ذلت]] را بر پیشانی [[یهودیان]] بنشاند و ایشان را دچار [[خشم]] خویش کند. این ویژگی‌ها معمولاً در حکومت‌های طاغوتی وجود دارد و بنابراین مهر [[ذلت]] از سوی [[خداوند متعال]] بر پیشانی این [[طاغوت‌ها]] که در ویژگی هایشان همانند [[یهودیان]] هستند نیز زده شده است و ایشان هم گرفتار [[خشم]] [[خداوند سبحان]] هستند و بی‌اندازه از آن [[عزت]] [[الهی]] و [[رحمت]] خدای [[کریم]] به دورند. با وجود این، چگونه ممکن است مقصود از اعطای [[مُلک]] که [[عزت]] بخشی [[الهی]] است، همان اعطای [[تکوینی]] باشد که بیشتر مصداق هایش حکومت‌های [[طاغوت]] است؟&lt;br /&gt;
##بخش سوم سخن [[خدای سبحان]] {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} نشان روشن دیگری است بر [[درستی]] آنچه گفته شد. [[سیاق]] [[سخن]] و [[قوانین]] عرفی [[حاکم]] بر [[کلام]]، حاکی از آن است که &amp;quot;خیر&amp;quot;ی که در [[آیه]] بیان شده با [[مُلک]] و عزتی که در همان [[آیه]] است، منطبق بوده، عبارت {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} بیان مفهوم کلی بعد از مصداق جزئی است و بر این اساس مقصود [[آیه]] چیزی جز این نیست: [[مُلک]] و [[عزت]] و همۀ خیرها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و او خیر را به هر که بخواهد می‌دهد؛ که او بر هر کاری توانا است.&lt;br /&gt;
*بنابراین از آنجا که مقتضای این قرینه آن است که [[مُلک]] و عزتی که در [[آیه]] آمده در قلمرو مفهوم &amp;quot;خیر&amp;quot; باشد، تنها احتمال ممکن در مورد اعطای [[مُلک]]، اعطای [[تشریعی]] خواهد بود که به معنای [[واجب]] بودن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است؛ چرا که فقط همین معنا &amp;quot;خیر&amp;quot; است، نه اعطای [[تکوینی]] که بیشتر مصداق‌های آن [[شر]] و [[عذاب]] است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این، در [[آیات]] پیشین و پسین نیز قرینه‌هایی وجود دارد که مقصود بودن اعطای [[تشریعی]] را [[تأیید]] می‌کند، اما همین قرینه‌ها و شاهدهایی که بیان کردیم، بس است.&lt;br /&gt;
#شکی در این نیست که [[آیه]] با عبارت {{متن قرآن|مَالِكَ الْمُلْكِ}}  در ابتدا، که نشان از مخصوص بودن [[مُلک]] به [[خداوند متعال]] است، و نیز جمله {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} در انتها، که بیان می‌دارد خیر جز به [[دست خدا]] نیست، و دیگر قرینه‌هایی از این [[دست]]، بر انحصار دلالت می‌کند و به روشنی و صراحت بیان می‌دارد که زمام [[سلطه]] و [[حکومت]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در آن [[شریک]] او نیست و فقط اوست که [[مُلک]] و [[سلطنت]] را به هر کس بخواهد می‌دهد و از هر که [[اراده]] کند باز می‌دارد و [[مردم]] نمی‌توانند [[مُلک]] و [[عزت]] را به هر کس میلشان باشد بدهند، بلکه این [[اختیار]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و نه هیچ کس جز او. اگر زمام [[حکومت]] به [[دست]] [[مردم]] بود و آنان هر که را می‌خواستند برای آن [[انتخاب]] می‌کردند، درست نبود که در آیه بر این انحصار تأکید شود که [[اختیار]] اعطای [[مُلک]] و [[عزت]] تنها از آن [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در این مسأله با او شراکتی ندارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۵-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:11142.jpg|22px]] [[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[گفتگوی دو مذهب (کتاب)|&#039;&#039;&#039;گفتگوی دو مذهب&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1414.jpg|22px]] [[فرهنگ شیعه (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ شیعه&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:10119661.jpg|22px]] [[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات علم کلام&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:440259451.jpg|22px]] [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:978964298273.jpg|22px]] [[محمد حسن قدردان قراملکی|قدردان قراملکی، محمد حسن]]، [[امامت ۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 1100453.jpg|22px]] [[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)|&#039;&#039;&#039; ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی &#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100538.jpg|22px]] [[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
* [[مبادی امامت]]&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصوریه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[اله]] ([[الوهیت]])&lt;br /&gt;
*** [[رب]] ([[ربوبیت]])&lt;br /&gt;
*** [[ملک]] ([[مالکیت]])&lt;br /&gt;
*** [[حکم]] ([[حاکمیت]] و [[حکومت]])&lt;br /&gt;
*** [[ولی]] ([[ولایت]])&lt;br /&gt;
*** [[حجت]]&lt;br /&gt;
*** [[رسالت]]&lt;br /&gt;
*** [[خلافت]]&lt;br /&gt;
*** [[امارت]]&lt;br /&gt;
*** [[قدوه]] ([[اسوه]])&lt;br /&gt;
*** [[رهبری]] ([[قیادت]])&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصدیقیه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[حق عبادت و اطاعت]]&lt;br /&gt;
*** [[حق امر و نهی]]&lt;br /&gt;
*** [[حق الزام]]&lt;br /&gt;
*** [[حق پاداش و کیفر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق ابلاغ و تبیین امر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق نصرت الهی]]&lt;br /&gt;
* [[ویژگی‌های لازم امامت]] ([[صفات ضروری امام]]) &lt;br /&gt;
* [[نصب امام]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام بر خدا]]&lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام از سوی خدا]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام پس از پیامبر]] &lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام پس از پیامبر]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امامت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مفاهیم در کلام اسلامی]]&lt;br /&gt;
[[رده:مقاله‌های اولویت سه]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;onlyinclude&amp;gt;{{درجه‌بندی&lt;br /&gt;
 | نویسنده اصلی=&amp;lt;!--جوکار،پورانزاب،واثق،امینی،بهمنی--&amp;gt;واثق&lt;br /&gt;
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 | تاریخ برتر شدن =&amp;lt;!--{{subst:#time:xij xiF xiY}}--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | توضیحات = &lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/onlyinclude&amp;gt;&amp;lt;/pre&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<title>اسلام جاهلی</title>
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		<updated>2021-05-24T07:53:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{خرد}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;مدخل‌های وابسته به این بحث:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt; [[اسلام جاهلی در قرآن]] - [[اسلام جاهلی در حدیث]] - [[اسلام جاهلی در نهج البلاغه]] - [[اسلام جاهلی در معارف دعا و زیارات]] - [[اسلام جاهلی در کلام اسلامی]] - [[اسلام جاهلی در فرهنگ و معارف انقلاب اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[اسلام جاهلی (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0008.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
# اسلام محمدی که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
# اسلام جاهلی&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پیمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این اسلام جاهلی بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] [[محمدی]] بود. حوادثی که اسلام جاهلی پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس [[شکیبایی]] گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با اسلام جاهلی، [[نزاع]] بر &amp;quot;ریاست&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] آشکار [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] پنهان و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین اسلام جاهلی و اسلام جاهلی و به بیانی دیگر: بین [[اسلام علوی]] و [[اسلام اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. اسلام جاهلی - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==تحریف‌های اسلام جاهلی==&lt;br /&gt;
از مهم‌ترین [[تحریفات]] اسلام جاهلی دست‌اندازی‌های سردمداران آن به به [[منظومه فکری اسلام]]، به ویژه مفاهیم و آموزه‌های [[نظام سیاسی اسلام]] است. بارزترین این [[تحریف‌ها]] در [[ارتباط]] با [[امامت]] موارد ذیل‌اند:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;ریاست&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبیدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، علی بن محمد، الكامل فی التاریخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;ریاست&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان اسلام جاهلی، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به ریاست و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این ریاست و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== پرسش‌های وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
* [[مظالم]]&lt;br /&gt;
* [[مظالم عباد]]&lt;br /&gt;
* [[معونة الظالم]]&lt;br /&gt;
* [[قیام مسلحانه]]&lt;br /&gt;
* [[عدالت]] ([[عدل]])&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:اسلام جاهلی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA&amp;diff=503662</id>
		<title>امامت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA&amp;diff=503662"/>
		<updated>2021-05-24T07:53:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] - [[امامت در قرآن]] - [[امامت در حدیث]] - [[امامت در نهج البلاغه]] - [[امامت در کلام اسلامی]] - [[امامت در معارف و سیره رضوی]] - [[امامت از دیدگاه اهل سنت]] - [[امامت در اصول فقه]] - [[امامت در فقه سیاسی]] - [[امامت در معارف دعا و زیارات]] - [[امامت در معارف و سیره سجادی]] - [[امامت در فرهنگ و معارف انقلاب اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0010.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039; به معنای [[رهبری]] و [[پیشوایی]] است. امامت، [[منصب]] و مقامی که از سوی [[خداوند]] به بعضی انسان‌های [[پاک]] و [[دانا]] و [[شایسته]] داده می‌شود که [[مردم]] را به [[راه خدا]] [[هدایت]] کنند. در [[اسلام]]، برای تداوم [[مسؤولیت]] [[پیامبر خدا]]{{صل}} در بُعد [[حکومتی]] و [[دینی]]، امامت و [[وصایت]] قرار داده شده تا [[مردم]] پس از [[پیامبر]]، از [[امام]] تبعیّت کنند و [[رسول خدا]]{{صل}} و [[امامان]] پس از خویش را با نام و مشخصات [[تعیین]] کرده است. امامت یکی از [[اصول اعتقادی]] [[شیعه]] است و از سوی [[خدا]] و [[پیامبر]]{{صل}} است نه به [[انتخاب مردم]]. [[علم]] و [[عصمت]] از جمله شرایط آن است و [[امام]]، [[حق]] [[ولایت]] بر [[مردم]] دارد و [[حجت الهی]] بر همگان است. [[پذیرش]] امامتِ امامانِ [[معصوم]] [[واجب]] است و [[نشانه]] [[اطاعت از خدا]] و [[پیامبر]] است و هر کس بدون [[عقیده]] و [[ایمان به امامت]] امامِ [[معصوم]] بمیرد، به [[مرگ جاهلیت]] مرده است. [[امام رضا]]{{ع}} می‌‌فرماید: {{متن حدیث|إِنَّ الْإِمَامَةَ خِلَافَةُ اللَّهِ وَ خِلَافَةُ الرَّسُولِ}} امامت، [[جانشینی]] [[خدا]] و [[جانشینی پیامبر]] است&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج۱، ص۲۰۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. روشن است کسی که به جای [[خدا]] و [[رسول]] بر [[مردم]] [[حکومت]] می‌کند، باید [[پاک]] و [[عادل]] و [[شبیه]] [[پیامبر]] در [[کمالات]] و [[فضایل]] باشد. به [[پیروان]] این [[عقیده]]، [[امامیه]] و [[شیعه]] گفته می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف [[امام]] و [[امامت]]==&lt;br /&gt;
===واژه‌شناسی لغوی===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[امامت در کلام اسلامی|تعریف مشهور متکلمان]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==رابطه مفهوم امامت با مفاهیم دیگر==&lt;br /&gt;
===رابطه با [[حجت الهی]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[ولایت]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[نبوت]] و [[رسالت]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[خلیفه الهی]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[خلیفه رسول الله]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[وصی رسول الله]] ([[وصایت]])===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[عهد الهی]]===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[پادشاهی]] ([[ملک]])===&lt;br /&gt;
===رابطه با [[ریاست]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===رابطه با [[خلافت]]، [[نبوت]] و [[رسالت]]===&lt;br /&gt;
*در [[قرآن کریم]] هر چهار کلمه [[خلیفه]]، [[امام]]، [[نبوت]] و [[رسالت]] یا مشتقات آن، استعمال شده است که [[آیات]] دارای کلمه [[خلیفه]] در ذیل عنوان مفهوم [[خلیفه]] در [[قرآن]] مطرح شد.&lt;br /&gt;
*اما کلمه [[امام]]، در [[قرآن مجید]]، بر مصادیق مختلفی استعمال شده است که به دو دسته تقسیم می‌شود:&lt;br /&gt;
#مصادیق غیر بشری، مانند [[لوح محفوظ‍‌]]: {{متن قرآن|وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#[[کتاب آسمانی]]: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا وَرَحْمَةً}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷؛ سوره احقاف، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مصادیق بشری که از جهت [[حقانیت]] و بطلان، به دو دسته تقسیم می‌شود:&lt;br /&gt;
#[[امام حق]]: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#[[امام باطل]]: {{متن قرآن|فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«با پیشگامان کفر که به هیچ پیمانی پایبند نیستند کارزار کنید» سوره توبه، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*امّا [[امامت]] در اصطلاح [[دینی]] به دو صورت [[عام و خاص]] است که در معنای عام، شامل [[نبوت]] و [[رسالت]] به عنوان [[مقتدا]] و [[اسوه]] می‌شود و در معنای خاص، شامل آنها نشده و در بعضی موارد بعد از تحقق [[مقام نبوت]] و [[رسالت]] است{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «و (یاد کن) آنگاه را  که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی  آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم. (ابراهیم) گفت: و از فرزندانم (چه کس را)؟ فرمود: پیمان من به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یا [[مقام]] ویژه‌ای است که از طرف [[خدای سبحان]] به اوصایای [[پیامبران]]{{عم}}، [[عنایت]] می‌شود.&lt;br /&gt;
*اما کلمه [[نبوت]]، ۵ بار {{متن قرآن|مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَنْ يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «هیچ بشری را نسزد که خداوند به او کتاب و حکمت و پیامبری بدهد» سوره آل عمران، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|أُولَئِكَ الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنان کسانی هستند که به آنها کتاب و داوری و پیامبری دادیم» سوره انعام، آیه ۸۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِ النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما به او اسحاق و (نوه‌اش) یعقوب را بخشیدیم و در فرزندان او پیامبری و کتاب (آسمانی) را نهادیم» سوره عنکبوت، آیه ۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَلَقَدْ آتَيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ}} &amp;lt;ref&amp;gt;«و به راستی ما به بنی اسرائیل کتاب (آسمانی) و داوری و پیامبری دادیم» سوره جاثیه، آیه ۱۶&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا وَإِبْرَاهِيمَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِمَا النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و نوح و ابراهیم را فرستادیم و در فرزندان آنان پیامبری و کتاب (آسمانی) نهادیم» سوره حدید، آیه ۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[قرآن]] استعمال شده و در اصل و ریشه آن، [[اختلاف]] است. بعضی گفته‌اند: از نَبَأ به معنای خبر مشتق شده&amp;lt;ref&amp;gt;تبیان، ج۷، ص۱۳۳؛ کنزالدقائق، ج۸، ص۲۳۲؛ المیزان، ج۲، ص۱۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; و برخی دیگر نوشته‌اند: از نبوه (بر وزن نغمه) به معنای [[رفعت]] و بلندی [[مقام]]، مشتق شده است&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البیان، ج۶، ص۸۰۰؛ کشف الاسرار، ج۶، ص۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ لذا با لحاظ‍ ریشه، ترجمه [[آیه شریفه]] {{متن قرآن|وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ مُوسَى إِنَّهُ كَانَ مُخْلَصًا وَكَانَ رَسُولًا نَبِيًّا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و در این کتاب از موسی یاد کن که ناب و فرستاده‌ای پیامبر بود» سوره مریم، آیه ۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; دو گونه می‌شود؛ ای [[پیامبر]]! در کتاب [[قرآن]] از [[موسی]] یاد کن که او [[بنده]] [[مخلَص]] و فرستاده [[حق]] و پیام‌آور برای خَلق بود.&lt;br /&gt;
*ای [[پیامبر]]! در کتاب [[قرآن]] از [[موسی]] یاد کن که او [[بنده]] [[مخلَص]] و فرستاده‌ای والامقام بود.&lt;br /&gt;
*اما کلمه [[رسالت]] فقط‍ یک بار{{متن قرآن|فَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَكِنْ لَا تُحِبُّونَ النَّاصِحِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «(صالح) از آنان روی گردانید و گفت: ای قوم من! بی‌گمان پیام پروردگارم را به شما رسانده‌ام و برای شما خیرخواهی کرده‌ام امّا شما خیرخواهان را دوست نمی‌دارید» سوره اعراف، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; و جمع آن &amp;quot;رسالات&amp;quot;، ۸ بار در [[قرآن مجید]] استعمال شده است؛ و معنای [[رسالت]] این است که مأموریتی بر عهده کسی بگذارند و او موظف به [[تبلیغ]] و ادای آن شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله حق‌جو|حق‌جو، عبدالله]]، [[ولایت در قرآن (کتاب)|ولایت در قرآن]]، ص:۵۶-۵۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==امامت در اصطلاح==&lt;br /&gt;
*مراد از &amp;quot;امامت&amp;quot; و &amp;quot;[[ولایت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; است؛ به این معنا که اینکه [[فرمان]] [[دست]] چه کسی باید باشد؛ بازگشت همۀ [[نزاع‌ها]]، چه داخل و چه بیرون از [[جامعه اسلامی]]، به این است که چه کسی [[دستور]] بدهد. در عصر ما نیز، هر کدام از [[طاغوت‌ها]] و سردم‌داران [[استکبار جهانی]] ادعا می‌کند که باید [[فرمان]] [[دست]] من باشد و اگر ملتی یا کشوری بیابد که روزبه‌روز مقتدرتر می‌شود، درصدد شکستن و به‌زانودرآوردن آن برمی‌آید تا خود را ابرقدرت جلوه دهد. اساس [[جنگ‌ها]] و کشمکش‌های این [[مستکبران]] با رقبای خود در [[دنیا]] همین است که زیر بار [[فرمان]] آنان نمی‌روند. بنابراین، [[نزاع]] و دعوا بر سر همان چیزی است که در منابع [[دینی]] [[اسلام]] از آن به &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; تعبیر شده است. &amp;quot;امامت&amp;quot; همان &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; است؛ یعنی چه کسی باید صاحب [[دستور]] باشد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*امامت در اصطلاح، تعاریف متعدّدی برای آن ارائه شده است که شاید مناسب‌ترین آن تعریف زیر باشد:&lt;br /&gt;
*&amp;quot;امامت عبارت است از [[ریاست]] و [[رهبری]] [[جامعه]] در [[امور دینی]] و [[دنیوی]]&amp;quot;. از این تعریف چند نکته استفاده می‌شود:&lt;br /&gt;
# امامت یک [[منصب الهی]] و به تعبیر [[قرآن کریم]] [[عهد خداوند]] است{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «و (یاد کن) آنگاه را که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم. (ابراهیم) گفت: و از فرزندانم (چه کس را)؟ فرمود: پیمان من به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[امام]] [[ریاست]] کلّی [[جامعه]] را در همه جنبه‌ها و تمام [[شئون]] آن بر عهده دارد. اعم از: [[رهبری سیاسی]] و [[حکومت]]، [[رهبری]] [[قضایی]] و [[فصل خصومت]]، [[رهبری]] و مرجعیّت [[دینی]] و [[مقام]] [[افتاء]] و [[زعامت]] تقنینی و قانون‌گذاری.&lt;br /&gt;
# [[مردم]] در [[تعیین]] و [[نصب امام]] دخالتی ندارند، امّا برای به فعلیت رسیدن [[زعامت]] او و به اصطلاح &amp;quot;مبسوط الید&amp;quot; شدن [[امام]]، [[بدیهی]] است که نقش اصلی از آن [[مردم]] است. بر این که امامت نیز همچون [[نبوّت]] خارج از محدوده [[انتخاب]] و تشخیص [[مردم]] است علاوه بر [[قرآن]] و [[روایات]]، [[عقل]] نیز دلالت دارد؛ چون [[امام]] نیز – چنان‌که خواهد آمد- باید دارای صفاتی همچون [[عصمت]] و [[علم]] خاصّ باشد که جز [[خداوند]] کسی از آن [[آگاه]] نیست و اینکه تحقّق و فعلیت [[امام]] وابسته به [[مردم]] و حضور آنها در صحنه است امری روشن است؛ زیرا [[حاکم]] بدون [[رعیت]] و [[امام]] بدون [[مأموم]] معنا ندارد و از طرفی [[انسان]] موجودی مختار است و امور خود را با [[اراده]] خود انجام میدهد و [[خدای متعال]] نیز بنا ندارد امور خارج از مجاری عادّی به انجام برسد: {{متن حدیث|أبى اللّه أن يجرى الأمور إلّا بأسبابها}}؛ بنابراین حضور [[مردم]] و به تعبیر [[امیر المؤمنین]]{{ع}} &amp;quot;حضور حاضر&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه، خطبه ۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; است که امکان تصدّی امور توسّط [[امام]] را فراهم می‌کند. به همین [[دلیل]] اکثر ائمّه{{عم}} در [[حقیقت]] دارای [[منصب امامت]] بودند، ولی در عمل متصدّی بخشی از [[شئون امامت]] نبودند و نه تنها [[مردم]] از [[رهبری سیاسی]] آنها [[محروم]] بودند که حتّی در امور مذهبی نیز [[مرجع]] عمومی [[مردم]] نبودند و [[مردم]] به دیگران مراجعه می‌کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[رضا محمدی|محمدی، رضا]]، [[امام‌شناسی ۵ (کتاب)|امام‌شناسی]]، ص:۳۰-۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*واژۀ [[امام]] از ریشۀ &amp;quot;أ م م&amp;quot; است و در لغت به معانی زیر آمده است: &amp;quot;هر کسی که مورد [[اقتدا]] و [[تبعیت]] گروهی قرار بگیرد چه در [[راه مستقیم]] باشند یا [[گمراه]]؛ [[قیم]] و [[مصلح]]، مقدم، طریق و راه&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۱۵۰؛ فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۱، ص۱۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[ابن منظور]] در [[لسان العرب]] [[معتقد]] است که أمامَ (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم ریشه است هردو ریشۀ &amp;quot;ام [[یوم]]&amp;quot; به معنی قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۱۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*واژۀ [[امام در قرآن]] در معانی لغوی آن به کار رفته است، تفلیسی در وجوه [[قرآن]] بر آن است که &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; در [[قرآن]] بر پنج وجه به کار رفته است:&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;وجه نخستین&#039;&#039;&#039; [[امام]] به معنای پیشرو است چنان که [[خدای متعال]] در [[سورۀ بقره]] آیۀ ۱۲۴ فرموده است: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و نیز در [[سورۀ فرقان]] آیۀ ۷۴ فرموده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|یعني قائداً في الخير}}.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;وجه دوم&#039;&#039;&#039; به معنای &amp;quot;[[نامه]]&amp;quot; آمده است چنان که در سورۀ [[بنی اسرائیل]]، آیۀ ۷۱ فرموده است: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|یعنی بکتابهم الذی عملوا فی الدنیا}}.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;وجه سوم&#039;&#039;&#039; به معنای &amp;quot;[[لوح محفوظ]]&amp;quot; است چنان که در [[سورۀ یس]] فرموده است: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|يعني في اللوح المحفوظ}}.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;وجه چهارم&#039;&#039;&#039; به معنای &amp;quot;[[تورات]]&amp;quot; است چنان که در [[سورۀ هود]] فرموده است: {{متن قرآن|مِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|يعني التوراة}} و در [[سورۀ احقاف]] فرمود: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا وَرَحْمَةً}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و پیش از آن، کتاب موسی پیشوا و رحمت بود» سوره احقاف، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|يعني التوریه}}.&lt;br /&gt;
*وجه پنجم به معنای راه روشن و پیداست، چنان که در [[سورۀ حجر]] فرمود: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|يعني الطریق الواضح}}&amp;lt;ref&amp;gt;وجوه قرآن، ص۲۸-۲۹؛ اسماعیل بن احمد، وجوه القرآن، ص۲۸-۲۹ و ص۹۸-۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&amp;quot;غالباً معنای آن در نزد [[عرب]] امری است که مورد [[تبعیت]] باشد چه [[انسان]] باشد که [[کردار]] و گفتارش مورد [[تبعیت]] است و چه کتاب باشد (مانند [[آیین]] [[نامه]])، چه محق باشد یا مبطل&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: المفردات، ج۱، ص۱۹۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابر آنچه [[گذشت]] امامت به معنای [[پیشوا]] و مقتدای [[مردم]] بودن است که آنان را به سویی [[هدایت]] می‌کند حال اگر [[امام]] بر [[حق]] و [[منصوب]] از طرف [[خداوند متعال]] و [[نبی مکرم اسلام]] باشد آنان را به سوی خیر و [[نیکی]] [[هدایت]] می‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;[[آرزو شکری|شکری، آرزو]]، [[حقوق اهل بیت (کتاب)|حقوق اهل بیت]]، ص۱۵۴- ۱۵۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[اندیشمندان]] و [[متکلمان]] [[مسلمان]] درباره امامت و [[ولایت]] تعاریف زیادی ذکر کرده‌اند. در اینجا به برخی از این تعاریف مهم اشاره می‌شود:&lt;br /&gt;
# [[سید مرتضی علم الهدی]] از [[عالمان]] بزرگ [[شیعی]] در این زمینه می‌نویسد: امامت، [[ریاست]] فراگیر در امور [[دین]] است به صورت اصلی و استقلالی، نه به [[نیابت]] از کسانی که در [[دار تکلیف]] هستند&amp;lt;ref&amp;gt;مراد از قید «بالاصالة لا بالنیابة» در تعریف امامت این است که امامت مورد نظر اسلام و شیعه، امری اصلی و منصبی الهی است، نه امری نیابتی و وکالتی از سوی مردم، که امامت و رهبری مطرح در حکومت‌های رایج در گذشته و حال از این قسم است.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|اَلاِمَامَهُ رِیَاسَهٌ عَامَّهٌ فِی الدِّینِ بِالاِصَالَهِ لا بِالنِّیَابَهِ عَمَّن هُوَ فِی دَارِ التَّكلیِفِ}}؛ الحدود والحقایق، سید مرتضی علم الهدی، ص۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[قاضی عبدالجبار معتزلی همدانی]] از [[اهل سنت]] در [[تعریف امامت]] می‌نویسد: &amp;quot;[[امام]]، نامی است برای کسی که [[حق ولایت]] و صاحب اختیاری بر [[امّت]] و (نیز) [[حق]] تصرّف در کارهایشان را دارد، به صورتی که قدرتی [[برتر]] از او - در میان [[امت]] - نیست&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإمام اسم لمن له الولايه علی الأمة و التصرف في أمورهم علی وجه لا يكون فوق يده يدٌ}}؛ شرح الأصول الخمسة، ص۵۰۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[سعدالدین تفتازانی]] از [[اهل سنت]] می‌گوید: امامت، [[ریاست]] عام و فراگیر بر امر [[دین]] و [[دنیا]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} است&amp;lt;ref&amp;gt;شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[شیخ طوسی]] از بزرگان [[شیعه]] می‌نویسد: &amp;quot;[[امام]]، همان کسی است که عهده‌دار [[ریاست]] عمومی در [[دین]] و [[دنیا]] با هم است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامام هو الذي يتولي الرئاسة العامّة في الدين و الدنيا جميعاً}}؛ شرح العبارات المصطلحة بین المتکلمین، به نقل از امامت‌ پژوهی، ص۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# امامت در تعریفی دیگر، عبارت است از: [[ریاست]] و [[سرپرستی]] توسط [[امام]] [[معصوم]] بر امور [[دین]] و دنیای [[مردم]] و [[حفظ]] [[مصالح]] دنیوی‌شان از راه جلوگیری از [[ظلم]] و [[فساد]] و اخلال امور [[واجب]] [[دینی]]. وجود چنین امامی لطفی از سوی [[خدای متعال]] بر [[مردم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;برگرفته از تمهید الأصولی فی علم الکلام، ابی جعفر محمد بن حسن طوسی، ص۳۴۸ - ۳۴۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[عضدالدین ایجی]] از [[اهل سنت]] نیز می‌گوید: &amp;quot;امامت، [[ریاست]] عام بر امور [[دین]] و دنیاست&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامامة رياسة عامة في امور الدين و الدنيا}}؛ شرح المواقف، شرح از سید شریف علی بن محمد جرجانی، ج۸، ص۲۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[علامه حلی]] از بزرگ [[عالمان]] [[شیعی]]، می‌گوید: &amp;quot;[[امام]]، همان [[انسانی]] است که برایش [[ریاست]] عمومی بالاصالة بر امور [[دین]] و [[دنیا]] در [[دار تکلیف]] است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الأمام هو الانسان الذي له الرياسة العامة في أمور الدين و الدنیا بالأصالة فی دار التکلیف}}؛ الاَلفین (دو هزار دلیل) فی امامة امیرالمؤمنین علی بن ابی‌طالب{{ع}}، جمال الدین حسن بن یوسف المطهر الحلّی، ص۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[ماوردی اشعری]] از [[اهل سنت]]، می‌گوید: امامت، [[ریاست]] عمومی در امر [[دین]] و [[دنیا]]، و [[جانشینی پیامبر]]{{صل}} است&amp;lt;ref&amp;gt;به نقل از امامت‌پژوهی، ص۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[خواجه نصیرالدین طوسی]] از مشاهیر [[عالمان]] [[شیعی]] می‌گوید: &amp;quot;امامت، [[ریاست]] عام [[دینی]] است که مشتمل بر [[ترغیب]] و [[تشویق]] عموم [[مردم]] بر [[حفظ]] [[مصالح دینی]] و دنیوی‌شان و بازداشتن آنها از آنچه که به حالشان [[مضر]] است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامامة رئاسة عامة دينية مشتملة علی ترغيب عموم الناس في حفظ مصالحهم الدينية و الدنياوية و زجرهم عما يضرهم بحسبها}}؛ قواعد العقائد، تحقیق علی ربانی گلپایگانی، ص۱۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
# [[ابن‌میثم بحرانی]]، دیگر عالم [[فرهیخته]] [[شیعی]] نیز می‌گوید: [[امام]]، همان [[انسانی]] است که برایش امامت و [[رهبری]] می‌باشد و امامت، [[ریاست]] عامی در امور [[دین]] و [[دنیا]] [[بالاصاله]] است&amp;lt;ref&amp;gt;قواعد المرام فی علم الکلام، میثم بن علی بن میثم البحرانی، ص۱۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله ابراهیم‌زاده آملی|ابراهیم‌زاده آملی، عبدالله]]، [[امامت و رهبری - ابراهیم‌زاده آملی (کتاب)| امامت و رهبری]]، ص:۱۷-۱۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==بررسی دیدگاه‌ها==&lt;br /&gt;
*چنانکه از ظاهر تعاریف امامت نزد [[عالمان]] [[شیعی]] و [[سنّی]] برمی‌آید، به نظر چنین می‌آید که تفاوت چندانی میان [[عالمان]] و [[متکلمان شیعه]] و [[سنّی]] در این خصوص وجود ندارد. از این رو، اگر ملاک بررسی و [[داوری]] درباره دیدگاه‌های [[شیعه]] و [[سنّی]] درباره امامت همین تعاریف باشد بر حسب ظاهر عبارات، نمی‌توان گفت از امامت دو تصویر و دیدگاه متمایز و متخالف میان [[شیعه]] و [[سنّی]] وجود دارد.&lt;br /&gt;
*به این تشابه ظاهری تعریف است که ممکن است [[تصور]] شود که در [[حقیقت]] و واقع امر نیز [[شیعه]] و [[سنّی]] در اصل مسئله امامت و چیستی آن، [[اختلاف]] [[عقیده]] ندارند و [[اختلاف]] آنها فقط به مصداق خارجی برمی‌گردد&amp;lt;ref&amp;gt;یعنی اختلاف فقط در این است که امام کیست و نه امامت چیست.&amp;lt;/ref&amp;gt;، در حالی که تفاوت دیدگاه [[تشیّع]] و تسنّن در [[تصور]] و [[تعریف امامت]] نیز تفاوت آشکار و غیر قابل جمعی است؛ زیرا تفاوت و [[اختلاف]] دیدگاه دو گروه در مسائل امامت (از [[وجوب]] و [[ضرورت امامت]] و شیوه [[نصب]] گرفته تا ویژگی‌ها و [[شرایط امام]] از [[علم]]، [[عصمت]] و...) به حدی است که نمی‌توان [[اختلاف]] آنها را تنها در [[تعیین]] مصداق دانست.&lt;br /&gt;
*توضیح آنکه اگر در [[تعریف امامت]] از سوی [[عالمان شیعه]] و [[سنّی]] دقت شود، روشن می‌شود که هسته مرکزی و نقطه محوری تعریف دو گروه درباره امامت، عبارت &amp;quot;[[ریاست عامه]] بر [[مسلمانان]] در امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. اما تشابه ظاهری و [[وحدت]] لفظی آنها در مفهوم امامت نباید مایه این [[اشتباه]] و [[پندار]] غلط شود که آنها حداقل تصوّر امامت [[وحدت]] نظر دارند؛ زیرا تصوّر این دو گروه از امامت نیز کاملاً متفاوت است. چه اینکه [[ریاست عامه]] و مطلق بر امور [[دین]] و دنیای [[مسلمانان]] می‌طلبد که [[امام]] و [[حاکم]] [[مسلمانان]] از [[شایستگی]] لازم و کافی برای احراز این [[منصب]] خطیر و حساس برخوردار باشد؛ از قبیل [[اسلام‌شناسی]] به تمام معنا، [[عدالت]] و [[تقوا]] و مجاز و [[مأذون]] بودن از سوی [[خدا]] و [[رسول]]، تا [[حکومت]] و [[رهبری]] او از [[مشروعیت]] و وجاهت [[دینی]] و [[شرعی]] کافی ـ و بلکه کامل ـ برخوردار باشد. در غیر این صورت [[حاکمیت]] او غیر [[شرعی]] و طاغوتی می‌شود.&lt;br /&gt;
*اما [[اهل سنت]] به هیچ یک از این [[شایستگی‌ها]] که از الزامات غیر قابل اغماض [[تعریف امامت]] به معنای یاد شده است، ملتزم نبوده و هیچ یک از آنها را برای [[امام]] و [[رئیس]] [[عامه]] [[مسلمانان]] در امور [[دین]] و [[دنیا]] قائل نیستند. از این‌رو، [[اهل سنت]] در [[تعریف امامت]]، دچار نوعی تضاد و تناقض‌گویی گشته‌اند. به همین خاطر، [[متکلم]] [[شیعی]] معروف [[قرن یازدهم]] &amp;quot;[[عبدالرزاق لاهیجی]]&amp;quot;، تشابه ظاهری تعاریف [[شیعه]] و [[سنّی]] از امامت را &amp;quot;معمّایی&amp;quot; تلقی کرده که باید حل شود؛ زیرا در [[باطن]] این تشابه ظاهری، تخالف و تفاوت آشکار و غیر قابل جمعی وجود دارد. وی در این زمینه می‌نویسد: و از عجایب امور آن است که تعریف مذکور برای امامت متفق علیه است میان ما و مخالفین ما، و حال آنکه هیچ یک از [[خلفا]] و [[ائمه]] (ای) که ایشان مختّص‌اند به قول به امامت ایشان، متصف نیستند به جمیع امور معتبره در مفهوم امامت به تعریف مذکور. چه [[ریاست]] در امور [[دین]] لا محاله موقوف است بر [[معرفت]] امور دینیه بالضرورة و ایشان عالم بودن [[امام]] را شرط نمی‌دانند در امامت؛ و مدّعی آن هم نیستند که هیچ یک از [[ائمه]] (مورد قبول) ایشان عالم به جمیع امور [[دین]] بوده‌اند.&lt;br /&gt;
*مرحوم [[لاهیجی]] در ادامه می‌گوید: &amp;quot;و نیز [[ریاست]] در امور [[دین]] موقوف است به [[عدالت]] بالضرورة؛ و ایشان آن را (نیز) شرط ندانسته‌اند؛ و تصریح به عدم اشتراط این دو امر، در اکثر کتب ایشان موجود است. از جمله در &amp;quot;شرح مقاصد&amp;quot; گفته که یکی از اسباب انعقاد [[خلافت]]، [[قهر]] و [[غلبه]] است و هر کس متصدی امامت به [[قهر]] و [[غلبه]] شود بدون [[بیعت]]، اگرچه [[فاسق]] یا [[جاهل]] باشد [[علی]] الاظهر منعقد شود [[خلافت]] برای او؛ و نیز گفته: &amp;quot;و [[واجب]] است [[اطاعت]] و [[فرمانبری]] از [[امام]] تا جایی که مخالف [[حکم شرع]] نباشد، چه اینکه [[امام]] [[عادل]] باشد یا [[جائر]] و [[فاسق]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يجب طاعة الإمام ما لم يخالف حكم الشرع سواء كان عادلاً أو جائراً}}؛ شرح مقاصد، ج۵، ص۲۳۳-۳۳۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ &amp;quot;و همچنین در سایر کتب ایشان، چنانکه بر ادنی متتبعی پوشیده نیست؛ و نیز [[خلیفگی]] از [[پیغمبر]] موقوف است به [[اذن]] [[پیغمبر]] بالضرورة؛ و از آنچه از شرح مقاصد [[نقل]] شد، عدم اعتبار این شرط نیز ظاهر است...&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;گوهر مراد، ملا عبدالرزاق لاهیجی، ص۴۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[اهل سنت]] در مسئله امامت و [[خلافت]]، به [[وحدت]] نظر و دیدگاه یکسان و متفق القولی نرسیده‌اند. از طرفی، به تعریفی پایبندند که [[امام]] و [[خلیفه]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} را [[اسلام‌شناسی]] [[عادل]] و مجاز از سوی [[خدا]] و [[رسول]]{{صل}} معرفی می‌کند و در آن [[جایگاه]] قرار می‌دهد، از سوی دیگر، در واقع امر و در [[مقام]] [[تعیین]] مصداق، خلاف آن عمل کرده و نه این شرایط را مد نظر قرار می‌دهند و نه چنین شرایط و شایستگی‌هایی در خلفای آنها وجود دارد!&lt;br /&gt;
*از آنچه گفته شد، این [[حقیقت]] مهم و کلیدی نیز آشکار گشت که به رغم تشابه ظاهری [[شیعه]] و [[سنّی]] در [[تعریف امامت]]، ولی [[اختلاف]] این [[دو مذهب]] مهم و محوری در میان [[مسلمانان]] در مسئله امامت، اختلافی شدید است؛ چه اینکه اساساً ریشه همه [[اختلافات]] [[شیعه]] و [[سنّی]] در مسائل اصولی و فروعی [[دین]]، به هیمن [[اختلاف]] دیدگاه آنها در مسئله امامت و [[خلافت]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} برمی‌گردد و از آن نشأت می‌گیرد؛ زیرا [[شیعیان]] بنا به [[دلایل عقلی]] و [[نقلی]]، امامت را اصلی از [[اصول دین]] و [[مذهب]] خود می‌دانند، ولی [[اهل سنّت]] آن را تا آنجا تنزل داده‌اند که فرعی از [[فروع فقهی]] می‌شمارند؛ هر چند در عمل، با [[واجب الاطاعه]] دانستن هر [[حاکم]] حتی فاقد صلاحیت، او را در [[جایگاه امام]] و [[پیامبر]] [[معصوم]] قرار داده و [[قداست]] و [[منزلت]] والایی برای او قائل شده‌اند!&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله ابراهیم‌زاده آملی|ابراهیم‌زاده آملی، عبدالله]]، [[امامت و رهبری - ابراهیم‌زاده آملی (کتاب)| امامت و رهبری]]، ص:۲۰-۲۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[نظام امامت]] و [[نظام خلافت]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اهمیت بحث امامت]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==نخست: [[حقیقت امامت]]==&lt;br /&gt;
===[[امامت در قرآن]]===&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت در قرآن}}&lt;br /&gt;
* لفظ &amp;quot;امامت&amp;quot; در [[قرآن]] به‌کار نرفته؛ ولی واژه &amp;quot;[[امام]]{{ع}}&amp;quot; به صورت مفرد و جمع در ۱۲ مورد استعمال شده است که برخی از آنها و نیز [[آیات]] متعدد دیگر به موضوع امامت [[ارتباط]] دارد. [[آیات]] مربوط گاهی به [[پیشوایی]] بر [[حق]] [[بالاصاله]]: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}} &amp;lt;ref&amp;gt; و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند؛ سوره انبیاء، آیه: ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}} &amp;lt;ref&amp;gt; برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم؛ سوره سجده، آیه: ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به [[پیشوایی]] به [[حق]] به نحو [[جانشینی]]: {{متن قرآن|وَأُولِي الأَمْرِ مِنكُمْ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و زمامدارانی که از شمایند؛ سوره نساء، آیه: ۵۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به [[پیشوایی]] [[باطل]]: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و زمامدارانی که از شمایند؛ سوره قصص، آیه: ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و گاهی به مفهوم جامع میان [[پیشوایی]] بر [[حق و باطل]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}} &amp;lt;ref&amp;gt; روزی که هر دسته‌ای  را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم؛ سوره اسراء، آیه: ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; اشاره دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*افزون بر آیاتی که واژه [[امام]]{{ع}} یا [[اولی‌الامر]] در آن به‌کار رفته است [[آیات]] فراوانی با امامت و [[رهبری]] پیوند دارد، از جمله برخی آیاتی که در آن مفهوم [[هدایت]] آمده {{متن قرآن|وَيَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُواْ لَوْلا أُنزِلَ عَلَيْهِ آيَةٌ مِّن رَّبِّهِ إِنَّمَا أَنتَ مُنذِرٌ وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و کافران می‌گویند: چرا نشانه‌ای از پروردگارش بر او فرو فرستاده نشده است؟ تو، تنها بیم‌دهنده‌ای و هر گروهی رهنمونی دارد؛ سوره رعد، آیه: ۱۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ قُلِ اللَّهُ يَهْدِي لِلْحَقِّ أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لاَّ يَهِدِّيَ إِلاَّ أَن يُهْدَى فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; بگو آیا از شریکانتان  کسی هست که به سوی «حق» رهنمون باشد؟ بگو خداوند به «حق» رهنماست؛ آیا آنکه به حقّ رهنمون می‌گردد سزاوارتر است که پیروی شود یا آنکه راه نمی‌یابد  مگر آنکه راه برده شود؟ پس چه بر سرتان آمده است؟ چگونه داوری می‌کنید؟؛ سوره یونس، آیه: ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;، آیه‌ای که [[مؤمنان]] را به [[همراهی]] با [[صادقان]] فرا می‌خواند {{متن قرآن|الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ بَعْضُهُم مِّن بَعْضٍ يَأْمُرُونَ بِالْمُنكَرِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمَعْرُوفِ وَيَقْبِضُونَ أَيْدِيَهُمْ نَسُواْ اللَّهَ فَنَسِيَهُمْ إِنَّ الْمُنَافِقِينَ هُمُ الْفَاسِقُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; مردان و زنان منافق، همگون یکدیگرند که به کار ناپسند فرمان می‌دهند و از کار شایسته باز می‌دارند! و (در بخشش) ناخن خشکی می‌ورزند، خداوند را فراموش کرده‌اند و خداوند نیز آنان را از یاد برده است، بی‌گمان منافقانند که نافرمانند؛ سوره توبه، آیه: ۶۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[آیه ولایت]] {{متن قرآن|إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُواْ الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; سرور شما تنها خداوند است و پیامبر او و (نیز) آنانند که ایمان آورده‌اند، همان کسان که نماز برپا می‌دارند و در حال رکوع  زکات می‌دهند؛ سوره مائده، آیه: ۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;، آیه‌ای که می‌گوید اگر به برخی در [[زمین]] [[قدرت]] داده شود [[نماز]] را برپا می‌دارند، [[زکات]] می‌دهند و [[امر به معروف و نهی از منکر]] می‌کنند {{متن قرآن|الَّذِينَ إِن مَّكَّنَّاهُمْ فِي الأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنكَرِ وَلِلَّهِ عَاقِبَةُ الأُمُورِ}} &amp;lt;ref&amp;gt; همان کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند و پایان کارها با خداوند است؛ سوره حج، آیه: ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و آیاتی که در آن از اعطای [[مُلک]] به برخی سخن به میان آمده است. {{متن قرآن|أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لاَّ يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُم مُّلْكًا عَظِيمًا }} &amp;lt;ref&amp;gt; آیا ایشان را بهره‌ای از فرمانروایی است؟ که در آن صورت سر سوزنی  به کسی (چیزی) نمی‌دهند.  یا اینکه به مردم برای آنچه خداوند به آنان از بخشش خود داده است رشک می‌برند؟ بی‌گمان ما به خاندان ابراهیم کتاب (آسمانی) و فرزانگی  دادیم و به آنان فرمانروایی سترگی بخشیدیم؛ سوره نساء، آیه: ۵۳ - ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ اللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًا قَالُواْ أَنَّى يَكُونُ لَهُ الْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِالْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةً مِّنَ الْمَالِ قَالَ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ وَاللَّهُ يُؤْتِي مُلْكَهُ مَن يَشَاء وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ }} &amp;lt;ref&amp;gt; و پیامبرشان به آنان گفت: خداوند طالوت را به پادشاهی شما گمارده است، گفتند:چگونه او را بر ما پادشاهی تواند بود با آنکه ما از او به پادشاهی سزاوارتریم و در دارایی هم به او گشایشی نداده‌اند. گفت: خداوند او را بر شما برگزیده و بر گستره دانش و نیروی تن او افزوده است و خداوند پادشاهی خود را به هر که خواهد می‌دهد و خداوند نعمت‌گستری داناست؛ سوره بقره، آیه: ۲۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[روایات]] فراوانی نیز، مصادیق یا [[تأویل]] آیاتی از [[قرآن]]، مانند: {{متن قرآن|فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالنُّورِ الَّذِي أَنزَلْنَا وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ }} &amp;lt;ref&amp;gt; پس به خداوند و پیامبرش و نوری که فرو فرستاده‌ایم ایمان آورید و خداوند از آنچه انجام می‌دهید آگاه است؛ سوره تغابن، آیه: ۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;نورالثقلین، ج ۵، ص ۳۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، {{متن قرآن|يُرِيدُونَ لِيُطْفِؤُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللَّهُ مُتِمُّ نُورِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; بر آنند که نور خداوند را با دهانهاشان خاموش کنند و خداوند کامل‌کننده نور خویش است هر چند کافران نپسندند؛ سوره صف، آیه: ۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;نورالثقلین، ج ۵، ص ۳۱۶ - ۳۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و {{متن قرآن|وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و ما برای آنان این گفتار را به هم پیوستیم  باشد که پند گیرند؛ سوره قصص، آیه: ۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt; الکافی، ج ۱، ص ۴۱۵؛ بصائر الدرجات، ص ۵۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[امامان]]{{عم}} دانسته شده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[قرآن]] و [[احادیث اسلامی]]، کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، فی الجمله در معنای لغویِ آن به کار رفته است؛ یعنی هر چیزی که مورد [[پیروی]] واقع شود اعم از [[انسان]] و غیر [[انسان]]، مانند: {{متن قرآن|وَمِن قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا وَرَحْمَةً}} &amp;lt;ref&amp;gt; و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است؛ سوره هود، آیه: ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[حق]] مانند: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}} &amp;lt;ref&amp;gt; و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند؛ سوره انبیاء، آیه: ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[باطل]] مانند: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ }} &amp;lt;ref&amp;gt; و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم  که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند؛ سوره قصص، آیه: ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ ولی غالبا این واژه به [[پیشوایان]] [[حق]] و کسانی که به بالاترین نقطه قلّه [[انسانیت]] [[صعود]] کرده‌اند، اطلاق می‌گردد و استعمال آن در معنای لغوی، اندک است و نیز استعمال آن در «[[امامان]] [[آتش]]»، به لحاظ نشان دادن نقطه نهاییِ [[انحطاط]] [[انسان]]، در مقابل نقطه اوج [[تکامل]] اوست. به هر حال، [[آیات]] و احادیثی که در این جا تحت عنوان «امامت» خواهند آمد، اختصاص به امامت [[امامان]] [[حق]] دارند&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/27255/6/214 [[محمد محمدی ری‌شهری|محمدی ری‌شهری، محمد]]، دانشنامه قرآن و حدیث،  ج ۱۰، ص۲۱۳ - ۲۱۴.]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[خدای سبحان]] در [[آیات]] متعددی به موضوع امامت اشاره و برای [[امام]] ویژگی‌هایی آورده است. این ویژگی‌ها در [[تعریف امامت]]، تأثیر بسزایی دارد.&lt;br /&gt;
*نمونه‌های زیر، برخی از مهم‌ترین [[آیات]] است:&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (یاد کن) آنگاه را  که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی  آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم. (ابراهیم) گفت: و از فرزندانم (چه کس را)؟ فرمود: پیمان من به ستمکاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً وَكُلًّا جَعَلْنَا صَالِحِينَ وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِمْ فِعْلَ الْخَيْرَاتِ وَإِقَامَ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءَ الزَّكَاةِ وَكَانُوا لَنَا عَابِدِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و اسحاق را و افزون بر آن (نوه‌اش) یعقوب را به او بخشیدیم و همه را (مردمی) شایسته کردیم و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند و به آنها انجام کارهای نیک و برپا داشتن نماز و دادن زکات را وحی کردیم و آنان پرستندگان ما بودند» سوره انبیاء، آیه ۷۲-۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَلَا تَكُنْ فِي مِرْيَةٍ مِنْ لِقَائِهِ وَجَعَلْنَاهُ هُدًى لِبَنِي إِسْرَائِيلَ وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يُوقِنُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و به راستی ما به موسی کتاب (آسمانی) دادیم -بنابراین در لقای او (با خداوند) تردیدی مکن- و ما آن (کتاب) را رهنمودی برای بنی اسرائیل قرار دادیم و چون شکیب ورزیدند و به آیات ما یقین داشتند  برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم که به فرمان ما (مردم را) رهنمایی می‌کردند» سوره سجده، آیه ۲۳-۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بر پایه [[آیات]] یاد شده، چند ویژگی برای امامت دست‌یافتنی است:&lt;br /&gt;
# امامت به [[جعل]] [[الهی]] است: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ}}، {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ}}، {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ}}. &lt;br /&gt;
# [[گستره امامت]] [[امام]]، [[مردم]] است: {{متن قرآن|جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ}}.&lt;br /&gt;
# امامت، [[عهد الهی]] است: {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي}}.&lt;br /&gt;
# امامت به [[ظالمان]] نمی‌رسد: {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}.&lt;br /&gt;
# [[امام]]، دارای [[هدایت تکوینی]] یا [[هدایت به امر]] است: {{متن قرآن|يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}. &lt;br /&gt;
# [[هدایت به امر]]، دو مقدمه دارد: کمال علمی‌ یا [[یقین]]: {{متن قرآن|وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يُوقِنُونَ}}؛  کمال عملی یا [[صبر]]: {{متن قرآن|لَمَّا صَبَرُوا}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[مهدی مقامی|مقامی، مهدی]]، [[درسنامه امام‌شناسی (کتاب)|درسنامه امام‌شناسی]]، ص:۲۲-۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===امامت در اصطلاح===&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت در کلام اسلامی}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت در حکمت اسلامی}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت در عرفان اسلامی}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|حقیقت امامت}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
===امامت از دیدگاه فرق و [[مذاهب]] ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==دوم: [[ضرورت امامت]]==&lt;br /&gt;
{{اصلی|ضرورت امامت}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|استمرار امامت}}&lt;br /&gt;
*وجود [[امام]]{{ع}} در هر عصر و زمان و در هر جامعه‌ای برای [[هدایت]] [[انسان‌ها]] به سوی کمال و [[برقراری نظم]] در [[جامعه]] [[ضرورت]] دارد&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج ۱۳، ص ۱۶۵ ـ ۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|إِنَّمَا أَنْتَ مُنْذِرٌ وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ}} &amp;lt;ref&amp;gt; تو، تنها بیم‌دهنده‌ای و هر گروهی رهنمونی دارد؛ سوره رعد، آیه: ۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[روایات تفسیری]] این [[آیه]] نیز این [[حقیقت]] را [[تأیید]] می‌کند که امامی زنده تا [[روز قیامت]] در میان [[انسان‌ها]] حضور دارد&amp;lt;ref&amp;gt;الکافى، ج ۱، ص ۱۹۱ ـ ۱۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ همچنین براساس روایاتی درباره [[سوره قدر]]، در [[شب قدر]] هر سال تا [[روز قیامت]]، [[فرشتگان]] بر [[امام]]{{ع}} آن زمان نازل می‌شوند و این [[سوره]] [[دلیل]] روشنی بر [[وجود امام]]{{ع}} در همه زمانهاست &amp;lt;ref&amp;gt;نورالثقلین، ج ۵، ص ۶۱۹ ـ ۶۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
===[[اثبات ضرورت وجود امام]] ===&lt;br /&gt;
===[[اصل اعتقادی بودن امامت]] ===&lt;br /&gt;
{{اصلی|اصل دین بودن امامت}}&lt;br /&gt;
===[[فرع فقهی بودن امامت]] ===&lt;br /&gt;
===[[جایگاه امامت]]===&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام معارف دینی]]====&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام اعتقادی اسلام]]====&lt;br /&gt;
*مسئله امامت در [[تفکر]] [[اسلامی]] [[جایگاه]] بسیار بالایی دارد. [[قرآن کریم]] امامت را [[برتر]] از [[نبوت]] دانسته است، زیرا درباره [[ابراهیم خلیل]]{{ع}}، یادآور شده است که او پس از آنکه دارای [[مقام]] [[نبوت]] بود، مورد آزمون‌های ویژه‌ای قرار گرفت و آن گاه [[مقام امامت]] به او اعطا گردید&amp;lt;ref&amp;gt;سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[روایات]] [[اهل بیت]]{{عم}} بر این مطلب تصریح و تأکید شده است &amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج۱، ص۱۳۳ـ ۱۳۴، ۱۴۹ـ ۱۵۱ و ۱۵۴؛ غایة المرام، ج۳، ص۱۲۷ـ ۱۲۹؛ البرهان فی تفسیر القرآن، ج۱، ص۱۴۹ـ ۱۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اگر از منظر [[تاریخی]] نیز به امامت بنگریم [[جایگاه]] ویژه آن نزد [[مسلمانان]] آشکار می‌گردد. پس از [[پیامبر]]{{صل}} مهم‌ترین و حساس‌ترین مسئله‌ای که مورد بحث و گفت وگوی [[مسلمانان]] قرار گرفت، امامت بود. هیچ یک از آموزه‌های دینی‌، در هیچ زمانی مانند امامت مورد بحث و [[نزاع]] واقع نشده است &amp;lt;ref&amp;gt;الملل والنحل، ج۱، ص۲۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در اهمیت امامت همین بس که در [[مکتب]] [[تشیع]] امامت یکی از [[اصول دین]] است؛ از این‌رو در ادامه چند نکته ذکر می‌شود.&lt;br /&gt;
#اهداف و اغراضی که با [[نبوت]] حاصل می‌شد با امامت حقه نیز به دست آید به گونه‌ای که به انتفای امامت، اغراض و [[اهداف]] [[نبوت]]، منتفی می‌شود پس همان طور که [[نبوت]] از [[اصول دین]] است امامت نیز از [[اصول دین]] است.&lt;br /&gt;
#با امامت، اساس [[شریعت]] [[حفظ]] می‌شود و [[نظام اجتماعی]] قوام می‌یابد.&lt;br /&gt;
# [[زندگی]] بدون [[معرفت به امام]]، در واقع [[زندگی]] جاهلانه است و نه [[حیات]] طیبه‌ای که [[ادیان]]، ارمغان‌آور آن هستند. از [[حضرت رسول]] از [[خاصه]] و [[عامه]] چنین [[روایت]] شده است: &amp;quot;هر کس که از [[دنیا]] برود و [[امام]] زمانش را نشناخته باشد در [[حقیقت]] ([[مسلمان]] نیست) به [[مرگ جاهلیت]] از [[دنیا]] رفته است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|مَنْ مَاتَ وَ لَمْ يَعْرِفْ إِمَامَ زَمَانِهِ مَاتَ مِيتَةً جَاهِلِيَّةً}}&amp;lt;/ref&amp;gt;. این [[حدیث]] به وضوح دلالت می‌کند که [[نفی]] امامت مستلزم [[کفر]] است پس امامت از اصول [[دین اسلام]] است.&lt;br /&gt;
* امامت یک [[منصب الهی]] و فراتر از [[گزینش]] است همان طور که [[مقام نبوت]]، یک [[مقام]] و [[منصب الهی]] است و [[خداوند متعال]] باید [[نبی]] و [[پیامبر]] را [[تعیین]] کند هرگز امکان ندارد فردی از طریق [[گزینش]] [[مردم]] به [[مقام نبوت]] رسد و هم‌چنین، [[مقام امامت]] یک [[مقام الهی]] است که هرگز فردی از طریق [[انتخاب مردم]] یا [[انتخاب]] [[اهل حل و عقد]] و دایرۀ [[شورا]] به [[مقام امامت]] نمی‌رسد&amp;lt;ref&amp;gt;محمود یزدی مطلق و جمعی از نویسندگان، امامت پژوهی، ص۷۸-۷۹ با تلخیص.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*آخرین مرحلۀ [[سیر]] تکاملی [[انسان]]، امامت است که [[قرآن مجید]] نیز آن را بیان می‌کند که تنها [[خواص]] به آن [[مقام]] می‌رسند: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (یاد کن) آنگاه را که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم. (ابراهیم) گفت: و از فرزندانم (چه کس را)؟ فرمود: پیمان من به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[کتاب]] [[بدایة المعارف (کتاب)|بدایة المعارف]] این‌گونه عقیدۀ [[شیعه]] را در مورد امامت بیان می‌کند: &amp;quot;ما معتقدیم که امامت یک اصل از [[اصول دین]] است که [[ایمان کامل]] نمی‌شود الا به وسیلۀ [[اعتقاد]] به آن و اینکه [[تقلید]] در [[عقیده]] از آباء واهل و معلمان هنگامی که به سن [[تکلیف]] میرسند و بزرگ میشوند [[کفایت]] نمی‌کند بلکه [[واجب]] است [[تفکر]] در امامت کما اینکه که [[واجب]] است [[تفکر]] در [[توحید]] و [[نبوت]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;محسن خرازی، بدایة المعارف، ج۱، ص۵ و ۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*باز هم می‎گوید: همان طوری که ما معتقدیم امامت مانند [[نبوت]] از [[خدای تعالی]] است پس چاره نیست از این که در هر عصری [[امام هدایت]] کننده‌ای که [[جانشین]] [[نبی]] باشد در وظایفش مثل [[هدایت]] [[بشر]]، [[ارشاد]] [[بشر]] به آن چیزی که [[صلاح]] و [[سعادت]] در دو [[جهان]] است و برای [[امام]] است آن چیزی که برای [[نبی]] از [[ولایت عامه]] است بر [[مردم]]، به خاطر [[تدبیر]] شوون آنها، مصالحشان و [[اقامه عدل]] بین [[مردم]] و [[رفع ظلم]] و [[دشمنی]] از بین [[مردم]].&lt;br /&gt;
*بنابراین امامت [[استمرار]] برای [[نبوت]] است و دلیلی که موجب [[ارسال رسل]] و [[بعثت انبیا]]{{عم}} است همان [[دلیل]] موجب [[نصب امام]] بعد از [[رسول]] است. همانا امامت نمی‌باشد الا بالنص از طرف [[خدای تعالی]] برلسان [[نبی]] یا زبان امامی که قبل از او است و امامت به [[اختیار]] و [[انتخاب مردم]] نیست و این طور نیست که [[مردم]] هنگامی که خواستند [[امام]] [[نصب]] کنند او را [[نصب]] کنند و هنگامی که خواستند او را ترک کنند ترکش کنند؛ بنابراین جایز نیست این که خالی بماند عصری از عصرها از [[امام]] مفروض الطاعه [[منصوب]] از جانب [[الله]] تعالی فرقی نمی‌کند که [[مردم]] اباء کنند از پذیرشش یا اباء نکنند و فرقی نمی‌کند که [[یاری]] بکنند او را یا نه، [[اطاعت]] بکنند یا نکنند. فرقی نمی‌کند که [[امام]] حاضر باشد یا نباشد زیرا همان طور که صحیح است [[غیبت]] [[نبی]] مثل [[غیبت]] در [[غار]] و دره، صحیح است که [[امام]] نیز [[غایب]] شود هیچ فرقی نیست در [[حکم عقل]] بین [[طولانی بودن غیبت]] و کوتاه بودن آن&amp;lt;ref&amp;gt;محسن خرازی، بدایه المعارف، ج۱، ص۵ و ۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[آرزو شکری|شکری، آرزو]]، [[حقوق اهل بیت (کتاب)|حقوق اهل بیت]]، ص۱۵۸- ۱۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[انسان]] به مقدار [[شناخت]] خود از یک موضوع در برابر آن واکنش نشان می‌دهد؛ به عنوان مثال، کسی که شناختش نسبت به [[خدای متعال]]، سطحی است، چه بسا نسبت به انجام [[اعمال]] و وظایفش کوتاهی کند و به آنها اهمیت ندهد؛ ولی اگر فردی شناختش نسبت به [[خداوند متعال]] در مرتبه بالاتری باشد، به طور حتم دید و نگرش او نسبت به [[مقام]] [[ربوبیّت]] به گونه دیگر بوده و با تمام وجود می‌کوشد که به دستوراتش عمل کند. این مطلب در رابطه با [[جایگاه]] رفیع امامت و [[مقام]] و [[منزلت امام]]{{ع}} نیز جاری است.&lt;br /&gt;
*اینکه در [[روایات]] نشناختن [[امام]] و جایگاهش موجب [[کفر]] و [[بی‌ایمانی]] اعلام شده، رازش در همین نهفته است. به عنوان نمونه، [[پیامبر اکرم]]{{صل}} فرمود: &amp;quot;هرکس بمیرد و [[امام]] خویش را نشناسد به [[مرگ جاهلیت]] (و [[کفر]]) مرده است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|مَنْ مَاتَ وَ لَا يَعْرِفُ إِمَامَهُ مَاتَ مِيتَةً جَاهِلِيَّةً}}؛ اصول کافی، ج۲، ص۲۰ - ۲۱، روایات ۶ و ۹. نیز ر.ک: اصول کافی، ج۱، ص۳۷۱، روایت ۵ و ص۳۷۶، روایت ۱ و ۲ و ص۳۷۷، روایت ۳ و ص۳۷۸، روایت ۲ و ص۳۷۹، روایت ۱؛ شرح مقاصد، ج۵، ص۲۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امام باقر]]{{ع}} در بیان اهمیت و [[ضرورت شناخت امام]]{{ع}} فرمود: اگر کسی شب‌ها را به [[عبادت]] [[قیام]] کند و روزها را [[روزه]] بگیرد و همه اموالش را در [[راه خدا]] [[انفاق]] کند و تمام [[عمر]] خویش را [[حج]] بجای آورد (ولی) [[ولایت ولی]] [[خدا]] را نشناسد، تا به ولایتش ملتزم گشته، پیرویش کند و همه [[اعمال]] و رفتارش با دلالت و [[راهنمایی]] او باشد، بهره‌ای از [[پاداش]] برای او نزد [[خدا]] نیست و از [[اهل]] [[ایمان]] نخواهد بود&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج۲، ص۱۹، دنباله روایت مفصّل شماره ۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[تبیین]] [[جایگاه امامت]] و معرّفی [[شخصیت]] و [[مقام]] [[امامان معصوم]]{{عم}}، کاری بسیار ضروری است؛ زیرا از این طریق می‌توانیم [[مقام]] شامخ و والای آن [[انسان‌های کامل]] را تا حدودی بشناسیم و [[زندگی فردی]] و [[اجتماعی]] خویش را تا حد ممکن با [[زندگی]] آنان [[تطبیق]] دهیم؛ و آن وقت است که میتوان مدّعی شد پیرو [[مکتب اهل بیت]]{{عم}} هستیم.&lt;br /&gt;
*پیشاپیش زبان به عجز و [[ناتوانی]] خود در [[شناخت]] و شناساندن کامل [[امام]] [[معصوم]]{{عم}} می‌گشایم و اعتراف می‌کنیم که نمی‌توانیم [[مقام امامت]] را آن‌چنانکه [[شایسته]] و بایسته است [[درک]] کنیم. چنانکه [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرمؤمنان]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;غیر از [[خدا]] و من، کسی تو را آن گونه که [[شایسته]] است، نشناخت&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|مَا عَرَفَكَ حَقَّ مَعْرِفَتِكَ غَيْرُ اللَّهِ وَ غَيْرِي}}؛ بحارالانوار، ج۳۹، ص۸۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*ولی می‌توانیم برای معرفی [[مقام]] و [[منزلت]] آن قلّه‌نشینان [[کمال انسانی]] و نایل‌شدگان به [[مقام]] والای &amp;quot;[[انسان کامل]]&amp;quot; و [[مقام]] &amp;quot;[[خلیفة]] [[الهی]]&amp;quot;، از خودشان [[استمداد]] بطلبیم و از سخنان وحی‌گونه‌شان در این زمینه استفاده کنیم.&lt;br /&gt;
* [[امیرمؤمنان علی]]{{ع}} درباره [[جایگاه معنوی]] و [[شخصیت]] [[الهی]] [[اهل بیت]]{{عم}} (= [[ائمه اهل بیت]] و [[فاطمه زهرا]]{{س}}) می‌فرماید: &amp;quot;هرگز کسی از این [[امت]] [[مسلمان]] با [[خاندان پیامبر]]{{صل}} مقایسه نمی‌شود و آنانی که پروردۂ [[نعمت]] [[هدایت]] [[اهل بیت]]{{عم}} هستند با آنها برابر نیستند. [[خاندان رسالت]]، [[اساس دین]] و ستون‌های [[استوار]] یقین‌اند&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|لَا يُقَاسُ بِآلِ مُحَمَّدٍ{{صل}} مِنْ هَذِهِ الْأُمَّةِ أَحَدٌ وَ لَا يُسَوَّى بِهِمْ مَنْ جَرَتْ نِعْمَتُهُمْ عَلَيْهِ أَبَداً هُمْ أَسَاسُ الدِّينِ وَ عِمَادُ الْيَقِينِ}}؛ نهج‌البلاغه، صبحی صالح، خطبه ۲، ص۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امام رضا]]{{ع}} نیز در یک بیان طولانی به شرح و [[تبیین]] [[جایگاه امامت]] و [[مقام]] و [[منزلت]] والای [[امامان]]{{عم}} پرداخته است. آن [[حضرت]] این سخنان را زمانی بیان کرد که در هنگام ورود به [[شهر]] [[مرو]] [[خراسان]] مردمی را [[مشاهده]] نمود که در [[مسجد]] جامع [[شهر]] گرد هم نشسته و درباره مسئله امامت [[گفت‌وگو]] می‌کنند و [[اختلاف]] شدیدی در آن پیدا کرده بودند. [[امام]]{{ع}} این‌گونه آغاز سخن کرد و فرمود: مگر [[مردم]] [[مقام]] و [[منزلت]] ([[امام]] و) امامت را در میان [[امّت]] می‌دانند تا روا باشد که - [[گزینش امام]] - به [[اختیار]] و [[انتخاب]] آنان سپرده شود؟! [[شکوه]] [[مقام امامت]] و [[برتری]] مکان و [[جاه]] و جلال و [[حقیقت]] آن، بالاتر از آن است که این [[مردم]] بتوانند با [[عقل]] ناقصشان به ارزیابی آن بپردازند؛ یا [[اندیشه]] [[درستی]] درباره آن داشته باشند؛ یا به [[اختیار]] خود [[پیشوایی]] را برای سر و سامان دادن به کارهای خویش [[انتخاب]] کنند.&lt;br /&gt;
* امامت، [[مقام]] و [[منصب]] ویژه‌ای است که [[خداوند]] پس از [[منصب]] [[نبوّت]] و خلّت [[مقام]] [[خلیل]] اللهی، در مرتبه سوم به [[حضرت ابراهیم]]{{ع}} ارزانی داشته و او را به این [[فضیلت]] و [[مقام]] مشرّف ساخته و نامش را بلندآوازه و سرافراز گردانیده و (در [[آیه ابتلا]]: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (یاد کن) آنگاه را که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم. (ابراهیم) گفت: و از فرزندانم (چه کس را)؟ فرمود: پیمان من به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;) فرمود: همانا من تو را [[امام]] [[مردم]] گردانیدم... این [[آیه]] [[پیشوایی]] هر فرد [[ستمکاری]] را تا [[روز قیامت]] [[باطل]] کرد و آن را ویژه [[پاکان]] برجسته قرار داد...&amp;lt;ref&amp;gt;آیه ابتلا و نفی امامت و رهبری در جامعه اسلامی از انسان‌های فاسد و ستمکار در آن، دلیل روشنی است بر نادرستی دیدگاه علمای اهل سنّت و جماعت درباره امامت و جانشینی پیامبر{{صل}} که این مقام راحتی برای انسان‌های فاسدم و ستمکار روا می‌دانند!&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*همانا امامت، [[مقام]] [[انبیا]] و [[میراث]] اوصیاست. امامت، [[خلافت خدا]]، [[جانشینی رسول خدا]]{{صل}}، [[مقام]] [[امیرمؤمنان]]{{ع}} و [[میراث]] [[حسن]] و [[حسین]]{{عم}} است. امامت، [[زمام دین]]، موجب [[نظام]] [[مسلمین]] و [[صلاح]] [[دنیا]] و [[عزت]] [[مؤمنین]] است. امامت، ریشه بالنده [[اسلام]] و شاخه بلند آن است. با [[امام]] است که [[نماز]]، [[زکات]]، [[روزه]]، [[حج]]، [[جهاد]]، دریافت [[بیت‌المال]]، [[اجرای حدود]] و [[احکام]]، [[دفاع]] از مرزها و سرحدات به طور کامل انجام می‌شود... [[امام]] مانند [[خورشید]] روشنی‌بخش است که نورش فراگیر عالم (و [[آدم]]) است... [[امام]]، ماه تابان، چراغ فروزان، [[نور]] درخشان و ستاره‌ای است تابان و راهنمای در شدّت تاریکیها و رهگذر [[شهرها]] و کویرها و گرداب دریاها (یعنی [[راهنما]] و روشنگر زمان تاریکی‌های فراگیر [[جهل]] و [[نادانی]]، [[حیرت]] و [[سرگردانی]]، [[فتنه]] و آشوب‌های [[اجتماعی]]). [[امام]] آب گوارای زمان [[تشنگی]]، [[رهبر]] به سوی [[هدایت]] و [[نجات‌بخش]] از ([[گمراهی]] و) [[هلاکت]] است... [[امام]]، ابری است بارنده، بارانیست شتابنده، خورشیدی است فروزنده... [[امام]]، همدم و رفیق، [[پدری]] [[مهربان]]، [[برادری]] برابر، [[مادری]] [[دلسوز]] به [[کودک]]، [[پناه]] [[بندگان خدا]] در گرفتاری‌های سخت است....&lt;br /&gt;
* [[امام]]، [[امین]] [[خدا]] در میان خلقش و [[حجّت]] او در میان بندگانش و [[خلیفه]] او در سرزمین‌هایش است و [[مردم]] را به [[دین خدا]] [[دعوت]] و از [[حریم]] او، حراست می‌کند. [[امام]]، کسی است که از [[گناهان]]، [[پاک]] و از [[عیوب]] به دور است. به [[علم]]، مخصوص و به [[حلم]]، موسوم است. رشته اتصال [[دین]]، [[عزّت]] [[مسلمین]]، مایه [[خشم]] [[منافقین]] و نابودی کافرین است....&lt;br /&gt;
* [[امام]]، یگانه روزگار خویش است و هیچ کس به پای او نمی‌رسد و هیچ عالمی با او برابر نیست. [[جانشینی]] برای او یافت نمی‌شود و نظیر و مانندی برایش نیست. تمام [[فضایل]] و [[نیکی‌ها]] را داراست؛ بدون این که خود در طلبش رفته و کسب کرده باشد، بلکه امتیازی است که از سوی [[خداوند]] به او عطا شده است. پس کیست که بتواند [[امام]] را بشناسد یا [[انتخاب امام]] برای او ممکن باشد؟! هیهات، در اینجا خردها گم گشته... وعقل‌ها سرگردان و دیده‌ها بیدید است، بزرگان در این جا کوچکند و حکیمان در [[حیرت]] و بردباران کوتاه نظر، هوشمندان گیج و [[نادان]]، [[شاعران]]، لال و گنگ (یعنی [[ناتوان]] از توصیف [[امام]]) و سخندانان بی‌زبانند؛ شرح یک منزلتش را نتوانند و [[وصف]] یکی از فضایلش را ندانند و همگی به عجز و [[ناتوانی]] معترفند. چگونه می‌توان تمام اوصاف و [[ویژگی‌های امام]] و [[حقیقت]] وجود او را بیان کرد و اسرارش را فهمید... او که از [[وصف]] واصفان، فراتر است....&lt;br /&gt;
*آن [[حضرت]] در فراز دیگری در توصیف [[امام]] [[معصوم]]، فرمود: [[امام]]، عالمی است که چیزی بر او پوشیده نیست؛ [[پاسداری]] است که از انجام [[وظایف]] و [[تکالیف]]، کوتاهی نمی‌کند. معدن [[قداست]]، [[پاکی]]، [[پارسایی]]، [[علم]] و [[عبادت]] است... [[امام]]، مورد [[تأیید الهی]] و به دور از هر [[لغزش]] و خطایی است. بدین گونه، [[خداوند]] به وی [[مقام]] و منزلتی ممتاز بخشید، تا حجّتی باشد بر [[بندگان]] و [[گواهی]] باشد بر مخلوقات؛ و این [[فضل]] خداست که به هر کس خواهد، عطا نماید و [[خداوند]] صاحب [[فضل]] عظیمی است&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج۱، کتاب الحجة، باب نادر جامع فی فضل الامام و صفاته، روایت اول:&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امام هادی]]{{ع}} نیز در فرازهایی از [[زیارت]] معتبر و گرانسنگ &amp;quot;[[جامعه]] کبیره&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;زیارت جامعه کبیره از ادعیه معتبره‌ای است که علاوه بر کتب ادعیه به ویژه مفاتیح الجنان شیخ عباس قمی، در کتب روایی نیز آمده است. (ر.ک: بحارالانوار، ج۹۹، ص۱۲۷ - ۱۴۴؛ روضة المتقین، محمدتقی مجلسی، ج۵، ص۴۵۰ - ۴۵۳، من لا یحضره الفقیه، ج۲، ص۳۸۵ –۳۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[مقام]] و [[منزلت]] [[ائمه اهل بیت]]{{عم}} را چنین [[تبیین]] می‌کند: &amp;quot;[[درود]] بر شما ای [[خاندان]] [[نبوّت]]، [[جایگاه]] (و خاستگاه) [[رسالت]]، محل آمد و رفت [[فرشتگان]]، فرودگاه [[وحی]]، سرچشمه‌های [[رحمت]] ([[خداوند]])، دارندگان [[برترین]] [[درجه]] [[تقوا]] و [[پرهیزکاری]]، حجّت‌های [[خداوند]] بر تمام [[اهل]] [[دنیا]]، [[آخرت]] و [[مردم]] نخستین (و پیشینیان)؛ و شمایید [[نور]] (دیده و [[دل]]) خوبان و هدایت‌کنندگان [[نیکوکاران]]. برای شماست [[محبّت]] [[واجب]]، درجات والا، [[مقام]] ستوده، [[جایگاه]] آشکار نزد خدای عزّوجلّ و [[جاه]] و جلال بزرگ و [[منزلت]] بسیار عالی&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|السَّلَامُ عَلَيْكُمْ يَا أَهْلَ بَيْتِ النُّبُوَّةِ وَ مَوْضِعَ الرِّسَالَةِ وَ مُخْتَلَفَ الْمَلَائِكَةِ وَ مَهْبِطَ الْوَحْيِ وَ مَعْدِنَ الرَّحْمَةِ... وَ أَعْلَامِ التُّقَى... وَ حُجَجِ اللَّهِ عَلَى أَهْلِ الدُّنْيَا وَ الْآخِرَةِ وَ الْأُولَى... وَ أَنْتُمْ نُورُ الْأَخْيَارِ وَ هُدَاةُ الْأَبْرَارِ... وَ لَكُمُ الْمَوَدَّةُ الْوَاجِبَةُ وَ الدَّرَجَاتُ الرَّفِيعَةُ وَ الْمَقَامُ الْمَحْمُودُ وَ الْمَقَامُ الْمَعْلُومُ عِنْدَ اللَّهِ عَزَّ وَ جَلَّ وَ الْجَاهُ الْعَظِيمُ وَ الشَّأْنُ الْكَبِيرُ}}.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله ابراهیم‌زاده آملی|ابراهیم‌زاده آملی، عبدالله]]، [[امامت و رهبری - ابراهیم‌زاده آملی (کتاب)| امامت و رهبری]]، ص:۲۸-۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام فرهنگی اسلام]]====&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام اخلاقی اسلام]]====&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام سیاسی اسلام]]====&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امامت در نظام اقتصادی اسلام]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===اهمیت امامت در [[قیامت]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==سوم: [[غایت امامت]] ([[چرایی امامت]]) ==&lt;br /&gt;
{{اصلی|چرایی امامت}}&lt;br /&gt;
* [[چرایی امامت]] در دو سطح قابل بررسی است:&lt;br /&gt;
# [[غایت امامت]]: والاترین و نهایی ترین [[هدف الهی از تعیین امام]] (رسیدن [[بشر]] به [[مقام خلافت الهی]] که در خود [[امام]] با [[تربیت الهی]] صورت می‌گیرد و در غیر [[امام]] با [[تربیت امام]] و [[تبعیت از امام|تبعیت از او]] حاصل می‌گردد)؛&lt;br /&gt;
# [[حکمت امامت]]: به معنای بیان اهداف و [[راهبردهای کلان]] [[الهی]] ([[چرایی فعل خدا در جعل امامت]])، شمردن [[شؤون]] ([[جایگاه ها]] و [[مقامات]]) و همچنین تشریح [[وظایف]] ([[رسالت ها]] و [[مأموریت ها]]) و [[کارکردهای امام]] و [[کارکردهای امامت|نظام امامت]] ([[فواید امامت|فواید]] و [[منافع مترتب بر جعل امامت|منافع مترتب بر جعل]] و [[منافع مترتب بر پیاده‌سازی امامت|پیاده‌سازی امامت]]).&lt;br /&gt;
*در [[روایات]] از امامت، به عنوان [[غایت خلقت]] تعبیر شده است؛ به گونه‌ای که اگر لحظه‌ای [[زمین]] از [[امام]] خالی باشد، بر اهلش [[خشم]] خواهد نمود و آنان را در کام خود فرو خواهد برد &amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|لَوْ بَقِيَتِ الْأَرْضُ بِغَيْرِ إِمَامٍ لَسَاخَتْ‏}}؛ اصول کافی، ج۱، ص۱۳۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از این [[روایت]] و نظایر آن به دست می‌آید که [[سرنوشت]] [[زندگی]] [[انسان]] و سایر جانداران در [[زمین]] به [[وجود امام]] بستگی دارد؛ یعنی از زمانی که در [[زمین]] [[حیات]] وجود داشته، [[امام]] نیز بوده است و تا هنگامی‌ که [[زندگی]] جریان دارد، [[امام]] نیز وجود خواهد داشت. بر این اساس، [[امام]] در [[نظام خلقت]] نقش علیت دارد. علیت [[امام]] در [[نظام طبیعت]] و در سطحی فراتر در [[نظام خلقت]]، به دو گونه فاعلی و غایی امکان پذیر است؛ یعنی [[وجود امام]] در سلسله علل فاعلی و غایی [[جهان]] قرار دارد، هر چند علة العلل در هر دو سلسله [[خداوند متعال]] است. بدین جهت است که درباره [[امام مهدی|امام عصر]]{{ع}} آمده است: &amp;quot;بقای [[دنیا]] به بقای [[امام عصر]]{{ع}} است، و به یُمن و [[برکت]] او موجودات روزی داده می‌شوند و به واسطه وجود او [[زمین]] و [[آسمان]] پابرجاست&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث| الَّذِي بِبَقَائِهِ بَقِيَتِ الدُّنْيَا وَ بِيُمْنِهِ رُزِقَ الْوَرَى وَ بِوُجُودِهِ ثَبَتَتِ الْأَرْضُ وَ السَّمَاء‏}}؛ دعای عدیله.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[صدرالمتألهین]] در شرح این گونه [[احادیث]] گفته است: [[خداوند سبحان]] موجودات را با تفاوت درجات و مراتبی که از نظر [[برتری]] و [[پست]] تری دارند آفرید. پایین‌ترین مرتبه موجودات مواد عنصری [[زمین]] است که دورترین فاصله را از [[لطافت]] وجودی دارد، اما قابلیت تحول و [[تکامل]] وجودی را دارد. [[اراده]] حکیمانه [[خداوند]] اقتضا کرده است که این مواد عنصری، مسیر [[تکامل]] را طی کرده و به غایات وجودی خود &amp;quot;مرتبه بالاتر وجود&amp;quot; برسند. بر این اساس، در مسیر [[تکامل]] موجودات که از طریق علت غایی تحقق می‌یابد هر موجودی که مرتبه بالاتر دارد علت غایی موجود پایین‌تر است. بدین ترتیب، [[زمین]] را برای گیاه آفرید و گیاه را برای حیوان و حیوان را برای [[انسان]]، و از آنجا که در میان افراد [[انسان]] نیز مراتب کمال و [[نقص]] وجود دارد، [[کامل‌ترین]] [[انسان]] را [[غایت]] وجود انسان‌های دیگر قرار داد که در [[حقیقت]] [[غایت]] همه موجوداتی است که در مرتبه پایین‌تر از [[انسان]] قرار دارند. او همان [[انسان کامل]] است که در مرتبه امامت است، او [[جانشین]] [[خداوند]] در [[زمین]] است و چون وجود چیزی بدون [[غایت]] آن محال است، وجود [[جهان]] بدون [[وجود امام]] ناممکن خواهد بود&amp;lt;ref&amp;gt;شرح اصول کافی، ص۴۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==چهارم: [[صفات امام]] ([[شروط امامت]])==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|صفات امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|عصمت امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|علم خدادادی}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
===شروط عام===&lt;br /&gt;
===شروط خاص===&lt;br /&gt;
====شرط اول: [[نصب الهی امام]] ([[اصطفاء]])====&lt;br /&gt;
====شرط دوم: [[علم ویژه الهی]] ([[علم لدنی]])====&lt;br /&gt;
* [[امامان]]{{عم}} [[حق]] که [[مسئولیت]] خطیر [[هدایت]] [[مردم]] به [[سعادت]] و کمال و [[مدیریت جوامع انسانی]] را بر عهده دارند، باید از [[دانش]] گسترده برخوردار باشند، تا بتوانند این [[مسئولیت]] را به انجام رسانند، افزون بر این لازم است [[علم]] آنان از [[خطا]] و [[شک]] مصون باشد، تا [[مردم]] بتوانند به آنان [[اعتماد]] کنند و [[هدایت]] ایشان را پذیرفته و تحت [[حاکمیت]] آنان به اهداف مادی و [[معنوی]] خود برسند، ازاین‌رو [[خداوند]] [[طالوت]] را با [[برتری در دانش]] و نیروی جسمانی برای [[حاکمیت]] بر [[بنی‌اسرائیل]] برگزید: {{متن قرآن|إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُ بَسْطَةً فِي الْعِلْمِ وَالْجِسْمِ}} &amp;lt;ref&amp;gt; خداوند او را بر شما برگزیده و بر گستره دانش و (نیروی) تن او افزوده است؛ سوره بقره، آیه:  ۲۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و نیز [[اولواالامر]] را [[مرجع]] [[علمی]] [[مسلمانان]] در تشخیص [[حق و باطل]] و [[صدق]] و [[کذب]] معرفی کرد و به آنان [[فرمان]] داد تا در هنگام دریافت گزارشها به [[اولواالامر]] به عنوان صاحبان [[آگاهی]] و [[قدرت]] تشخیص مراجعه کنند تا با [[استنباط]] [[حق]] و [[صدق]]، آنان را [[آگاه]] سازند: {{متن قرآن|وَإِذَا جَاءَهُمْ أَمْرٌ مِّنَ الأَمْنِ أَوِ الْخَوْفِ أَذَاعُواْ بِهِ وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى الرَّسُولِ وَإِلَى أُولِي الأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ الَّذِينَ يَسْتَنبِطُونَهُ مِنْهُمْ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و هنگامی که خبری از ایمنی یا بیم به ایشان برسد آن را فاش می‌کنند و اگر آن را به پیامبر یا پیشوایانشان باز می‌بردند کسانی از ایشان که آن را در می‌یافتند به آن پی می‌بردند؛ سوره نساء، آیه: ۸۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مقصود از [[اولواالامر]] در این [[آیه]] همان کسانی هستند که در [[آیه]] ۵۹ [[سوره]] [[نساء]] به آنان اشاره شده و [[حکم]] ایشان در [[عصمت]] و وجوبِ [[اطاعت]] مانند [[پیامبر|رسول خداست]]{{صل}} &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۵، ص ۲۲؛ ج ۴، ص ۳۸۷ ـ ۳۹۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;. و مصادیق آن بر اساس [[روایات]]، [[امامان]]اند{{عم}}&amp;lt;ref&amp;gt;روض‌الجنان،ج۶، ص۳۵؛ همان، ج۴، ص۳۸۷ـ ۳۹۱؛ ج ۵، ص ۲۳ ـ ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; با توجه به اینکه [[آیه]]، [[اولواالامر]] را [[آگاه]] به ریشه مسائل معرفی کرده به‌گونه‌ای که اگر دیگران به آنان مراجعه کنند راهنماییشان می‌کنند، استفاده می‌شود که [[علم]] آنان آمیخته به [[جهل]] و [[شک]] و [[خطا]] نیست و این در مورد غیر [[معصومان]] [[صدق]] نمی‌کند، افزون بر این از ذیل [[آیه]] فهمیده می‌شود که وجود [[اولواالامر]] نوعی [[فضل]] و [[رحمت الهی]] است که اطاعتشان [[مردم]] را از [[پیروی]] [[شیطان]] باز می‌دارد: {{متن قرآن|وَلَوْلاَ فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ لاَتَّبَعْتُمُ الشَّيْطَانَ إِلاَّ قَلِيلاً}} &amp;lt;ref&amp;gt; و اگر بخشش و بخشایش خداوند بر شما نمی‌بود (همه) جز اندکی، از شیطان پیروی می‌کردید؛ سوره نساء، آیه:  ۸۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و تنها [[پیروی]] از [[معصومان]] می‌تواند [[انسان]] را از [[گمراهی]] و [[پیروی]] [[شیطان]] به طور قطع باز دارد، زیرا غیر [[معصوم]] ممکن است خود گرفتار [[لغزش]] و [[خطا]] شود&amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱۲، ص ۲۵۹، ۲۸۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از دیگر آیاتی که [[علم امام]]{{ع}} از آن استفاده می‌شود [[آیه]] {{متن قرآن|وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلاَّ رِجَالاً نُّوحِي إِلَيْهِمْ فَاسْأَلُواْ أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لاَ تَعْلَمُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و ما پیش از تو جز مردانی را که به آنها وحی می‌کردیم نفرستادیم؛ اگر نمی‌دانید از اهل کتاب (آسمانی) بپرسید؛ سوره نحل، آیه: ۴۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و {{متن قرآن|وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلاَّ رِجَالاً نُّوحِي إِلَيْهِمْ فَاسْأَلُواْ أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لاَ تَعْلَمُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و پیش از تو جز مردانی را که به آنها وحی می‌کردیم نفرستادیم، اگر نمی‌دانید از اهل کتاب  بپرسید؛ سوره انبیاء، آیه: ۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; است که براساس آن باید [[انسان‌ها]] اموری را که نمی‌دانند از [[اهل ذکر]] بپرسند. گرچه مضمون [[آیه]] عام و [[ارشاد]] به اصلی عقلایی یعنی [[وجوب]] [[رجوع]] [[جاهل]] به [[اهل خبره]] است &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱۲، ص ۲۵۹، ۲۸۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ ولی [[کامل‌ترین]] مصداق «[[اهل ذکر]]» [[امامان]]{{عم}} هستند  &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج۱۲، ص۲۸۵؛ پيام قرآن، ج۹، ص ۱۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، چنان‌که در [[روایات]] فراوانی نیز آمده است که مقصود از [[اهل ذکر]] [[ائمه‌]]اند{{عم}} &amp;lt;ref&amp;gt;روض‌الجنان، ج ۱۳، ص ۲۰۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[آیات]] دیگری نیز با تعبیراتی نظیر [[راسخان در علم]]: {{متن قرآن|وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و استواران در دانش؛ سوره آل عمران، آیه: ۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;الكافى،ج۱، ص۲۱۳؛ نورالثقلين، ج۱، ص۳۱۵ ـ ۳۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;، کسی که [[علم کتاب]] نزد اوست: {{متن قرآن|وَمَنْ عِندَهُ عِلْمُ الْكِتَابِ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و کسی که دانش کتاب نزد اوست؛ سوره رعد، آیه: ۴۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع‌البيان، ج ۶، ص ۴۶۲؛ نورالثقلين، ج ۲، ص۵۲۱ ـ ۵۲۴؛ الميزان، ج۱۱، ص۳۸۷ ـ ۳۸۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; و کسانی که به آنان [[علم]] داده شده: {{متن قرآن|بَلْ هُوَ آيَاتٌ بَيِّنَاتٌ فِي صُدُورِ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; اما آن (قرآن) آیاتی روشن است در سینه کسانی که به آنان دانش داده‌اند؛ سوره عنکبوت، آیه: ۴۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;الكافى، ج ۱، ص ۲۱۳ ـ ۲۱۴؛ مجمع‌البيان، ۸، ص ۴۵۱؛ الميزان، ج ۱۶، ص ۱۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; به عالمانی اشاره شده که مصادیق کامل آنها [[امامان]]{{عم}} هستند. شایان ذکر است که بر پایه [[روایات]] فراوانی از [[امامان]]{{عم}} آنان به [[غیب]] و همه علومی که در [[اختیار]] [[فرشتگان]]، [[پیامبران]] و [[رسولان]] قرار گرفته عالم‌اند &amp;lt;ref&amp;gt;الكافى، ج ۱، ص ۲۵۵ ـ ۲۵۶؛ الميزان، ج ۱۸، ص ۱۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[علم]] آنان دارای منابع فراوانی است؛ مانند: [[تحدیث]] و [[الهام]]، [[وراثت]] از [[پیامبر|پیامبر اکرم]]{{صل}} و [[امام]]{{ع}} پیش از خود، [[جفر]] و [[جامعه]]، [[مصحف فاطمه]]{{س}} و [[صحیفه امیرمؤمنان]]، [[امام علی]]{{ع}} &amp;lt;ref&amp;gt; الكافى، ج ۱، ص ۱۷۶، ۲۷۰، ۲۲۳، ۲۳۱، ۲۳۸ـ ۲۴۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
====شرط سوم: [[عصمت]]====&lt;br /&gt;
* بر اساس آموزه‌های [[قرآن]]، [[امام]]{{ع}} دارای ویژگی‌هایی است که مهم‌ترین آنها [[عصمت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[خدای سبحان]] در پاسخ [[حضرت ابراهیم]]{{ع}} که از [[خدا]] خواست تا امامت را در ذرّیه او قرار دهد فرمود: [[عهد]] من به [[ظالمان]] نمی‌رسد: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ }} &amp;lt;ref&amp;gt; پیمان من به ستمکاران نمی‌رسد؛ سوره بقره، آیه: ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[مفسران]] با استناد به این [[آیه]] [[عصمت]] را برای [[امام]]{{ع}} لازم می‌دانند و [[لزوم]] [[عصمت]] را این‌گونه [[تبیین]] می‌کنند که [[امام]]{{ع}} [[مقتدا]] و [[رهبری]] است که اقتدای به او [[واجب]] است و اگر [[امام]]{{ع}} [[معصیت]] کند بر [[آدمیان]] نیز از باب [[لزوم اطاعت]] از [[امام]]{{ع}}، [[معصیت]] [[واجب]] خواهد بود و این امر محال است، زیرا [[معصیت]] [[ممنوع]] است و جمع فعل و ترک غیر ممکن است، ازاین‌رو [[عصمت]] در [[امامان]]{{عم}} لازم است تا این محذور پیش نیاید&amp;lt;ref&amp;gt;التفسيرالكبير، ج۴، ص ۳۶ ـ ۳۷، ج ۱۰، ص ۱۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; ناگفته نماند که [[آیه]] بر [[عصمت امام]]{{ع}} در طول [[حیات]] و تمام [[عمر]] دلالت می‌کند بنابراین کسی که در قسمتی از [[عمر]] خود گرفتار [[فسق]] یا [[شرک]] باشد [[شایستگی]] [[مقام امامت]] را نخواهد داشت &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱، ص ۲۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;. نیز [[خداوند]] در {{متن قرآن|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اتَّقُواْ اللَّهَ وَكُونُواْ مَعَ الصَّادِقِينَ }} &amp;lt;ref&amp;gt; ای مؤمنان! از خداوند پروا کنید و با راستگویان باشید!؛ سوره توبه، آیه: ۱۱۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; از [[مؤمنان]] می‌خواهد، [[تقوای الهی]] را پیشه ساخته و به طور مطلق &amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج ۹، ص ۴۰۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; با [[صادقان]] باشند: {{متن قرآن|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اتَّقُواْ اللَّهَ وَكُونُواْ مَعَ الصَّادِقِينَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; ای مؤمنان! از خداوند پروا کنید و با راستگویان باشید!؛ سوره توبه، آیه: ۱۱۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; بی‌تردید لازمه [[همراهی]] مطلق با آنان، [[عصمت]] آنهاست&amp;lt;ref&amp;gt; التفسيرالكبير، ج ۱۶، ص ۲۲۱؛ پيام قرآن، ج ۹، ص ۵۰؛ حق‌اليقين، ص ۵۴ ـ ۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین در {{متن قرآن|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ أَطِيعُواْ اللَّهَ وَأَطِيعُواْ الرَّسُولَ وَأُولِي الأَمْرِ مِنكُمْ }} &amp;lt;ref&amp;gt; ای مؤمنان، از خداوند فرمان برید و از پیامبر و زمامدارانی که از شمایند فرمانبرداری کنید؛ سوره نساء، آیه: ۵۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[اطاعت]] از [[اولواالامر]] در ردیف [[اطاعت]] [[پیامبر]]{{صل}} و [[اطاعت]] [[پیامبر]]{{صل}} در ردیف [[اطاعت]] [[خدای متعال]] قرار گرفته است و چون [[اطاعت خدا]] به صورت مطلق [[واجب]] است بنابراین، [[اطاعت]] [[پیامبر]]{{صل}} و [[اولواالامر]] نیز به طور مطلق [[واجب]] است و لازمه [[وجوب]] اطاعتِ مطلق، [[عصمت]] است &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۴، ص ۳۸۹ ـ ۳۹۱؛ حق اليقين، ص ۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; دلالت [[آیه]] بر [[عصمت]] چنان واضح و روشن است که برخی از [[اهل سنت]] نیز نتوانسته‌اند آن را [[انکار]] کنند، گرچه مصداق [[اولواالامر]] در نظر آنان، [[اهل حلّ و عقد]] از امت‌اند که مجموع آنان ـ به شرط [[اجتماع]] ـ [[خطا]] نمی‌کنند  &amp;lt;ref&amp;gt;التفسير الكبير، ج ۱۰، ص ۱۴۴؛ التفسير المنار، ج ۵، ص ۲۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ ولی چون [[اهل حل و عقد]] کسانی‌اند که ممکن است مرتکب [[خطا]] بشوند از [[عصمت]] بهره‌ای ندارند و نمی‌تواند مراد [[آیه]] [[اهل حل و عقد]] باشد&amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۴، ص ۳۹۲ ـ ۳۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====شرط چهارم: [[افضلیت]]====&lt;br /&gt;
=====[[امامت افضل]] یا [[امامت مفضول]]؟=====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پنجم: [[تعیین امام]]==&lt;br /&gt;
===[[راه تعیین امام]]===&lt;br /&gt;
====[[نصب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[انتخاب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[غلبه]] و [[استیلا]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اثبات امامت]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[قلمرو امامت]]==&lt;br /&gt;
===[[امامت شأنی]]===&lt;br /&gt;
===[[امامت فعلی]]===&lt;br /&gt;
====[[امامت صامت]]====&lt;br /&gt;
====[[امامت ناطق]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اثبات امامت]] ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==زمینه‌های [[جعل امامت]]==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|صبر امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|یقین امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|ابتلای امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|بندگی امام}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|هدایتگری امام}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
* [[جعل امامت]] منوط به وجود زمینه‌هایی است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[صبر]] و [[شکیبایی:]]&#039;&#039;&#039; [[هدایت]] [[انسان‌ها]] به [[توحید]] و به ثمر رساندن آن، با دشواری‌هایی همراه است، از این رو برای عهده‌داری این امر خطیر، باید امامت به کسی سپرده شود که از [[مشکلات]] نهراسد و با [[شکیبایی]] این بار سنگین را به مقصد برساند&amp;lt;ref&amp;gt; نمونه، ج ۱۷، ص ۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا }} &amp;lt;ref&amp;gt; برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم که به فرمان ما (مردم را) رهنمایی می‌کردند؛ سوره سجده، آیه: ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[یقین معصوم|یقین به آیات الهی:]]&#039;&#039;&#039; [[انسانی]] که به [[آیات الهی]] [[یقین]] دارد در کار [[هدایت]] [[امت]] موفق است و می‌تواند با نیروی [[یقین]] خط [[هدایت به امر الهی]] را تداوم بخشد&amp;lt;ref&amp;gt; نمونه، ج ۱۷، ص ۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يُوقِنُونَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و چون شکیب ورزیدند و به آیات ما یقین داشتند برخی از آنان را پیشوایانی گماردیم که به فرمان ما (مردم را) رهنمایی می‌کردند؛ سوره سجده، آیه: ۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، چنانکه [[حضرت ابراهیم]]{{ع}} ابتدا برای دستیابی به [[یقین]]، از [[رؤیت ملکوت]] بهره‌مند شد: {{متن قرآن|وَكَذَلِكَ نُرِي إِبْرَاهِيمَ مَلَكُوتَ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ الْمُوقِنِينَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; و این‌گونه ما گستره  آسمان‌ها و زمین را به ابراهیم می‌نمایانیم و (چنین می‌کنیم) تا از باورداران گردد؛ سوره انعام، آیه: ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; و پس از رسیدن به [[مقام]] [[یقین]] و تحقق به کلمات اللّه امامت به او اعطا گردید&amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱، ص ۲۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} &amp;lt;ref&amp;gt; و (یاد کن) آنگاه را  که پروردگار ابراهیم، او را با کلماتی  آزمود و او آنها را به انجام رسانید؛ فرمود: من تو را پیشوای مردم می‌گمارم؛ سوره بقره، آیه: ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[ابتلای معصوم|موفقیت در آزمونهای الهی:]]&#039;&#039;&#039;امامت زمانی به [[حضرت ابراهیم]]{{ع}} عطا شد که [[خدای متعال]] او را به انواع [[ابتلائات]]، از جمله [[ذبح فرزند]] آزمود و او در همه آنها [[پیروز]] گردید&amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱، ص ۲۶۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[بندگی معصوم|عبودیت تام:]]&#039;&#039;&#039; کسانی که [[مقام امامت]] به آنان داده شده در [[عبودیت الهی]] [[استمرار]] داشته و با [[عبادت]] ملازم بوده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;المیزان، ج ۱۴، ص ۳۰۴ ـ ۳۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|كَانُوا لَنَا عَابِدِينَ}} &amp;lt;ref&amp;gt; آنان پرستندگان ما بودند؛ سوره انبیاء، آیه: ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، چنانکه بر پایه برخی [[احادیث]] [[خدای متعال]] [[ابراهیم]] را قبل از هرچیز [[عبد]] خود قرار داد و پس از آن [[مقام امامت]] را به او عطا کرد&amp;lt;ref&amp;gt;الكافى، ج ۱، ص ۱۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[هدایت معصوم|هدایت یافتگی بدون واسطه:]]&#039;&#039;&#039; [[رسالت]] اساسی [[امام]]{{ع}} [[هدایت]] است و ازاین‌رو در صورتی می‌تواند دیگران را [[هدایت]] کند که خود به طور مستقیم و بدون واسطه از [[ناحیه]] [[خدا]] [[هدایت]] شده باشد &amp;lt;ref&amp;gt;الميزان، ج ۱، ص ۲۷۲ ـ ۲۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لاَّ يَهِدِّيَ إِلاَّ أَن يُهْدَى}} &amp;lt;ref&amp;gt; آیا آنکه به حقّ رهنمون می‌گردد سزاوارتر است که پیروی شود یا آنکه راه نمی‌یابد مگر آنکه راه برده شود؟؛ سوره یونس، آیه: ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; براساس روایاتی در ذیل این [[آیه]] [[پیامبران]] و [[امامان]] [[هدایت]] یافتگان‌اند&amp;lt;ref&amp;gt; نورالثقلين، ج ۲، ص ۳۰۳ ـ ۳۰۴؛ الميزان، ج ۱۰، ص ۵۶ ـ ۵۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹ - ۲۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[مسئولیت‌های امامت]] ([[شؤون امام|شؤون]] و [[وظایف امام]])==&lt;br /&gt;
===[[مرجعیت علمی]] و [[مرجعیت دینی]]===&lt;br /&gt;
* [[نقل دین]]&lt;br /&gt;
* [[حفظ دین]]&lt;br /&gt;
* [[تبیین معارف دینی]]&lt;br /&gt;
===[[رهبری اجتماع]] ([[ولایت امر]])===&lt;br /&gt;
===[[ولایت باطنی]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[کارکردهای امامت]] ==&lt;br /&gt;
{{اصلی|کارکردهای امامت}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امامت در کودکی]]==&lt;br /&gt;
==دوران‌های امامت==&lt;br /&gt;
# دوره حضور؛&lt;br /&gt;
# دوره [[غیبت]]؛&lt;br /&gt;
# دوره [[ظهور]]؛&lt;br /&gt;
# دوره [[رجعت]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==سال‌شمار امامت [[امامان دوازده‌گانه]]==&lt;br /&gt;
==فهرست مباحث امامت==&lt;br /&gt;
{{پرسش‌های وابسته}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
===واژه‌شناسی و [[تعریف امامت]]===&lt;br /&gt;
* تعریف لغوی امامت‏؛&lt;br /&gt;
* کاربردهای [[امام در قرآن]]‏؛&lt;br /&gt;
* تعریف‏‌های [[متکلمان]] اسلامی‏؛&lt;br /&gt;
* الف) تعریف‏‌های عام‏؛&lt;br /&gt;
* ب) تعریف‏‌های خاص‏؛&lt;br /&gt;
*تعریف عام امامت؛&lt;br /&gt;
*تعریف خاص امامت؛&lt;br /&gt;
*معنای لغوی [[امام]]؛&lt;br /&gt;
*معنای اصطلاحی [[امام]]؛&lt;br /&gt;
* امامت از منظر [[اهل‌بیت]]&lt;br /&gt;
* امامت از منظر [[امامیه]]&lt;br /&gt;
* امامت از نظر [[اهل تسنن]]&lt;br /&gt;
* [[خلافت]] و [[بیعت]]؛&lt;br /&gt;
* امامت و سکولاریزم؛&lt;br /&gt;
*نسبت [[خلافت]] با امامت؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===اهمیت و [[جایگاه امامت]]===&lt;br /&gt;
* [[قرآن]] و [[جایگاه]] امامت‏؛&lt;br /&gt;
* [[جایگاه امامت در احادیث اسلامی]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[جایگاه امامت]] از منظر تاریخی‏.&lt;br /&gt;
====[[جایگاه امام]] در [[عقاید شیعه]]====&lt;br /&gt;
# [[امام]] [[حجت خدا]] و [[پرچم هدایت]]؛&lt;br /&gt;
# [[رهبری سیاسی]] و [[رهبری حکومتی|حکومتی]] [[امام]] در [[جامعه]]؛&lt;br /&gt;
# [[امام]] [[الگوی امت]]؛&lt;br /&gt;
# [[امام]] [[بیان‌کننده قرآن]] و [[بیان‌کننده معارف اسلامی|معارف اسلامی]]؛&lt;br /&gt;
* [[درجات ولایت تکوینی]]؛&lt;br /&gt;
* [[فلسفه ولایت تکوینی]]؛&lt;br /&gt;
* [[نقش امام در هدایت باطنی]] [[انسان]]؛&lt;br /&gt;
* [[ارائه اعمال امت به امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[نقش امام در نظام زمین]]؛&lt;br /&gt;
* [[نقش امام در نظام جهان هستی]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===مراتب و [[شؤون امام]] و امامت===&lt;br /&gt;
===[[وظایف امام]]===&lt;br /&gt;
===[[فلسفه امامت]]===&lt;br /&gt;
* بخش نخست: [[فلسفه امامت]] از دیدگاه [[اهل سنت]]‏؛&lt;br /&gt;
:۱. [[معتزله]] و [[فلسفه امامت‏]]؛&lt;br /&gt;
:۲. [[ماتریدیه]] و [[فلسفه امامت‏]]؛&lt;br /&gt;
:۳. [[اشعریه]] و [[فلسفه امامت‏]]؛&lt;br /&gt;
* بخش دوم: [[فلسفه امامت]] از نظر [[امامیه‏]]؛&lt;br /&gt;
:۱. [[حفظ نظام اجتماعی]] [[مسلمانان‏]]؛&lt;br /&gt;
:۲. [[برقراری عدالت اجتماعی]]؛‏&lt;br /&gt;
:۳. [[تکالیف اجتماعی‏]]؛&lt;br /&gt;
:۴. [[اجرای حدود الهی]]؛&lt;br /&gt;
:۵. امامت و [[لطف]]؛‏&lt;br /&gt;
:۶. [[حفظ شریعت]]؛&lt;br /&gt;
:۷. [[بیان تفاصیل شریعت]]‏؛&lt;br /&gt;
====امامت و [[فلسفه خلقت]]====&lt;br /&gt;
* [[انسان کامل]]، [[فلسفه خلقت]] است‏؛&lt;br /&gt;
* [[انسان کامل]] [[خلیفه خداوند در زمین]] است‏؛&lt;br /&gt;
* [[پیامبران]]، [[امام]] و [[خلفای الهی در زمین]] بوده‏اند؛&lt;br /&gt;
* [[خلافت الهی]] و [[امامت بشر]]؛&lt;br /&gt;
* [[استمرار امامت]] و [[استمرار خلافت الهی|خلافت الهی]] پس از [[پیامبران‏]]؛&lt;br /&gt;
* پاسخ به یک اشکال‏.&lt;br /&gt;
* [[فلسفه امامت]] از نگاه [[روایات‏]]:&lt;br /&gt;
** [[روایات نبوی]]‏؛&lt;br /&gt;
** [[روایات اهل بیت]]{{ع}}؛&lt;br /&gt;
* [[مسئولیت‌های اخلاقی]]، [[مسئولیت‌های دینی|دینی]] و [[مسئولیت‌های اجتماعی|اجتماعی]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[مصالح دینی]] و [[مصالح دنیوی|دنیوی]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[نظم]]، [[امنیت]] و [[عدالت اجتماعی‏]]؛&lt;br /&gt;
* [[اجرای احکام]] و [[اجرای حدود الهی|حدود الهی]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[حفظ شریعت]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[اتمام حجت بر مکلفان‏]]؛&lt;br /&gt;
* [[ولایت]] و [[هدایت درونی]]‏؛&lt;br /&gt;
* امامت و [[غایت خلقت]]‏.&lt;br /&gt;
* [[تکامل معنوی]] در پرتو [[نصب امام معصوم]]؛&lt;br /&gt;
* [[حفاظت از دین|حفاظت]] و [[پاسداری از دین]]؛&lt;br /&gt;
* [[لزوم]] [[اتمام حجت]]؛&lt;br /&gt;
* [[زمین هیچ‌گاه خالی از حجت نیست]]؛&lt;br /&gt;
* [[امام]] [[واسطه‌ای میان خدا و خلق]]؛&lt;br /&gt;
* [[پیش‌گیری از انحراف فکری]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[ضرورت امامت]]===&lt;br /&gt;
:۱. [[مذهب امامیه]]‏؛&lt;br /&gt;
:۲. [[مذهب اسماعیلیه]]؛‏&lt;br /&gt;
:۳. [[مذهب زیدیه]]‏؛&lt;br /&gt;
:۴. [[معتزله‏]]؛&lt;br /&gt;
:۵. [[خوارج‏]]؛&lt;br /&gt;
:۶. [[اشاعره]]‏؛&lt;br /&gt;
:۷. [[ماتریدیه‏]]؛&lt;br /&gt;
:۸. [[وهابیت‏]]؛&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;[[دلایل وجوب امامت]]‏:&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
:۱. [[آیه اولی الامر]]؛&lt;br /&gt;
:۲. [[حدیث من مات و لم یعرف امام زمانه]]...؛&lt;br /&gt;
:۳. [[سیره مسلمانان‏]]؛&lt;br /&gt;
:۴. [[اجرای حدود]] و [[حفظ نظام اسلامی]]‏؛&lt;br /&gt;
:۵. [[وجوب دفع ضررهای عظیم‏]].&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;[[قاعده لطف]] و [[وجوب امامت‏]]:&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
* تعریف و اقسام [[لطف]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[لطف]] و [[حکمت الهی‏]]؛&lt;br /&gt;
* فاعل [[لطف]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[برهان لطف]] بر [[وجوب امامت]]‏؛&lt;br /&gt;
*خودسری، رمز سقوط فرد و [[جامعه]]؛&lt;br /&gt;
* [[عدالت اجتماعی]]؛&lt;br /&gt;
* [[استقلال]]، [[آزادی]] و [[امنیت]]؛&lt;br /&gt;
* [[حاکمیت نظم]] و [[حاکمیت قانون|قانون]].&lt;br /&gt;
* [[قاعده لطف]] و [[وجوب امامت]]؛&lt;br /&gt;
**تعریف [[لطف]]؛&lt;br /&gt;
** [[دلیل]] [[وجوب]] [[لطف]] بر [[خداوند]]؛&lt;br /&gt;
** [[لطف امامت]]؛&lt;br /&gt;
====[[ضرورت]] [[شناخت امام]]====&lt;br /&gt;
* [[اعتقاد به خداوند]]، ملازم [[شناخت امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[رهایی از ضلالت]] و [[رهایی از گمراهی|گمراهی]]؛&lt;br /&gt;
* [[نصب امام]] بر عهده ی کیست؟&lt;br /&gt;
* [[نصب امام]] از [[افعال الهی]] است؛&lt;br /&gt;
* [[خدا]] و [[رسول]]، منشأ [[شناسایی امام]]؛&lt;br /&gt;
*او کجا و [[انتخاب]] [[بشر]]؟!&lt;br /&gt;
* [[میزان اطاعت از امام]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[صفات امام|صفات]] و [[ویژگی‌های امام]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[شرایط امامت|شرایط]] و [[بایستگی‌های امامت]]===&lt;br /&gt;
* [[قریشی بودن امام]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[پارسایی]] و [[عدالت‏]]؛&lt;br /&gt;
* [[دانایی]] و [[کفایت]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[شیعه امامیه]] و [[علم امام]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[معتزله]] و [[علم امام]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[اشعریه]] و [[علم امام]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[ماتریدیه]] و [[علم امام]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[زیدیه]] و [[علم امام]]؛‏&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== نخست: [[عصمت امام]]====&lt;br /&gt;
* [[حقیقت عصمت|حقیقت]] و معنای [[عصمت]]؛&lt;br /&gt;
* [[خاستگاه عصمت]]؛&lt;br /&gt;
* [[عصمت علمی‏]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[دلایل عصمت ائمه]]{{عم}}:&lt;br /&gt;
# ۱. [[دلایل نقلی]]؛&lt;br /&gt;
# [[آیه امامت]]؛&lt;br /&gt;
# [[آیه اطاعت]]؛&lt;br /&gt;
# [[آیه تطهیر]]؛&lt;br /&gt;
# [[آیه ابتلای ابراهیم]]{{ع}}؛&lt;br /&gt;
# [[آیه اولی الامر]]؛&lt;br /&gt;
* [[آیه صادقین]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[دلایل عقلی]]؛&lt;br /&gt;
** [[برهان]] [[امتناع]] تسلسل‏؛‏&lt;br /&gt;
** [[برهان حفظ شریعت]]؛&lt;br /&gt;
** [[پیامدهای معصوم نبودن امام‏]]؛&lt;br /&gt;
** [[ضرورت امام معصوم]]؛&lt;br /&gt;
** [[مقام]] [[عقل]] در [[استنباط]] [[احکام شرعی]]؛&lt;br /&gt;
** [[نیاز به امام معصوم در عصر غیبت]]؛&lt;br /&gt;
**معنای [[گناه پیامبران]]؛&lt;br /&gt;
**عوامل مؤثر در دوری از [[گناه]] و [[معصیت]]:&lt;br /&gt;
# ۱. [[عذاب]]؛&lt;br /&gt;
# ۲. [[بهشت]] و درجات آن؛&lt;br /&gt;
# ۳. دوری از [[رحمت]] و [[رضای الهی]]؛&lt;br /&gt;
# ۴. هشدارهای [[دنیایی]].&lt;br /&gt;
** [[عدم عصمت امام]]، مقتضی [[لزوم]] [[تسلسل]]؛&lt;br /&gt;
** [[امام]] [[پاسدار احکام شرع]]؛&lt;br /&gt;
** [[عصمت]] ملازم با [[اطاعت از امام]]؛&lt;br /&gt;
** [[فقدان عصمت]]، منافی با [[افضلیت امام]]؛&lt;br /&gt;
** [[برتری امام]] نسبت به دیگران؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== دوم: [[علم امام]]====&lt;br /&gt;
* [[علم]] و [[بصیرت]]؛&lt;br /&gt;
* [[چگونگی علم امام]]؛&lt;br /&gt;
*دلایلی [[نقلی]] بر [[علم حضوری امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[آیات]]؛&lt;br /&gt;
* [[روایات]]؛&lt;br /&gt;
*دیدگاه [[نهج‌البلاغه]] درباره [[علم امامان]]؛&lt;br /&gt;
* [[اهل بیت]] [[معدن‌های علوم]] و [[گنجینه‌های رحمان]]؛&lt;br /&gt;
* [[امامان]]، [[استوانه‌های دین]] و [[چشمه‌های دانش]] و [[چشمه‌های حکمت|حکمت]]؛&lt;br /&gt;
* [[ائمه اطهار]]، [[قرآن ناطق]]‌اند؛&lt;br /&gt;
*چگونه از راه روشن بازتان می‌‌گردانند؟&lt;br /&gt;
# [[علم امام]]&lt;br /&gt;
*معنای لغوی [[غیب]]؛&lt;br /&gt;
* [[غیب]] در اصطلاح کتاب و [[سنت]]؛&lt;br /&gt;
* [[علم غیب ذاتی]]، ویژه [[خدا]]؛&lt;br /&gt;
* [[خاستگاه علوم غیبی]]:&lt;br /&gt;
# [[ابعاد دانش غیبی]] و [[گستره علم الکتاب]]؛&lt;br /&gt;
# [[شرایع آسمانی]]؛&lt;br /&gt;
# گذشته و [[آینده]]؛&lt;br /&gt;
# زمان [[مرگ]] و [[پیشامدهای ناگوار]]؛&lt;br /&gt;
# [[رازهای پنهان]] و [[اسرار درونی آدمیان]]؛&lt;br /&gt;
# [[زبان همه آدمیان]]؛&lt;br /&gt;
# [[زبان حیوانات]]؛&lt;br /&gt;
* [[چگونگی آگاهی معصومان از امور غیبی]]:&lt;br /&gt;
# مطلق و بدون شرط؛&lt;br /&gt;
# وابسته به [[مشیت]] و [[اراده]]؛&lt;br /&gt;
* [[بداء]] و رابطه آن با [[علم غیب]]؛&lt;br /&gt;
* [[علم غیب]] و میدان عمل؛&lt;br /&gt;
* فرق [[امام]] و [[پیامبر]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== سوم: [[پاکزادی امام]]====&lt;br /&gt;
* [[پاکزادی]]؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== چهارم: [[عدالت امام]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== پنجم: [[افضلیت امام]]====&lt;br /&gt;
* [[شیعه امامیه]] و [[افضلیت امام‏]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[قلمرو افضلیت]]‏؛‏&lt;br /&gt;
* [[امامت مفضول]] [[قبیح]] است‏؛‏&lt;br /&gt;
* بررسی اشکالات‏؛‏&lt;br /&gt;
* نقد و نظر؛‏&lt;br /&gt;
* [[قرآن]] و [[افضلیت امام‏]]؛‏&lt;br /&gt;
* نقد و نظر؛‏&lt;br /&gt;
* [[برتری اخروی‏]]؛‏&lt;br /&gt;
:۱. [[عصمت]] و [[افضلیت]]‏؛‏&lt;br /&gt;
:۲. [[تکلف]] سنگین‌تر و [[پاداش]] بیش‌تر؛‏&lt;br /&gt;
:۳. [[امام]]، [[حجت خداوند بر بشر]] است‏؛‏&lt;br /&gt;
:۴. [[تعظیم]] ویژه، مستلزم [[افضلیت]] است‏؛‏&lt;br /&gt;
:۵. [[برتری در کمالات]]، مستلزم [[برتری در پاداش]] است‏؛‏&lt;br /&gt;
* [[اشاعره]] و [[افضلیت امام]]‏؛‏&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[تعیین امامت]]===&lt;br /&gt;
* [[انتصاب]] و [[انتخاب]]&lt;br /&gt;
* [[اثبات نظریه انتصاب شیعه]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[راه تعیین امام]] از دیدگاه [[مذاهب اسلامی]]====&lt;br /&gt;
* [[نص]] و [[معجزه]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[کیسانیه]] و [[نص در امامت]]‏؛&lt;br /&gt;
* بررسی و نقد؛&lt;br /&gt;
* [[بکریه]] و [[نص در امامت‏]]؛&lt;br /&gt;
* [[نص]] و [[دعوت]]؛‏&lt;br /&gt;
* [[نص]] و [[وراثت]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[غلبه]] و [[استیلاء]]؛&lt;br /&gt;
* [[بیعت]] و [[انتخاب]]‏.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[راه تعیین امام]] از [[دیدگاه امامیه]]====&lt;br /&gt;
:۱. [[عصمت امام‏]]؛&lt;br /&gt;
:۲. [[افضلیت امام]]‏؛&lt;br /&gt;
:۳. [[علم گسترده امام‏]]؛&lt;br /&gt;
:۴. [[سیره پیامبر خاتم|سیره پیامبر]]{{صل}}؛&lt;br /&gt;
:۵. [[روش انتخاب]] فاقد [[مشروعیت]] است‏؛&lt;br /&gt;
:۶. [[امام]] [[خلیفه پیامبر]]{{صل}} است، نه [[وکیل مردم‏]]؛&lt;br /&gt;
:۷. [[نظریه انتخاب]] [[اختلاف]] خیز است‏؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[نظریه انتخاب]] در [[تعیین امام]]‏====&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039; گونه نخست: [[بیعت]] و [[اجماع]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
:۱. [[رفتار صحابه]]‏؛&lt;br /&gt;
:۲. [[اثبات خلافت ابوبکر]] از طریق [[بیعت]]‏؛&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;گونه دوم: [[انکار نص در امامت‏]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
:۱. مقایسه [[نص در امامت]] با [[فرائض اسلامی]]‏؛&lt;br /&gt;
:۲. [[وجوب احتجاج]] و [[وجوب قیام|قیام]]‏؛&lt;br /&gt;
:۳. [[تعارض نصوص امامت]]‏؛&lt;br /&gt;
:۴. [[شواهد فقدان نص]]‏؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[نظریه انتصاب در تعیین امام]]‏====&lt;br /&gt;
* [[تبیین]] نظریه‏؛&lt;br /&gt;
* [[قرآن]] و [[صحابه پیامبر خاتم|صحابه پیامبر]]{{صل}}؛&lt;br /&gt;
* [[صحابه پیامبر خاتم|صحابه پیامبر]]{{صل}} از نگاه [[احادیث]]‏؛&lt;br /&gt;
* [[صحابه پیامبر خاتم|صحابه]] از نگاه تاریخ‏؛&lt;br /&gt;
* [[تاویل نصوص]] یا [[اجتهاد در برابر نص]]‏؛&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[مقام امامت]]====&lt;br /&gt;
* [[تفکر]] مادی درباره [[رهبری]] و [[اختلاف]] بنیادین آن با [[تفکر]] [[اسلامی]]؛&lt;br /&gt;
* سطوح متعدد [[رهبری]] در [[اسلام]]:&lt;br /&gt;
# ۱. سطح کار برای [[زندگی]] [[دنیا]]؛&lt;br /&gt;
# ۲. سطح کوشش برای [[زندگی]] [[آخرت]]؛&lt;br /&gt;
# ۳. سطح کمال و [[رشد معنوی]] و رسیدن به [[رضوان الهی]]؛&lt;br /&gt;
* [[حقانیت]] [[انتصاب]] و [[نادرستی]] [[انتخاب امام]] در [[اسلام]]؛&lt;br /&gt;
* [[دلایل انتخاب]]؛&lt;br /&gt;
* [[آیات خلافت]]؛&lt;br /&gt;
* [[روایت]] [[اجماع مسلمانان]]؛&lt;br /&gt;
* دو [[آیه شوری]]؛&lt;br /&gt;
* [[دلایل ضرورت انتصاب]]:&lt;br /&gt;
# ۱. [[احادیث اهل بیت]] در مورد امامت؛&lt;br /&gt;
# ۲. [[حدیث غدیر]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[ولایت امامان]]===&lt;br /&gt;
* [[ولایت تکوینی]]&lt;br /&gt;
* [[ولایت تشریعی]]&lt;br /&gt;
* [[ولایت امر]]&lt;br /&gt;
===[[مرجعیت دینی امامان]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[وظیفه امت در قبال امام]]====&lt;br /&gt;
# [[شناسایی]]، [[رجوع]] و [[پیروی از امام]]؛&lt;br /&gt;
# [[دلبستگی]] و [[محبت به امام]]؛&lt;br /&gt;
# [[بیزاری جستن]] از [[دشمنان امام]]؛&lt;br /&gt;
* [[ولایت]] و شرط [[قبولی اعمال]].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====[[امامت در قرآن]]====&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;مفهوم [[امامت در قرآن|امامت از منظر قرآن]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
** [[ویژگی‌های امامت در قرآن کریم]]؛&lt;br /&gt;
** [[توحید|امامت و حقیقت توحید]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات عبادت]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات امر]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات حکم]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات ملک]]؛&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;[[نصب امام|امامت و گزینش الهی]] در [[قرآن کریم]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
** [[آیات امر]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات حکم]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات ملک]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات ولایت]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات اطاعت]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه اختیار]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه تحکیم]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیات ایتاء]]؛&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;[[نص|نص بر امامان]]{{ع}} و [[گزینش الهی]] آنان در [[قرآن کریم]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
** [[نصوص]] عام؛&lt;br /&gt;
** [[نصوص]] خاص بر امامت [[برگزیدگان آل ابراهیم]]؛&lt;br /&gt;
** [[اهل بیت در قرآن|نصوص دال بر امامت اهل بیت]]{{عم}}؛&lt;br /&gt;
** [[آیه ولایت]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه تطهیر]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه مودت]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه تبلیغ]]؛&lt;br /&gt;
** [[آیه شهادت]].&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|2}} &lt;br /&gt;
# [[پرونده:3073589.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100439.jpg|22px]] [[عبدالله ابراهیم‌زاده آملی|ابراهیم‌زاده آملی، عبدالله]]، [[امامت و رهبری - ابراهیم‌زاده آملی (کتاب)| &#039;&#039;&#039;امامت و رهبری&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1379781.jpg|22px]] [[آرزو شکری|شکری، آرزو]]، [[حقوق اهل بیت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;حقوق اهل بیت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:000055.jpg|22px]] [[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:440259451.jpg|22px]] [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:110015.jpeg|22px]] [[محمد محمدی ری‌شهری|محمدی ری‌شهری، محمد]]، &#039;&#039;&#039;[http://lib.eshia.ir/27255/6/214 [[دانشنامه]] [[قرآن]] و [[حدیث]] ج ۱۰]&#039;&#039;&#039;؛&lt;br /&gt;
# [[پرونده:978964298273.jpg|22px]] [[محمد حسن قدردان قراملکی|قدردان قراملکی، محمد حسن]]، [[امامت ۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1368142.jpg|22px]] [[مهدی مقامی|مقامی، مهدی]]، [[درسنامه امام‌شناسی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;درسنامه امام‌شناسی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:4670311.jpg|22px]] [[رضا محمدی|محمدی، رضا]]، [[امام‌شناسی ۵ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امام‌شناسی ۵&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100662.jpg|22px]] [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ مطهر&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{:امامت (نمایه)}}&lt;br /&gt;
==[[:رده:آثار امامت|منبع‌شناسی جامع امامت]]==&lt;br /&gt;
{{پرسش‌های وابسته}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
* [[:رده:کتاب‌شناسی کتاب‌های امامت|کتاب‌شناسی امامت]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:مقاله‌شناسی مقاله‌های امامت|مقاله‌شناسی امامت]]؛&lt;br /&gt;
* [[:رده:پایان‌نامه‌شناسی پایان‌نامه‌های امامت|پایان‌نامه‌شناسی امامت]]. &lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
{{امامت‌ شناسی}}&lt;br /&gt;
{{کلام اسلامی}}&lt;br /&gt;
{{حکومت}}&lt;br /&gt;
{{اصول دین}}&lt;br /&gt;
{{درجه‌بندی&lt;br /&gt;
 | نویسنده اصلی=&amp;lt;!--جوکار،پورانزاب،واثق،امینی،بهمنی--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | ارزیابی=&amp;lt;!--آماده،نشده، تمام--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | ارزیابی نهایی =&amp;lt;!--نشده،-،خیرآبادی،فرقانی،تمام توسط [[کاربر:خیرآبادی|خیرآبادی]]،تمام توسط [[کاربر:فرقانی|فرقانی]]--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | شناسه = &amp;lt;!--ندارد، ناقص، کامل--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | جامعیت = &amp;lt;!--ندارد، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | زیاده‌نویسی = &amp;lt;!--دارد، ندارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | رسا بودن = &amp;lt;!--ندارد، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | لینک‌دهی دستی = &amp;lt;!--ندارد، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | رده = &amp;lt;!--ندارد، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | جعبه اطلاعات = &amp;lt;!--ندارد،-، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | عکس = &amp;lt;!-- ندارد،-، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 | ناوبری = &amp;lt;!--ندارد، دارد--&amp;gt;&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:اعتقادات شیعه]]&lt;br /&gt;
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[[رده:اصطلاحات کلامی]]&lt;br /&gt;
[[رده:مقاله‌های اولویت یک]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;onlyinclude&amp;gt;{{درجه‌بندی&lt;br /&gt;
 | نویسنده اصلی=&amp;lt;!--جوکار،پورانزاب،واثق،امینی،بهمنی--&amp;gt;&lt;br /&gt;
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 | توضیحات = &lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/onlyinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%AC%D8%A7%D9%87%D9%84%DB%8C&amp;diff=503657</id>
		<title>اسلام جاهلی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%AC%D8%A7%D9%87%D9%84%DB%8C&amp;diff=503657"/>
		<updated>2021-05-24T07:46:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{خرد}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;مدخل‌های وابسته به این بحث:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt; [[اسلام جاهلی در قرآن]] - [[اسلام جاهلی در حدیث]] - [[اسلام جاهلی در نهج البلاغه]] - [[اسلام جاهلی در معارف دعا و زیارات]] - [[اسلام جاهلی در کلام اسلامی]] - [[اسلام جاهلی در فرهنگ و معارف انقلاب اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[اسلام جاهلی (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0008.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
# اسلام جاهلی که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
# اسلام جاهلی&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پیمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این اسلام جاهلی بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] [[محمدی]] بود. حوادثی که اسلام جاهلی پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس [[شکیبایی]] گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با اسلام جاهلی، [[نزاع]] بر &amp;quot;ریاست&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] آشکار [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] پنهان و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین اسلام جاهلی و اسلام جاهلی و به بیانی دیگر: بین [[اسلام علوی]] و [[اسلام اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. اسلام جاهلی - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==تحریف‌های اسلام جاهلی==&lt;br /&gt;
از مهم‌ترین [[تحریفات]] اسلام جاهلی دست‌اندازی‌های سردمداران آن به به [[منظومه فکری اسلام]]، به ویژه مفاهیم و آموزه‌های [[نظام سیاسی اسلام]] است. بارزترین این [[تحریف‌ها]] در [[ارتباط]] با [[امامت]] موارد ذیل‌اند:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;ریاست&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبیدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، علی بن محمد، الكامل فی التاریخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;ریاست&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان اسلام جاهلی، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به ریاست و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این ریاست و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== پرسش‌های وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
* [[مظالم]]&lt;br /&gt;
* [[مظالم عباد]]&lt;br /&gt;
* [[معونة الظالم]]&lt;br /&gt;
* [[قیام مسلحانه]]&lt;br /&gt;
* [[عدالت]] ([[عدل]])&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:اسلام جاهلی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=503654</id>
		<title>امام در لغت</title>
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		<updated>2021-05-24T07:41:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امام در لغت]] - [[امام در قرآن]] - [[امام در حدیث]] - [[امام در کلام اسلامی]] - [[امام در نهج البلاغه]] - [[امام در فلسفه اسلامی]] - [[امام در عرفان اسلامی]] - [[امام در فقه سیاسی]] - [[مقام امام]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0006.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;[[امام]]:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] که به گفتار و [[رفتار]] او [[اقتدا]] می‌شود، آنکه از وی [[پیروی]] می‌شود؛ خواه [[انسان]] باشد یا کتاب یا غیر آن، [[حق]] باشد یا [[باطل]]&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ کتاب، راه&amp;lt;ref&amp;gt;بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;، هر کسی که به او [[اقتدا]] می‌شود یا در [[امور جامعه]] بر دیگران مقدّم شمرده شود، [[امام]] خوانده می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;خلیل بن احمد فراهیدی، کتاب العین، ج۸، ص۴۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ چه در راه [[حق]] و چه در مسیر [[ضلالت]] و [[گمراهی]]&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ جمع آن [[ائمه]] است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;[[امام]]&amp;quot; به معنای &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot;، &amp;quot;پیشرو&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;فرهنگ فارسی، ج۱، ص۳۴۶ ـ ۳۴۷، «امامت».&amp;lt;/ref&amp;gt;، &amp;quot;[[مقتدا]]&amp;quot;، &amp;quot;[[قیّم]]&amp;quot;، &amp;quot;[[مصلح]]&amp;quot;، &amp;quot;[[الگو]]&amp;quot;، &amp;quot;راه اصلی&amp;quot; و &amp;quot;[[راهنما]]&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج ۱، ص ۲۱۳ ـ ۲۱۵، «امم».&amp;lt;/ref&amp;gt;. کسی یا چیزی که مورد [[پیروی]] واقع می‌گردد یا اساس و مبدأ حرکت چیز دیگری قرار می‌‌گیرد، [[انسان]] باشد یا کتاب یا چیزی دیگر، به [[حق]] باشد یا بر [[باطل]]&amp;lt;ref&amp;gt;مفردات، ص ۸۷، «ام».&amp;lt;/ref&amp;gt; [[امام]] است&amp;lt;ref&amp;gt;المنجد، ص ۱۷، «ام».&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژۀ [[امام]] بر [[زن]] و مرد اطلاق می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[مرکز فرهنگ و معارف قرآن]]، [[محمد رضا مصطفی‌پور|مصطفی‌پور، محمد رضا]]، [[ امامت - مصطفی‌پور (مقاله)|مقاله «امامت»]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص۲۱۹-۲۲۰؛ [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۳۰-۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[امام]] کسی است که همواره مقصود و [[هدف]] حرکت و تلاش دیگران قرار گیرد. در کتاب‌های لغت برای [[امام]] مصادیقی برشمرده‌اند: [[قرآن کریم]]، [[پیامبر گرامی اسلام]]{{صل}}، [[جانشین پیامبر]]{{صل}}، [[امام]] در [[نماز جماعت]]، [[فرمانده سپاه]]، راهنمای مسافران و دانشمندی که از او [[پیروی]] می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;معجم المقاییس فی اللغة، ص۴۸، المصباح المنیر، ج۱، ص۳۱ ـ ۳۲؛ لسان العرب، ج۱، ص۱۵۷؛ المفردات فی غریب القرآن، ص۲۴، اقرب الموارد، ج۱، ص۱۹؛ المعجم الوسیط، ج۱، ص۲۷؛ فرهنگ عمید، ص۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بنابراین، کلمۀ &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; بیانگر این واقعیت‌ است که رهبریِ [[جامعه]] در [[حقیقت]] اصل و اساس [[جامعه]] است که [[مردم]] از او [[پیروی]] می‌کنند و در امور خود، به سراغ او می‌روند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک:  [[محمد محمدی ری‌شهری|محمدی ری‌شهری، محمد]]، دانشنامه قرآن و حدیث، ج ۱۰، ص۲۱۳ – ۲۱۴؛ [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[ امامت - ربانی گلپایگانی (مقاله)|مقاله «امامت»]][[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==امام در لغت==&lt;br /&gt;
واژه [[امام]] در لغت برای معانی گوناگونی به کار گرفته شده است؛ اما همگی در یک راستا بوده و جامع تمامی آنها معنای [[رئیس]]، [[رهبر]] و پیشوای هر گروه است&amp;lt;ref&amp;gt;فراهیدی، خلیل، العین، ج۸، ص۴۲۸؛ ابن‌فارس، احمد، معجم مقاییس اللغة، ج۱، ص۲۸؛ راغب اصفهانی، حسین، مفردات، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. &amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد تقی یارمحمدیان|یارمحمدیان، محمد تقی]]، [[ازدیاد علم امام از دیدگاه کتاب و سنت (کتاب)|ازدیاد علم امام از دیدگاه کتاب و سنت]]، ص ۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==منابع فرهنگ لغت==&lt;br /&gt;
{{متن رجال&lt;br /&gt;
| عنوان =1.  مفردات القرآن (راغب)&lt;br /&gt;
| توضیحات تصویر = ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)&lt;br /&gt;
| تصویر = 13681368.jpg&lt;br /&gt;
| متن کتاب =امام: کسی که از گفتار و یا کردار او پیروی می‌کنند خواه انسان باشد خواه کتاب و غیره، برحق باشد یا باطل، پیشوا، رهبر&amp;lt;ref&amp;gt;[[راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|ترجمه و تبیین مفردات القرآن]]، ص ۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:000055.jpg|22px]] [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دائرةالمعارف قرآن کریم&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]] [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:440259451.jpg|22px]] [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100760.jpg|22px]] [[محمد تقی یارمحمدیان|یارمحمدیان، محمد تقی]] [[ازدیاد علم امام از دیدگاه کتاب و سنت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;ازدیاد علم امام از دیدگاه کتاب و سنت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 13681368.jpg|22px]] [[راغب اصفهانی]]، [[ترجمه و تبیین مفردات القرآن (کتاب)|&#039;&#039;&#039;مفردات القرآن (ترجمه و تبیین)&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان منابع}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پرسش مستقیم==&lt;br /&gt;
* [[امام در لغت و اصطلاح به چه معناست؟ (پرسش)]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امام]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0024.webm&amp;diff=497554</id>
		<title>پرونده:V0024.webm</title>
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		<updated>2021-05-05T17:52:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: ربوبیت به معنای صاحب‌اختیار بودن

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
ربوبیت به معنای صاحب‌اختیار بودن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0023.webm&amp;diff=466098</id>
		<title>پرونده:V0023.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0023.webm&amp;diff=466098"/>
		<updated>2021-04-26T04:40:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: ربوبیت به معنای مالکیت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
ربوبیت به معنای مالکیت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=466097</id>
		<title>عبادت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=466097"/>
		<updated>2021-04-26T04:28:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] | [[عبادت در قرآن]] | [[عبادت در حدیث]] | [[عبادت در نهج البلاغه]] | [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] | [[عبادت در فقه سیاسی]] | [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] | [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0022.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039; به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و [[طاعت]] و [[پرستش]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] است. در آیات فراوانی به موضوع عبادت اشاره شده است: {{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}} و بیان شده که عبادت هدف اصلی خلقت است.&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0021.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==معناشناسی عبادت==&lt;br /&gt;
===معنای لغوی===&lt;br /&gt;
عبادت به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و خاکساری&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۵۴۲؛ فیومی، المصباح المنیر، ج۲، ص۳۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; در مقابل [[خداوند]]، [[طاعت]]&amp;lt;ref&amp;gt;فیروزآبادی، القاموس المحیط، ج۱، ص۳۱۱، ماده «عبد»؛ ابن منظور، لسان العرب، ج۳، ص۲۷۲، ماده «عبد»؛ صحاح اللغه جوهری، ماده «عبد».&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[پرستش]] و پرستیدن&amp;lt;ref&amp;gt;بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. اصل آن از &amp;quot;عبد&amp;quot; به‌معنای نهایت افتادگی در مقابل مولا&amp;lt;ref&amp;gt;حسن مصطفوی، التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۸، ص‌۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[نرمش]] و ذلیل شدن آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌فارس، معجم مقاییس اللغة، ج۴، ص۲۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===معنای اصطلاحی===&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح دینی یعنی [[اطاعت]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] و [[پرستش]]، [[خداپرستی]] و [[نیایش]] به درگاه او. عبادت عبارت است از مواظبت بر برخی [[اعمال]] که از [[ناحیه]] [[شارع]] [[دستور]] رسیده است&amp;lt;ref&amp;gt;مقالات فلسفی (۲)، ص۱۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. انجام تکالیفی همچون [[نماز]]، [[روزه]]، [[حج]] و [[جهاد]] عبادت است، البته تلاش برای تأمین [[زندگی]] از راه [[حلال]]، [[آموختن]] [[دانش]]، [[جهاد]] در [[راه خدا]]، رسیدگی به محرومان و [[نیکی]] به [[پدر]] و [[مادر]] نیز از بزرگترین عبادت‌هاست&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت در [[قرآن]]==&lt;br /&gt;
{{اصلی|عبادت در قرآن}}&lt;br /&gt;
از مجموع [[آیات]] [[قرآن کریم]] استفاده می‌شود مراد از عبادت در اصطلاح [[قرآنی]]، معنای لغوی آن است یعنی [[اطاعت]] خاضعانه و بدون چون و چرا. برخی از این آیات عبارت‌اند از:&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا با شما عهد نکردم ای فرزندان آدم که فرمانبری شیطان نکنید که دشمن آشکاری برای شماست * و اینکه فرمانبر من باشید که راه راست همین است؟» سوره یس، آیه ۶۰-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«شما و آنچه جز خداوند فرمانبری می‌کنید سوخت دوزخید که شما به دورن آن می‌روید.» سوره انبیاء، آیه ۹۸-۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بعضى از مردم خدا را تنها با زبان مى‌پرستند و اطاعت می‌کنند.» سوره حج، آیه ۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|فقه نظام سیاسی اسلام]]، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت هدف خلقت==&lt;br /&gt;
[[قرآن]]، [[فلسفه خلقت]] [[جن]] و انس را عبادت [[خدا]] می‌داند: {{متن قرآن|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;و پریان و آدمیان را نیافریدم جز برای آنکه مرا بپرستند؛ سوره ذاریات، آیه ۵۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; چرا که [[بندگی خدا]] [[انسان]] را به کمال روحی و [[معنوی]] و رشد [[اخلاقی]] می‌‌رساند و از [[گناهان]] و [[مفاسد]] باز می‌دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. به نظر می‌رسد، مراد از عبودیّت انسان که [[هدف خلقت]] بیان شده، تنها [[عبادت]] ظاهری و [[خداترسی]] نیست؛ بلکه رسیدن انسان به مقامی است که همه [[اعمال]] و [[رفتار]] او عبادت محسوب شود و به قصد [[قرب]] به [[حق‌تعالی]] انجام شود (رسد [[آدمی]] به جایی که به جز [[خدا]] نبیند) و هیچ شائبه‌ای در اعمال و رفتار فردی و [[اجتماعی]] او از [[ریا]] و [[عجب]]، [[خودبینی]]، [[تکبر]] و [[تجاوزگری]] و [[فساد]] و [[ظلم]] و... نباشد؛ چنین انسانی به [[حق]] می‌پیوندد&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبادت==&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح [[قرآن]] مفهوم گسترده‌ای دارد. یک [[درجه]] که عالی‌ترین درجه است، این است که [[انسان]] در مقابل چیزی [[سجده]] کند. ولی از آن مرحله که بگذریم، قرآن هر اطاعتی را عبادت می‌شمارد و لذا می‌فرماید: کسی که [[هوای نفس]] خویش را [[اطاعت]] کند، خودپرست است. {{متن قرآن|أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَهَهُ هَوَاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا آن کس را دیدی که هوای (نفس) خود را، خدای خویش گرفته است» سوره جاثیه، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;آشنایی با قرآن، ج۱-۲، ص۱۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. البته هر توجه یا [[خضوع]] نسبت به چیزی عبادت نیست، خضوع نسبت به چیزی اگر جنبه [[تقدیس]] پیدا کند عبادت است&amp;lt;ref&amp;gt;خدمات متقابل اسلام و ایران، ص۲۵۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==بندگی خدا==&lt;br /&gt;
{{اصلی|بندگی خدا}}&lt;br /&gt;
بنده و [[عبد خدا]] کسی است که راه را برای اجرای [[فرامین]] [[پروردگار]] عالم هموار می‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین.&amp;lt;/ref&amp;gt; و تنها خواست [[خداوند]] را انتخاب کند و از [[کمالات]] والای [[اخلاقی]] است. [[انسان]] در سایه [[عبودیت]] به کمال [[آفرینش]] که همان [[بندگی]] خداست، دست می‌یابد و براساس استعداد خود، مسیر کمال را می‌پیماید. [[پیامبر اسلام]]{{صل}} می‌فرمایند: «[[مؤمن]] اگر بخواهد بنده شایسته‌ای باشد باید حدود خدا را نگه دارد و در [[عمل]] [[بندگی]] خود را نشان دهد»&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج۱۷، ص۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[تقوای الهی]]، [[رضایت]] به [[خشنودی]] [[حق تعالی]]، عمل با [[بصیرت]] و ... از نشانه‌های بندگی و [[فریب خوردن]] از شیطان‌های گوناگون؛ [[عجب]] و [[خودبینی]]؛ [[سستی]] و کسالت و مشغول شدن به [[امور دنیا]] هم از موانع آن محسوب می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا دهدست|دهدست، محمد رضا]]، [[دانشنامه صحیفه سجادیه (کتاب)|مقاله «بندگان خدا»، دانشنامه صحیفه سجادیه]]، ص ۱۱۷-۱۲۰؛ [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۷-۴۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اهمیّت عبادت (ارزش و جایگاه عبادت)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ضرورت عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مراتب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==شرایط عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==موانع عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==لوازم عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آداب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آثار و نشانه‌های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==فواید و کارکردهای عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==گستره عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ویژگی های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عواقب ترک عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|7}}&lt;br /&gt;
* [[بندگی خدا]] ([[عبادت خدا]])&lt;br /&gt;
* [[عبادات شرعیه]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت اهل بهشت]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر مولی به امر مولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت بشر]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مشرکین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مقربین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت عملی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قلبی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت خدا]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر خدا]]&lt;br /&gt;
* [[یگانه پرستی]]&lt;br /&gt;
* [[استحقاق عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[اعمال عبادی]]&lt;br /&gt;
* [[تفاوت عبادت با تعظیم]]&lt;br /&gt;
* [[معبود]]&lt;br /&gt;
* [[وجوب عبادات]]&lt;br /&gt;
* [[بهترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[رکوع]]&lt;br /&gt;
* [[سجده]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت عالم]]&lt;br /&gt;
* [[نیکو ترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[استنکاف از عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[آفت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[برتری فضیلت علم از فضیلت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[تحرج]]&lt;br /&gt;
* [[دلبستگی]]&lt;br /&gt;
* [[رغبت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[سرکشی]]&lt;br /&gt;
* [[عابد]]&lt;br /&gt;
* [[فراغت برای عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت مؤمن]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:11123.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فقه نظام سیاسی اسلام ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1379779.jpg|22px]] [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100662.jpg|22px]] [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ مطهر&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{فضایل اخلاقی}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
{{فضیلت}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=466096</id>
		<title>عبادت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B9%D8%A8%D8%A7%D8%AF%D8%AA&amp;diff=466096"/>
		<updated>2021-04-26T04:26:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{سیره معصوم}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[عبادت در لغت]] | [[عبادت در قرآن]] | [[عبادت در حدیث]] | [[عبادت در نهج البلاغه]] | [[عبادت در سیره پیامبر خاتم]] | [[عبادت در فقه سیاسی]] | [[عبادت در معارف دعا و زیارات]] | [[عبادت در معارف و سیره سجادی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[عبادت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;عبادت&#039;&#039;&#039; به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و [[طاعت]] و [[پرستش]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] است. در آیات فراوانی به موضوع عبادت اشاره شده است: {{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}} و بیان شده که عبادت هدف اصلی خلقت است.&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0021.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==معناشناسی عبادت==&lt;br /&gt;
===معنای لغوی===&lt;br /&gt;
عبادت به‌معنای اظهار [[فروتنی]] و خاکساری&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۵۴۲؛ فیومی، المصباح المنیر، ج۲، ص۳۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; در مقابل [[خداوند]]، [[طاعت]]&amp;lt;ref&amp;gt;فیروزآبادی، القاموس المحیط، ج۱، ص۳۱۱، ماده «عبد»؛ ابن منظور، لسان العرب، ج۳، ص۲۷۲، ماده «عبد»؛ صحاح اللغه جوهری، ماده «عبد».&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[پرستش]] و پرستیدن&amp;lt;ref&amp;gt;بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. اصل آن از &amp;quot;عبد&amp;quot; به‌معنای نهایت افتادگی در مقابل مولا&amp;lt;ref&amp;gt;حسن مصطفوی، التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۸، ص‌۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[نرمش]] و ذلیل شدن آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌فارس، معجم مقاییس اللغة، ج۴، ص۲۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===معنای اصطلاحی===&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح دینی یعنی [[اطاعت]] و [[بندگی]] [[انسان]] در برابر [[خداوند]] و [[پرستش]]، [[خداپرستی]] و [[نیایش]] به درگاه او. عبادت عبارت است از مواظبت بر برخی [[اعمال]] که از [[ناحیه]] [[شارع]] [[دستور]] رسیده است&amp;lt;ref&amp;gt;مقالات فلسفی (۲)، ص۱۵۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. انجام تکالیفی همچون [[نماز]]، [[روزه]]، [[حج]] و [[جهاد]] عبادت است، البته تلاش برای تأمین [[زندگی]] از راه [[حلال]]، [[آموختن]] [[دانش]]، [[جهاد]] در [[راه خدا]]، رسیدگی به محرومان و [[نیکی]] به [[پدر]] و [[مادر]] نیز از بزرگترین عبادت‌هاست&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت در [[قرآن]]==&lt;br /&gt;
{{اصلی|عبادت در قرآن}}&lt;br /&gt;
از مجموع [[آیات]] [[قرآن کریم]] استفاده می‌شود مراد از عبادت در اصطلاح [[قرآنی]]، معنای لغوی آن است یعنی [[اطاعت]] خاضعانه و بدون چون و چرا. برخی از این آیات عبارت‌اند از:&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْبُدُوا الشَّيْطَانَ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ * وَأَنِ اعْبُدُونِي هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا با شما عهد نکردم ای فرزندان آدم که فرمانبری شیطان نکنید که دشمن آشکاری برای شماست * و اینکه فرمانبر من باشید که راه راست همین است؟» سوره یس، آیه ۶۰-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«شما و آنچه جز خداوند فرمانبری می‌کنید سوخت دوزخید که شما به دورن آن می‌روید.» سوره انبیاء، آیه ۹۸-۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#{{متن قرآن|وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و بعضى از مردم خدا را تنها با زبان مى‌پرستند و اطاعت می‌کنند.» سوره حج، آیه ۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|فقه نظام سیاسی اسلام]]، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عبادت هدف خلقت==&lt;br /&gt;
[[قرآن]]، [[فلسفه خلقت]] [[جن]] و انس را عبادت [[خدا]] می‌داند: {{متن قرآن|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;و پریان و آدمیان را نیافریدم جز برای آنکه مرا بپرستند؛ سوره ذاریات، آیه ۵۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; چرا که [[بندگی خدا]] [[انسان]] را به کمال روحی و [[معنوی]] و رشد [[اخلاقی]] می‌‌رساند و از [[گناهان]] و [[مفاسد]] باز می‌دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۱۴۴-۱۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. به نظر می‌رسد، مراد از عبودیّت انسان که [[هدف خلقت]] بیان شده، تنها [[عبادت]] ظاهری و [[خداترسی]] نیست؛ بلکه رسیدن انسان به مقامی است که همه [[اعمال]] و [[رفتار]] او عبادت محسوب شود و به قصد [[قرب]] به [[حق‌تعالی]] انجام شود (رسد [[آدمی]] به جایی که به جز [[خدا]] نبیند) و هیچ شائبه‌ای در اعمال و رفتار فردی و [[اجتماعی]] او از [[ریا]] و [[عجب]]، [[خودبینی]]، [[تکبر]] و [[تجاوزگری]] و [[فساد]] و [[ظلم]] و... نباشد؛ چنین انسانی به [[حق]] می‌پیوندد&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۶-۴۰۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام عبادت==&lt;br /&gt;
عبادت در اصطلاح [[قرآن]] مفهوم گسترده‌ای دارد. یک [[درجه]] که عالی‌ترین درجه است، این است که [[انسان]] در مقابل چیزی [[سجده]] کند. ولی از آن مرحله که بگذریم، قرآن هر اطاعتی را عبادت می‌شمارد و لذا می‌فرماید: کسی که [[هوای نفس]] خویش را [[اطاعت]] کند، خودپرست است. {{متن قرآن|أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَهَهُ هَوَاهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا آن کس را دیدی که هوای (نفس) خود را، خدای خویش گرفته است» سوره جاثیه، آیه ۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;آشنایی با قرآن، ج۱-۲، ص۱۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. البته هر توجه یا [[خضوع]] نسبت به چیزی عبادت نیست، خضوع نسبت به چیزی اگر جنبه [[تقدیس]] پیدا کند عبادت است&amp;lt;ref&amp;gt;خدمات متقابل اسلام و ایران، ص۲۵۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۵۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==بندگی خدا==&lt;br /&gt;
{{اصلی|بندگی خدا}}&lt;br /&gt;
بنده و [[عبد خدا]] کسی است که راه را برای اجرای [[فرامین]] [[پروردگار]] عالم هموار می‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین.&amp;lt;/ref&amp;gt; و تنها خواست [[خداوند]] را انتخاب کند و از [[کمالات]] والای [[اخلاقی]] است. [[انسان]] در سایه [[عبودیت]] به کمال [[آفرینش]] که همان [[بندگی]] خداست، دست می‌یابد و براساس استعداد خود، مسیر کمال را می‌پیماید. [[پیامبر اسلام]]{{صل}} می‌فرمایند: «[[مؤمن]] اگر بخواهد بنده شایسته‌ای باشد باید حدود خدا را نگه دارد و در [[عمل]] [[بندگی]] خود را نشان دهد»&amp;lt;ref&amp;gt;بحارالانوار، ج۱۷، ص۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[تقوای الهی]]، [[رضایت]] به [[خشنودی]] [[حق تعالی]]، عمل با [[بصیرت]] و ... از نشانه‌های بندگی و [[فریب خوردن]] از شیطان‌های گوناگون؛ [[عجب]] و [[خودبینی]]؛ [[سستی]] و کسالت و مشغول شدن به [[امور دنیا]] هم از موانع آن محسوب می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد رضا دهدست|دهدست، محمد رضا]]، [[دانشنامه صحیفه سجادیه (کتاب)|مقاله «بندگان خدا»، دانشنامه صحیفه سجادیه]]، ص ۱۱۷-۱۲۰؛ [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص: ۴۰۷-۴۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اهمیّت عبادت (ارزش و جایگاه عبادت)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ضرورت عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مراتب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==شرایط عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==موانع عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==لوازم عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آداب عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==آثار و نشانه‌های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==فواید و کارکردهای عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==گستره عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ویژگی های عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==عواقب ترک عبادت==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|7}}&lt;br /&gt;
* [[بندگی خدا]] ([[عبادت خدا]])&lt;br /&gt;
* [[عبادات شرعیه]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت اهل بهشت]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر مولی به امر مولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت بشر]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مشرکین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت مقربین]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت عملی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قلبی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت قولی]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت خدا]]&lt;br /&gt;
* [[عبادت غیر خدا]]&lt;br /&gt;
* [[یگانه پرستی]]&lt;br /&gt;
* [[استحقاق عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[اعمال عبادی]]&lt;br /&gt;
* [[تفاوت عبادت با تعظیم]]&lt;br /&gt;
* [[معبود]]&lt;br /&gt;
* [[وجوب عبادات]]&lt;br /&gt;
* [[بهترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[رکوع]]&lt;br /&gt;
* [[سجده]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت عالم]]&lt;br /&gt;
* [[نیکو ترین عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[استنکاف از عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[آفت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[برتری فضیلت علم از فضیلت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[تحرج]]&lt;br /&gt;
* [[دلبستگی]]&lt;br /&gt;
* [[رغبت عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[سرکشی]]&lt;br /&gt;
* [[عابد]]&lt;br /&gt;
* [[فراغت برای عبادت]]&lt;br /&gt;
* [[نگاه به صورت مؤمن]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681040.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ‌نامه دینی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:11123.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [[فقه نظام سیاسی اسلام ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فقه نظام سیاسی اسلام ج۱&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1379779.jpg|22px]] [[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100662.jpg|22px]] [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ مطهر&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{فضایل اخلاقی}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:عبادت]]&lt;br /&gt;
{{فضیلت}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%84%D9%84%D9%87_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=466095</id>
		<title>الله در لغت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%84%D9%84%D9%87_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=466095"/>
		<updated>2021-04-26T04:18:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[الله]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[الله]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[الله در لغت]] | [[الله در قرآن]] | [[الله در حدیث]] | [[الله در کلام اسلامی]] | [[الله در فلسفه اسلامی]] | [[الله در عرفان اسلامی]] | [[الله از دیدگاه برون‌دینی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[الله (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0019.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
الله نام [[آفریدگار]] [[جهان]] و [[انسان]] و همه موجودات است. الله اسم عَلَم (خاص) برای خداوند است. شاید بتوان برابر این واژه را در [[فارسی]] کلمه &amp;quot;[[خدا]]&amp;quot; دانست&amp;lt;ref&amp;gt; البته در [[فارسی]] لغتی مترادف کلمه الله وجود ندارد و هیچ‌کدام رساننده تمام معنی الله نیستند؛ زیرا اگر به جای الله [[خدا]] بگذاریم رسا نخواهد بود، چون خدا مخفف خودآی است و رساننده تعبیری است که [[فیلسوفان]] می‌کنند، یعنی [[واجب]] الوجود و یا شاید به کلمه [[غنی]] که در [[قرآن]] آمده است نزدیک‌تر باشد تا به الله. و اگر [[خداوند]] استعمال شود باز رسا نخواهد بود زیرا خداوند یعنی صاحب، و اگر چه الله خداوند هم هست ولی مرادف با خداوند نیست؛ خداوند یک [[شأن]] از [[شئون]] الله است. [[مرتضی مطهری]]، آشنایی با قرآن، جلد اول و دوم، ص۸۰؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. معادل این واژه در برخی زبان‌های دیگر چنین است: هندی: &amp;quot;خِدا&amp;quot;، عبری: &amp;quot;إلوهیم&amp;quot; (به صیغه جمع از باب [[تعظیم]]) یا &amp;quot;یهوه&amp;quot; (Y.H.W.H)، [[سریانی]]: &amp;quot;إلوهو&amp;quot;، کلدانی: &amp;quot;إلاها&amp;quot;، یونانی: &amp;quot;ثاؤس&amp;quot;، لاتین: &amp;quot;داؤس&amp;quot;، فرانسه و ایتالیا: &amp;quot;دیُو&amp;quot; (Dieu)، انگلیسی: &amp;quot;گاد&amp;quot; (God)&amp;lt;ref&amp;gt;دائرة المعارف بستانی، ج ۴، ص ۲۸۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
الله در اصل واژه‌ای [[عربی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;التفسیر الکبیر، ج ۱، ص ۱۶۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. برخی آنرا شبیه کلمات عبرانی و برگرفته از &amp;quot;إیل&amp;quot; یا [[سریانی]] و کلدانی و برگرفته از &amp;quot;إلاها&amp;quot; دانسته‌اند&amp;lt;ref&amp;gt; التفسیر الکبیر، ج ۱، ص ۱۶۳؛ الفرقان، ج ۱، ص ۸۲- ۸۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; که البته صرف شباهت [[دلیل]] بر [[عربی]] نبودن و برگرفته بودن آن از زبان دیگر نیست&amp;lt;ref&amp;gt;اسماء و صفات الهی، ج ۱، ص ۳۱؛ مفاهیم القرآن، ج ۶، ص ۱۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۴ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۴، ص ۱۷۸- ۱۸۸؛ [[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص ۱۲۴؛ [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگ‌نامه دینی (کتاب)|فرهنگ‌نامه دینی]]، ص۹۵-۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پیوند به بیرون==&lt;br /&gt;
* [https://www.aparat.com/v/q983e کلیپ مرتبط با این مدخل از آیت‌الله محسن اراکی]&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:الله]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0022.webm&amp;diff=466094</id>
		<title>پرونده:V0022.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0022.webm&amp;diff=466094"/>
		<updated>2021-04-26T04:17:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: عبادت به معنای اطاعت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
عبادت به معنای اطاعت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0021.webm&amp;diff=466093</id>
		<title>پرونده:V0021.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0021.webm&amp;diff=466093"/>
		<updated>2021-04-26T04:13:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: عبادت در لغت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
عبادت در لغت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0020.webm&amp;diff=465346</id>
		<title>پرونده:V0020.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0020.webm&amp;diff=465346"/>
		<updated>2021-04-24T22:01:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: واژه اله در لغت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
واژه اله در لغت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0019.webm&amp;diff=464977</id>
		<title>پرونده:V0019.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0019.webm&amp;diff=464977"/>
		<updated>2021-04-23T22:26:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: الله در لغت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
الله در لغت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D8%AE%D8%AA%D9%84%D8%A7%D9%81&amp;diff=438377</id>
		<title>اختلاف</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D8%AE%D8%AA%D9%84%D8%A7%D9%81&amp;diff=438377"/>
		<updated>2021-04-11T15:54:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[اختلاف در قرآن]] | [[اختلاف در نهج البلاغه]] | [[اختلاف در فقه سیاسی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0005.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
اختلاف، غیرهمسویی&amp;lt;ref&amp;gt;حسین راغب اصفهانی، مفردات الفاظ القرآن، ص۲۹۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; (هر کسی راهی غیر از دیگری داشته باشد)، مقابل استواء و اتفاق&amp;lt;ref&amp;gt;حسن مصطفوی، التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۳، ص۱۱۲؛ بهاءالدین خرمشاهی، قرآن کریم، ترجمه، توضیحات و واژه‌نامه، ص۷۰۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;: {{متن قرآن|فَاخْتَلَفَ الْأَحْزَابُ مِنْ بَيْنِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنگاه از میان ایشان چند دسته اختلاف ورزیدند» سوره مریم، آیه ۳۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخی [[اختلافات]] از دیدگاه [[قرآن کریم]] [[تکوینی]] و در [[طبیعت]] ضروری و ثمربخش هستند؛ مانند:[[اختلاف]] [[شب]] و روز: {{متن قرآن|وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و در پیاپی آمدن شب و روز» سوره بقره، آیه ۱۶۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ [[اختلاف]] در زبان و رنگِ پوست در [[انسان‌ها]]: {{متن قرآن|وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافُ أَلْسِنَتِكُمْ وَأَلْوَانِكُمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و از نشانه‌های او آفرینش آسمان‌ها و زمین و گوناگونی زبان‌ها و رنگ‌های شماست» سوره روم، آیه ۲۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ [[اختلاف]] و گوناگونی میوه‌ها و روییدنی‌ها: {{متن قرآن|أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ ثَمَرَاتٍ مُخْتَلِفًا أَلْوَانُهَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آیا ندیدی که خداوند از آسمان آبی فرو فرستاد که از آن فرآورده‌هایی رنگارنگ برآوردیم؟» سوره فاطر، آیه ۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخی دیگر [[اختلافات]] عارضی هستند؛ مانند: [[اختلاف بین انسان‌ها]] که رفع آنها مطلوب [[قرآن]] است و راه حل [[قرآن]] برای [[رفع اختلافات]] بشری در [[دنیا]]، [[داوری]] بر اساس [[کلام]] خداست: {{متن قرآن|وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي اخْتَلَفُوا فِيهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما این کتاب را بر تو فرو فرستادیم تا آنچه را در آن اختلاف ورزیدند برای آنها روشن گردانی» سوره نحل، آیه ۶۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در [[آخرت]]، [[خداوند]] بین [[مردم]] [[قضاوت]] خواهد کرد: {{متن قرآن|فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«باری، خداوند میان آنها در آنچه اختلاف می‌داشتند، روز رستخیز داوری خواهد کرد» سوره بقره، آیه ۱۱۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[انبیا]] داوران [[الهی]] برای [[رفع اختلافات]] [[بشر]] هستند و بر اساس [[کلام خدا]] در [[اختلافات]] بشری [[قضاوت]] می‌کنند و [[حق]] را از [[باطل]] جدا می‌سازند. البته از نظر [[قرآن]] همه [[انسان‌ها]] [[امت]] واحدی بودند و [[اختلافات]] عارضی موجب تفکیک و جداشدن آنان گردید: {{متن قرآن|وَمَا كَانَ النَّاسُ إِلَّا أُمَّةً وَاحِدَةً فَاخْتَلَفُوا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و مردم جز امّتی یگانه نبودند که اختلاف ورزیدند» سوره یونس، آیه ۱۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: سیدمحمدحسین طباطبایی، المیزان، ج۱۰، ص۳۱-۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[عبدالله نظرزاده|نظرزاده، عبدالله]]، [[فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات و مفاهیم سیاسی قرآن کریم]]، ص:۵۲-۵۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
واژه اختلاف در معانی و مفاهیم گوناگون به‌کار رفته است. این مفاهیم عبارت‌اند از تفاوت، [[نابرابری]]، ناسازگاری و [[منازعه]]. [[امام علی]]{{ع}} هر یک از این معانی و مفاهیم را مورد نظر قرار داده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[دانشنامه نهج البلاغه ج۱ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۱، ص ۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== اختلاف اصلی در جوامع بشری==&lt;br /&gt;
*نخستین اختلافی که در [[جامعه بشر]] رخ داد، بر سر &amp;quot;[[فرمان‌روایی]]&amp;quot; و &amp;quot;[[ولایت‌امری]]&amp;quot; بوده است؛ در ماجرای [[هابیل و قابیل]]، [[روایات]] صحیحه‌ای وجود دارد که بیان می‌کند [[اختلاف]] اصلی بر سر [[ولایت امر]] بوده است&amp;lt;ref&amp;gt;در روایت، امام صادق{{ع}} از کسانی که گفته‌اند نزاع فرزندان آدم{{ع}} در مورد ازدواج و انتخاب همسر بوده به شدت برآشفته شده و به راوی فرموده است: {{متن حدیث|أَمَا تَسْتَحْيِي أَنْ تَرْوِيَ هَذَا عَلَى نَبِيِّ اللَّهِ آدَمَ فَقُلْتُ: جُعِلْتُ فِدَاكَ فَفِيمَ قَتَلَ قَابِيلُ هَابِيلَ فَقَالَ: فِي الْوَصِيَّةِ ثُمَّ قَالَ لِي: يَا سُلَيْمَانُ إِنَّ اللَّهَ تَبَارَكَ وَ تَعَالَى أَوْحَى إِلَى آدَمَ أَنْ يَدْفَعَ الْوَصِيَّةَ وَ اِسْمَ اللَّهِ الْأَعْظَمَ إِلَى هَابِيلَ، وَ كَانَ قَابِيلُ أَكْبَرَ مِنْهُ، فَبَلَغَ ذَلِكَ قَابِيلَ فَغَضِبَ فَقَالَ: أَنَا أَوْلَى بِالْكَرَامَةِ وَ الْوَصِيَّةِ فَأَمَرَهُمَا أَنْ يُقَرِّبَا قُرْبَاناً بِوَحْيٍ مِنَ اللَّهِ إِلَيْهِ فَفَعَلاَ، فَقَبِلَ اللَّهُ قُرْبَانَ هَابِيلَ فَحَسَدَهُ قَابِيلُ فَقَتَلَهُ}}، «آيا شرم نمی‌کنی كه چنين چيزى را به پیامبر خدا آدم نسبت می‌دهى؟»، گفتم: «پس، از روی چه قابیل، هابیل را کشت؟» فرمود: «به‌سبب وصیّت». آنگاه فرمود: «ای سلیمان! همانا خداوند تبارک‌وتعالی به آدم{{ع}} وحی فرمود تا وصیّت و اسم اعظم الهی را به هابیل دهد؛ حال آنکه قابیل بزرگ‌تر بود». این سخن به قابیل رسید و خشمگین گشت و گفت: من به کرامت و وصیّت سزاوارترم. پس آدم به فرمان خداوند ایشان را امر کرد تا قربانی پیشکش کنند و چنین کردند و خدا قربانی هابیل را پذیرفت و قابیل نیز رشک ورزید و او را کشت». عیاشی، محمد بن مسعود، التفسیر، ج۱، ص۳۱۲؛ فیض کاشانی، محمد بن مرتضی، الصافی، ج۲، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[قابیل]] با [[آگاهی]] از اینکه [[حضرت آدم]]{{ع}} از سوی [[خدای متعال]] [[مأمور]] شده [[هابیل]] را &amp;quot;[[ولی امر]]&amp;quot; بعد از خود کند، به او [[حسد]] ورزید و او را کشت. بعضی گفته‌اند [[نزاع]] [[هابیل و قابیل]] بر سرِ دختر بوده است؛ به این صورت که یک دختر جنیه و یک دختر [[انسیه]] وجود داشته و پس از قرعه مشخص شد دختر [[زیبا]] رو به نام [[هابیل]] در آمد. آنگاه [[قابیل]] [[حسادت]] ورزید و برادرش را کشت&amp;lt;ref&amp;gt;احتمال می‌رود منشأ این تحلیل‌های نادرست، برخی روایات معتبر یا نامعتبر باشد؛ از جمله: {{متن حدیث|عَنْ بُرَيْدٍ الْعِجْلِيِّ عَنْ أَبِي جَعْفَرٍ{{ع}} قَالَ: إِنَّ اللَّهَ تَبَارَكَ وَ تَعَالَى أَنْزَلَ عَلَى آدَمَ حَوْرَاءَ مِنَ الْجَنَّةِ فَزَوَّجَهَا أَحَدَ اِبْنَيْهِ وَ تَزَوَّجَ الْآخَرُ اِبْنَةَ الْجَانِّ}}، «از برید بن معاویۀ عجلی روایت کرده که امام باقر{{ع}} فرمود: خداوند تبارک و تعالی حوریّه‌ای از بهشت فرو فرستاد و آدم او را بیکی از پسران خود تزویج کرد، و فرزند دیگرش را دختری از بنی جانّ تزویج نمود». ابن‌بابویه (صدوق)، محمد بن علی، من لا يحضره الفقيه، ج۳، ص۳۸۲. در روایتی دیگر نیز آمده است: {{متن حدیث|فَلَمَّا أَدْرَكَ قَابِيلُ مَا يُدْرِكُ الرَّجُلُ أَظْهَرَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ جِنِّيَّةً مِنْ وُلْدِ الْجَانِّ يُقَالُ لَهَا جُهَانَةُ فِي صُورَةِ إِنْسِيَّةٍ فَلَمَّا رَآهَا قَابِيلُ وَمِقَهَا فَأَوْحَى اللَّهُ إِلَى آدَمَ أَنْ زَوِّجْ جُهَانَةَ مِنْ قَابِيلَ فَزَوَّجَهَا مِنْ قَابِيلَ ثُمَّ وُلِدَ لآِدَمَ هَابِيلُ فَلَمَّا أَدْرَكَ هَابِيلُ مَا يُدْرِكُ الرَّجُلُ أَهْبَطَ اللَّهُ إِلَى آدَمَ حَوْرَاءَ وَاِسْمُهَا تُرْكُ الْحَوْرَاءِ فَلَمَّا رَآهَا هَابِيلُ وَمِقَهَا فَأَوْحَى اللَّهُ إِلَى آدَمَ أَنْ زَوِّجْ تُرْكاً مِنْ هَابِيلَ}}، «چون قابیل به سنّ بلوغ و تشخیص رسید، خداوند عزّوجلّ، دختری از فرزندان جنّیان را که جهانه نام داشت، به شکل یک انسان ظاهر و آشکار کرد؛ به محض آنکه نگاه قابیل به او افتاد، مهر او نیز به دلش افتاد، پس خداوند به آدم{{ع}} وحی فرستاد که جهانه را به عقد قابیل در آور و آدم چنین کرد. پس از آن، هابیل به دنیا آمد و چون به سنّ بلوغ و تشخیص رسید، خداوند عزّوجلّ، حوری بهشتی را که ترک نام داشت، به‌سوی آدم و به زمین فرستاد؛ به‌محض آنکه نگاه هابیل به او افتاد، مهر و او به دلش افتاد، پس خداوند به آدم وحی فرستاد که ترک را به عقد هابیل در آور». مجلسی، محمد باقر، بحارالأنوار، ج۱۱، ص۲۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این توجیهات، اعتباری ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;مقصود این است که نزاع هابیل و قابیل بر سر دختر نبوده، بلکه بر سر ولایت الله بعد از آدم بوده، اما اینکه هابیل یا قابیل با چه کسی و چگونه ازدواج کرده‌اند سخنی دیگر است که موضوع بحث ما در اینجا نیست.&amp;lt;/ref&amp;gt;، بلکه [[جنگ]] و [[نزاع]] بر [[ولایت‌امری]] بعد از [[حضرت آدم]] بوده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، تا مسأله [[ولایت]] حل نشود هیچ مسأله‌ای در [[اسلام]] حل نخواهد شد؛ نه‌تنها از نظر عملی و در صحنۀ میدانی، [[مشکلات]] حل نخواهد شد، بلکه در صحنۀ نظر و [[اعتقاد]] نیز اگر مسئلۀ [[ولایت امر]] و [[صاحبان امر]] در [[جامعه اسلامی]] مشخص نشود، هیچ مسأله‌ای حل نخواهد شد و [[آتش]] [[اختلاف]] و [[تفرقه]] دامنگیر همه چیز خواهد بود&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلَى شَرِيعَةٍ مِنَ الْأَمْرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«سپس تو را بر شریعتی از امر برگماشتیم» سوره جاثیه، آیه ۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. تمام [[اسلام]] &amp;quot;شریعة الامر&amp;quot; است و چیزی غیر از این نیست. این شریعة الأمر صاحب الامرش همان [[ولیّ الأمر]] است؛ بدین رو اگر در تشخیص [[ولی امر]] اشتباهی صورت بگیرد، نتیجه‌اش خطای نظری در تشخیص [[اسلام]] است و به دنبال آن، این خطای راهبردی به حیطۀ عمل خواهد رسید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اقسام اختلاف==&lt;br /&gt;
===اختلاف طبیعی===&lt;br /&gt;
# اختلاف در آفرینش جهان پیرامون&lt;br /&gt;
# اختلاف در آفرینش انسان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===اختلاف اجتماعی===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ارزیابی اختلاف==&lt;br /&gt;
===اختلاف مثبت===&lt;br /&gt;
===اختلاف منفی===&lt;br /&gt;
# [[اختلاف در دین]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[حل اختلاف]]==&lt;br /&gt;
===[[مرجع حل اختلاف]]===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== پرسش‌های وابسته ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جستارهای وابسته ==&lt;br /&gt;
* [[تفرقه]]&lt;br /&gt;
* [[رفع اختلاف]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:13681048.jpg|22px]] [[دانشنامه نهج البلاغه ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه نهج البلاغه&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس2}}&lt;br /&gt;
{{مدینه}}&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امام علی]]&lt;br /&gt;
[[رده:اختلاف]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل نهج البلاغه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B6%D8%B1%D9%88%D8%B1%D8%AA_%D9%86%D8%B5%D8%A8_%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85&amp;diff=409433</id>
		<title>ضرورت نصب امام</title>
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		<updated>2020-12-22T11:35:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[نصب امام]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[ضرورت نصب امام]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[ضرورت نصب امام در قرآن]] | [[ضرورت نصب امام در حدیث]] | [[ضرورت نصب امام در کلام اسلامی]] | [[ضرورت نصب امام در فلسفه اسلامی]] | [[ضرورت نصب امام در عرفان اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[ضرورت نصب امام (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0017.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0014.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==[[وجوب نصب امام بر خدا]] ([[امامت عامه]])==&lt;br /&gt;
*در اینکه این [[وجوب عقلی]] است یا [[شرعی]]؟ و به عبارتی دیگر: در اینکه این [[وجوب]]، به [[ضرورت عقلی]] ثابت می‌شود یا به [[ضرورت نقلی]] یا به هر دو؟ میان [[امامیه]] و سایر فِرَق [[اسلامی]] [[اختلاف]] وجود دارد. فِرَق دیگر تنها به [[وجوب شرعی]] قائل‌اند و به همین [[دلیل]]، [[نصب امام]] را از [[وظایف]] [[مکلفان]] و در زمره [[فروع]] و [[احکام فقهی]] می‌شمارند. اما [[دانشمندان]] [[امامیه]]، به تبع [[حکم عقل]] و [[آیات]] کریمه [[قرآن]]، [[نصب امام]] را از دایره [[وظایف]] [[مکلفان]] خارج می‌دانند و &amp;quot;[[وجوب نصب امام]] بر [[خدا]]&amp;quot; را هم به [[ضرورت عقلی]] ثابت می‌کنند و هم بر اساس [[نقل]] و [[ادله]] سمعی. به همین [[دلیل]]، [[امامت]] را بحثی [[فقهی]] نمی‌دانند؛ بلکه به عنوان اصلی از [[اصول اعتقادی]] - که از [[فروع]] مسائل [[توحید]] است - مورد بحث و بررسی قرار می‌دهند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این بحث، در منابع [[کلامی]] [[امامیه]] با عنوان &amp;quot;[[وجوب]] [[نصب]] الامام علی [[الله]]&amp;quot; مطرح است اما فِرَق دیگر، با عنوان &amp;quot;[[وجوب]] [[نصب]] الامام [[علی]] [[الناس]]&amp;quot; بررسی کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از جمله مباحثی که باید بدان پرداخته شود: بررسی و [[اثبات]] [[وجوب عقلی]] و [[وجوب]] [[نقلی]] [[نصب امام]]؛ همچنین پاسخ به این سؤال که: آیا این [[وجوب]] در همه زمان‌ها استمرار دارد یا خیر؟ اگر [[نصب امام]] در همه زمان‌ها [[واجب]] باشد معنایش این است مادامی که [[اطاعت خدا]] بر [[بندگان]] [[واجب]] است، پس هر جا اطاعتش [[واجب]] است، [[نصب امام]] هم [[واجب]] است؛ اگر اقامه [[حکم خدا]] [[واجب]] است - که همیشه [[واجب]] است در هر زمان و هر مکان - پس در هر زمان و مکان، [[وجود امام]] برای اقامه [[حکم خدا]] [[واجب]] است و اختصاص به زمان و مکان خاص ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==[[وجوب نصب امام]] پس از [[پیامبر خاتم]] ([[امامت خاصه]])==&lt;br /&gt;
*یکی از مباحث [[امامت]] درباره [[اثبات]] &amp;quot;[[وجوب نصب امام]] پس از [[پیامبر خاتم]]&amp;quot; تا [[روز قیامت]] است. البته در [[عرف]] [[امامیه]] نیازی نیست خصوص &amp;quot;پس از [[پیامبر خاتم]]&amp;quot; بحث شود؛ زیرا [[امامیه]] به &amp;quot;[[وجوب]] [[نصب]] [[حجت]]&amp;quot; در هر زمان و هر مکان [[اعتقاد]] دارد؛ خواه این [[نصب]]، پس از [[پیامبر]] باشد، یا پیش از او. اما در [[عرف]] [[اهل‌سنت]]، مسئله [[امامت]]، پس از [[پیامبر اکرم]]{{صل}} مطرح است و اساساً &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; را &amp;quot;[[خلافت]] بعد النبی&amp;quot; تعریف می‌کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بحثی که در اینجا مطرح است این است که: چگونه می‌شود [[پیامبر اکرم]]{{صل}}، [[امت]] خود را رها کند بی‌آنکه برای آنها [[امام]] و [[رهبری]] [[نصب]] کرده باشد؟! و در نهایت نتیجه این باشد که {{متن حدیث|مَاتَ رسولُ اللهِ وَلَمْ يُوصِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;مسند أحمد بن حنبل، ح۳۰۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. البته [[تاریخ]] [[مسلمین]] و تجربه [[عینی]] مربوط به [[مفاسد]] عظیمی که بر ادعای عدم [[نصب امام]] بعدالنبی{{صل}} مترتب گردید، [[دلیل]] روشنی بر بطلان چنین نظریه‌ای است. گذشته از آنکه [[عقل]] و [[نصوص]] [[شرعی]] قطعی و [[متواتر]]، این ادعا را که [[پیامبر اکرم]]، [[امت]] را بدون [[نصب امام]] رها کرده است، به شدت [[نفی]] می‌کند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
==خطرات داخلی و خارجی [[صدر اسلام]]==&lt;br /&gt;
* وجود خطرات خارجی و داخلی مانند [[منافقان]] و [[ظهور]] [[پیامبران]] دروغین مانند [[مسیلمه کذاب]] برای [[حکومت اسلامی]] و از آن مهم‌‌تر خطر [[تحریف]] و [[بدعت]] برای آموزه‌‌های [[اسلام]] اقتضا می‌‌‌کرد که [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} [[امت]] خود را در برابر این همه خطرات و هجمه‌‌ها تنها و رها نگذارد و با توجّه به [[علم لدنی]] که داشت [[بهترین]] گزینه برای [[تصدی]] [[مرجعیت علمی]] و [[مرجعیت دینی|دینی]] و نیز [[سیاست|سیاسی]] [[کشور]] را در نظر و [[نصب]] نماید. به عبارت ساده، [[مردم]] یک روستایی که [[گله]] خود را بدون چوپان نمی‌‌‌گذارند، چگونه ممکن است [[پیامبری]] مانند [[حضرت محمد]]{{صل}} [[امت]] خویش را بدون [[جانشین]] رها کند؟!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[نصب]] عامل [[حفظ وحدت]] و جلوگیری از [[اختلافات]] قومی‌==&lt;br /&gt;
*[[جامعه]]‌‌ها و به شکل بارز امت‌‌ها از مناطق و [[قبایل]]، نژادها و زبان‌‌های مختلفی تشکیل شده است که هر کدام خواهان به-دست گرفتن [[حکومت]] و یا حداقل سهیم شدن در آن به اندازه وزن و [[موقعیت]] خودشان می‌‌‌باشند. این تعدد و [[اختلاف]] موجب [[کشمکش]]، [[نزاع]] و چه‌‌بسا [[جنگ]] داخلی می‌‌‌گردد که چهره خشونت‌آمیز آن در [[جوامع]] متقدم بیشتر نمایان بود، نمونه بارز آن [[جنگ]] در [[قبیله]] معروف [[مدینه]] یعنی [[اوس]] و [[خزرج]] می‌‌‌باشد که تنها با رویکرد هر دو به [[اسلام]]، شعله [[جنگ]] خاتمه پیدا کرد. &lt;br /&gt;
*با [[رشد]] و نمو [[اسلام]] توسط [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} [[پیروان]] [[اسلام]] در مناطق و [[قبایل]] مختلف پراکنده و منتشر بودند، دو [[قطب]] قدرتمند [[مسلمانان]] یعنی [[مهاجران]] و [[انصار]] هر کدام به عنوان [[رقیب]] برای [[تصدی]] [[حکومت]] طرح و برنامه‌‌ای داشته و یا درصدد قبضه [[حکومت]] بعد از [[رحلت]] [[پیامبر اکرم]]{{صل}} بودند. این نکته را جریان [[سقیفه]] [[تأیید]] می‌‌‌کند. با وجود عدم [[تدفین]] جنازه [[مبارک]] [[پیامبر اسلام]]{{صل}}، [[انصار]] با لفور در محلی به نام [[سقیفه]] جمع شده و برای خود شخصی به نام سعدبن‌‌عباده را به عنوان [[رهبر]] [[انتخاب]] نمودند؛ این طرح یا خبر به [[گوش]] [[عمر]] و [[ابوبکر]] رسیده و خودشان را شتاب‌‌زده به [[سقیفه]] رساندند و مدعی شدند که [[رهبری]] شما &amp;quot;[[انصار]]&amp;quot; را سران [[قریش]] نمی‌‌‌پذیرند، امّا با این [[دلیل]] [[انصار]] به عقب‌‌نشینی از صحنه [[قدرت]] و [[سیاست]] حاضر نشدند تا این‌‌که [[ابوبکر]] به اصل [[نص]] [[نبوی]] [[متوسل]] شد که [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} فرموده که [[امامت]] و [[خلافت]] باید از [[قریش]] باشد، [[ابوبکر]] برای تکمیل نظر خود به [[انصار]] [[وعده]] [[وزارت]] داد&lt;br /&gt;
*از این قطعه [[تاریخی]] روشن می‌‌‌شود که اصل [[نص]] [[نبوی]] بود که شعله [[اختلاف]] و مناقشه را به نفع [[ابوبکر]] خاموش کرد. &lt;br /&gt;
*حال این سؤال مطرح است که [[نص]] کلی در [[تعیین امام]] از [[قبیله]] [[قریش]] آیا خود مسئله و [[اختلاف]] - ساز نخواهد بود؟ چراکه [[قبیله]] [[قریش]] خود بر هزاران فرد شامل است که ده‌‌ها فرد می‌‌‌تواند مدعی [[خلافت]] و [[امامت]] گردد، چنان‌که [[عمر]] [[خلافت]] را در [[سقیفه]] به [[ابوبکر]] هدیه داد و در عضو [[ابوبکر]] نیز [[عمر]] را [[خلیفه]] بعد از خود [[نصب]] کرد. &lt;br /&gt;
*اگر مصلحت‌‌اندیشی [[حضرت علی]]{{ع}} نبود، [[شیعیان]] آن [[حضرت]] [[خلافت]] [[ابوبکر]] را برنتافته و دامن [[اختلاف]] و [[جنگ]]، [[اسلام]] را فراگرفته و درخت نوپای [[حکومت اسلامی]] را [[تهدید]] می‌‌‌کرد. &lt;br /&gt;
*پس اصل [[نص]] خاص و عمل به آن می‌‌‌توانست [[بالندگی]] و [[شکوه]] [[اسلام]] را [[حفظ]] و از [[اختلاف]] و [[جنگ]] جلوگیری کند. این نکته مورد [[تأیید]] بعض [[فلاسفه]] نیز قرار گرفته است &amp;lt;ref&amp;gt;«الأستخلاف بالنص أصوب فان ذلک لایؤدی الی التشعب و التشاغب و الأختلاف»، (بوعلی سینا، الهیات شفا، ص ۴۵۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[علم]] به شخص [[اصلح]] و [[لزوم]] معرفی و [[نصب]] آن==&lt;br /&gt;
*گفته شد که [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} هم از کانال عادی و هم کانال [[وحی]] به فرد [[شایسته]] و [[اصلح]] از همه جهات برای [[تصدی]] [[مرجعیت دینی]] و [[سیاست|سیاسی]] [[علم]] و [[آگاهی]] داشت، اگر با این فرض [[حضرت]] فرد مزبور را به این [[مقام]] [[نصب]] ننماید، نه تنها [[امت]] خویش را از [[رهبری دینی]] و [[سیاست|سیاسی]] فرد [[اصلح]] [[محروم]] نموده است، بلکه به نوعی با روی کار آمدن شخص غیر [[اصلح]] و چه‌‌بسا شخص ناکارآمد به آسیب‌‌پذیری دو نهال نوپای خود نیز کمک نموده است. &lt;br /&gt;
*چنین فرضی از [[پیامبر]] [[حکیم]] و [[دلسوز]] به [[دین]] و [[امت]] بعید و بلکه محال است. به تقریر دیگر، [[عقل]] به تقدیم [[فاضل]] بر [[مفضول]] و ترجیح [[اصلح]] بر [[صالح]] [[حکم]] می‌‌‌کند و این [[حکم عقل]] نیز مورد [[تأیید]] [[قرآن کریم]] است: {{متن قرآن|قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ قُلِ اللَّهُ يَهْدِي لِلْحَقِّ أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لاَّ يَهِدِّيَ إِلاَّ أَن يُهْدَى فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;  بگو آیا از شریکانتان کسی هست که به سوی «حق» رهنمون باشد؟ بگو خداوند به «حق» رهنماست؛ آیا آنکه به حقّ رهنمون می‌گردد سزاوارتر است که پیروی شود یا آنکه راه نمی‌یابد مگر آنکه راه برده شود؟ پس چه بر سرتان آمده است؟ چگونه داوری می‌کنید؟؛ سوره یونس، آیه: ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بر این اساس [[پیامبر اسلام]]{{صل}} نیز خود به عنوان یکی از عقلا بلکه [[عقل]] کل بر [[حکم]] فوق مطلع بوده و می‌‌‌بایست عمل نیز بنماید و لازمه عمل آن [[تعیین]] فرد [[اصلح]] و [[شایسته]] است وگرنه [[مخالفت]] با [[حکم عقل]] لازم می‌‌‌آید که از [[شأن]] و [[منزلت]] آن [[حضرت]] بعید می‌‌‌باشد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اعتبار [[عصمت امام]] مقتضی [[نصب]]==&lt;br /&gt;
*در بحث [[فلسفه امامت]] [[گذشت]] که [[امام]] برای [[حفظ دین|حفظ صحیح دین]] و صیانت [[خالص]] از آن می‌‌‌بایست [[معصوم]] باشد تا [[تفاسیر]] وی نیز از [[عصمت]] و [[حجیت]] ذاتی برخوردار گردد.&lt;br /&gt;
*با این نگاه به [[امامت]] و شخص [[امام]] روشن می‌‌‌شود که راهکار دیگر یعنی [[تعیین امام]] از طریق [[شورا]] یا [[بیعت]] ممکن نیست؛ چراکه آنان به [[عصمت]] شخص [[معصوم]] [[علم]] ندارند و [[علم]] آن در [[اختیار]] [[خداوند]] است که آن را به پیامبرش منتقل می‌‌‌نماید&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[کشف]] المراد، ص ۴۹۵؛ الشافی فی الأمامه، ج ۲، ص ۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[نصب]] لازمه [[دین]] خاتم و جاودان==&lt;br /&gt;
*[[آیین]] و [[شرایع]] [[پیامبران پیشین]] موقتی بود، به این صورت که [[آیین]] و برنامه آنان بعد از مدتی با [[ظهور]] [[پیامبر]] دیگر [[نسخ]] می‌‌‌شد. در این صورت وجود [[جانشین]] در همه عرصه‌‌ها خیلی هم ضروری نبود، امّا [[آیین]] [[اسلام]] [[آیین]] جاودان، [[جهانی]] و خاتم است که بعد از آن هیچ [[پیامبری]] [[ظهور]] نخواهد کرد. چنین آیینی برای [[حفظ]] [[موقعیت]] خود در [[جهان]] و جلوگیری از خطر [[انحراف]]، [[بدعت]] و [[تحریف]]، به [[جانشینی]] در حد [[دین]] خاتم و جهانی لازم دارد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[تعیین جانشین]] رویه [[پیامبران پیشین]]==&lt;br /&gt;
*هر چند گفته شد [[تعیین جانشین]] با [[آیین خاتم]] بیشتر تناسب و سنخیت دارد، لکن نگاهی به زنگی [[دینی]] [[پیامبران]] خصوصاً [[پیامبران]] بزرگ روشن می‌‌‌کند که آنان برای [[حفظ]] و صیانت [[آیین]] و [[شریعت]] خود نوعاً به [[تعیین]] [[وصی]] و [[جانشین]] پرداختند، نخستین [[پیامبر]] یعنی [[حضرت آدم]] [[شیث]] و اوقینان تا [[پیامبر خاتم]] [[پیامبر]] و [[وصی]] بعدی خود را با [[امر الهی]] [[انتخاب]] نمودند. [[ابوالحسن مسعودی]] در کتاب معروف خو [[اثبات الوصیه]] لیست [[جانشینان]] [[پیامبران]] را به رشته تحریر درآورده است. &lt;br /&gt;
*حال چگونه ممکن است [[پیامبران پیشین]] با وجود [[پیامبر خاتم]] نبودنشان به [[تعیین جانشین]] [[دست]] زنند، امّا [[پیامبر اسلام]] با فرض [[خاتم بودن]]، جاودان و [[جهانی بودن]] دینش هیچ [[جانشین]] در [[دین]] معرفی نکرده باشد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[تعیین جانشین]] و [[وصی]] سفارش [[قرآن]]==&lt;br /&gt;
*[[قرآن کریم]] [[مسلمانان]] را موقع [[مرگ]] به [[نوشتن]] [[وصیت]] سفارش و امر می‌‌‌کند: {{متن قرآن|كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt; بر شما مقرر شده است که هرگاه مرگ یکی از شما فرا رسد، اگر مالی بر جای نهد برای پدر و مادر و خویشان وصیّت شایسته کند؛ بنا به حقّی بر گردن پرهیزگاران؛ سوره بقره، آیه: ۱۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[قرآن کریم]] که به [[وصیت]] در امور جزئی و [[خانوادگی]] این همه اهمیت می‌‌‌دهد و تأکید می‌‌‌کند و [[مسلمانان]] نیز خود را [[متعهد]] به آن می‌‌‌دانند چگونه ممکن است که درباره یک مسئله مهم و کلیدی یعنی [[تعیین]] [[جانشینی]] [[دینی]] و [[سیاست|سیاسی]] برای [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} هیچ سخنی نگفته باشد و [[پیامبر]] نیز بدون [[وصیت]] از کنار آن بگذرد؟ آیا این نسبت [[طعن]] و زیر سؤال بردن [[شخصیت]] [[پیامبر]] نیست که آن [[حضرت]] برخلاف [[آیه]] مزبور هیچ وصیتی درباره [[امت]] خود نکرده است؟  &amp;lt;ref&amp;gt;ر. ک فضل بن شاذات، الأیضاح، ص ۱۰۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[تعیین جانشین]] مبنا و رویه [[پیامبر]] در [[اداره کشور]]==&lt;br /&gt;
*نگاهی به [[تاریخ]] [[حکومت]]‌‌داری [[پیامبر اعظم]]{{صل}} نشان می‌‌‌دهد آن [[حضرت]] در سفرهای مختلفی مانند شرکت در جبهه‌‌های [[جنگ]] که از پایتخت [[حکومت]] خویش یعنی [[مدینه]] خارج می‌‌‌شد [[جانشین]] خود را [[تعیین]] می‌‌‌کرد تا در غیاب [[حضرت]]، امور [[اداری]]، [[سیاست|سیاسی]] و [[حکومت|حکومتی]] تعطیل نماند. [[حضرت علی]]{{ع}}، این مکتوم و معاذ از شمار صحابه‌‌ای هستند که در غیاب [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} [[جانشین]] آن [[حضرت]] شدند. &lt;br /&gt;
*حال این سؤال پیش می‌‌‌آید [[پیغمبری]] که به مسائل [[حکومت]] این همه توجّه و [[عنایت]] دارد، چگونه ممکن است از [[تعیین جانشین]] خود بعد از [[رحلت]] چشم‌‌پوشی کند؟ &amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: کشف‌المراد، ص ۴۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; در حالی که خطر و آسیب آنبه مراتب بیشتر است، که به بعضی اشاره شد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==لازمه عدم [[نص]]، [[برتری]] دو [[خلیفه اول]] بر [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} ‌==&lt;br /&gt;
*نگاهی به [[تاریخ]] دو [[خلیفه اول]] نشان می‌‌دهد که هردو [[خلیفه]] به [[بیعت]]و [[انتخاب]] [[مردم]] توجهی نداشتند و [[حاکم]] بعدی را خودشان [[تعیین]] [[نصب]] نمودند. [[ابوبکر]] هنگام به یاری‌اش ب [[عثمان]] که دبیر [[خلیفه]] بود، سفارش نمود اسم [[عمر]] را به عنوان [[خلیفه]] و [[جانشین]] وی بنویسد و از [[مردم]] نیز خواست از او [[اطاعت]] کنند: &amp;quot;من [[عمر بن خطاب]] را جانشين خود در ميان شما مى‌سازم پس گوش به فرمانش باشيد و از وى [[اطاعت]] كنيد&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|&amp;quot; فانی استخلفت علیکم عمر بن الخطاب فاسمعوا و اطیعوه ‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}؛ تاریخ مدینة دمشق، ج۱۸، ص۳۱۰، تاریخ طبری، ج۲، ص۵۹۱، حوادث سال ۱۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[عمر]] نیز نزدیک فوت خود بدون توجّه به [[انتخاب]] مرد در [[اندیشه]] [[تعیین]] [[حاکم]] و [[جانشین]] خود برآمد ولکن به‌جای یک نفر شش نفر به نام‌های: [[عثمان]]، [[طلحه]]، [[زبیر]]، [[عبدالرحمن]]، [[سعد بن ابی وقاص]] و [[امام علی|علی]]{{ع}} را مشخص کرد و [[دستور]] داد یکی از این شش تن با [[رأی]] یثسه به عنوان [[خلیفه]] [[برگزیده]] و [[انتصاب]] گردد. در متن کتاب خواهد آمد - چنان‌که [[امام علی|علی]]{{ع}} نیز به آن تصریح می‌‌کند - نتیجه و برآیند [[شورای شش‌نفره]] فوق یعنی [[انتخاب]] [[عثمان]] پیشاپیش معلوم بود. بر این اساس [[خلیفه اول]] و دوم به [[فکر]] [[مردم]] و [[آینده]] [[کشور]] و به حسب ظاهر [[آینده]] [[دین]] نیز بودند و برای جلوگیری از هر نوع خطر احتمالی پیش از [[مرگ]] خودشان به چاره پرداختند. &lt;br /&gt;
*آیا [[پیامبر اعظم]]{{صل}} که همه هستی خویش را [[وقف]] [[دین]] [[اسلام]] کرده بود، به اندازه دو [[خلیفه]] آینده‌نگر و در [[مقام]] چاره‌اندیشی نبود؟ اهل سن باید جواب بدهند ک آیا [[سیره]] دو [[خلیفه اول]] در [[تعیین جانشین]] خودشان عمل [[مشروع]] و خالی از محذور بود یا نه؟ &lt;br /&gt;
*اگر عمل آن دو غیر [[مشروع]] و خالی از اشکال و محذور نبود، ما اینجا حرفی نداریم جز اینکه [[اهل سنت]] به عمل غیر [[مشروع]] [[شیخین]] خود اعتراف کردند. امّا اگر عمل [[مشروع]] و [[عقلانی]] و عقلایی بود، سؤال می‌‌کنیم، چرا [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} چنین نکرد؟ آیا - العیاذ بالله - [[حضرت]] با وجود اتصال به [[وحی]] در [[مقام ثبوت]] و [[شناخت]] به این [[درک]] نرسیده بود، یا اینکه - العیاذ بالله - عمدا [[مصلحت]] جامع و [[دین]] را نادیده انگاشت و [[امت]] را به حال خود رها کرد؟ لازمه این مبنای [[اهل سنت]] این است که [[شیخین]] - العیاذ بالله - حداقل در این [[مقام]] از [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} [[برتر]] و [[افضل]] باشند!و این لازمه را خود [[اهل سنت]] بر‌نمی‌تابند. &lt;br /&gt;
*این چالش از سده‌های پیش گرفتار [[اهل سنت]] بوده است. [[ابن ابی الحدید]] در شرح فرازهای [[نهج‌البلاغه]] ک بر اصل [[نصب]] دلالت می‌‌کند، یکی از [[ادله]] خود در توجیه آنها را واهمه از [[مخالفت]] [[صحابه]] به [[نص]] ذکر می‌کند، چنان‌که در ذیل خطبه۱۶۳ {{متن حدیث|فَإِنَّهَا كَانَتْ أَثَرَةً شَحَّتْ عَلَيْهَا نُفُوسُ قَوْم‏ }} از استاد خود [[ابو جعفر یحیی محمد علوی]]، از کسانی می‌‌پرسد که برحق [[حضرت]] &amp;quot;[[حکومت]]&amp;quot; [[هجوم]] بردند که آیا مراد جریان [[سقیفه]] است یا [[شورای شش‌نفره]] [[عمر]] که به [[انتخاب]] [[عثمان]] منجر شد؟ که وی روز را جواب می‌‌دهد &amp;lt;ref&amp;gt;توضیح اینکه این ابی الحدید بعداز این کلام باز اشکال می‌‌کند که ظاهر [[خطبه]] فوق استدلال حضرت از طریق اولویت ونه نص است. ابوجعفر در پاسخ می‌‌گوید چون این [[خطبه]] در جواب سائلی است که می‌‌پرسد که بااینکه تو از دیگران به حکوت و [[پیامبر]] نزدیک و اولی بودی چرا از [[حکومت]] کنار گذاشتند؟ به این دلیل حضرت جواب مناسب سائل راداد. افزون بر جواب ابوجعفر ما در متن کتاب به صورت متعدد به [[احتجاج]]‌های حضرت به اصل [[نصب]] اشاره خواهیم کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[ابن ابی الحدید]] به عنوان یک [[سنی]] اعتراف می‌کند‌ که نفس من اجازه نمی‌دهد که [[صحابه]] را به [[عصیان پیامبر]]{{صل}} متهم کنم؟ {{عربی|&amp;quot; ان نفسی لا تسامحنی ان السب الی الصحابه عصیان رسول‌الله{{صل}} و دفع النص‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏‏&amp;quot;}}.&lt;br /&gt;
*در اینجا استاد [[ابن الی الحدید]] - که وی او را دانشمند منصف و وافر [[عقل]] توصیف می‌‌کند - چنین جواب می‌‌دهد که نفس من نیز اجازه نمی‌دهد که [[پیامبر خاتم|پیامبر]]{{صل}} ‌را به اهمال در امر [[امامت]] و [[رهبری]] [[امت]] خود و رها کردن آنان متهم کنم، [[پیامبری]] که در هر سفری در [[مدینه]] [[جانشین]] خود را مشخص می‌‌کرد. [[ابوجعفر]] به تفضیل جواب خود را توضیح می‌‌دهد تا اینکه [[ابن ابی الحدید]] قانع شده و می‌‌گوید در جواب من [[نیکو]] گفت: {{عربی|اندازه=۱۵۰%|&amp;quot;لقد احسنت فیما قلت&amp;quot;}}&amp;lt;ref&amp;gt;شرح نهج البلاغه، ج۹، صص۲۴۸، و۲۵۰. &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[کشف]] نه [[نصب]]==&lt;br /&gt;
*نکته آخری که درباره [[نظریه انتصاب]] [[شیعه]] باید گفت این است که [[شیعه]] با [[الهام]] از [[آیات]] و صریح [[روایات نبوی]] بر این [[اعتقاد]] است که[[وجود نورانی]] [[حضرت علی]]{{ع}} پیش از [[آفرینش]] عالم مادی مورد توجّه و [[عنایت الهی]] بوده و در [[دنیا]] نیز صفات و [[فضایل]] لازم برای [[انسان کامل]] از جهت فردی و [[اجتماعی]] و [[دینی]] [[سیاست|سیاسی]] را کسب نموده بود. با این فرض آن [[حضرت]] از هان بدو [[رسالت]] خودبه‌خود ملاک [[جانشینی]] [[پیامبر خاتم|پیغمبر]]{{صل}} را دارا بود و اصلاً به [[نصب]] و [[تعیین]] نیازی نداشت. &lt;br /&gt;
*به دیگر سخن، [[نصب]] و [[تعیین]] از صفات اعتباری و به امور جعلی تعلق دارد، درحالی که [[مقام]] [[جانشینی]] [[پیامبر]] [[امر]] [[تکوینی]] [[حقیقی]] است و با دارا بودن صفات آن، خودبه‌خود به [[مقام]] [[جانشینی]] می‌‌رسد و به [[جعل]] و [[نصب]] نیازی نیست. &lt;br /&gt;
*باری [[جعل]] و [[نصب]] - که در [[آیات]] و [[روایات]] آمده است - نه در [[مقام]] [[جعل]] [[حقیقی]] بلکه در [[مقام]] [[ارشاد]] و رهنمایی به مصداق [[حقیقی]] و [[تکوینی]] و در واقع کاشف از [[مقام]] [[تکوینی]] هستند. توضیح آن در نقد [[شبهه]] موروثی نمودن [[امامت]] خواهد آمد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==اشکالات [[علم فقه|فقهی]] و [[حقوقی]] نظریه [[رقیب]] &amp;quot;[[انتخاب]]&amp;quot;== &lt;br /&gt;
*نظریه [[رقیب]] یعنی [[انتخاب]] [[خلیفه]] از طریق [[شورا]] و [[بیعت]] مخصوصاً [[بیعت|بیعتی]] که در [[سقیفه]] توسط چند نفر اتفاق افتاد، فاقد [[مشروعیت]] [[دینی]] است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
* [[پرونده:978964298273.jpg|22px]] [[محمد حسن قدردان قراملکی|قدردان قراملکی، محمد حسن]]، [[امامت ۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039;]].&lt;br /&gt;
* [[پرونده:3073589.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/2dil0?playlist=376197 درس دوم «امامت در اندیشه اسلامی»]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{یادآوری پانویس}}&lt;br /&gt;
{{پانویس2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مقاله‌های اولویت دو]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0018.webm&amp;diff=409432</id>
		<title>پرونده:V0018.webm</title>
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		<updated>2020-12-22T11:25:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: تحقق نصب امام پس از نبی

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
تحقق نصب امام پس از نبی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>پرونده:V0017.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0017.webm&amp;diff=409067"/>
		<updated>2020-12-21T21:03:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: وجوب نصب امام پس از پیامبر

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
وجوب نصب امام پس از پیامبر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0016.webm&amp;diff=409066</id>
		<title>پرونده:V0016.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0016.webm&amp;diff=409066"/>
		<updated>2020-12-21T20:44:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: تحقق نصب امام از سوی خدا

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
تحقق نصب امام از سوی خدا&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0015.webm&amp;diff=408987</id>
		<title>پرونده:V0015.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0015.webm&amp;diff=408987"/>
		<updated>2020-12-21T12:18:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: ویژگی های لازم امامت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
ویژگی های لازم امامت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0014.webm&amp;diff=408963</id>
		<title>پرونده:V0014.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0014.webm&amp;diff=408963"/>
		<updated>2020-12-21T12:05:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: وجوب نصب امام برخدا

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
وجوب نصب امام برخدا&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0013.webm&amp;diff=408935</id>
		<title>پرونده:V0013.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0013.webm&amp;diff=408935"/>
		<updated>2020-12-21T11:39:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: مبادی تصدیقیه امامت شناسی

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
مبادی تصدیقیه امامت شناسی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0012.webm&amp;diff=408210</id>
		<title>پرونده:V0012.webm</title>
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		<updated>2020-12-20T14:49:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: مبادی تصوریه و تصدیقیه امامت شناسی

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
مبادی تصوریه و تصدیقیه امامت شناسی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0011.webm&amp;diff=407018</id>
		<title>پرونده:V0011.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0011.webm&amp;diff=407018"/>
		<updated>2020-12-14T21:31:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: (افسانه تابیر نخل آیت الله اراکی)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
(افسانه تابیر نخل آیت الله اراکی)&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=405859</id>
		<title>امامت در لغت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=405859"/>
		<updated>2020-12-09T10:04:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: ویرایش Seyedmahdi (بحث) به آخرین تغییری که Wasity انجام داده بود واگردانده شد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] | [[امامت در قرآن]] | [[امامت در حدیث]] | [[امامت در نهج البلاغه]] | [[امامت در معارف دعا و زیارات]] | [[امامت در کلام اسلامی]] | [[امامت در معارف و سیره رضوی]] | [[امامت از دیدگاه اهل سنت]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] و [[رهبری]] [[امامت]] از ریشۀ &amp;quot;ا م م&amp;quot; در لغت به معنای قصد، [[پیشوایی]]، پیشروی و [[رهبری]]&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۲۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امام]] به معنای [[پیشوا]]، پیشرو، [[مقتدا]]، قیِّم، [[مصلح]]، [[الگو]]، راه اصلی و [[راهنما]]&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۲۱۳-۲۱۵؛ المفردات، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و کسی که همواره مقصود و [[هدف]] حرکت و تلاش دیگران قرار گیرد، آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۱، ص۱۳۶-۱۳۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* واژه [[امام]] در لغت از ریشه “ام” است که معانی گوناگونی دارد. یکی از آنها [[مقتدا]] و پیشواست. طریحی می‌گوید: “امام به کسر الف، بر وزن فِعال به معنای کسی است که از او [[پیروی]] می‌شود”&amp;lt;ref&amp;gt;فخرالدین الطریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مؤلف [[کتاب]] [[معانی الاخبار]] نیز در توضیح وجه تسمیه [[امام]] می‌گوید: “امام را [[امام]] نامیدند به [[دلیل]] اینکه او پیشرو و مقتدای [[مردم]] است”&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن علی بابویه قمی (شیخ صدوق)، معانی الأخبار، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین [[امامت]]، همان [[ریاست عامه]] بر همه [[مردم]] است که اگر لابشرط بیاید، منظور همان [[ریاست]] [[پیامبر]] و [[رسالت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإِمَامَةُ: هي الرئاسة العامة على جميع الناس، فإذا أخذت لا بشرط شي‏ء تجامع النبوة و الرسالة، و إذا أخذت بشرط لا شي‏ء لا تجامعهما}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵).&amp;lt;/ref&amp;gt;. پس به گروهی خاص که از نظر [[فکری]]، [[اعتقادی]]، [[سیاسی]] یا زبانی، زمانی و مکانی در یک امر یا اموری خاص با یکدیگر اشتراک دارند و با یکدیگر یکی شده‌اند [[امت]] می‌گویند و رهبرشان نیز [[امام]] نامیده می‌شود. بنابراین سه واژۀ [[امام]]، [[امامت]] و [[امت]] لازم و ملزوم یکدیگرند و بدون هم معنا ندارند. [[امت]] نیز به گروهی گفته می‌شود که اعضای آن به سبب [[پیروی از امام]] واحد به نوعی با یکدیگر انتساب داشته باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: لطف الله صافی، نظام امامت و رهبری، ص۱۱-۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* نکته مهم اینکه معنای [[پیشوا]] لزوماً مثبت نیست، بلکه ممکن است [[پیشوا]] [[عادل]] یا [[فاسق]] و [[ظالم]] باشد. در [[قرآن]] کلمه [[پیشوا]] به هر دو مورد گفته شده است. در آیه‌ای آمده است: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، و در جای دیگر می‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[آیه]] نخست [[امام]] به پیشوای خیر و در [[آیه]] دوم [[امام]] به پیشوای [[شر]] گفته شده است. [[امام]] به معنای مقدم نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴-۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[قرآن]] درباره [[فرعون]] همین تعبیر را به کار برده است: {{متن قرآن|يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید» سوره هود، آیه ۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین [[امام]] به معنای طریق و [[راه]] نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يقال للطريق إِمَامٌ، لأنّه يُؤَمُّ أي يقصد و يتبع}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt;. ابن‌منظور در لسان العرب [[معتقد]] است که [[امام]] (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم‌ریشه است و هر دو از ریشه “أمّ، یؤمّ” به معنای قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۶؛ جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر یزدی مطلق، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژه [[امام در قرآن]] در غالب معانی لغوی آن به کار رفته است. البته واژه [[امام در قرآن]] کاربردهای فراوانی دارد که تفلیسی در وجوه القرآن، پنج معنای آن را به شرح ذیل برشمرده است:&lt;br /&gt;
* گاهی [[امام]] به معنای [[مقتدا]] و پیشواست: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، نیز در آیه‌ای دیگر به همین معنا آمده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به معنای [[نامه]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[لوح محفوظ]]: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[تورات]] نیز به کار رفته است: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مقصود از [[امام]] در [[آیه]] اخیر، [[تورات]] است. در [[قرآن]] [[امام]] به معنای [[راه]] آشکار و روشن نیز آمده است: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ مراد [[راه]] واضح و آشکار است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جیش بن ابراهیم تفلیسی، وجوه القرآن، ترجمه مهدی محقق، ص۲۸-۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت]]، ص ۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[راغب اصفهانی]]==&lt;br /&gt;
*[[راغب اصفهانی ]] در &amp;quot;مفردات&amp;quot; چنین می‌گوید: {{عربی|&amp;quot;اَلْإِمَامُ: المُؤتَمُّ بِهِ؛ إنساناً كانَ يُقتَدى بِقَولِهِ أو فِعلِهِ، أو كِتاباً، أو غَيرَ ذلِكَ، مُحِقّاً كانَ أو مُبطِلاً، وجمعه: أَئِمَّةٌ. وقولُه تَعَالى:}} {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر گروه مردم را با پیشوایشان فرامی‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|؛ أي: بالذي يقتدون به، وقيل: بكتابهم&amp;quot;}}&amp;lt;ref&amp;gt;راغب اصفهانی، حسین بن محمد، مفردات ألفاظ القرآن، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: هر کسی که [[مردم]] به او ائتمام کنند؛ یعنی پشت سر او قرار بگیرند و حرکت کنند، او [[امام]] است. [[امام]] آن است که جلو باشد و [[مردم]] به او [[اقتدا]] کنند. حال، آن [[امام]] و [[مقتدا]] یا [[انسان]] است، یا کتابی است که [[انسان]] به [[معارف]] آن عمل می‌کند. پس اگر [[امامت]]، به کتاب هم [[تفسیر]] شود، از باب همین اقتداست؛ گرچه در [[روایات]] ما، [[امام]] به همان {{عربی|مَنْ يُقتَدَى بِه}} [[تفسیر]] شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*از [[کلام]] [[راغب اصفهانی]] این‌گونه استفاده می‌شود که [[امامت]] به معنای [[مقتدا]] و متقدم بودن است.[[اقتدا]] کردن نیز به معنای [[تبعیت]] و [[پیروی]] است. [[خدای متعال]] در [[وصف]] رابطه [[فرعون]] و قومش می‌فرماید: {{متن قرآن|فَاتَّبَعُوا أَمْرَ فِرْعَوْنَ وَمَا أَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَشِيدٍ * يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَأَوْرَدَهُمُ النَّارَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنگاه، آنها از فرمان فرعون پیروی کردند و فرمان فرعون از سر [کمال رهیافتگی و] کاردانی نبود * او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید و آنان را به دوزخ درمی‌آورد» سوره هود، آیه ۹۷-۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. طبق این [[آیه]]، [[دلیل]] تقدّم و پیش‌روی [[فرعون]] بر قومش در [[روز قیامت]] این است که [[قوم]] [[فرعون]] از امر او [[پیروی]] کرده‌اند و این نکته نشان می‌دهد مسئلۀ اصلی و سرنوشت‌ساز [[امت‌ها]] و [[ملت‌ها]]، &amp;quot;[[اتّباع]] [[امر]]&amp;quot; است. بنابراین، &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; و &amp;quot;ائتمام&amp;quot; ([[پذیرش]] [[امامت]]) به معنی &amp;quot;[[اتّباع]] [[امر]]&amp;quot; یا &amp;quot;[[اتّباع]] در فعل و قول&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; یعنی &amp;quot;تقدّم&amp;quot;، &amp;quot;[[مقتدا]] شدن&amp;quot; و &amp;quot;متبوع شدن&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[ابن‌منظور]]==&lt;br /&gt;
*[[ابن‌منظور]] در &amp;quot;لسان العرب&amp;quot; در باره این ریشه لغوی می‌گوید: {{عربی|أَمَّ القومَ وأَمَّ بِهِمْ: تقدَّمهم، وَهِيَ الإِمامةُ. والإِمامُ: كُلُّ مَنِ ائتَمَّ بِهِ قومٌ كَانُوا عَلَى الصِّرَاطِ الْمُسْتَقِيمِ أَو كَانُوا ضالِّين... [قال] ابْنُ سِيدَهْ: والإِمامُ مَا ائْتُمَّ بِهِ مِنْ رئيسٍ وغيرِه، وَالْجَمْعُ أَئِمَّة. وَفِي التَّنْزِيلِ الْعَزِيزِ:}} {{متن قرآن|فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«با پیشگامان کفر کارزار کنید» سوره توبه، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|؛ أَي: قاتِلوا رؤساءَ الكُفْر وقادَتَهم الَّذِينَ ضُعَفاؤهم تَبَعٌ لَهُمْ... وقال الْمَازِنِيُّ: أُيَيْمَة وَلَمْ يقلِب، وإِمامُ كلِّ شَيْءٍ: قَيِّمُهُ والمُصْلِح لَهُ، والقرآنُ إِمامُ المُسلمين، وسَيدُنا مُحَمَّدٌ رَسُولُ الله{{صل}}: إِمام الأَئِمَّة، وَالْخَلِيفَةُ: إِمَامُ الرَّعِيَّةِ، وإِمامُ الجُنْد: قَائِدُهُمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌منظور، محمد بن مکرم، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: این واژه، به صورت متعدی و لازم به کار برده می‌شود. اگر گفته شود: {{عربی|أَمَّ القومَ وأَمَّ بِهِمْ}} یعنی: بر آنها مقدم شد؛ نه اینکه فقط از لحاظ مکانی، بلکه از لحاظ عمل؛ او جلو باشد و اینها مثل او عمل کنند. ازاین‌رو، می‌گوید: معنای {{متن قرآن|فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ}} اینکه: با سران و [[رهبران]] [[کفر]] بجنگید؛ آنان که [[ضعیفان]]، تابعشان بودند. پس [[امامت]] به معنای [[مقتدا]] بودن است و [[مقتدا]] شدن به این است که دیگران [[تبعیت]] کنند. بنابراین، محور اصلی این واژه &amp;quot;[[تبعیت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; است. در ادامه گفته است:[[امام]] هر چیزی [[قیّم]] بر آن است؛ یعنی [[امام]]، آن کسی است که [[مسئولیت]] [[اصلاح]] چیزی را بر عهده دارد. در انتهای سخن نیز برخی از استعمالات [[امام]] را برمی‌شمارد و می‌گوید: [[قرآن]] [[امام]] [[مسلمین]] است و [[خلیفه]] [[امام]] [[رعیت]]، [[امام]] [[لشکریان]] نیز [[رهبر]] آنان است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[طریحی]]==&lt;br /&gt;
*[[فخرالدین طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین کتابی است که هم نگاه به استعمالات لغوی دارد و هم نگاهی به استعمالات شرعیه دارد. این از امتیازات این کتاب است. البته در لسان العرب نیز خود ابن منظور توجه بسیاری به استعمالات شرعیه الفاظ دارد، اما امتیاز مجمع البحرین این است که استعمالات شرعیه را در منابع اهل بیت{{عم}} دنبال می‌کند.&amp;lt;/ref&amp;gt; درباره معنای [[امام]] می‌گوید: {{عربی|والإِمَامُ - بالكسر على فِعَال - للذي يُؤتَمُّ بِه، وجمعه: أَئِمَّة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل مطلب این است که: هر کسی که دیگران به او &amp;quot;ائتمام&amp;quot; کنند - یعنی &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; و &amp;quot;[[تبعیت]]&amp;quot; کنند - &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; می‌گویند. سپس تعریفی از [[شیخ صدوق]] و [[متکلمان]] [[نقل]] می‌کند که در تعریف اصطلاحی به آن دو اشاره خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
# [[پرونده:3073589.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100538.jpg|22px]] [[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده: مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده: امامت]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=393492</id>
		<title>امامت در لغت</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%D9%84%D8%BA%D8%AA&amp;diff=393492"/>
		<updated>2020-11-13T09:15:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] | [[امامت در قرآن]] | [[امامت در حدیث]] | [[امامت در نهج البلاغه]] | [[امامت در معارف دعا و زیارات]] | [[امامت در کلام اسلامی]] | [[امامت در معارف و سیره رضوی]] | [[امامت از دیدگاه اهل سنت]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0007.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] و [[رهبری]] [[امامت]] از ریشۀ &amp;quot;ا م م&amp;quot; در لغت به معنای قصد، [[پیشوایی]]، پیشروی و [[رهبری]]&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۲۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امام]] به معنای [[پیشوا]]، پیشرو، [[مقتدا]]، قیِّم، [[مصلح]]، [[الگو]]، راه اصلی و [[راهنما]]&amp;lt;ref&amp;gt;لسان العرب، ج۱، ص۲۱۳-۲۱۵؛ المفردات، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و کسی که همواره مقصود و [[هدف]] حرکت و تلاش دیگران قرار گیرد، آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;التحقیق فی کلمات القرآن الکریم، ج۱، ص۱۳۶-۱۳۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* واژه [[امام]] در لغت از ریشه “ام” است که معانی گوناگونی دارد. یکی از آنها [[مقتدا]] و پیشواست. طریحی می‌گوید: “امام به کسر الف، بر وزن فِعال به معنای کسی است که از او [[پیروی]] می‌شود”&amp;lt;ref&amp;gt;فخرالدین الطریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مؤلف [[کتاب]] [[معانی الاخبار]] نیز در توضیح وجه تسمیه [[امام]] می‌گوید: “امام را [[امام]] نامیدند به [[دلیل]] اینکه او پیشرو و مقتدای [[مردم]] است”&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن علی بابویه قمی (شیخ صدوق)، معانی الأخبار، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین [[امامت]]، همان [[ریاست عامه]] بر همه [[مردم]] است که اگر لابشرط بیاید، منظور همان [[ریاست]] [[پیامبر]] و [[رسالت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإِمَامَةُ: هي الرئاسة العامة على جميع الناس، فإذا أخذت لا بشرط شي‏ء تجامع النبوة و الرسالة، و إذا أخذت بشرط لا شي‏ء لا تجامعهما}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵).&amp;lt;/ref&amp;gt;. پس به گروهی خاص که از نظر [[فکری]]، [[اعتقادی]]، [[سیاسی]] یا زبانی، زمانی و مکانی در یک امر یا اموری خاص با یکدیگر اشتراک دارند و با یکدیگر یکی شده‌اند [[امت]] می‌گویند و رهبرشان نیز [[امام]] نامیده می‌شود. بنابراین سه واژۀ [[امام]]، [[امامت]] و [[امت]] لازم و ملزوم یکدیگرند و بدون هم معنا ندارند. [[امت]] نیز به گروهی گفته می‌شود که اعضای آن به سبب [[پیروی از امام]] واحد به نوعی با یکدیگر انتساب داشته باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: لطف الله صافی، نظام امامت و رهبری، ص۱۱-۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* نکته مهم اینکه معنای [[پیشوا]] لزوماً مثبت نیست، بلکه ممکن است [[پیشوا]] [[عادل]] یا [[فاسق]] و [[ظالم]] باشد. در [[قرآن]] کلمه [[پیشوا]] به هر دو مورد گفته شده است. در آیه‌ای آمده است: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، و در جای دیگر می‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[آیه]] نخست [[امام]] به پیشوای خیر و در [[آیه]] دوم [[امام]] به پیشوای [[شر]] گفته شده است. [[امام]] به معنای مقدم نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴-۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[قرآن]] درباره [[فرعون]] همین تعبیر را به کار برده است: {{متن قرآن|يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید» سوره هود، آیه ۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین [[امام]] به معنای طریق و [[راه]] نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يقال للطريق إِمَامٌ، لأنّه يُؤَمُّ أي يقصد و يتبع}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt;. ابن‌منظور در لسان العرب [[معتقد]] است که [[امام]] (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم‌ریشه است و هر دو از ریشه “أمّ، یؤمّ” به معنای قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۶؛ جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر یزدی مطلق، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژه [[امام در قرآن]] در غالب معانی لغوی آن به کار رفته است. البته واژه [[امام در قرآن]] کاربردهای فراوانی دارد که تفلیسی در وجوه القرآن، پنج معنای آن را به شرح ذیل برشمرده است:&lt;br /&gt;
* گاهی [[امام]] به معنای [[مقتدا]] و پیشواست: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، نیز در آیه‌ای دیگر به همین معنا آمده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به معنای [[نامه]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[لوح محفوظ]]: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[تورات]] نیز به کار رفته است: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مقصود از [[امام]] در [[آیه]] اخیر، [[تورات]] است. در [[قرآن]] [[امام]] به معنای [[راه]] آشکار و روشن نیز آمده است: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ مراد [[راه]] واضح و آشکار است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جیش بن ابراهیم تفلیسی، وجوه القرآن، ترجمه مهدی محقق، ص۲۸-۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت]]، ص ۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[راغب اصفهانی]]==&lt;br /&gt;
*[[راغب اصفهانی ]] در &amp;quot;مفردات&amp;quot; چنین می‌گوید: {{عربی|&amp;quot;اَلْإِمَامُ: المُؤتَمُّ بِهِ؛ إنساناً كانَ يُقتَدى بِقَولِهِ أو فِعلِهِ، أو كِتاباً، أو غَيرَ ذلِكَ، مُحِقّاً كانَ أو مُبطِلاً، وجمعه: أَئِمَّةٌ. وقولُه تَعَالى:}} {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر گروه مردم را با پیشوایشان فرامی‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|؛ أي: بالذي يقتدون به، وقيل: بكتابهم&amp;quot;}}&amp;lt;ref&amp;gt;راغب اصفهانی، حسین بن محمد، مفردات ألفاظ القرآن، ص۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: هر کسی که [[مردم]] به او ائتمام کنند؛ یعنی پشت سر او قرار بگیرند و حرکت کنند، او [[امام]] است. [[امام]] آن است که جلو باشد و [[مردم]] به او [[اقتدا]] کنند. حال، آن [[امام]] و [[مقتدا]] یا [[انسان]] است، یا کتابی است که [[انسان]] به [[معارف]] آن عمل می‌کند. پس اگر [[امامت]]، به کتاب هم [[تفسیر]] شود، از باب همین اقتداست؛ گرچه در [[روایات]] ما، [[امام]] به همان {{عربی|مَنْ يُقتَدَى بِه}} [[تفسیر]] شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*از [[کلام]] [[راغب اصفهانی]] این‌گونه استفاده می‌شود که [[امامت]] به معنای [[مقتدا]] و متقدم بودن است.[[اقتدا]] کردن نیز به معنای [[تبعیت]] و [[پیروی]] است. [[خدای متعال]] در [[وصف]] رابطه [[فرعون]] و قومش می‌فرماید: {{متن قرآن|فَاتَّبَعُوا أَمْرَ فِرْعَوْنَ وَمَا أَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَشِيدٍ * يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَأَوْرَدَهُمُ النَّارَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنگاه، آنها از فرمان فرعون پیروی کردند و فرمان فرعون از سر [کمال رهیافتگی و] کاردانی نبود * او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید و آنان را به دوزخ درمی‌آورد» سوره هود، آیه ۹۷-۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. طبق این [[آیه]]، [[دلیل]] تقدّم و پیش‌روی [[فرعون]] بر قومش در [[روز قیامت]] این است که [[قوم]] [[فرعون]] از امر او [[پیروی]] کرده‌اند و این نکته نشان می‌دهد مسئلۀ اصلی و سرنوشت‌ساز [[امت‌ها]] و [[ملت‌ها]]، &amp;quot;[[اتّباع]] [[امر]]&amp;quot; است. بنابراین، &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; و &amp;quot;ائتمام&amp;quot; ([[پذیرش]] [[امامت]]) به معنی &amp;quot;[[اتّباع]] [[امر]]&amp;quot; یا &amp;quot;[[اتّباع]] در فعل و قول&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; یعنی &amp;quot;تقدّم&amp;quot;، &amp;quot;[[مقتدا]] شدن&amp;quot; و &amp;quot;متبوع شدن&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[ابن‌منظور]]==&lt;br /&gt;
*[[ابن‌منظور]] در &amp;quot;لسان العرب&amp;quot; در باره این ریشه لغوی می‌گوید: {{عربی|أَمَّ القومَ وأَمَّ بِهِمْ: تقدَّمهم، وَهِيَ الإِمامةُ. والإِمامُ: كُلُّ مَنِ ائتَمَّ بِهِ قومٌ كَانُوا عَلَى الصِّرَاطِ الْمُسْتَقِيمِ أَو كَانُوا ضالِّين... [قال] ابْنُ سِيدَهْ: والإِمامُ مَا ائْتُمَّ بِهِ مِنْ رئيسٍ وغيرِه، وَالْجَمْعُ أَئِمَّة. وَفِي التَّنْزِيلِ الْعَزِيزِ:}} {{متن قرآن|فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«با پیشگامان کفر کارزار کنید» سوره توبه، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; {{عربی|؛ أَي: قاتِلوا رؤساءَ الكُفْر وقادَتَهم الَّذِينَ ضُعَفاؤهم تَبَعٌ لَهُمْ... وقال الْمَازِنِيُّ: أُيَيْمَة وَلَمْ يقلِب، وإِمامُ كلِّ شَيْءٍ: قَيِّمُهُ والمُصْلِح لَهُ، والقرآنُ إِمامُ المُسلمين، وسَيدُنا مُحَمَّدٌ رَسُولُ الله{{صل}}: إِمام الأَئِمَّة، وَالْخَلِيفَةُ: إِمَامُ الرَّعِيَّةِ، وإِمامُ الجُنْد: قَائِدُهُمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌منظور، محمد بن مکرم، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: این واژه، به صورت متعدی و لازم به کار برده می‌شود. اگر گفته شود: {{عربی|أَمَّ القومَ وأَمَّ بِهِمْ}} یعنی: بر آنها مقدم شد؛ نه اینکه فقط از لحاظ مکانی، بلکه از لحاظ عمل؛ او جلو باشد و اینها مثل او عمل کنند. ازاین‌رو، می‌گوید: معنای {{متن قرآن|فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ}} اینکه: با سران و [[رهبران]] [[کفر]] بجنگید؛ آنان که [[ضعیفان]]، تابعشان بودند. پس [[امامت]] به معنای [[مقتدا]] بودن است و [[مقتدا]] شدن به این است که دیگران [[تبعیت]] کنند. بنابراین، محور اصلی این واژه &amp;quot;[[تبعیت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; است. در ادامه گفته است:[[امام]] هر چیزی [[قیّم]] بر آن است؛ یعنی [[امام]]، آن کسی است که [[مسئولیت]] [[اصلاح]] چیزی را بر عهده دارد. در انتهای سخن نیز برخی از استعمالات [[امام]] را برمی‌شمارد و می‌گوید: [[قرآن]] [[امام]] [[مسلمین]] است و [[خلیفه]] [[امام]] [[رعیت]]، [[امام]] [[لشکریان]] نیز [[رهبر]] آنان است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==تعریف لغوی [[طریحی]]==&lt;br /&gt;
*[[فخرالدین طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البحرین کتابی است که هم نگاه به استعمالات لغوی دارد و هم نگاهی به استعمالات شرعیه دارد. این از امتیازات این کتاب است. البته در لسان العرب نیز خود ابن منظور توجه بسیاری به استعمالات شرعیه الفاظ دارد، اما امتیاز مجمع البحرین این است که استعمالات شرعیه را در منابع اهل بیت{{عم}} دنبال می‌کند.&amp;lt;/ref&amp;gt; درباره معنای [[امام]] می‌گوید: {{عربی|والإِمَامُ - بالكسر على فِعَال - للذي يُؤتَمُّ بِه، وجمعه: أَئِمَّة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل مطلب این است که: هر کسی که دیگران به او &amp;quot;ائتمام&amp;quot; کنند - یعنی &amp;quot;[[اقتدا]]&amp;quot; و &amp;quot;[[تبعیت]]&amp;quot; کنند - &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; می‌گویند. سپس تعریفی از [[شیخ صدوق]] و [[متکلمان]] [[نقل]] می‌کند که در تعریف اصطلاحی به آن دو اشاره خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
# [[پرونده:3073589.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100538.jpg|22px]] [[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده: مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده: امامت]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%B1%DB%8C%D8%A7%D8%B3%D8%AA&amp;diff=393335</id>
		<title>ریاست</title>
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		<updated>2020-11-12T13:48:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
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: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[ریاست در لغت]] | [[ریاست در قرآن]] | [[ریاست در حدیث]] | [[ریاست در نهج البلاغه]] | [[ریاست در کلام اسلامی]] | [[ریاست در فقه اسلامی]] | [[ریاست در فقه سیاسی]] | [[ریاست در تاریخ اسلامی]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[ریاست (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0009.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==تعریف [[امامت]] به ریاست==&lt;br /&gt;
*تعریفی که غالب علمای [[کلام]] از &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; کرده‌اند، دو عنصر اساسی در آن به چشم می‌خورد؛ یکی اینکه [[امامت]] &amp;quot;ریاست&amp;quot; است و دیگر اینکه این ریاست در &amp;quot;امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. این تعریف، بیشتر نزد [[متکلمان]] [[اهل‌سنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: ماوردی در تعریف امامت گفته است: {{عربی|الإمامة موضوعة لخلافة النبوّة في حراسة الدين وسياسة الدنيا به}}. ماوردی، علی بن محمد، الأحكام السلطانیة، ص۵؛ ابن خلدون نیز مشابه این عبارت را آورده است: {{عربی|نيابة عن صاحب الشريعة في حفظ الدين وسياسة الدنيا}}. [[ابن خلدون]]، عبدالرحمن بن محمد، المقدّمة، ص۱۹۰؛ امام‌الحرمین جوینی نیز گفته است: {{عربی|الإمامة رياسة تامّة، وزعامة تتعلّق بالخاصّة والعامّة في مهمّات الدين والدنيا}}. جوینی، عبدالملک بن عبدالله، غیاث الأمم فی التیاث الظلم، ص۱۵؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: فخر رازی : {{عربی|الإمامة رئاسة في الدين والدنيا عامّة لشخص من الأشخاص}}. رازی، محمد بن عمر، نهایة العقول، ج۴، ص۳۲۱؛ میر سید شریف جرجانی : {{عربی|الإمام: الذي له الرياسة العامّة في الدين والدنيا جميعاً}}. جرجانی، علی بن محمود، التعریفات، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; آمده و از آنجا به [[متکلمان]] [[زیدیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: [[حمیدان بن یحیی]] در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|هو الشخص الجامع للرئاسة على الخلق في الدين والدنيا على وجه لا يكون فوق يده يد}}. قاسمی، حمیدان بن یحیی، جواب المسائل الشتویة والشبه الحشویة، ص۴۸۴؛ احمد بن یحیی المرتضی نیز گفته است: {{عربی|رئاسة عامّة لشخص مخصوص بحكم الشرع ليس فوقها يد}}. المرتضی، احمد بن یحیی، البحر الزخار، ج۲، ص۵۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امامیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: شیخ مفید در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|الإمام هو الإنسان الذي له رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا نيابةً عن النبيّ}}. مفید، محمد بن محمد، النكت الاعتقادية، ص۳۹؛ شیخ طوسی و به تبع او، ابن میثم بحرانی نیز در تعریف [[امامت]] گفته‌اند: {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في أمور الدين والدنيا}}. طوسی، محمد بن حسن، الرسائل العشر، ج۱، ص۱۰۳؛ بحرانی، میثم بن علی، النجاة فی القیامة، ص۴۱؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: محقق حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في الدين والدنيا بحقّ الأصالة}}. حلی، جعفر بن حسن، المسلک فی أصول الدین، ص۳۰۶؛ علامه حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا لشخص من الأشخاص نيابةً عن النبيّ}}. حلی، حسن بن یوسف، نهج المسترشدين، ص۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نیز منتقل شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[سعد الدین تفتازانی]] در &amp;quot;شرح المقاصد&amp;quot; و [[قوشچی]] در &amp;quot;شرح تجرید&amp;quot;، [[امامت]] را چنین تعریف می‌کنند:{{عربی|الإمامةُ رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا، خلافةً عن النبيّ{{صل}}، وبهذا القيد خرجت النبوّة، وبقيد العموم مثل القضاء والرئاسة في بعض النواحي، وكذا رئاسة من جعلة الإمام نائباً عنه على الإطلاق؛ فإنّها لا تعمّ الإمامة}}&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، سعدالدین، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۴؛ قوشچی، علی بن محمد، شرح تجرید العقائد، ص۳۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*صاحبان این تعریف، معتقدند با قید {{عربی|عامّة}} ریاست‌های خُرد و با قید {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} [[نبوّت]] خارج می‌شود. پس [[امام]] آن کسی است که به صورت [[خلافت]] از [[رسول الله]]، [[ریاست عامه]] داشته باشد. در اغلب منابع [[اهل]] [[کلام]]، [[امامت]] را {{عربی|رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا}} تعریف کرده‌اند و گاهی برای دقت بیشتر، بعضی‌ها عبارت {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} را هم اضافه کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot; نیز پس از بیان تعریف لغوی، به استعمال اصطلاحی [[امامت]] نزد [[اهل]] [[کلام]] اشاره کرده و می‌گوید: {{عربی|الإمامة هي الرئاسة العامّة على جميع الناس، فإذا أُخذت لا بشرط شيء تجامع النبوّة والرسالة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: [[امامت]] به استعمال مستعمل بستگی دارد؛ اگر به‌طور کلی و عمومی بررسی شود (به تعبیر او: اگر &amp;quot;لا بشرط&amp;quot; در نظر گرفته شود)، با [[نبوت]] و [[رسالت]] قابل جمع است؛ یعنی [[نبی]] می‌تواند علاوه بر [[مقام نبوت]]، [[امام]] نیز باشد؛ البته [[امام]] غیر [[نبی]] نیز متصوَّر است. اما اگر [[امامت]] با [[قطع]] نظر از [[نبوت]] بررسی شود (به تعبیر او: &amp;quot;بشرط لا عن النبوة&amp;quot; در نظر گرفته شود)، قابل جمع با [[نبوت]] نخواهد بود. البته [[حق]] این است که در ذات مفهوم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، &amp;quot;بشرط لا&amp;quot; نهفته نیست؛ یعنی هنگامی که کلمه [[امام]] اطلاق می‌شود [[امام]]، لا بشرط مراد است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
===اشکالات این تعریف===&lt;br /&gt;
*بر تعریف [[متکلمان]] اشکالاتی وارد است؛ چه با قید &amp;quot;{{عربی|خلافةً عن النبيّ}}&amp;quot; و چه بدون آن. پیش از بیان این اشکالات، لازم است به مقدمه‌ای توجه شود:&lt;br /&gt;
*پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
# [[اسلام محمدی]] که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
# [[اسلام جاهلی]]&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پیمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این [[اسلام جاهلی]] بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] [[محمدی]] بود. حوادثی که [[اسلام جاهلی]] پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس [[شکیبایی]] گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با [[اسلام جاهلی]]، [[نزاع]] بر &amp;quot;ریاست&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] [[آشکار]] [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] [[پنهان]] و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین [[اسلام محمدی]] و [[اسلام جاهلی]] و به بیانی دیگر: بین [[اسلام علوی]] و [[اسلام اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. [[اسلام جاهلی]] - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از مهم‌ترین این دست‌اندازی‌ها:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;ریاست&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبیدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، علی بن محمد، الكامل فی التاریخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;ریاست&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان [[اسلام جاهلی]]، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به ریاست و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این ریاست و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پس از این مقدمه، روشن می‌شود اشکالات اساسی تعریف مذکور از [[امامت]] به دو نکته ذیل برمی‌گردند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===نخست: [[تفسیر]] [[امامت]] به ریاست (تعریف به لازم؛ نه به [[حقیقت]])=== &lt;br /&gt;
* بی‌شک، مفهوم &amp;quot;ریاست&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است و نمی‌توان این مفهوم را از [[امامت]] جدا انگاشت، لکن جنبه مهمی که در [[حقیقت امامت]] باید لحاظ شود، جنبه ریاستش نیست؛ جنبه مهم‌تری که می‌تواند گویای ماهیت و [[حقیقت امامت]] باشد، بحث ولایت‌ الامری است. [[امامت]] چیزی جز &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; نیست و [[ولایت امر]] عقلاً و نقلاً [[حق]] انحصاری [[خدای متعال]] و مقامی [[الهی]] است. البته در نگاه مردمی که [[خدا]] را از زندگی‌شان حذف می‌کنند، [[امامت]] - خواه ناخواه - تنها ریاست و [[امارت]] خواهد بود و هنگامی که [[حقوق]] و [[حدود الهی]] در محاسبات [[جامعه]] نباشند، شیخ [[قبیله]] یا هر شخص دیگری نیز می‌تواند [[رئیس]] باشد و اگر کسی [[رئیس]] شد به هر حال، باید به [[فرمان]] او رفت و از او [[تبعیت]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[انتخاب]] واژه ریاست یا [[سلطنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;پیش از این روایت طبری (م۳۱۰ق) از گفته عمر بن خطاب در سقیفه نقل شد که گفته بود: {{عربی|من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته...}}. طبری، محمد بن جریر، تاریخ الأمم والملوک، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[تفسیر]] [[حقیقت امامت]]، انعکاسی از واقعیت تلخ [[جامعه اسلامی]] پس ار [[رسول الله]]{{صل}} است. حوادث [[غصب]] [[امامت]] از [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} آغازگر [[انحراف]] [[امامت]] از [[جایگاه]] اصلی‌اش شد و چون [[امامت]] را از [[جایگاه]] [[حقیقی]] و بلندش جابجا کردند، تمام این [[تحریف‌ها]] دامن‌گیر [[جامعه اسلامی]] شد. به همین [[دلیل]]، [[حضرت زهرا]]{{س}} در خطبه‌ای، به [[مردم]] عصر خود نهیب زد و فرمود: {{متن حدیث|وَيْحَهُم! أَنَّى زَحْزَحُوهَا عَنْ رَوَاسِي الرِّسَالَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۳۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ شگفتا از آنان! چگونه [[خلافت]] را از جایگاه‌های [[استوار]] [[رسالت]] دور راندند؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، عبارت ریاست یا [[سلطنت]] با مفاهیمی که در [[اسلام]] برای مسأله [[امامت]] آمده است سازگار نیست و هنگامی که به [[قرآن کریم]] و [[حدیث]] [[معصومان]]{{عم}} مراجعه می‌کنیم، می‌بینیم در مسأله [[امامت]] چیز دیگری مطرح است&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال: خدای متعال در قرآن کریم امامت را عهد الهی معرفی کند: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظّالِمِينَ}}، روایات منقول از معصومین{{عم}} نیز از امامت به عنوان جایگاه انبیا، میراث اوصیا و خلافت خدا و رسول یاد شده است: {{متن حدیث|الإِمامَةَ هِيَ مَنزِلَةُ الأَنبِياءِ، وإرثُ الأَوصِياءِ، إنَّ الإِمامَةَ خِلافَةُ الله وخِلافَةُ الرَّسولِ}}. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافی، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ حتی یک بار هم در تعابیر [[رسول اکرم]]{{صل}} کلمه ریاست به چشم نمی‌خورد و با وجود اینکه مفهوم &amp;quot;ریاست&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است، اما در [[آیات]] کریمه و [[احادیث]] [[پیامبر اکرم]] و [[اهل بیت]]{{عم}} از زاویه ریاست به آن [[مقام]] بلند نگاه نشده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از سوی دیگری، تعریف جامع و [[مانع]]، باید به جوهر و اصلِ معنا اشاره کند و واژگانی به‌کار بگیرد که مقوّم ماهیت آن مفهوم باشند؛ نه آنکه آثار یا نتایج و تبعات آن مفهوم را محور تعریف خود قرار دهد. ریاستی که در تعریف گذشته ذکر شد، نتیجه [[امامت]] است یا عَرَض عام آن؛ اما نه جوهر اصلی و مقوم ماهیتش&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* ریاست نیز از آن جهت که می‌تواند گسترده و کلان باشد یا نباشد، قابل تقسیم بر [[ریاست عامه|عامه]] و [[ریاست خاصه|خاصه]] است. به همین [[دلیل]]، [[برادران]] [[اهل‌سنت]] چون [[امامت]] را به ریاست تبدیل کردند، ناچار شدند قید [[عامه]] را بیاورند؛ تا شامل ریاست‌های خاص و [[خرد]] نشود؛ زیرا مدیر مدرسه یا [[مسئول]] اداره نیز [[رئیس]] است و هر رئیسی [[امام]] نیست. ازاین‌رو، ناچار شدند ریاست را به قید [[عامه]] تقیید کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===دوم: توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]] ([[میراث]] [[اسلام جاهلی]])===&lt;br /&gt;
* همان‌گونه که اشاره شد، جداسازی [[دین الهی]] از دنیای [[مردم]] یکی از تحریف‌هایی است که دامنگیر [[امت اسلام]] شد. بنابر این، عبارت {{عربی|في أمر الدين والدنيا}} که در [[تعریف امامت]] آورده‌اند، بی‌اساس و از میراث‌های [[اسلام جاهلی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[منابع حدیثی]] و [[تاریخی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] [[نقل]] کرده‌اند از همان روزهای اولی که [[ابوبکر]] سر کار آمد، [[مردم]] و [[صحابه]] از او درباره [[دین]] سؤال می‌کردند و چون [[ابوبکر]] پاسخ آن مسائل [[شرعی]] را نمی‌دانست، به دیگران مراجعه می‌کرد. در زمان عمربن‌خطاب نیز [[رجوع]] به دیگران بیشتر اتفاق افتاد. مرحوم امینی  مسأله [[رجوع]] [[عمر]] به دیگران به‌ویژه، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} را در [[کتاب]] [[شریف]] &amp;quot;[[الغدیر]]&amp;quot; جمع کرده است؛ تقریباً یک جلد از این کتاب&amp;lt;ref&amp;gt;امینی، عبدالحسین، الغدیر، ج۶، ص۸۲ - ۳۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مختص به همین مسئله است و این سخن [[عمر]] که {{عربی|لَو لَا عَلِيٌّ لَهَلَكَ عُمَرُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه، عبدالله بن مسلم، تأویل مختلف الحدیث، ج۱، ص۱۵۲ و ص۱۶۲؛ باقلانی، ابوبکر، تمهید الأوائل فی تلخیص الدلائل، ج۱، ص۵۰۲ و ص۵۴۷؛ ابن‌مردویه اصفهانی، احمد بن موسی، مناقب علی ابن أبی طالب، ص۸۸؛ ماوردی شافعی، علی بن محمد، الحاوی الکبیر، ج۱۲، ص۱۱۵ و ج۱۳، ص۲۱۳؛ سمعانی، أبوالمظفر، التفسیر، ج۵، ص۱۵۴؛ زمخشری، محمود، المفصل فی صنعة الإعراب، ج۱، ص۴۳۲؛ ابن‌عربی، ابوبکر، العواصم من القواصم، ج۱، ص۱۹۴؛ رازی، فخرالدین، التفسیر الکبیر، ج۲۱، ص۳۸۰؛ ابن ابی‌الحدید، عبدالحمید، شرح نهج‌البلاغه، ج۱، ص۱۸ و ج۱۲، ص۲۰۵؛ قندوزی، سلیمان بن ابراهیم، ینابیع المودة، ج۱، ص۲۱۶ و ج۲، ص۱۷۲ و ج۳، ص۱۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; را آنجا مطرح و بررسی کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*به [[دلیل]] همین مطلب؛ یعنی عدم اطلاع کافی [[خلیفه اول]] و [[خلیفه دوم]] به [[کتاب خدا]] و [[سنت]] [[رسول الله]] و [[رجوع]] آنان به دیگران، [[رجال]] [[مکتب]] [[اهل‌سنت]] بین [[دین]] و [[دنیا]] جدایی قائل شدند و در نتیجه &amp;quot;[[مرجعیت سیاسی]]&amp;quot; از &amp;quot;[[مرجعیت دینی]]&amp;quot; جدا شد و این آغاز تناقض آشکاری بود که درون این [[مکتب]] اتفاق افتاد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[مکتب]] [[روایی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] برای توجیه این رویکرد، [[روایات]] مجعولی نیز [[نقل]] شده که اساس این دوگانگی را تحکیم بخشید و بر انگاره جدایی [[دنیا]] از [[دین]] صحه گذاشته است. از جمله آنها، [[روایت]] معروف &amp;quot;تأبیر النخل&amp;quot; است که [[اهل]] [[صحاح]] نیز [[نقل]] می‌کنند. در [[صحیح مسلم]] آمده است: &amp;quot;[[رسول الله]] به [[مدینه]] آمد؛ در حالی که آنان درختان [[نخل]] را بارور می‌کردند. [[رسول الله]] گفت: &amp;quot;چه کار می‌کنید؟&amp;quot; گفتند: درختان را بارور می‌کنیم. گفت: &amp;quot;شاید اگر چنین نکنید، بهتر باشد&amp;quot;. آنان نیز از آن عمل دست کشیدند در آن سال میوه درختان ریخت یا ناقص شد. [[راوی]] می‌گوید: قضیه را برای [[رسول الله]] توضیح دادند. [[پیامبر]] گفت: &amp;quot;من هم بشرم؛ هرگاه چیزی در مورد دینتان را به شما امر کردم، آن را بپذیرید و هرگاه مطابق [[رأی]] و نظر خویش چیزی را به شما گفتم؛ بدانید که من نیز بشری هستم مانند شما&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|قَدِمَ نَبِيُّ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةَ، وَهُمْ يَأْبُرُونَ النَّخْلَ، يَقُولُونَ يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ، فَقَالَ: مَا تَصْنَعُونَ؟ قَالُوا: كُنَّا نَصْنَعُهُ، قَالَ: لَعَلَّكُمْ لَوْ لَمْ تَفْعَلُوا كَانَ خَيْرًا فَتَرَكُوهُ، فَنَفَضَتْ أَوْ فَنَقَصَتْ، قَالَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ: إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ، إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ نیشابوری، مسلم بن حجاج، الجامع الصحیح، ج۴، ص۱۸۳۵. همچنین رجوع شود به: بستی، محمد بن حبان، صحیح ابن حبان، ج۱، ص۲۰۲؛ طبرانی، سلیمان بن احمد، المعجم الکبیر، ج۴، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[روایت]] و امثال آن، از جعل‌های جنایت‌آمیزی است که در [[حق]] [[حضرت رسول]]{{صل}} انجام شده و با عبارات متفاوتی [[نقل]] شده است؛ از جمله: {{متن حدیث|إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ {{متن حدیث|إِنَّمَا ظَنَنْتُ ظَنًّا، فَلَا تُؤَاخِذُونِي بِالظَّنِّ، وَلَكِنْ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنِ اللهِ شَيْئًا فَخُذُوا بِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحیح مسلم ح۲۳۶۱؛ مسند احمد (۳/۱۵)؛ مسند عبد بن حمید، المنتخب (ص۶۴)؛ مسند ابوداود طیالسی (۱/۱۸۶)؛ طحاوی در شرح معانی الآثار (۳/۴۸)؛ ابن أبی عاصم در الآحاد والمثانی (۱/۱۶۵)؛ مسند ابی یعلی (۲/۱۲)، مسند الشاشی (۱/۶۸، ۷۰)، ابو نعیم در حلیة الأولیاء (۴/ ۳۷۲).&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن حدیث|أَنْتُمْ أَعْلَمُ بِأَمْرِ دُنْيَاكُمْ&amp;quot; يا: &amp;quot;إِذَا كَانَ شَيْءٌ مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَأَنْتُمْ أَعْلَمُ بِهِ، فَإِذَا كَانَ مِنْ أَمْرِ دِينِكُمْ فَإِلَيَّ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحیح مسلم ح۲۳۶۳؛ مسند احمد (۲۰/۱۹)، سنن ابن ماجة، ح۲۴۷۱، بزار در البحر الزخار (۱۳/۳۵۵) (۱۸/۹۹)، مسند ابی یعلی (۶/۱۹۸) (۶/۲۳۷)، طحاوی در شرح مشكل الآثار (۴/۴۲۴)، صحیح ابن حبان (۱/۲۰۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مضمون کلی این [[نقل]] قول‌های تحریف‌آمیز این است که اگر در مورد دینتان فرمانی صادر کردم، آن را بپذیرید و اگر در مورد [[دنیا]] به شما دستوری دادم پس از من [[اطاعت]] نکنید! و مفاد نهایی آن، اصل &amp;quot;جدایی [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است که در [[روایات]] مجعولی [[نقل]] شده است. متأسفانه این از [[روایات]] متفق‌ علیه [[برادران]] [[اهل‌سنت]] است و با صریح [[قرآن]] تناقض دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پرسشی که اینجا باید مطرح شود اینکه: &amp;quot;بیع&amp;quot;، &amp;quot;[[تجارت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[زکات]]&amp;quot; و &amp;quot;[[خمس]]&amp;quot; از [[امور دنیوی]] شمرده می‌‌شوند یا از [[امور دینی]]؟ [[قرآن]] درباره بیع سخن گفته است، آیا بیع [[دنیوی]] است و [[دینی]] نیست؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(همان) کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند» سوره حج، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[اداره امور]] [[کشور]] یعنی عمل به [[احکام اسلام]]. حال اگر [[احکام اسلام]] به‌گونه‌ای بیان کنیم که مربوط به [[دین]] باشد و ربطی به [[دنیا]] نداشته باشد، تناقض است. متأسفانه در [[کلام]] و [[حدیث]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] تناقضاتی دیده می‌شود؛ تناقض‌هایی در مسائل [[توحید]]، [[نبوت]]، [[خلافت]] و [[امامت]] که حتی به [[فروع دین]] نیز کشیده شده است &amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال، برادران اهل سنت حدیث عشره مبشره را روایت می‌کند که ده نفر از جمله طلحه و زبیر، همگی در بهشت هستند. از طرفی قرآن می‌گوید که {{متن قرآن|وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا}}؛ «و آنان که با خداوند و پیامبر او نافرمانی کنند بی‌گمان آتش دوزخ، آنان راست که هماره در آن جاودانند» سوره جن، آیه ۲۳. خدا و رسول را اینها معصیت کردند؛ با اینکه خدا دستور داده بود از پیامبر و اولی‌الامر اطاعت کنند: {{متن قرآن|أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ}}؛ «از خداوند فرمان برید و از پیامبر و صاحبان امری که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹. اما اینان اطاعت نکردند؛ اکنون اهل سنت این تناقض را چگونه حل می‌کند؟ چطور می‌شود اینها هم بهشتی باشند و هم جهنمی؟! امثال این تناقض‌ها بسیارند که تنها راه برون رفت از آنان بازگشت به اسلام اصیل و قرآن و عترت است. این‌گونه بود که تقابل بین دین و دنیا در تفکر اسلامی رخنه کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[اسلام محمدی]]{{صل}}، [[دین]] همان شریعتی است که دنیای [[مردم]] را اداره می‌کند؛ بنابر این، در نگاه [[اسلام محمدی]]{{صل}} دو مقوله جدا از یک‌دیگر به نام &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; و &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; وجود ندارد. بی‌گمان، [[رسول الله]]{{صل}} چون [[رئیس]] [[دین]] بود، [[رئیس]] [[دنیا]] نیز بود و چون این [[خلافت]]، [[خلافت]] [[رسول]] خداست، باید &amp;quot;[[ریاست عامه]] در [[دین]]&amp;quot; باشد که همان &amp;quot;[[ولایت امر]] بر دنیای [[مردم]]&amp;quot; است، لکن در [[تفسیری]] که بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} از [[دین]] ارائه شد، [[دین]] و [[دنیا]] از یک‌دیگر تفکیک شدند و از اینجا بود که میان [[دین]] و [[دنیا]] [[تقابل]] ایجاد شد و باعث اندیشه‌های [[انحرافی]] فراوانی گردید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اما [[امامت]] در [[مکتب]] [[اهل‌بیت]]{{عم}} این‌گونه تعریف نشده است. همان‌گونه که خواهد آمد، [[امامت]]، ولایت‌الامر است و اساساً [[تقابل]] [[دین]] و [[دنیا]] در این [[مکتب]] معنا و مفهوم ندارد؛ آن [[دینی]] که [[قرآن کریم]] معرفی می‌کند همین [[شریعت]] است و [[شریعت]] شامل همه امور دنیاست و [[رسول اکرم]]{{صل}} [[مبعوث]] شد تا [[مردم]] را در [[دنیا]] [[هدایت]] کند تا بتوانند در [[دنیا]] و [[آخرت]] [[سعادتمند]] باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
* [[پرونده:3073589.jpg|22px]] [[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{یادآوری پانویس}}&lt;br /&gt;
{{پانویس2}}&lt;br /&gt;
{{امام مهدی}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:ریاست]]&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=393328</id>
		<title>امامت در کلام اسلامی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A7%D9%85%D8%A7%D9%85%D8%AA_%D8%AF%D8%B1_%DA%A9%D9%84%D8%A7%D9%85_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;diff=393328"/>
		<updated>2020-11-12T13:28:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ویرایش غیرنهایی}}&lt;br /&gt;
{{امامت}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;اين مدخل از زیرشاخه‌های بحث &#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039; است. &amp;quot;&#039;&#039;&#039;[[امامت]]&#039;&#039;&#039;&amp;quot; از چند منظر متفاوت، بررسی می‌شود:&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;[[امامت در لغت]] | [[امامت در قرآن]] | [[امامت در حدیث]] | [[امامت در نهج البلاغه]] | [[امامت در معارف دعا و زیارات]] | [[امامت در کلام اسلامی]] | [[امامت در معارف و سیره رضوی]] | [[امامت از دیدگاه اهل سنت]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.0em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
: &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;&amp;quot;&amp;gt;در این باره، تعداد بسیاری از پرسش‌های عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل &#039;&#039;&#039;[[امامت (پرسش)]]&#039;&#039;&#039; قابل دسترسی خواهند بود.&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;padding: 0.4em 0em 0.0em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;[[پیشوا]]&#039;&#039;&#039; در [[زبان فارسی]]، ترجمه تحت‌اللفظی کلمه &#039;&#039;&#039;[[امام]]&#039;&#039;&#039; است. در [[عربی]] کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; یا &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot; مفهوم مقدسی ندارد. [[پیشوا]]، یعنی کسی که پیشرو است و عده‌ای تابع و پیرو او هستند؛ اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]. [[قرآن کریم]] کلمه [[امام]] را در هر دو مورد به کار برده است. در یک‌جا می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و در جای دیگر می‌‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم  که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مورد اول در مورد [[پیشوایان]] به [[حق]] است و مورد دوم در مورد [[رهبران]] [[کافر]] و [[گمراه]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از [[اصول دین اسلام]] و [[مذهب تشیع]] است. در یکی از تعاریف، به معنای [[ریاست عامه]] در [[امور دنیوی]] و [[اخروی]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در تعاریفی دیگر، [[امامت]]، [[رهبری]] [[امت اسلامی]] پس از [[پیامبر گرامی اسلام]]{{صل}}&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
[[پرونده:V0007.webm|بندانگشتی|285px|چپ|]]&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
واژه [[امام]] در لغت از ریشه “ام” است که معانی گوناگونی دارد. یکی از آنها [[مقتدا]] و پیشواست. طریحی می‌گوید: “امام به کسر الف، بر وزن فِعال به معنای کسی است که از او [[پیروی]] می‌شود”&amp;lt;ref&amp;gt;فخرالدین الطریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مؤلف [[کتاب]] [[معانی الاخبار]] نیز در توضیح وجه تسمیه [[امام]] می‌گوید: “امام را [[امام]] نامیدند به [[دلیل]] اینکه او پیشرو و مقتدای [[مردم]] است”&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن علی بابویه قمی (شیخ صدوق)، معانی الأخبار، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین [[امامت]]، همان [[ریاست عامه]] بر همه [[مردم]] است که اگر لابشرط بیاید، منظور همان [[ریاست]] [[پیامبر]] و [[رسالت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإِمَامَةُ: هي الرئاسة العامة على جميع الناس، فإذا أخذت لا بشرط شي‏ء تجامع النبوة و الرسالة، و إذا أخذت بشرط لا شي‏ء لا تجامعهما}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵).&amp;lt;/ref&amp;gt;. پس به گروهی خاص که از نظر [[فکری]]، [[اعتقادی]]، [[سیاسی]] یا زبانی، زمانی و مکانی در یک امر یا اموری خاص با یکدیگر اشتراک دارند و با یکدیگر یکی شده‌اند [[امت]] می‌گویند و رهبرشان نیز [[امام]] نامیده می‌شود. بنابراین سه واژۀ [[امام]]، [[امامت]] و [[امت]] لازم و ملزوم یکدیگرند و بدون هم معنا ندارند. [[امت]] نیز به گروهی گفته می‌شود که اعضای آن به سبب [[پیروی از امام]] واحد به نوعی با یکدیگر انتساب داشته باشند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: لطف الله صافی، نظام امامت و رهبری، ص۱۱-۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
نکته مهم اینکه معنای [[پیشوا]] لزوماً مثبت نیست، بلکه ممکن است [[پیشوا]] [[عادل]] یا [[فاسق]] و [[ظالم]] باشد. در [[قرآن]] کلمه [[پیشوا]] به هر دو مورد گفته شده است. در آیه‌ای آمده است: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، و در جای دیگر می‌فرماید: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را (به کیفر کفرشان) پیشوایانی کردیم که (مردم را) به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[آیه]] نخست [[امام]] به پیشوای خیر و در [[آیه]] دوم [[امام]] به پیشوای [[شر]] گفته شده است. [[امام]] به معنای مقدم نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۴-۲۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[قرآن]] درباره [[فرعون]] همین تعبیر را به کار برده است: {{متن قرآن|يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«او در روز رستخیز، پیشاپیش قومش می‌آید» سوره هود، آیه ۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;. همچنین [[امام]] به معنای طریق و [[راه]] نیز آمده است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و يقال للطريق إِمَامٌ، لأنّه يُؤَمُّ أي يقصد و يتبع}} (ر.ک: فخرالدین طریحی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt;. ابن‌منظور در لسان العرب [[معتقد]] است که [[امام]] (جلو و مقدم) با [[امام]] ([[پیشوا]]) هم‌ریشه است و هر دو از ریشه “أمّ، یؤمّ” به معنای قصد کردن و [[پیشی گرفتن]] است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: محمد بن مکرم بن منظور، لسان العرب، ج۱۲، ص۲۶؛ جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر یزدی مطلق، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. واژه [[امام در قرآن]] در غالب معانی لغوی آن به کار رفته است. البته واژه [[امام در قرآن]] کاربردهای فراوانی دارد که تفلیسی در وجوه القرآن، پنج معنای آن را به شرح ذیل برشمرده است:&lt;br /&gt;
گاهی [[امام]] به معنای [[مقتدا]] و پیشواست: {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«من تو را پیشوای مردم می‌گمارم» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، نیز در آیه‌ای دیگر به همین معنا آمده است: {{متن قرآن|وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و ما را پیشوای پرهیزگاران کن» سوره فرقان، آیه ۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به معنای [[نامه]]: {{متن قرآن|يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«روزی که هر دسته‌ای را با پیشوایشان فرا می‌خوانیم» سوره اسراء، آیه ۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;، [[لوح محفوظ]]: {{متن قرآن|كُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هر چیزی را در نوشته‌ای روشن بر شمرده‌ایم» سوره یس، آیه ۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[تورات]] نیز به کار رفته است: {{متن قرآن|وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و کتاب موسی به پیشوایی و بخشایش پیش از او بوده است» سوره هود، آیه ۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. مقصود از [[امام]] در [[آیه]] اخیر، [[تورات]] است. در [[قرآن]] [[امام]] به معنای [[راه]] آشکار و روشن نیز آمده است: {{متن قرآن|وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و (نشانه‌های) آن دو شهر (لوط و ایکه) بر سر راهی آشکار است» سوره حجر، آیه ۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ مراد [[راه]] واضح و آشکار است&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جیش بن ابراهیم تفلیسی، وجوه القرآن، ترجمه مهدی محقق، ص۲۸-۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنچه بیان شد، به معانی لغوی [[امام]] مربوط بود. [[متکلمان]] در تعریف اصطلاحی [[امام]] گفته‌اند: [[امام]] [[خلیفه رسول الله]] در [[اجرای دین]] است؛ به گونه‌ای که [[پیروی]] از وی بر همه [[مسلمانان]] [[واجب]] است&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|و عند المتكلمين هو خليفة الرسول{{صل}} في إقامة الدين بحيث يجب اتباعه على كافة الأمة}} (ر.ک: محمدعلی تهانوی، موسوعة کشاف اصطلاحات الفنون و العلوم، ج۱، ص۲۵۹).&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[امام]] در اصطلاح [[شیعه]] به کسی می‌گویند که [[پیشوا]] و مقتدای عالمیان در امور [[ظاهریه]] و [[باطنیه]]، اجتماعیه و معنویۀ روحانیه، مُلْکیه و ملکوتیه است. [[خداوند]] به وی در اثر [[اختیار]] عالی و ارادۀ انتخابیۀ آن [[پیشوا]] در جمیع امور چنین [[مصونیت]] و عصمتی را بخشیده است. این [[امامان]] به [[دوازده تن]] منحصرند. بنابر [[عقیده]] و [[ایمان راسخ]] [[شیعه]]، پس از [[غیبت کبری]] آن [[حضرت]] زنده است و [[ولایت]] [[امور معنوی]] و مَلَکوتی [[عوالم]] را در [[دست]] دارد، اما به سبب [[غصب خلافت]] و [[امامت]]، فعلاً در پردۀ [[غیبت]] [[نهان]] است تا [[ظهور]] کند و متصدیان و مباشران [[سلطنت]] و [[امارت]] [[باطل]] را کنار زند و خود بر اساس [[طهارت]] سِریَّه و [[عصمت]] الهیه و [[ولایت]] کبرای حقۀ حقیقیه، بر [[مردم]] [[حکومت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: [[سید محمد حسین حسینی تهرانی|حسینی تهرانی|سید محمد حسین]]، امام‌شناسی، ج۱۸، ص۲۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس با توجه به تعریف‌های یادشده، [[امام]] سه ویژگی خواهد داشت: ویژگی نخست، [[جانشینی]] [[پیامبر گرامی اسلام]] است. [[امام]] کسی است که پس از [[پیامبر اسلام]]{{صل}} بر [[مسند]] او می‌نشیند. [[ولایت]] و [[سرپرستی]] بر همۀ [[مکلفان]]، از دیگر [[ویژگی‌های امام]] است. [[متکلمان]]، اغلب [[ریاست عامه]] یا [[ولایت]] بر همۀ [[مکلفان]] را در [[تعریف امامت]]، اخذ کرده‌اند، لکن در برخی نکات جنبی، اختلاف‌نظر وجود دارد. ویژگی دیگر، [[واجب‌الاطاعه]] بودن [[امام]] است. برخی از [[متکلمان]]، این قید را نیز در [[تعریف امامت]] آورده‌اند. [[امام]]، [[جانشین پیامبر]]{{صل}} و [[ولیّ]] [[امت]] است؛ به گونه‌ای که [[اطاعت]] از [[فرمان]] او در حد [[اطاعت]] از [[فرمان پیامبر]]{{صل}} [[وجوب]] دارد. [[امام]]، تنها یک [[راهنما]] و [[هدایت‌گر]] نیست که [[امت]] در قبال وی هیچ وظیفه‌ای نداشته باشد، بلکه [[امت]]، هم در امور [[دین]] و هم در [[امور دنیا]] باید از وی [[اطاعت]] کند&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: جمعی از نویسندگان، امامت‌پژوهی (بررسی دیدگاه‌های امامیه، معتزله و اشاعره)، زیر نظر محمود یزدی مطلق، ص۴۹-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از نظر [[شیعه]]، [[جامعه]] در هر زمان به [[امام]] نیاز دارد و [[زمین]] نباید هیچ‌گاه از [[حجت خدا]] خالی باشد. پس چنان‌چه شرایط برای [[حضور امام معصوم]] فراهم نباشد، آن بزرگوار تا صدور [[امر الهی]] در پس پردۀ [[غیبت]] [[منتظر ظهور]] می‌نشیند. این دوره، [[عصر غیبت]] نام دارد. [[شیعه]] [[معتقد]] است در این دوره که وجود [[حکومت]] ضروری است، باید افرادی [[حکومت]] را اداره کنند که [[تالی]] تلو معصوم‌اند و شرایط لازم تصدیگری [[حکومت]] را دارند. این [[انتصاب]] در واقع [[نصب عام]] نامیده می‌شود. &lt;br /&gt;
[[نظام امامت]] از منظر [[شیعه]] ویژگی‌ها و مختصاتی دارد که در بخش کلیات بدان اشاره خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت]]، ص ۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف [[شیخ صدوق]]===&lt;br /&gt;
*شیخ [[صدوق]] در &amp;quot;معانی الأخبار&amp;quot; در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|سُمِّيَ الْإِمَامُ إِمَاماً لِأَنَّهُ قُدْوَةٌ لِلنَّاسِ، مَنْصُوبٌ مِنْ قِبَلِ الله - تَعَالَى ذِكْرُهُ - مُفْتَرَضُ الطَّاعَةِ عَلَى الْعِبَادِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن‌بابویه (صدوق)، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۴-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*حاصل این تعریف، اشاره به سه رکن مهم [[امامت]] در استعمالات شرعیه است؛ یکی: &amp;quot;[[قدوه]]&amp;quot; بودن؛ دومی: &amp;quot;[[منصوب]]&amp;quot; بودن از طرف [[خدا]] و رکن سوم: &amp;quot;[[واجب الاطاعه]]&amp;quot; بودن [[امام]] است. این تعریفِ دقیق، [[جامع‌ترین]] سخن در تعریف [[امام]] را آورده است. مرحوم [[صدوق]] این قیود مذکور در متن خود را از [[روایات]] استفاده کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;در روایات بسیاری به قدوه بودن، منصوب بودن و واجب‌الاطاعه بودن امامان تصریح شده است؛ از جمله: روایت از پیامبر اکرم{{صل}}: {{متن حدیث|إنَّ أئِمَّتَكُم قادَتُكُم إلَى الله؛ فَانظُروا بِمَن تَقتَدونَ في دينِكُم وصَلاتِكُم}}؛ پيشوايان شما زمام داران شما به سوى خدايند؛ پس بنگريد از چه كسانى در نماز و دينتان پيروى مى‌كنيد. صدوق، محمد بن علی، كمال الدين، ص۵؛ و روایت امام صادق{{ع}}: {{متن حدیث|لِأَنَّ اللهَ تَبارَكَ وتَعالى نَصَبَ الإِمامَ عَلَماً لِخَلقِهِ، وجَعَلَهُ حُجَّةً}}؛ چرا كه خداى تبارك و تعالى امام را به عنوان نشانى براى خَلق خويش بر نهاد و او را حجّت قرار داد. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۲۰۳؛ و روايت مفصّل امام رضا{{ع}} در معرفی امام و امامت: {{متن حدیث|هَل يَعرِفونَ قَدرَ الإِمامَةِ ومَحَلَّها مِنَ الاُمَّةِ فَيَجوزَ فيهَا اختِيارُهُم؟ إنَّ الإِمامَةَ أجَلُّ قَدراً، وأَعظَمُ شَأناً وأَعلى مَكاناً، وأَمنَعُ جانِباً، وأبعَدُ غَوراً مِن أن يَبلُغَهَا النّاسُ بِعُقولِهِم، أو يَنالوها بِآرائِهِم، أو يُقيموا إماماً بِاختِيارِهِم... فَكَيفَ لَهُم بِاختِيارِ الإِمامِ؟! وَالإِمامُ عالِمٌ لا يَجهَلُ... مُضطَلِعٌ بِالإِمامَةِ، عالِمٌ بِالسِّياسَةِ، مَفروضُ الطّاعَةِ}}؛ آيا مردم، مقام امامت و جايگاه آن در ميان امّت را مى‌دانند تا در نتيجه، انتخاب آنان در اين باره، روا باشد؟! امامت، مقامش بزرگ‌تر و شأنش والاتر و جايگاهش بلندتر و دست‌نيافتنى‌تر و ژرف‌تر از آن است كه مردم، با خردهايشان بدان برسند، يا با انديشه‌هايشان آن را دريابند، يا با انتخاب خود، امامى را برگمارند... پس مردم را چه رسد به انتخاب امام؟! امامى كه داناست و نادانى ندارد... در پيشوايى و رهبرى، نيرومند، و به سياست داناست. فرمان بردارى از او واجب است. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۹۸-۲۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*او در جای دیگری نیز گفته است: {{عربی|الإمامة إنّما هي مشتقّة من الإيتمام بالإنسان، والإيتمام هو الاتّباع، والاقتداء، والعمل بعمله، والقول بقوله}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. {{عربی|ويجب أن يُعتقد أنّه يلزمنا من طاعة الإمام ما يلزمنا من طاعة النبيّ{{صل}}، وأنّ كلّ [[فضل]] آتاه [[الله]] عَزَّ وَجَلَّ نبيَّه فقد آتاه الإمامَ إلا النبوّة}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، الهداية في الأصول و الفروع، ج۲، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* تعاریفی که در برخی کتب متقدّم [[علمای شیعه]] آمده، [[مؤیّد]] همین تعریف‌اند؛ از جمله: تعریف [[شیخ مفید]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي التقدّم فيما يقتضي طاعة صاحبه، والاقتداء به}}. مفید، علی بن محمد، الإفصاح في الإمامة، ص۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[علامه]] [[طبرسی]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|المستفاد من لفظ الإمام أمران؛ أحدهما: أنّه المقتدى به في أفعاله وأقواله‌. والثاني: أنّه الذي يقوم بتدبير الأمّة وسياستها، والقيام بأمورها، وتأديب جناتها، وتولية ولاتها، وإقامة الحدود على مستحقّيها، ومحاربة من يكيدها ويعاديها}}. طبرسی، فضل بن حسن، مجمع البيان، ج۱، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===تعریف مشهور [[متکلمان]]===&lt;br /&gt;
*تعریفی که غالب علمای [[کلام]] از &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; کرده‌اند، دو عنصر اساسی در آن به چشم می‌خورد؛ یکی اینکه [[امامت]] &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; است و دیگر اینکه این [[ریاست]] در &amp;quot;امور [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است. این تعریف، بیشتر نزد [[متکلمان]] [[اهل‌سنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: ماوردی در تعریف امامت گفته است: {{عربی|الإمامة موضوعة لخلافة النبوّة في حراسة الدين وسياسة الدنيا به}}. ماوردی، علی بن محمد، الأحكام السلطانية، ص۵؛ ابن خلدون نیز مشابه این عبارت را آورده است: {{عربی|نيابة عن صاحب الشريعة في حفظ الدين وسياسة الدنيا}}. [[ابن خلدون]]، عبدالرحمن بن محمد، المقدّمة، ص۱۹۰؛ امام‌الحرمین جويني نيز گفته است: {{عربی|الإمامة رياسة تامّة، وزعامة تتعلّق بالخاصّة والعامّة في مهمّات الدين والدنيا}}. جويني، عبدالملک بن عبدالله، غياث الأمم في التياث الظلم، ص۱۵؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: فخر رازی : {{عربی|الإمامة رئاسة في الدين والدنيا عامّة لشخص من الأشخاص}}. رازی، محمد بن عمر، نهاية العقول، ج۴، ص۳۲۱؛ مير سيد شريف جرجانى : {{عربی|الإمام: الذي له الرياسة العامّة في الدين والدنيا جميعاً}}. جرجانى، على بن محمود، التعريفات، ص۲۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; آمده و از آنجا به [[متکلمان]] [[زیدیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: [[حمیدان بن یحیی]] در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|هو الشخص الجامع للرئاسة على الخلق في الدين والدنيا على وجه لا يكون فوق يده يد}}. قاسمی، حمیدان بن یحیی، جواب المسائل الشتوية والشبه الحشوية، ص۴۸۴؛ احمد بن یحیی المرتضی نیز گفته است: {{عربی|رئاسة عامّة لشخص مخصوص بحكم الشرع ليس فوقها يد}}. المرتضی، احمد بن یحیی، البحر الزخار، ج۲، ص۵۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[امامیه]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه: شیخ مفید در تعریف [[امام]] گفته است: {{عربی|الإمام هو الإنسان الذي له رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا نيابةً عن النبيّ}}. مفید، محمد بن محمد، النكت الاعتقادية، ص۳۹؛ شیخ طوسی و به تبع او، ابن میثم بحرانی نیز در تعریف [[امامت]] گفته‌اند: {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في أمور الدين والدنيا}}. طوسی، محمد بن حسن، الرسائل العشر، ج۱، ص۱۰۳؛ بحرانی، میثم بن علی، النجاة في القيامة، ص۴۱؛ همچنین تعاریف ذیل در همین سیاق‌اند: محقق حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة لشخص من الأشخاص في الدين والدنيا بحقّ الأصالة}}. حلی، جعفر بن حسن، المسلك في أصول الدين، ص۳۰۶؛ علامه حلی : {{عربی|الإمامة رئاسة عامّة في أمور الدين والدنيا لشخص من الأشخاص نيابةً عن النبيّ}}. حلی، حسن بن یوسف، نهج المسترشدين، ص۶۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نیز منتقل شده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[سعد الدین تفتازانی]] در &amp;quot;شرح المقاصد&amp;quot; و [[قوشچی]] در &amp;quot;شرح تجرید&amp;quot;، [[امامت]] را چنین تعریف می‌کنند:{{عربی|الإمامةُ رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا، خلافةً عن النبيّ{{صل}}، وبهذا القيد خرجت النبوّة، وبقيد العموم مثل القضاء والرئاسة في بعض النواحي، وكذا رئاسة من جعلة الإمام نائباً عنه على الإطلاق؛ فإنّها لا تعمّ الإمامة}}&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، سعدالدین، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۳۴؛ قوشچی، علی بن محمد، شرح تجريد العقائد، ص۳۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*صاحبان این تعریف، معتقدند با قید {{عربی|عامّة}} ریاست‌های خُرد و با قید {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} [[نبوّت]] خارج می‌شود. پس [[امام]] آن کسی است که به صورت [[خلافت]] از [[رسول الله]]، [[ریاست عامه]] داشته باشد. در اغلب منابع [[اهل]] [[کلام]]، [[امامت]] را {{عربی|رئاسةٌ عامّةٌ في أمر الدين والدنيا}} تعریف کرده‌اند و گاهی برای دقت بیشتر، بعضی‌ها عبارت {{عربی|خلافةً عن النبيّ}} را هم اضافه کرده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[طریحی]] در &amp;quot;مجمع البحرین&amp;quot; نیز پس از بیان تعریف لغوی، به استعمال اصطلاحی [[امامت]] نزد [[اهل]] [[کلام]] اشاره کرده و می‌گوید: {{عربی|الإمامة هي الرئاسة العامّة على جميع الناس، فإذا أُخذت لا بشرط شيء تجامع النبوّة والرسالة}}&amp;lt;ref&amp;gt;طریحی، فخرالدین بن محمدعلی، مجمع البحرین، ج۶، ص۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*حاصل سخن او اینکه: [[امامت]] به استعمال مستعمل بستگی دارد؛ اگر به‌طور کلی و عمومی بررسی شود (به تعبیر او: اگر &amp;quot;لا بشرط&amp;quot; در نظر گرفته شود)، با [[نبوت]] و [[رسالت]] قابل جمع است؛ یعنی [[نبی]] می‌تواند علاوه بر [[مقام نبوت]]، [[امام]] نیز باشد؛ البته [[امام]] غیر [[نبی]] نیز متصوَّر است. اما اگر [[امامت]] با [[قطع]] نظر از [[نبوت]] بررسی شود (به تعبیر او: &amp;quot;بشرط لا عن النبوة&amp;quot; در نظر گرفته شود)، قابل جمع با [[نبوت]] نخواهد بود. البته [[حق]] این است که در ذات مفهوم &amp;quot;[[امام]]&amp;quot;، &amp;quot;بشرط لا&amp;quot; نهفته نیست؛ یعنی هنگامی که کلمه [[امام]] اطلاق می‌شود [[امام]]، لا بشرط مراد است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;اشکالات این تعریف&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
*بر تعریف [[متکلمان]] اشکالاتی وارد است؛ چه با قید &amp;quot;{{عربی|خلافةً عن النبيّ}}&amp;quot; و چه بدون آن. پیش از بیان این اشکالات، لازم است به مقدمه‌ای توجه شود:&lt;br /&gt;
*پس از [[رحلت رسول خدا]]{{صل}}، [[امت]] با دو گونه از [[اسلام]] مواجه شد؛&lt;br /&gt;
#[[اسلام]] محمدی که [[نماینده]] و مدافع آن، [[امیرالمؤمنین]]، [[حضرت زهرا]] و [[ائمه معصومین]]{{عم}} بودند.&lt;br /&gt;
#[[اسلام جاهلی]]&amp;lt;ref&amp;gt;حضرت امیرالمؤمنین{{ع}} در یکی از سخنان خود به این بازگشت به جاهلیت اشاره می‌فرماید: {{متن حدیث|حَتَّى إِذَا قَبَضَ الله رَسُولَهُ{{صل}} رَجَعَ قَوْمٌ عَلَى الْأَعْقَابِ وَغَالَتْهُمُ السُّبُلُ وَاتَّكَلُوا عَلَى الْوَلَائِجِ وَوَصَلُوا غَيْرَ الرَّحِمِ وَهَجَرُوا السَّبَبَ الَّذِي أُمِرُوا بِمَوَدَّتِهِ وَنَقَلُوا الْبِنَاءَ عَنْ رَصِّ أَسَاسِهِ فَبَنَوْهُ فِي غَيْرِ مَوْضِعِهِ. مَعَادِنُ كُلِّ خَطِيئَةٍ وَ أَبْوَابُ كُلِّ ضَارِبٍ فِي غَمْرَةٍ، قَدْ مَارُوا فِي الْحَيْرَةِ وَذَهَلُوا فِي السَّكْرَةِ، عَلَى سُنَّةٍ مِنْ آلِ فِرْعَوْنَ، مِنْ مُنْقَطِعٍ إِلَى الدُّنْيَا رَاكِنٍ، أَوْ مُفَارِقٍ لِلدِّينِ مُبَايِن}}؛ چون خدا فرستاده خود را نزد خویش برد، گروهی به گذشته برگردیدند، و با پيمودن راه‌های گوناگون به گمراهی رسیدند، و به دوستانی که خود گزیدند پیوستند، و از خویشاوند گسستند. از وسیلتی که به دوستی آن مأمور بودند جدا افتادند، و بنیان را از بن برافکندند، و در جای دیگر بنا نهادند. کانهای هرگونه گناهند، و هر فتنه‌جو را درگاه و پناه. از این سو بدان سو سرگردان، در غفلت و مستی به سنّت فرعونیان، یا از همه بریده و دل به دنیا بسته، و یا پیوند خود را با دین گسسته. سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۱۵۰، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt; است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} اولین مبارزان علیه این [[اسلام جاهلی]] بودند و همه نزاع‌های آن دو بزرگوار در آن وهله از [[تاریخ اسلام]]، بر سر [[حفظ اسلام]] محمدی بود. حوادثی که [[اسلام جاهلی]] پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} بر [[امت اسلام]] آورد، آن [[قدر]] آزاردهنده و ناگوار بودند که [[حضرت امیرالمؤمنین]]{{ع}} در توصیف آنها می‌فرماید: {{متن حدیث|فَصَبَرْتُ وَفِي الْعَيْنِ قَذًى وَفِي الْحَلْقِ شَجًا}}؛ پس شکیبایی گزیدم؛ در حالی که همانند کسی بودم که خار به چشمش رفته، و استخوان در گلویش مانده باشد&amp;lt;ref&amp;gt;سید رضی، نهج البلاغة، خطبه ۳، چاپ صبحی صالح.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و همین حوادث، سرانجام به [[شهادت]] [[حضرت زهرا]]{{س}} منجر شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بی‌شک، [[مبارزه]] [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} و [[حضرت زهرا]]{{س}} با [[اسلام جاهلی]]، [[نزاع]] بر &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نبود که از کسی گرفته شود و به دیگری داده شود؛ بلکه محور این [[مبارزه]]، [[اسلام]] [[رسول الله]]{{صل}} بود؛ [[اسلام]] [[حق]]، در برابر [[جاهلیت]] نوینی که با [[پوشش]] [[اسلام]]، ظاهر شده و از [[جاهلیت]] کهن نیز خطرناک‌تر بود. طبق [[منابع شیعه]] و [[اهل‌سنت]]، [[رسول اکرم]]{{صل}} خطاب به [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} فرمود: &amp;quot;بر سر [[تأویل]] [[نبرد]] می‌کنی همان‌گونه که من بر سر تنزیل [[نبرد]] کردم&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|تُقَاتِلُ عَلَى التَّأْوِيلِ كَمَا قَاتَلْتُ عَلَى التَّنْزِيلِ}}؛ خزاز قمی، علی بن محمد، کفایة الأثر، ج۱، ص۷۵؛ طوسی، محمد بن حسن، الأمالی، ج۱، ص۳۵۱. همچنین: مسند احمد، ج۳، ص۸۲؛ حاکم نیشابوری در مستدرک الصحیحین، ج۳، ص۱۲۲-۱۲۳؛ مسند ابی یعلی، ج۲، ص۳۴۱؛ صحیح ابن حبان، ص۵۴۴؛ هیثمی در مجمع الزوائد، ج۹، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. یعنی: [[جدال]] و [[نزاع]] من درباره اصل [[دین الهی]] و [[نزول وحی]] بود اما [[جدال]] و [[نزاع]] تو با [[قوم]] بر سر محتوای [[دین]] و [[شریعت]] خواهد بود. مقصود [[حضرت]] در این سخن اینکه: من با [[جاهلیت]] [[آشکار]] [[نبرد]] کردم، تو نیز با [[جاهلیت]] [[پنهان]] و نقاب‌دار [[مبارزه]] خواهی کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[جنگ]] پس از [[رسول اکرم]]{{صل}} بین این دو [[اسلام]] رخ داد که تا امروز هم همین [[جنگ]] ادامه دارد. [[جنگ]] بین [[اسلام]] محمدی و [[اسلام جاهلی]] و به بیانی دیگر: بین [[اسلام]] [[علوی]] و [[اسلام]] [[اموی]]. یکی از جلوه‌های این [[جنگ]] ممتد در [[تاریخ اسلام]]، رویارویی [[فکری]] و [[فرهنگی]] است که پرده‌ای از آن، ایجاد [[تحریفات]] بزرگ در [[جامعه اسلامی]] بود. [[اسلام جاهلی]] - چه در حوادث پس از [[رحلت پیامبر خاتم]]{{صل}} و چه در عصر [[اموی]] -[[دست]] به تحریف‌های متعددی در عرصه‌های فراوانی زده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از مهم‌ترین این دست‌اندازی‌ها:&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;[[تغییر]] [[حقیقت]] و [[ماهیت امامت]] و [[خلافت]]:&#039;&#039;&#039; از [[مقام]] و [[منصب الهی]] بودن به [[مقام]] و [[منصب]] دنیویِ محض؛ یعنی &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; به ‌معنای &amp;quot;[[قدرت]]&amp;quot; و &amp;quot;[[سلطنت]]&amp;quot; بر [[ملت]]. این [[تفسیر]]، [[امامت]] و [[ولایت]] را مانند سایر سلطنت‌هایی که در [[جهان]] بود جلوه می‌دهد. [[ادبیات]] [[ابوبکر]] و [[عمر]]&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان نمونه، ابن‌اثیر می‌نویسد: {{عربی|لمّا تُوفي رسول الله{{صل}} اجتمع الأنصار في سقيفة بني ساعدة ليبايعوا سعد بن عبادة: فبلغ ذلك أبابكر فأتاهم ومعه عمر، وأبوعبيدة بن الجراح فقال: ما هذا؟ فقالوا: مِنَّا أمير ومنكم أمير، فقال أبوبكر: منّا الأمراء ومنكم الوزراء}}. ابن‌اثیر، على بن محمد، الكامل في التاريخ، ج۲، ص۳۲۵، ابوبکر، طبق نقل ابن‌عساکر نیز گفته است: {{عربی|نحن الأمراء وأنتم الوزراء، والأمر بيننا نصفان كقد الأنملة}}. ابن‌عساکر، علی بن حسن، تاریخ مدینة دمشق، ج۱۰، ص۲۹۲. طبری نیز نقل می‌کند که عمر بن خطاب در سقیفه گفته است: {{عربی|والله لا ترضى العرب أن يؤمّروكم ونبيها من غيركم ولكنّ العرب لا تمتنع أن تولّى أمرها من كانت النبوّة فيهم وولى أمورهم منهم ولنا بذلك على من أبى من العرب الحجّة الظاهرة والسلطان المبين. من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته ونحن أولياؤه وعشيرته إلا مدل بباطل أو متجانف لاثم أو متورط في هلكة}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوك، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[سقیفه]] نشان می‌دهد بحث سر [[قدرت]] و [[سلطنت]] است. این [[تحریف]]، متأسفانه بلافاصله پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} آغاز شد و در سلطنت‌های خلفای [[مسلمین]] ادامه یافت؛ در حالی‌ که در [[مکتب]] [[رسول الله]]{{صل}} و [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، مسئلۀ [[رهبری]] و [[جانشینی پیامبر]]، به‌عنوان &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; مطرح بوده است. در واژگان &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; و &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; - که بیشتر در [[فرهنگ شیعه]] رایج‌اند - معانی بسیار بلندی نهفته است که [[حقیقت]] مسئلۀ &amp;quot;[[رهبری]] در [[اسلام]]&amp;quot; را نشان می‌دهد و کلماتی مانند &amp;quot;[[رئیس]]&amp;quot; و &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; نمی‌توانند گویای آن باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#&#039;&#039;&#039;ایجاد توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]]:&#039;&#039;&#039; [[تحریف]] دیگری که فرع بر [[تحریف]] پیشین است اینکه مروجان [[اسلام جاهلی]]، سلطنتِ بر [[مردم]] را [[دنیوی]] جلوه دادند و از [[دین]] جدا کردند؛ یعنی پس از آنکه [[امامت]] بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} را به [[ریاست]] و [[سلطنت]] تعبیر کردند، این [[ریاست]] و [[سلطنت]] را [[سلطنت]] [[دنیوی]] مثل سایر سلطنت‌ها معرفی کرده و بدین‌رو از [[دین]] جدا کردند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پس از این مقدمه، روشن می‌شود اشکالات اساسی تعریف مذکور از [[امامت]] به دو نکته ذیل برمی‌گردند:&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۱. [[تفسیر]] [[امامت]] به [[ریاست]] (تعریف به لازم؛ نه به [[حقیقت]]):&#039;&#039;&#039; بی‌شک، مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است و نمی‌توان این مفهوم را از [[امامت]] جدا انگاشت، لکن جنبه مهمی که در [[حقیقت امامت]] باید لحاظ شود، جنبه ریاستش نیست؛ جنبه مهم‌تری که می‌تواند گویای ماهیت و [[حقیقت امامت]] باشد، بحث ولایت‌ الامری است. [[امامت]] چیزی جز &amp;quot;[[ولایت امر]]&amp;quot; نیست و [[ولایت امر]] عقلاً و نقلاً [[حق]] انحصاری [[خدای متعال]] و مقامی [[الهی]] است. البته در نگاه مردمی که [[خدا]] را از زندگی‌شان حذف می‌کنند، [[امامت]] - خواه ناخواه - تنها [[ریاست]] و [[امارت]] خواهد بود و هنگامی که [[حقوق]] و [[حدود الهی]] در محاسبات [[جامعه]] نباشند، شیخ [[قبیله]] یا هر شخص دیگری نیز می‌تواند [[رئیس]] باشد و اگر کسی [[رئیس]] شد به هر حال، باید به [[فرمان]] او رفت و از او [[تبعیت]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[انتخاب]] واژه [[ریاست]] یا [[سلطنت]]&amp;lt;ref&amp;gt;پیش از این روایت طبری (م۳۱۰ق) از گفته عمر بن خطاب در سقیفه نقل شد که گفته بود: {{عربی|من ذا ينازعنا سلطان محمد وإمارته...}}. طبری، محمد بن جریر، تاريخ الأمم والملوک، ج۲، ص۴۵۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[تفسیر]] [[حقیقت امامت]]، انعکاسی از واقعیت تلخ [[جامعه اسلامی]] پس ار [[رسول الله]]{{صل}} است. حوادث [[غصب]] [[امامت]] از [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} آغازگر [[انحراف]] [[امامت]] از [[جایگاه]] اصلی‌اش شد و چون [[امامت]] را از [[جایگاه]] [[حقیقی]] و بلندش جابجا کردند، تمام این [[تحریف‌ها]] دامن‌گیر [[جامعه اسلامی]] شد. به همین [[دلیل]]، [[حضرت زهرا]]{{س}} در خطبه‌ای، به [[مردم]] عصر خود نهیب زد و فرمود: {{متن حدیث|وَيْحَهُم! أَنَّى زَحْزَحُوهَا عَنْ رَوَاسِي الرِّسَالَةِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;صدوق، محمد بن علی، معانی الأخبار، ص۳۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ شگفتا از آنان! چگونه [[خلافت]] را از جایگاه‌های [[استوار]] [[رسالت]] دور راندند؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، عبارت [[ریاست]] یا [[سلطنت]] با مفاهیمی که در [[اسلام]] برای مسأله [[امامت]] آمده است سازگار نیست و هنگامی که به [[قرآن کریم]] و [[حدیث]] [[معصومان]]{{عم}} مراجعه می‌کنیم، می‌بینیم در مسأله [[امامت]] چیز دیگری مطرح است&amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال: خدای متعال در قرآن کریم امامت را عهد الهی معرفی کند: {{متن قرآن|لاَ يَنَالُ عَهْدِي الظّالِمِينَ}}، روايات منقول از معصومین{{عم}} نیز از امامت به عنوان جایگاه انبیا، میراث اوصیا و خلافت خدا و رسول ياد شده است: {{متن حدیث|الإِمامَةَ هِيَ مَنزِلَةُ الأَنبِياءِ، وإرثُ الأَوصِياءِ، إنَّ الإِمامَةَ خِلافَةُ الله وخِلافَةُ الرَّسولِ}}. کلینی، محمد بن یعقوب، الكافي، ج۱، ص۱۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ حتی یک بار هم در تعابیر [[رسول اکرم]]{{صل}} کلمه [[ریاست]] به چشم نمی‌خورد و با وجود اینکه مفهوم &amp;quot;[[ریاست]]&amp;quot; در &amp;quot;[[امامت]]&amp;quot; نهفته است، اما در [[آیات]] کریمه و [[احادیث]] [[پیامبر اکرم]] و [[اهل بیت]]{{عم}} از زاویه [[ریاست]] به آن [[مقام]] بلند نگاه نشده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از سوی دیگری، تعریف جامع و [[مانع]]، باید به جوهر و اصلِ معنا اشاره کند و واژگانی به‌کار بگیرد که مقوّم ماهیت آن مفهوم باشند؛ نه آنکه آثار یا نتایج و تبعات آن مفهوم را محور تعریف خود قرار دهد. ریاستی که در تعریف گذشته ذکر شد، نتیجه [[امامت]] است یا عَرَض عام آن؛ اما نه جوهر اصلی و مقوم ماهیتش&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[ریاست]] نیز از آن جهت که می‌تواند گسترده و کلان باشد یا نباشد، قابل تقسیم بر [[عامه]] و [[خاصه]] است. به همین [[دلیل]]، [[برادران]] [[اهل‌سنت]] چون [[امامت]] را به [[ریاست]] تبدیل کردند، ناچار شدند قید [[عامه]] را بیاورند؛ تا شامل ریاست‌های خاص و [[خرد]] نشود؛ زیرا مدیر مدرسه یا [[مسئول]] اداره نیز [[رئیس]] است و هر رئیسی [[امام]] نیست. ازاین‌رو، ناچار شدند [[ریاست]] را به قید [[عامه]] تقیید کنند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;۲. توهم جدایی [[دین]] از [[دنیا]] ([[میراث]] [[اسلام جاهلی]]):&#039;&#039;&#039; همان‌گونه که اشاره شد، جداسازی [[دین الهی]] از دنیای [[مردم]] یکی از تحریف‌هایی است که دامنگیر [[امت اسلام]] شد. بنابر این، عبارت {{عربی|في أمر الدين والدنيا}} که در [[تعریف امامت]] آورده‌اند، بی‌اساس و از میراث‌های [[اسلام جاهلی]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[منابع حدیثی]] و [[تاریخی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] [[نقل]] کرده‌اند از همان روزهای اولی که [[ابوبکر]] سر کار آمد، [[مردم]] و [[صحابه]] از او درباره [[دین]] سؤال می‌کردند و چون [[ابوبکر]] پاسخ آن مسائل [[شرعی]] را نمی‌دانست، به دیگران مراجعه می‌کرد. در زمان عمربن‌خطاب نیز [[رجوع]] به دیگران بیشتر اتفاق افتاد. مرحوم امینی  مسأله [[رجوع]] [[عمر]] به دیگران به‌ویژه، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}} را در کتاب [[شریف]] &amp;quot;[[الغدیر]]&amp;quot; جمع کرده است؛ تقریباً یک جلد از این کتاب&amp;lt;ref&amp;gt;امینی، عبدالحسین، الغدیر، ج۶، ص۸۲ - ۳۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; مختص به همین مسئله است و این سخن [[عمر]] که {{عربی|لَو لَا عَلِيٌّ لَهَلَكَ عُمَرُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه، عبدالله بن مسلم، تأویل مختلف الحدیث، ج۱، ص۱۵۲ و ص۱۶۲؛ باقلانی، ابوبکر، تمهید الأوائل فی تلخیص الدلائل، ج۱، ص۵۰۲ و ص۵۴۷؛ ابن‌مردویه اصفهانی، احمد بن موسی، مناقب علی ابن أبی طالب، ص۸۸؛ ماوردی شافعی، علی بن محمد، الحاوی الکبیر، ج۱۲، ص۱۱۵ و ج۱۳، ص۲۱۳؛ سمعانی، أبوالمظفر، التفسیر، ج۵، ص۱۵۴؛ زمخشری، محمود، المفصل فی صنعة الإعراب، ج۱، ص۴۳۲؛ ابن‌عربی، ابوبکر، العواصم من القواصم، ج۱، ص۱۹۴؛ رازی، فخرالدین، التفسیر الکبیر، ج۲۱، ص۳۸۰؛ ابن ابی‌الحدید، عبدالحمید، شرح نهج‌البلاغه، ج۱، ص۱۸ و ج۱۲، ص۲۰۵؛ قندوزی، سلیمان بن ابراهیم، ینابیع المودة، ج۱، ص۲۱۶ و ج۲، ص۱۷۲ و ج۳، ص۱۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; را آنجا مطرح و بررسی کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*به [[دلیل]] همین مطلب؛ یعنی عدم اطلاع کافی [[خلیفه اول]] و [[خلیفه دوم]] به [[کتاب خدا]] و [[سنت]] [[رسول الله]] و [[رجوع]] آنان به دیگران، [[رجال]] [[مکتب]] [[اهل‌سنت]] بین [[دین]] و [[دنیا]] جدایی قائل شدند و در نتیجه &amp;quot;[[مرجعیت سیاسی]]&amp;quot; از &amp;quot;[[مرجعیت دینی]]&amp;quot; جدا شد و این آغاز تناقض آشکاری بود که درون این [[مکتب]] اتفاق افتاد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[مکتب]] [[روایی]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] برای توجیه این رویکرد، [[روایات]] مجعولی نیز [[نقل]] شده که اساس این دوگانگی را تحکیم بخشید و بر انگاره جدایی [[دنیا]] از [[دین]] صحه گذاشته است. از جمله آنها، [[روایت]] معروف &amp;quot;تأبیر النخل&amp;quot; است که [[اهل]] [[صحاح]] نیز [[نقل]] می‌کنند. در [[صحیح مسلم]] آمده است: &amp;quot;[[رسول الله]] به [[مدینه]] آمد؛ در حالی که آنان درختان [[نخل]] را بارور می‌کردند. [[رسول الله]] گفت: &amp;quot;چه کار می‌کنید؟&amp;quot; گفتند: درختان را بارور می‌کنیم. گفت: &amp;quot;شاید اگر چنین نکنید، بهتر باشد&amp;quot;. آنان نیز از آن عمل دست کشیدند در آن سال میوه درختان ریخت یا ناقص شد. [[راوی]] می‌گوید: قضیه را برای [[رسول الله]] توضیح دادند. [[پیامبر]] گفت: &amp;quot;من هم بشرم؛ هرگاه چیزی در مورد دینتان را به شما امر کردم، آن را بپذیرید و هرگاه مطابق [[رأی]] و نظر خویش چیزی را به شما گفتم؛ بدانید که من نیز بشری هستم مانند شما&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن حدیث|قَدِمَ نَبِيُّ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةَ، وَهُمْ يَأْبُرُونَ النَّخْلَ، يَقُولُونَ يُلَقِّحُونَ النَّخْلَ، فَقَالَ: مَا تَصْنَعُونَ؟ قَالُوا: كُنَّا نَصْنَعُهُ، قَالَ: لَعَلَّكُمْ لَوْ لَمْ تَفْعَلُوا كَانَ خَيْرًا فَتَرَكُوهُ، فَنَفَضَتْ أَوْ فَنَقَصَتْ، قَالَ فَذَكَرُوا ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ: إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ، إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ نیشابوری، مسلم بن حجاج، الجامع الصحيح، ج۴، ص۱۸۳۵. همچنین رجوع شود به: بستی، محمد بن حبان، صحيح ابن حبان، ج۱، ص۲۰۲؛ طبرانی، سلیمان بن احمد، المعجم الکبیر، ج۴، ص۲۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[روایت]] و امثال آن، از جعل‌های جنایت‌آمیزی است که در [[حق]] [[حضرت رسول]]{{صل}} انجام شده و با عبارات متفاوتی [[نقل]] شده است؛ از جمله: {{متن حدیث|إِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ دِينِكُمْ فَخُذُوا بِهِ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِشَيْءٍ مِنْ رَأْيِي، فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ}}؛ {{متن حدیث|إِنَّمَا ظَنَنْتُ ظَنًّا، فَلَا تُؤَاخِذُونِي بِالظَّنِّ، وَلَكِنْ إِذَا حَدَّثْتُكُمْ عَنِ اللهِ شَيْئًا فَخُذُوا بِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۱؛ مسند احمد (۳/۱۵)؛ مسند عبد بن حميد، المنتخب (ص۶۴)؛ مسند ابوداود طيالسي (۱/۱۸۶)؛ طحاوي در شرح معاني الآثار (۳/۴۸)؛ ابن أبي عاصم در الآحاد والمثاني (۱/۱۶۵)؛ مسند ابي يعلى (۲/۱۲)، مسند الشاشي (۱/۶۸، ۷۰)، ابو نعيم در حلية الأولياء (۴/ ۳۷۲).&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن حدیث|أَنْتُمْ أَعْلَمُ بِأَمْرِ دُنْيَاكُمْ&amp;quot; يا: &amp;quot;إِذَا كَانَ شَيْءٌ مِنْ أَمْرِ دُنْيَاكُمْ فَأَنْتُمْ أَعْلَمُ بِهِ، فَإِذَا كَانَ مِنْ أَمْرِ دِينِكُمْ فَإِلَيَّ}}&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: صحيح مسلم ح۲۳۶۳؛ مسند احمد (۲۰/۱۹)، سنن ابن ماجة، ح۲۴۷۱، بزار در البحر الزخار (۱۳/۳۵۵) (۱۸/۹۹)، مسند ابي يعلى (۶/۱۹۸) (۶/۲۳۷)، طحاوي در شرح مشكل الآثار (۴/۴۲۴)، صحيح ابن حبان (۱/۲۰۱).&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*مضمون کلی این [[نقل]] قول‌های تحریف‌آمیز این است که اگر در مورد دینتان فرمانی صادر کردم، آن را بپذیرید و اگر در مورد [[دنیا]] به شما دستوری دادم پس از من [[اطاعت]] نکنید! و مفاد نهایی آن، اصل &amp;quot;جدایی [[دین]] و [[دنیا]]&amp;quot; است که در [[روایات]] مجعولی [[نقل]] شده است. متأسفانه این از [[روایات]] متفق‌ علیه [[برادران]] [[اهل‌سنت]] است و با صریح [[قرآن]] تناقض دارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پرسشی که اینجا باید مطرح شود اینکه: &amp;quot;بیع&amp;quot;، &amp;quot;[[تجارت]]&amp;quot;، &amp;quot;[[زکات]]&amp;quot; و &amp;quot;[[خمس]]&amp;quot; از [[امور دنیوی]] شمرده می‌‌شوند یا از [[امور دینی]]؟ [[قرآن]] درباره بیع سخن گفته است، آیا بیع [[دنیوی]] است و [[دینی]] نیست؟!&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*[[قرآن کریم]] می‌فرماید: {{متن قرآن|الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«(همان) کسانی که اگر آنان را در زمین توانمندی دهیم نماز بر پا می‌دارند و زکات می‌پردازند و به کار شایسته فرمان می‌دهند و از کار ناپسند باز می‌دارند» سوره حج، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[اداره امور]] [[کشور]] یعنی عمل به [[احکام اسلام]]. حال اگر [[احکام اسلام]] به‌گونه‌ای بیان کنیم که مربوط به [[دین]] باشد و ربطی به [[دنیا]] نداشته باشد، تناقض است. متأسفانه در [[کلام]] و [[حدیث]] [[برادران]] [[اهل‌سنت]] تناقضاتی دیده می‌شود؛ تناقض‌هایی در مسائل [[توحید]]، [[نبوت]]، [[خلافت]] و [[امامت]] که حتی به [[فروع دین]] نیز کشیده شده است &amp;lt;ref&amp;gt;به عنوان مثال، برادران اهل سنت حدیث عشره مبشره را روایت می‌کند که ده نفر از جمله طلحه و زبیر، همگی در بهشت هستند. از طرفی قرآن می‌گوید که {{متن قرآن|وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا}}؛ «و آنان که با خداوند و پیامبر او نافرمانی کنند بی‌گمان آتش دوزخ، آنان راست که هماره در آن جاودانند» سوره جن، آیه ۲۳. خدا و رسول را اینها معصیت کردند؛ با اینکه خدا دستور داده بود از پیامبر و اولی‌الامر اطاعت کنند: {{متن قرآن|أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ}}؛ «از خداوند فرمان برید و از پیامبر و صاحبان امری که از شمایند فرمانبرداری کنید» سوره نساء، آیه ۵۹. اما اینان اطاعت نکردند؛ اکنون اهل سنت این تناقض را چگونه حل می‌کند؟ چطور می‌شود اینها هم بهشتی باشند و هم جهنمی؟! امثال این تناقض‌ها بسیارند که تنها راه برون رفت از آنان بازگشت به اسلام اصیل و قرآن و عترت است. این‌گونه بود که تقابل بین دین و دنیا در تفکر اسلامی رخنه کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در [[اسلام]] محمدی{{صل}}، [[دین]] همان شریعتی است که دنیای [[مردم]] را اداره می‌کند؛ بنابر این، در نگاه [[اسلام]] محمدی{{صل}} دو مقوله جدا از یک‌دیگر به نام &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; و &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; وجود ندارد. بی‌گمان، [[رسول الله]]{{صل}} چون [[رئیس]] [[دین]] بود، [[رئیس]] [[دنیا]] نیز بود و چون این [[خلافت]]، [[خلافت]] [[رسول]] خداست، باید &amp;quot;[[ریاست عامه]] در [[دین]]&amp;quot; باشد که همان &amp;quot;[[ولایت امر]] بر دنیای [[مردم]]&amp;quot; است، لکن در [[تفسیری]] که بعد از [[رسول اکرم]]{{صل}} از [[دین]] ارائه شد، [[دین]] و [[دنیا]] از یک‌دیگر تفکیک شدند و از اینجا بود که میان [[دین]] و [[دنیا]] [[تقابل]] ایجاد شد و باعث اندیشه‌های [[انحرافی]] فراوانی گردید&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*اما [[امامت]] در [[مکتب]] [[اهل‌بیت]]{{عم}} این‌گونه تعریف نشده است. همان‌گونه که خواهد آمد، [[امامت]]، ولایت‌الامر است و اساساً [[تقابل]] [[دین]] و [[دنیا]] در این [[مکتب]] معنا و مفهوم ندارد؛ آن [[دینی]] که [[قرآن کریم]] معرفی می‌کند همین [[شریعت]] است و [[شریعت]] شامل همه امور دنیاست و [[رسول اکرم]]{{صل}} [[مبعوث]] شد تا [[مردم]] را در [[دنیا]] [[هدایت]] کند تا بتوانند در [[دنیا]] و [[آخرت]] [[سعادتمند]] باشند&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی|اراکی، محسن]]، [https://www.aparat.com/v/FYjv0?playlist=376197 درس اول «امامت در اندیشه اسلامی»]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*طبق آموزه‌های قرآنی و حدیثی، [[امامت]]، [[استمرار نبوت]] است در همه جزئیات و کلیات و تنها تفاوت آن با [[نبوت]] این است که بر شخص [[امام]] [[وحی]] فرود نمی‌آید و [[نزول وحی]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} پایان یافته است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از گذر [[علم لدنی]] و [[الهام الهی]] و [[مصونیت از خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]]، از [[آیین]] [[پیامبر اسلام]]{{صل}} [[پاسداری]] می‌کند و [[مصالح دینی]] و [[دنیوی]] [[مردم]] را محفوظ می‌دارد. [[تعالیم]] [[راستین]] آسمانی در روزگار پس از [[پیامبر]]{{صل}} تنها از این گذر به دست [[انسان]] می‌رسد و [[قرآن کریم]] و [[سنت پیامبر]] از این طریق [[تفسیر]] و [[تبیین]] می‌شود. [[شیعیان]] معتقدند که [[مقام امامت]] تنها به [[معصومین]] می‌رسد. [[متکلمان امامیه]] بر این [[اعتقاد]] دلایلی آورده‌اند؛ از جمله اینکه [[مردم]] از آن رو به [[امام]] محتاج‌اند، که [[معصوم]] نیستند و بدون او به [[خطا]] و [[اشتباه]] و [[گناه]] می‌لغزند. حال، اگر [[امام]]، [[معصوم]] نباشد، خود به امامی دیگر [[نیازمند]] است و این [[باطل]] است؛ زیرا مستلزم دور است. چون [[متکلمان امامیه]] این مدعا را ثابت می‌کنند، از آن نتیجه می‌گیرند که [[مردم]] را در [[انتخاب]] شخص [[امام]]، [[حق]] و سهمی نیست؛ زیرا او باید [[معصوم]] باشد و [[عصمت]] حالتی است [[باطنی]] و جز [[خداوند]] کسی از [[باطن]] [[انسان]] خبر ندارد و [[مردم]] توانِ آن ندارند که [[معصوم]] را از غیر [[معصوم]] بازشناسند&amp;lt;ref&amp;gt;بدایة المعارف الالهیة فی شرح عقائد الامامیه‌، ۱۰۰؛ فرهنگ معارف اسلامی، ۱/ ۲۸۵ و ۲۸۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۲-۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بدین‌سان، [[امامت]] همانند [[نبوت]] محتاج [[نص]] [[خداوند]] است و این [[نص]] یا به واسطه [[پیامبر]] تحقق می‌یابد و او به صراحت [[امام]] را معرفی می‌کند و یا به واسطه امامی که خود [[منصوب]] به [[نص]] است&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مفهوم [[امامت]] در [[علم کلام]]==&lt;br /&gt;
*کلمه &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; در [[زبان فارسی]] یعنی &amp;quot;[[پیشوا]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در [[زبان عربی]] به معنای &amp;quot;[[رهبر]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; است. [[امام]] و [[امامت]] بر حسبِ لغت، مشتق از &amp;quot;أمّ&amp;quot; به معنای هر چیزی است که چیزهای دیگر به آن ضمیمه و نسبت داده می‌شوند، یا از او پیدا می‌شوند، یا [[الهام]] می‌گیرند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;، به همین منظور، کلمه [[امام]] یا [[پیشوا]] به خودی خود مفهوم مقدسی ندارد، زیرا [[پیشوا]] یعنی کسی که پیش روست، عده‌ای تابع و پیرو او هستند، اعم از آنکه آن [[پیشوا]] [[عادل]] و راه یافته و درست‌رو باشد یا [[باطل]] و [[گمراه]]، [[قرآن]] هم کلمه [[امام]] را در هر دو مورد اطلاق کرده است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در یک [[آیه]] می‌فرماید: {{متن قرآن|وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنان را پیشوایانی کردیم که به فرمان ما راهبری می‌کردند» سوره انبیاء، آیه ۷۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; در آیه‌ای دیگر: {{متن قرآن|أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنان مردم را به سوی آتش دوزخ فرا می‌خوانند» سوره قصص، آیه ۴۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; از این رو، لفظ &amp;quot;[[امام]]&amp;quot; دارای مفهوم لغوی اختصاصی نیست بلکه مفهومی عام دارد و به همه [[رهبران]] [[حق و باطل]] اطلاق می‌شود.&lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] در چند مورد است که در پاره‌ای موارد [[اهل تسنن]] هم قائل به [[پیشوایی]] و [[امامت]] هستند ولی در کیفیت و شخصش با ما [[اختلاف]] دارند، اما در بعضی مفاهیم [[امامت]] اصلاً آنها منکر چنین امامتی هستند. [[امامت]] در معانی: &amp;quot;[[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]]، [[مرجعیت دینی]]، [[ولایت]]&amp;quot; استعمال شده است که [[اهل تسنن]] فقط معنای [[زعامت]] و [[رهبری]] [[اجتماع]] را قبول دارند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۴۶–۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[شیعه]] قائل است که [[پیغمبر]]{{صل}} [[رهبر]] و [[زعیم]] بعد از خودش را [[تعیین]] کرد و گفت بعد از من زمام امور [[مسلمانان]] باید به دست [[علی]]{{ع}} باشد و [[اهل تسنن]] با [[اختلاف]] منطقی که دارند این مطلب را لااقل به شکلی که [[شیعه]] قبول دارد، قبول ندارند و می‌گویند در این جهت [[پیغمبر]] شخص معیّنی را [[تعیین]] نکرد و [[وظیفه]] خود [[مسلمانان]] بوده است که [[رهبر]] را بعد از [[پیغمبر]] [[انتخاب]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مرتضی مطهری، امامت و رهبری، ص۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با بیان فوق روشن گردید که [[امامت]] نسبت به [[ولایت]] اعم مطلق است و وقتی [[متکلم]] از [[ولایت]] بحث می‌کند در واقع منظورش جنبه [[زعامت]] و رهبریِ [[اجتماعی]] [[امام]] است. [[متکلمین]]، تعاریف گوناگونی از [[امامت]] ارائه می‌دهند که به برخی از آنها اشاره می‌شود:&lt;br /&gt;
#تعریف مختارِ &amp;quot;[[محقق بحرانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کمال‌الدین ابن‌میثم بحرانی، متوفای ۶۷۹ ق است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] المرام: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در [[دین]] و [[دنیا]] اصالتاً (نه بر [[سبیل]] [[نیابت]])&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|وهي رئاسة عامّة في أمور الدّين والدنيا بالإصالة}}؛ میثم بن علی بن البحرانی، قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۴ و ر.ک: محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف مربوط به &amp;quot;[[تفتازانی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;سعدالدّین تفتازانی (۷۱۲ - ۷۹۳) متکلم برجسته اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در شرح المقاصد: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست عامه]] در امر [[دین]] و [[دنیا]] از باب [[جانشینی پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي رِئاسَة عامّةٌ فی امُورِ الدِّینِ وَ الدُّنْیا، خَلافَة عَنِ النَّبی{{صل}}}}؛ محمد حسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#تعریف جناب &amp;quot;[[ایجی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;عضدالدین ایجی (۴۵۰ - ۵۰۵) متکلم نام‌دار اسلامی و طرفدار مذهب اشعریه است.&amp;lt;/ref&amp;gt; در المواقف: &amp;quot;[[امامت]] یعنی [[نیابت]] و [[جانشینی پیامبر]] در برپا داشتن [[احکام دین]]، به‌طوری که [[تبعیت]] از او بر عموم [[مسلمین]] [[واجب]] است&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|هي خلافة الرّسول في اقامة الدين بحيث يجب اتّباعه علی كافّة الامّة}}؛ عضدالدین ایجی، المواقف فی علم کلام، ص۶۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛&lt;br /&gt;
#&amp;quot;[[ابن خلدون]]&amp;quot; می‌نویسد: &amp;quot;[[خلافت]] یعنی [[نیابت]] از صاحب [[شریعت]] در [[حفظ دین]] و [[سیاست]] [[دنیا]]. به این اعتبار [[خلافت]] و [[امامت]] گفته می‌شود و متصدی آن [[مقام]] را [[امام]] و [[خلیفه]] می‌گویند&amp;lt;ref&amp;gt;مقدمه ابن‌خلدون، ص۱۹۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#تعریف [[متکلمین]] [[شیعه]] و [[سنّی]] از [[امامت]] که در آن اختلافی ندارند این است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از یک [[ریاست]] و اولی بالتصرف بودن در جمیع [[شئون]] [[دین]] و دنیای [[مردم]] (اعم از [[بیان احکام]]، [[اجرای حدود]]، اداره [[جامعه]]، ایجاد [[عدالت اجتماعی]]، [[جنگ]] و [[صلح]] و...) برای شخص معیّنی از [[انسان‌ها]] به عنوان [[نیابت]] و [[جانشینی]] از [[پیامبر]]{{صل}}&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الامامة رئاسة عامّة في امور الدّين والدنيا، لشخص من الأشخاص نيابة عن النبي{{صل}}}}؛ علی محمدی، شرح کشف المراد، ص۴۰۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. در این تعریف، [[ولایت]] و [[امامت]] [[ریاست عامه]] الهیه معرفی شده، لذا مستلزم اجزایی است که عبارتند از: تقدم، [[علم]]، [[قدرت]] و [[حُکم]]، که بدون این اجزا، ریاستی متصور نیست. پس &amp;quot;[[ولیّ]]&amp;quot; کسی است که در [[خلقت]] خود، متقدم، عالِم، [[قادر]]، [[حاکم]] و نسبت به دیگر مخلوقات تصرف‌کننده علی‌الاطلاق باشد. اما تقدم او برای آن است که ولیِّ مطلق، [[انسانی]] است که [[خداوند]] او را خلعت [[جمال]] و کمال پوشانیده، و [[قلب]] او را مکان [[مشیت]] خود قرار داده و خزینه [[علم]] خود گردانیده و [[لباس]] [[تصرف]] [در [[آفرینش]]] و [[حکم]] [بر مخلوقات] را بر قامت او پوشانیده است. [[امر الهی]] در عالَم بشری در [[اختیار]] اوست. او مانند آفتابی درخشان است که [[خالق]] [[جهان]] در آن درخشش، [[نور]] [[حیات]] و [[اشراق]] و احتراق برای [[اهل]] روزگارها قرار داده است&amp;lt;ref&amp;gt;ماهنامه موعود، شماره ۶۶، اسفند ۱۳۸۵، مقاله &amp;quot;امامت و ولایت خاتم الانبیا&amp;quot; تلخیصی از کتاب ولایت کلّیه، سید حسن میرجهانی اصفهانی.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
#[[متکلم]] بزرگ [[شیعه]] &amp;quot;[[خواجه نصیر طوسی]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;خواجه نصیرالدّین طوسی (۵۹۷ -۶۷۲) سلطان المحققین، استادالبشر، حکیم و ریاضی‌دان، فیلسوف و متکلم بزرگ شیعی، مؤلف گران‌قدر کتاب کلامی ارزشمند تجریدالاعتقاد و شارح اشارات بوعلی سیناست.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[کتاب]] [[قواعد]] العقائد تعریف مُتقن و جامعی را مطرح کرده است که از تعاریف پیش مناسب‌تر است: &amp;quot;[[امامت]] عبارت است از [[ریاست]] عمومی [[دینی]] که عهده‌دار [[ترغیب]] همه [[مردم]] در [[حفظ]] و حراست از [[مصالح دینی]] و [[دنیایی]] بوده و آنان را بر حسب همان [[مصالح]] از آنچه برای‌شان ضرر دارد، برحذر می‌نماید&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|الإمامة رئاسة عامّة دينية مشتملة على ترغيب عموم الناس في حفظ مصالحهم الدينية و الدنياوية، وزجرهم عمّا نصرهم بحسبها}}؛ خواجه نصیر طوسی، قواعد العقائد، ص۱۰۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*با دقت و نظر اجمالی به تعریف مزبور می‌توان به [[جامعیت]] و تمامیت آن [[اذعان]] نمود، چه آنکه در این تعریف [[مقید]] نمودن [[ریاست]] به &amp;quot;[[ریاست]] [[دینی]]&amp;quot; کاشف این معناست که [[امامت]]، منصبی است [[الهی]]، نه [[مقام]] و منصبی [[اجتماعی]] که [[مردم]] در [[انتخاب]] آن نقش داشته باشند. و این نکته مهم و برجسته‌ای است که [[علمای شیعه]] به آن اهتمام داشته و ادله‌ای بر [[اثبات]] آن اقامه کرده‌اند. و اصولاً همین نقطه محلّ [[اختلاف]] [[شیعه]] و [[اهل سنّت]] است&amp;lt;ref&amp;gt;محمدحسین مختاری مازندرانی، امامت و رهبری، ص۳۱ و ۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*هم‌چنین برخلاف نظریه اکثر علمای [[اهل سنت]] که [[امامت]] و [[خلافت]] را مرادف دانسته و گفته‌اند [[خلافت]] و [[امامت]] یک معنا دارد&amp;lt;ref&amp;gt;جعفر سبحانی، رهبری امت، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;، هر گاه یکی از آنها صادق باشد دیگری نیز صادق خواهد بود. [[عالمان]] [[شیعی]] این مطلب را رد کرده و گفته‌اند که در تحقق معنای [[امامت]]، [[پیشوایی]] شرط است. [[امام]] باید به آنچه می‌گوید عمل کند و قولاً و عملاً [[مردم]] را [[رهبری]] کند. اما در تحقق معنای لغوی [[خلافت]] همین اندازه کافی است که شخص [[خلیفه]] برای [[جانشینی]] از [[پیغمبر]] [[تعیین]] شده باشد و در غیاب او کارهایش را انجام دهد. پس، این دو معنا مرادف نیستند، هر چند ممکن است در یک شخص جمع شوند&amp;lt;ref&amp;gt;ابراهیم امینی، بررسی مسائل کلی امامت، ص۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در نتیجه می‌توان [[اذعان]] داشت که اگر [[امام]] به‌طور مطلق بر کسی گفته شد و قرینه‌ای وجود نداشت که موضوع امامتش را محدود کند باید گفت [[پیشوا]] و [[رهبر]] کلی است و در کلّیه [[امور معنوی]] و [[مادّی]] [[پیشوایی]] دارد. همان‌طوری که [[امام رضا]]{{ع}} در [[تعریف امامت]] می‌فرماید: &amp;quot;[[مقام امامت]] بزرگ‌تر و عالی‌تر و دقیق‌تر از آن است که [[عقول]] [[مردم]] بدان برسد، یا به واسطه آرای خودشان بتوانند آن را [[درک]] کنند یا امامی را [[اختیار]] نمایند... [[امامت]] یعنی نگه‌داری [[دین]] و [[حفظ نظام]] [[مسلمانان]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، ج۱، ص۱۹۹-۲۰۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۰-۶۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==معانی [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای نخست:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[اخلاقی]] محض به معنای الگوی [[اخلاقی]]. در این صورت مقصود از {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که من تو را الگویی [[اخلاقی]] قرار دادم که بدون داشتن اختیارات [[حکومت]] و [[سیاست]] و [[تدبیر امور]]، به او [[اقتدا]] می‌شود.&lt;br /&gt;
حتی بدون توجه به قرینه‌هایی که پیش از این گفتیم نیز این معنا نمی‌تواند مدنظر باشد؛ زیرا&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &lt;br /&gt;
*[[پیشوایی]] [[اخلاقی]] برای همۀ [[پیامبران]] نسبت به دیگر [[مردم]] ثابت است؛ زیرا [[انبیا]] [[برترین]] [[بندگان]] و بهترین‌هایی هستند که [[خداوند]] از میان آفریدگانش [[برگزیده]] است. [[خدای سبحان]] می‌فرماید:&lt;br /&gt;
{{متن قرآن|اللَّهُ يَصْطَفِي مِنَ الْمَلَائِكَةِ رُسُلًا وَمِنَ النَّاسِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند از فرشتگان رسولانی برمی‌گزیند، و همچنین از مردم» سوره حج، آیه ۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لازمۀ اصطفا و [[گزینش الهی]]، کمال [[اخلاقی]] است که دارندۀ آن را در جایگاهی قرار می‌دهد که باید به او [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[الگو]] گرفت. این [[گزینش]] نیز برای [[ابراهیم]] [[ثابت]] بوده است؛ چه اینکه او [[پیامبری]] بود که [[خداوند سبحان]] پیش از [[عهد امامت]]، او را برای [[نبوت]] و [[رسالت]] [[برگزیده]] بود. پس درست نیست که از این [[امامت]]، تنها الگوی [[اخلاقی]] محض قصد شده باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۶۹-۱۷۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*با روشن شدن این مطلب، می‌گوییم: در این [[آیه]] قرینه‌های روشنی وجود دارد که نشان می‌دهد [[امامت]] در اینجا منصبی قانونی است و تنها یک ویژگی [[اخلاقی]] [[تکوینی]] نیست. از جمله:&lt;br /&gt;
#تعبیر از [[امامت]] به “عهد”؛ این تعبیر به صراحت بیان می‌کند که [[امامت]] نه ویژگی [[تکوینی]] بیرونی، بلکه منصبی اعتباری و قانونی است که [[خداوند]] [[عهد]] و [[پیمان]] بر آن را به هر کس بخواهد عطا می‌کند.&lt;br /&gt;
#[[نفی]] [[امامت]] از [[ظالمان]]؛ زیرا کمال [[اخلاقی]] و الگوگری [[معنوی]]، اساساً و به خودی خود از [[ظالمان]]، [[نفی]] شده است و اگر مقصود از عبارت {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} چنین معنایی می‌بود، تحصیل حاصل بوده، بیان آن از سوی حکیمی [[فصیح]] و [[بلیغ]]، [[زشت]] و نارواست؛ چرا که [[ظالم]] از پایه، ویژگی الگوگری [[اخلاقی]] را ندارد و نیازی نیست که [[خداوند متعال]] با این سخن آن را [[نفی]] کند: {{متن قرآن|لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۰-۱۷۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای دوم:&#039;&#039;&#039; [[پیشوایی]] [[فکری]] و [[اعتقادی]]. مقصود از این [[پیشوایی]]، [[رهبری]] [[مردم]] در [[باور]] به [[توحید]] است؛ یعنی همان [[دین ابراهیم]] که [[مأمور]] به [[پیروی]] از آن هستیم.&amp;lt;ref&amp;gt;اشاره به آیه:{{متن قرآن|قُلْ صَدَقَ اللَّهُ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا}} «بگو: خدا راست گفته است. بنابراین، از آیین ابراهیم پیروی کنید، که به حق گرایش داشت» سوره آل عمران، آیه ۹۵. (مترجم)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ممکن نیست مقصود از [[امامت]] در آیۀ [[عهد]]، صرف [[پیشوایی]] [[فکری]] در [[باور]] به [[توحید]] باشد. پیش از آنکه [[دلایل]] این مطلب را توضیح دهیم، باید به نکته‌ای اساسی اشاره کنیم و آن اینکه گاهی مقصود از [[توحید]]، [[توحید نظری]] محض است؛ یعنی [[باور]] [[ذهنی]] به [[توحید]]، حتی اگر عملاً در واقعیت محقق نشود. گاه نیز منظور از [[توحید]]، [[باور]] [[توحیدی]] محقَّق و مجسَّم در واقعیت [[انسانی]] است که آن را [[توحید عملی]] می‌نامیم.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۱-۱۷۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای سوم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] به معنای [[نبوت]] که در این صورت مقصود از آیۀ {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} این است که تو را [[پیامبر]] قرار دادیم.&lt;br /&gt;
*بطلان این احتمال، روشن و [[مورد اتفاق]] است. [[یقین]] به این [[حقیقت]] که [[نبوت]] پیش از [[آزمون]] [[ذبح]] [[اسماعیل]] برای [[ابراهیم]] [[ثابت]] بوده، برای بطلان این معنا کافی است؛ زیرا این [[آیه]] به صراحت تأکید می‌کند که [[امامت]] پس از موفقیت [[ابراهیم]] در آزمون‌ها و بلاهایش برای او قرار داده شد؛ آزمون‌هایی که بی‌شک ابتلای [[ذبح]] [[اسماعیل]] از مهم‌ترین و بزرگ‌ترین آنها بود و [[قرآن کریم]] نیز با این عبارت بر آن تصریح می‌کند: {{متن قرآن|إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ}}. پس [[امامت]] مدت‌ها بعد از [[پیامبری]] برای [[ابراهیم]] قرار داده شد و از این‌رو ممکن نیست که مقصود از [[امامت]] در اینجا، [[پیامبری]] باشد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۵-۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;معنای چهارم:&#039;&#039;&#039; [[رهبری]] شامل [[پیشوایی]] در [[سیاست]] و [[حکومت]]. با [[اثبات]] بطلان دیگر معانی، این تنها معنای ممکنی است که می‌توان از مجموع معانی بیان شده برای واژۀ [[امامت]] در این [[آیه]] فرض کرد؛ معنایی که ظاهر [[آیه]] و قرینه‌های پرشماری که برخی از آنها را پیش از این بیان کردیم نیز بر آن دلالت می‌کنند.&lt;br /&gt;
از آنچه گفتیم روشن شد که عبارت {{متن قرآن|إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا}} دلالت دارد که [[منصب]] [[ریاست]] و [[رهبری سیاسی]] برای [[ابراهیم]]{{ع}} قرار داده شده است و این دلالت به اندازه‌ای روشن است که جایی برای [[شک و تردید]] باقی نمی‌گذارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۱۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[تجلی]] [[توحید]] در [[نظام امامت]]==&lt;br /&gt;
*چون [[خداوند]] موجودی ادراک ‌نشدنی است و با کسی روبه‌رو و طرف [[گفت‌وگو]] نمی‌شود، پس ناگزیر کسانی از خود [[مردم]] را بر آنان می‌گمارد تا به جای خودِ او با [[مردم]] گفت‌وشنود کنند و [[حقّ حاکمیت]] و فرمان‌دهی [[خداوند]] را به مرحله [[اجرا]] و تحقق برسانند و فرستادن آنها [[لطف]]&amp;lt;ref&amp;gt;علامه حلی در این باره میفرمایند: {{عربی|الإمام لطف فيجب نصبه على الله تعالى تحصيلا للغرض}}. [وجود] امام لطف است؛ پس نصب او بر خدای متعال واجب است، برای آنکه غرض (و هدف الهی از هدایت بندگان) حاصل گردد، ر.ک: علی شیروانی، ترجمه و شرح کشف المراد، ج۲، ص۵۹-۶۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[مهربانی]] از سوی او به [[مردم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;نشریه همشهری، شماره ۸، اردیبهشت ۱۳۷۷، مقاله امامت در چشم‌انداز کلام شیعی برگرفته از کتاب جستاری در فلسفه امامت، نوشته اصغر دادبه.&amp;lt;/ref&amp;gt;، لذا [[ولایت]] [[نبویه]] به نوعی [[ولایت]] الهیه است و [[ولایت]] [[امامیه]] نیز استمرار [[ولایت]] [[نبویه]] می‌باشد.&lt;br /&gt;
*برحسب [[عقیده]] [[توحید]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] حقیقیّه مطلقه، مختص به خداست و [[حق]] و [[حقیقت]] این صفات، بنابر [[آیات قرآنی]]: {{متن قرآن|فَاللَّهُ هُوَ الْوَلِيُّ}}&amp;lt;ref&amp;gt; «اما خداوند است که سرور (راستین) است» سوره شوری، آیه ۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; فقط برای او ثابت است&amp;lt;ref&amp;gt;آیت الله جوادی آملی در کتاب شمیم ولایت، ص۹۴-۱۰۰ انحصار ولایت را برای خداوند با ادله عقلی و نقلی اثبات می‌کند.&amp;lt;/ref&amp;gt;. و هیچ کس در عوض [[خدا]]، حتی بر نفس خود، نه [[سلطنت]] و [[ولایت تکوینی]] دارد و نه [[ولایت تشریعی]]؛ تا چه رسد به اینکه بر دیگری [[ولایت]] و [[حکومت]] داشته باشد، یا مالک امر او باشد&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین، [[ولایت]] [[حقیقی]]، اوّلاً و بالذّات از آنِ خداست و [[ولایت]] و [[حکومت]] و مالکیتی که به [[اذن خدا]] برای بعضی از بندگانش اعتبار می‌شود، اعتباری و قراردادی بوده و [[حقیقی]] نیست&amp;lt;ref&amp;gt;عبدالله جوادی آملی، شمیم ولایت، ص۱۰۵-۱۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. لذا به [[عزل]] و اسباب دیگر، قابل زوال و انتقال است. این [[ولایت]] از نوع [[ولایت]] و [[حکومت]] الهیه نیست، چون [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] [[حقیقی]] و خودبه‌خود و دائم و [[ابدی]] است و مقتضای [[ارتباط]] و تعلق مخلوق به [[خالق]]، [[حکومت]] و [[ولایت]] و [[مالکیت]] [[حقیقی]] [[خالق]] است. مخلوق، هویتش مملوکیت و [[نیازمندی]] و [[فرمان‌پذیری]] و عنایت‌خواهی است، نه مملوکیت [[بنده]] و تحت [[ولایت]] [[خدا]] بودن او قابل [[سلب]] شدن است، چون ذات او، هویتش و واقعیتش همین است؛ و نه [[مالکیت]] و [[حکومت]] و [[ولایت]] [[خدا]] بر بندگانش قابل [[سلب]] و اعطا و انتزاع است&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۹۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و خلاصه اینکه [[تصرف در امور]] [[عامه]] و رتق و فتق امور و حلّ و فصل [[کارها]] و اِعمال [[ولایت]] بر خلق‌الله، اگرچه یک نفر هم باشد، [[تصرف]] در [[سلطنت الهی]] و [[مُلک]] خدایی است که باید به اِذن [[خدا]] باشد؛ چنان‌که برحسب [[آیات قرآن کریم]]&amp;lt;ref&amp;gt;مانند آیات ولایت، اولوالامر و تطهیر.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[احادیث متواتر]]&amp;lt;ref&amp;gt;برای نمونه ر.ک: اصول کافی، کتاب الحجه، ج۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; که از طریق [[شیعه]] و [[سنّی]] [[روایت]] شده است، در [[امت]] این برنامه انجام شده و [[حضرت رسول]]{{صل}} [[نظام امامت]] را به [[مردم]] [[ابلاغ]] کرده و &amp;quot;اولوالامری&amp;quot; که تا [[روز قیامت]] عهده‌دار این منصب‌اند و [[دوازده]] نفرند، به [[امت]] معرفی شده‌اند&amp;lt;ref&amp;gt;لطف‌الله صافی گلپایگانی، امامت و مهدویت، ج۱، ص۱۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*از بیانات پیشین می‌توان نتیجه گرفت که رابطه بین [[شناخت امام]] و [[یگانگی خداوند]] [[متعال]] رابطه‌ای دو طرفه است، زیرا از طرفی باید [[توحید خداوند]] و [[حاکمیت]] مطلق باری‌تعالی را پذیرفت و از طرفی نیز باید [[ایمان]] که [[معرفت خداوند]] فقط در پرتو [[شناخت]] و [[پیروی]] از [[ائمه اطهار]]{{عم}} امکان‌پذیر است. در لسان [[روایات]] این مطلب به صراحت مطرح شده است؛ چنان‌که [[ابوحمزه]] می‌گوید: [[امام باقر]]{{ع}} به من فرمود: &amp;quot;[[خدا]] را یقیناً کسی پرستد که او را بشناسد و کسی که به [[خدا]] [[معرفت]] پیدا نکند او را گمراهانه می‌پرستد&amp;quot;. عرض کردم: فدایت شَوم؛ [[معرفت خدا]] چیست؟ فرمود: &amp;quot;[[باور]] داشتن [[خدای متعال]] و [[باور]] داشتن [[پیغمبر]]{{صل}} و [[دوست داشتن علی]] و [[پیروی]] از او و [[ائمه اطهار]]{{عم}} و [[بیزاری جستن]] به [[خدای سبحان]] از [[دشمن]] آنان. این چنین شناخته می‌شود [[خدای عزوجل]]&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;کلینی، اصول کافی، کتاب الحجه، بابُ معرفة الإمام و الرَّد إلیه.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)| ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی]]، ص۶۵-۶۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مباحث [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*مباحث [[امامت]] بر پنج محور کلی [[استوار]] است:&lt;br /&gt;
# [[حقیقت امامت|حقیقت]] یا [[چیستی امامت]] (ما الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[وجوب وجود امام]] یا [[ضرورت امامت]] (هل الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[غایت امامت]] یا [[کارکردهای امام]] و در ذیل آن، [[شئون امام|شئون]] و [[وظایف امام]] (لم یجب وجود الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[صفات امام|صفات]] و [[ویژگی‌های امام]] و در ذیل آن، [[راه‌های شناخت امام]] (کیف الإمام؟)؛&lt;br /&gt;
# [[تعیین امام]] در هر زمان و در ذیل آن، [[نصوص امامت]] و [[افضلیت امیرالمؤمنین]]{{ع}} و یازده [[امام]] بعد، [[معجزات]] هر یک از [[امامان]] [[دوازده گانه]] و [[مهدویت]] و مباحث مرتبط با آن (مَنِ الإمام؟)&amp;lt;ref&amp;gt;تلخیص المحصل، ص۴۲۶- ۴۲۷؛ قواعد المرام فی علم الکلام، ص۱۷۳- ۱۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*چهار مبحث نخست، مباحث کلی [[امامت]] ([[امامت عامه]]) را تشکیل می‌دهد و مبحث اخیر مربوط به [[امامت خاصه]] است. به عبارت دیگر مسایل کلی و عمومی [[امامت]]، مربوط به [[امامت عامه]] است و مسایل مربوط به مصداق‌شناسی [[امام]] و این که [[امامان]] پس از [[پیامبر]]{{صل}} چه کسانی بوده‌اند، مسایل [[امامت خاصه]] است. مباحث [[امامت خاصه]] در مدخل‌های مناسب [[تبیین]] خواهد شد. چنان که پاره‌ای از مباحث کلی [[امامت]] نیز که از اهمیت یا گستردگی خاصی برخوردارند مدخل‌های مستقلی خواهند داشت.&lt;br /&gt;
* [[عصمت امام]]، [[افضلیت امام]] و [[علم امام]] از این گونه مباحث‌اند. در این مقاله دیگر مباحث کلی [[امامت]] بررسی خواهد شد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ص۴۰۴؛ [[عبدالمجید زهادت|زهادت، عبدالمجید]]، [[معارف و عقاید ۵ ج۱ (کتاب)|معارف و عقاید ۵]] ص ۲۵-۳۰&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==نخست: [[حقیقت امامت]]==&lt;br /&gt;
==دوم: [[ضرورت امامت]]==&lt;br /&gt;
==سوم: [[غایت امامت]]==&lt;br /&gt;
==چهارم: [[صفات امام]]==&lt;br /&gt;
*درباره [[صفات امام]] در منابع [[شیعه]] و [[اهل سنت]] بحث‌های فراوانی شده است. [[تفتازانی]] [[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]]، [[مرد بودن]]، [[اجتهاد]]، [[شجاعت]]، [[با کفایت]] و [[قریشی بودن]] را شرط می‌داند. از نظر ایشان چهار شرط نخست ([[مکلف]] بودن، [[عدالت]]، [[حریت]] و [[مرد بودن]]) [[مورد اتفاق]] است؛ ولی شرط‌های دیگر را برخی [[متکلمان]]، به خاطر [[تکلیف مالایطاق]] یا لغویت، لازم نمی‌دانند. [[وصف]] [[قریشی بودن]] مورد قبول تمام [[مذاهب اسلامی]] (به جز [[خوارج]] و گروهی از [[معتزله]]) می‌‌باشد&amp;lt;ref&amp;gt;تفتازانی، شرح المقاصد، ج۵، ص۲۴۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در میان [[متکلمین]] [[شیعه]]، [[خواجه نصیر]]، [[جامع‌ترین]] فهرست را در هشت عنوان برای صفات و [[شرایط امام]] تدوین کرده است که عبارتند از: [[عصمت]]، [[علم به احکام شریعت]] و روش [[سیاست]] و [[مدیریت]]، [[شجاعت]]، [[افضلیت]]، بری بودن از [[عیوب]] جسمی و [[روحی]] و نسبی، مقرب‌ترین افراد بودن در پیشگاه [[خدا]] و [[استحقاق]] پاداش‌های [[اخروی]]، [[توانایی]] برآوردن [[معجزه]] برای [[اثبات امامت]] خود در مواقع [[لزوم]] و یگانه بودن در [[منصب امامت]]&amp;lt;ref&amp;gt;طوسی، تلخیص المحصل، ص۴۳۰ - ۴۲۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|فرهنگ اصطلاحات علم کلام]]، ص ۳۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پنجم: [[تعیین امام]]==&lt;br /&gt;
===[[راه تعیین امام]]===&lt;br /&gt;
====[[نصب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[انتخاب امام]]====&lt;br /&gt;
====[[غلبه]] و [[استیلا]]====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[اثبات امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[جایگاه امامت]]==&lt;br /&gt;
==[[امامت]] از دیدگاه فرق و [[مذاهب]] ==&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه امامیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه زیدیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اسماعیلیه}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه غلات}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه اهل سنت}}&lt;br /&gt;
{{اصلی|امامت از دیدگاه خوارج}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
*از دیدگاه [[شیعه]] [[امامت]] از اصول [[عقاید اسلامی]] است، ولی [[معتزله]] و [[اشاعره]] و دیگر [[مذاهب اسلامی]] آن را از [[فروع دین]] می‌دانند. بر این اساس‌، [[شیعه]] برای [[امامت]] [[جایگاه]] برجسته‌تری در مقایسه با [[اهل سنت]] قائل است، ولی همان‌گونه که اشاره شد از دیدگاه [[اهل سنت]] نیز [[امامت]] مسئله‌ای مهم و برجسته است، زیرا از [[فروع دین]] بودن یک مسئله با مهم بودن آن منافات ندارد&amp;lt;ref&amp;gt;[[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|دانشنامه کلام اسلامی]]، ج۱، ۶۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*درباره [[نظریه سیاسی]] [[زیدیه]] و [[اندیشه]] امامت نزد آنان‌، مقدمتاً باید توضیح داد که زیدیه از تحولات و دگرگونی‌های فکری و مذهبی گوناگونی در طول تاریخ خود برخوردار بوده‌اند. در سده ۲ ق جدا از شخصیت محوری [[زید بن علی‌]]، گروه‌ها و گرایش‌های مختلفی از جمله جارودیه و ابتریه در میان [[زیدیه]] وجود داشتند که هر یک دارای [[عقاید]] ویژه خود در باب امامت بودند. در همان سده و نیز در سده ۳ ق نیز وجود برخی شخصیت‌های محوری در [[زیدیه]] [[عراق]] و [[حجاز]] و یمن همچون [[محمد بن عبدالله نفس زکیه‌]]، [[قاسم رسی]] و [[یحیی هادی الی الحق‌]]، پیشوای دولت زیدی یمن‌، تحولاتی در عقیده و [[اندیشه]] دینی زیدیه ایجاد کرد که طبعاً مسأله امامت نیز بر کنار از آن نبود. این تحولات البته به دلایل شرایط خاص تاریخی به وجود می‌آمد و تحت تأثیر اندیشه‌های محافل [[امامی‌]]، یا [[معتزلی]] و حتی [[سنی]] بود&amp;lt;ref&amp;gt;نک: مادلونگ‌۱، جم.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] از دیدگاه [[اسماعیلیه]] [[منصب الهی|منصبی الهی]] است و [[امام]] از جانب [[خداوند]]، [[هدایت]] و [[برگزیده]] می‌شود، و مسلمانان به وساطت او می‌توانند به وظایف دینی خود عمل کنند و درکی کامل و جامع از ابعاد ظاهری و باطنی [[قرآن]] - که تحقق آرمان‌های الهی در زمین مبتنی بر آن است - حاصل نمایند. [[اسماعیلیه]] [[ولایت امام]] را یکی از ارکان دین می‌دانند و معتقدند که امامت برترین ارکان دین است و حتی آن را عین [[ایمان]] می‌انگارند و بر آنند که امامت تا ابد ادامه دارد و جهان هستی بدون [[وجود امام]] لحظه‌ای دوام ندارد و اگر فرضاً [[امام]] از دست رود، بی‌درنگ همه عالم نابود می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;قاضی نعمان‌، دعائم الاسلام‌، به کوشش [[آصف بن علی اصغر فیضی‌]]، ص۲؛ تامر، عارف‌، الامامه فی الاسلام‌،ص: ۶۵ -۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;. از این‌رو، یکی از اصول اعتقادی اسماعیلیه این است که بعد از وفات [[پیامبر|پیامبر اکرم‌]]{{صل}}، [[امام علی]]{{ع}} به امر الهی و با نص [[پیامبر]]{{صل}} در زمان حیاتش به عنوان [[امام]] برگزیده شد و امامت باید به صورت موروثی در نسل [[امام علی|علی‌]]{{ع}} و [[فاطمه زهرا|فاطمه‌]]{{ع}} ادامه یابد و [[جانشینی امام]] لاحق مبتنی بر [[نص]] [[امام]] سابق است&amp;lt;ref&amp;gt;نک: قاضی نعمان‌، شرح الاخبار، به کوشش محمد حسینی جلالی‌، ج۱، ۸۹ بب.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*تاریخ اندیشه و فعالیت‌های دینی و سیاسی [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] چنان‌که باید هنوز مورد مطالعه همه‌جانبه قرار نگرفته است و از این‌رو، به درستی نمی‌توان تاریخ دقیق [[ظهور]] اندیشه‌های آنان را به دست داد. درباره موضوع امامت‌، پیش از هر چیز باید به این نکته توجه داشت که [[اندیشه]] [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] در [[ارتباط]] مستقیم با موضوع امامت قرار دارد و از این رو، بررسی تاریخ شکل‌گیری و اندیشه‌های دینی و سیاسی غلات‌، در حقیقت بررسی موضوع امامت در میان ایشان است‌، با این‌همه‌، نباید از یاد برد که [[غلات شیعه‌|غُلات شیعه]] گرچه در بستر اختلافات دینی - سیاسی در قرن اول هجری به صحنه آمدند، ولی در طول زمان و در طی تحول در اندیشه‌های خود و تحت تأثیر شرایط سیاسی و اجتماعی و محیطی‌، دگرگونی‌های فکری فراوانی را [[شاهد]] بودند که عمده‌ترین آن تحول [[اندیشه]] امامت محوری در میان آنان به منظومه‌ای فکری و کلامی از نوع ویژه خود بود. در این منظومه دینی درباره اساسی‌ترین محور [[اندیشه]] [[اسلامی]]، یعنی [[توحید]]، سخن بسیار رفته بود و با توجه به هندسه معرفت دینی آنان و جایگاه [[توحید]] و [[ارتباط]] آن با [[اندیشه]] امامت‌، طبعاً درباره مسائل دیگر الهیات از جمله [[وحی]] و [[نبوت]] و [[ارتباط]] انسان با [[خدا]]، و نیز اندیشه [[معاد]] و روز واپسین مواضعی اتخاذ شده بود&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*پیش از بررسی تاریخ تحول [[اندیشه سیاسی]] [[اهل سنت]] &amp;lt;ref&amp;gt;که در اینجا مقصود از آنان همه گروه‌های غیر [[شیعه]] و [[محکمه]] است‌.&amp;lt;/ref&amp;gt;باید به این نکته توجه داشت که امامت در نظر [[اهل سنت]] بر شالوده تجربه تاریخی [[امت اسلامی ]] پس از [[پیامبر|حضرت رسول]]{{صل}} [[استوار]] است و از این‌رو، توجه به [[سیر]] تحولات نهاد [[خلافت]] در [[اسلام]] می‌تواند به ارزیابی دقیق‌تری از موضوع امامت در میان [[اهل سنت]] رهنمون گردد. [[معتزله‌]]، [[مرجئه]] و حتی عالمان [[اشعری]] و گاه [[حنبلی]] [[مذهب]] نسبت به این تجربه موضع خود را بیان کرده‌اند و هر یک فراخور [[منظومه دینی]] و [[منظومه فکری‌|فکری]] خود نسبت به این تجربه ابراز نظر نموده‌اند. مهم‌ترین نکته در این باره منظر این گروه‌ها نسبت به عصر نخستین [[خلافت‌]]، یعنی عصر [[خلفای راشدین]] و گذار از آن به [[دوره اموی]] است‌؛ به ویژه اینکه برای گروه‌های غیر [[معتزلی]] [[اهل سنت]] که نسبت به «[[سنت‌]]» [[جماعت]] حساسیت دارند، این عصر به عنوان الگوی همیشگی «[[جماعت‌]]»، و به عبارت دیگر [[سلف صالح]] «[[امت‌]]» تلقی می‌شود. به هر حال‌، از آنجا که [[خلافت‌]]، صورت تاریخی [[اندیشه]] امامت در اسلام است‌، باید مفهوم امامت را در راستای [[ظهور]] تاریخی آن در [[خلافت]] جست‌وجو کرد؛ اما از سویی دیگر باید دانست که امامت در [[اسلام]] [[سنی]] مفهومی عام‌تر از [[خلافت]] است و در مقام نظر می‌تواند خارج از چارچوب مفهومی تاریخی خلافت تحقق پیدا کند؛ گرچه [[خلافت]] همیشه از سوی [[اهل سنت]] به عنوان نهاد مشروع امامت معرفی شده است‌&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
* [[امامت]] نزد گروه‌های گوناگون [[خوارج]] ([[اهل تحکیم‌]])، از نظر مفهومی‌، کاملاً پیوسته با [[حکومت]] بوده‌، اما آنچه امامت [[خوارج]] ([[محکمه‌|مُحَکِّمه‌]]) را از [[اهل سنت]] متمایز می‌ساخته‌، نوع آرمانهایی بوده است که هر یک در سایه امامت دنبال می‌کرده‌اند. در صحنه تاریخ نیز همین اختلاف در [[آرمان‌ها]] موجب شده است تا [[محکمه]] از همان [[عصر خلفای نخستین‌]]، راه خود را از [[عامه مسلمانان]] جدا سازند و در صدد برآیند تا امامتی کوچک‌، متناسب با آرمان‌های خویش بنیان گذارند. [[تصور]] موجود در میان گروهی از [[صحابه]] در عصر دو [[خلیفه]] نخست‌، مبنی بر اینکه بر ایشان لازم است تا با حساسیت‌، عملکرد [[امام]] در [[جامعه اسلامی]] را پی‌گیری کنند و در صورت [[مشاهده]] تخلفی از جانب او، واکنشی مناسب از خود نشان دهند، مبنای آرمان [[امامت]] در میان [[محکمه]] است‌. به عنوان نمونه‌، در خطبه‌ای از [[خلیفه]] [[عمر]] چنین آمده است که در صورت [[وفا]] نکردن [[امام]] [[مسلمانان]] به وظایف و تخطی از [[حدود شریعت‌]]، بر [[مؤمنان]] واجب می‌گردد که او را از امامت [[خلع]] کنند&amp;lt;ref&amp;gt;مثلاً نک: ابن‌شبه‌، عمر، تاریخ المدینة، به کوشش فهیم محمد شلتوت‌، ج۲، ۶۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://lib.eshia.ir/23022/10/3910 دانشنامه بزرگ اسلامی، ج ۱۰، ص ۳۹۱۰.]&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==رابطه [[امامت]] و [[دموکراسی]]==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[امامت]] در گفتگوی دو مذهب==&lt;br /&gt;
*[[امامت]] ریاستی فراگیر در [[امور دنیا]] و [[دین]] است و جامعه‌ای که ساختار آن بر پایۀ [[دین]] بنیان گرفته است، جز این نمی‌تواند باشد؛ چرا که در [[ریاست]] این [[جامعه]] و [[امامت]] بر آن نمی‌توان [[امور دنیا]] را از امور [[دین]] جدا نمود. [[رهبری]] [[رسول خدا]]{{صل}} بر [[جامعه]] اسلامیِ نخست، نیز همین‌گونه بود. و هیچ جدایی بین [[سیاست]] و [[دین]] وجود نداشت. از این‌رو بود که [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[سیاست]]، [[اقتصاد]]، [[تربیت]]، [[آموزش]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و دیگر امور [[جامعه اسلامی]] همان اندازه جزو [[قلمرو دین]] به شمار می‌رفت که [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر [[عبادات]] امری [[دینی]] قلمداد می‌شد.&lt;br /&gt;
*[[رسول خدا]]{{صل}} همان‌طور که در [[عبادات]] و [[احکام]] آن - که چه بسا صرفاً از آن به &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; تعبیر شود - [[مرجع]] [[مردم]] بود و آنها از ایشان [[احکام]] [[نماز]] و [[روزه]] و [[حج]] و دیگر عباداتی از این [[دست]] را می‌پرسیدند، [[مرجع]] [[مردم]] در دیگر ساحت‌های [[زندگی]] - که گاه مقصود از &amp;quot;[[دنیا]]&amp;quot; همین بخش است - نیز بود؛ عرصه‌هایی چون [[حکومت]]، [[قضاوت]]، [[مدیریت]]، [[اقتصاد]]، [[جنگ]]، [[صلح]] و مانند آن.&lt;br /&gt;
*و صد البته از [[رسول خدا]]{{صل}} به دور است که در [[رفتار]] یا گفتار خود از سر [[هوی و هوس]] کاری کند یا سخنی بگوید. و این همان است که [[خداوند متعال]] درباره آن فرموده است: {{متن قرآن|وَمَا يَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى * إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و هرگز از روی هوای نفس سخن نمی‌گوید * آنچه می‌گوید چیزی جز وحی که بر او نازل شده نیست» سوره نجم، آیه ۳-۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*و نیز فرموده است: {{متن قرآن|مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«کسی که از پیامبر اطاعت کند، خدا را اطاعت کرده» سوره نساء، آیه ۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: اگر خدا را دوست می‌دارید، از من پیروی کنید، تا خدا [نیز] شما را دوست بدارد» سوره آل عمران، آیه ۳۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*بنابراین کارهایی که آن [[حضرت]] انجام داد صرفاً بر پایۀ [[دستور خداوند]] بوده است و در نتیجه، همۀ آن [[کارها]] در قلمرو &amp;quot;[[دین]]&amp;quot; قرار دارد که [[خداوند]] ما را به [[پیروی]] از آن، [[امر]] و از [[سرپیچی]] از آن، [[نهی]] فرموده است. پس [[رهبری سیاسی]] و [[امامت فراگیر]] آن [[حضرت]] بر [[جامعه اسلامی]] تنها بر اساس [[تعیین]] از سوی [[خداوند متعال]] و بنا بر امر او بوده است.&lt;br /&gt;
*بر این اساس [[باور]] داریم که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که از [[بندگان]] [[برگزیده]] خود را بخواهد برای آن [[انتخاب]] می‌کند و این‌طور نیست که امری بشری باشد که به [[مردم]] سپرده شده و آنها خود بر مبنای [[هوای نفس]] و به [[دل]] خواهشان کسی را برای آن برگزینند تا در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] از هوا هایشان و [[پیروی]] ایشان از او، [[پیروی]] از آرایشان باشد. این چیزی است که [[عقل]] و [[نقل]] بر آن گواهند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۴-۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==[[دلایل]] [[عهد الهی]] بودن [[امامت]]==&lt;br /&gt;
*[[عقل]] بر این [[حقیقت]] بدین‌سان [[گواهی]] می‌دهد: از آنجا که مسألۀ [[امامت]]، مسألۀ [[اطاعت]] و [[پیروی]] است، اگر امر [[انتخاب امام]] به [[مردم]] واگذار شده باشد تا آنها هر که را به او میل دارند برای آن [[انتخاب]] کنند، پس در واقع [[اطاعت]] آنها از [[امام]]، [[اطاعت]] و [[پیروی]] از هوی و میل خودشان است و پر واضح است که [[اطاعت]] از هوی، [[قبیح]] است و چنان که تجربۀ [[جوامع بشری]] در گذشته و حال نشان می‌دهد و [[عقل]] [[سلیم]] نیز بر آن دلالت دارد، سبب [[فساد]] [[بندگان خدا]] و [[سرزمین]] هایشان می‌شود.&lt;br /&gt;
*همچنین [[امامت]] یا [[حکومت]]، [[ولایت]] و [[سرپرستی]] [[مردمان]] است و این [[ولایت]]، به [[گواه]] [[عقل]]، جز برای [[خداوند متعال]] و هر که او [[منصوب]] فرماید، [[ثابت]] نمی‌گردد؛ چرا که [[مردم]] به خودی خود همه با هم یکسانند و هیچ یک از آنها بر دیگری [[برتری]] ندارد تا [[شایسته]] آن باشد که در مرتبه‌ای والاتر از دیگران قرار بگیرد و آنها را در برابر [[دستورات]] خود رام سازد و به [[اطاعت]] از خویش وادارد.&lt;br /&gt;
[[نقل]] نیز این [[حقیقت]] را [[تأیید]] می‌کند. بسیاری از [[آیات قرآن کریم]] و [[روایات]] [[شریف]] تصریح دارند که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است، نه گزینشی بشری. ما در اینجا تنها به بیان شماری از [[آیات]] [[قرآن مجید]] که حاکی از این حقیقت‌اند بسنده می‌کنیم&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۶-۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;:&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] اول===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«[به یاد آورید] هنگامی که خداوند، ابراهیم را با وسایل گوناگونی آزمود. و او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم عرض کرد: از دودمان من [نیز امامانی قرار بده] خداوند فرمود: پیمان من، به ستم‌کاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت [[آیه کریمه]] به این نکات باید توجه داشت:&lt;br /&gt;
#[[امامت]] زمانی برای [[حضرت ابراهیم]] -[[سلام]] [[خدا]] بر [[پیامبر]] ما و خاندانش و بر [[ابراهیم]] باد - قرار داده شد که [[پیامبر]] بود. قرینۀ این سخن آن است که او این [[مقام]] را برای فرزندانش نیز خواست و این خود [[گواهی]] است بر آنکه وی در زمان این درخواست و [[جعل امامت]] برای او، فرزندانی داشته است و می‌دانیم که [[ابراهیم]] در [[پیری]] و پس از آنکه دوره‌ای دراز از پیامبریش را گذرانده بود، صاحب [[فرزند]] شد.&lt;br /&gt;
#[[امامت]] در این آیۀ [[شریف]] تنها به معنای [[اقتدا]] به [[هدایت]] و [[پیروی]] از [[رفتار]] [[حضرت ابراهیم]] نیست. بلکه به معنای [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] است؛ زیرا [[امامت]] به معنای [[اقتدا]] و [[پیروی]]، پیش از آن نیز با همان [[مقام]] [[پیامبری]] برای او ثابت بود؛ چرا که باید به [[هدایت]] هر [[پیامبری]]، حتی اگر [[امام]] هم نباشد، [[اقتدا]] کرد و از رفتارش [[پیروی]] نمود؛ بنابراین [[آیه]] [[شریف]] دلالت بر آن دارد که [[خداوند متعال]] [[منصب]] [[رهبری اجتماعی]] و [[حکومت]] را به [[ابراهیم]] داده است.&lt;br /&gt;
#این [[آیه]] دلالت دارد که [[منصب ولایت]] و [[رهبری]] در [[جامعه]]، عهدی [[الهی]] است که [[خدای سبحان]] آن را در آنجا که خود بخواهد، قرار می‌دهد و هرگز این [[منصب]]، گزینشی بشری نیست؛ وگرنه نیازی نبود که [[حضرت ابراهیم]] از [[خداوند متعال]] درخواست کند که [[امامت]] را در [[فرزندان]] وی نیز قرار دهد. در آن صورت [[ابراهیم]] می‌توانست به جای آنکه از [[خداوند]] چنین درخواستی کند، با [[تعیین]] از سوی خودش، [[امامت]] و [[رهبری]] [[جامعه]] را در فرزندانش قرار دهد یا مثلاً به مؤمنینی که از او [[اطاعت]] می‌کردند [[وصیت]] کند که آنها [[فرزندان]] و [[نسل]] وی را برای این [[منصب]] [[انتخاب]] کنند؛ اما او می‌دانست که [[امامت]]، عهدی [[الهی]] است که راهی برای رسیدن به آن جز با [[تعیین]] و [[گزینش]] صریح [[خدای سبحان]] نیست.&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، اینکه [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند]] هر که را بخواهد برای آن برمی‌گزیند، تنها به دوران [[ابراهیم]]{{ع}} اختصاص ندارد. [[دلیل]] این سخن آن است که [[ابراهیم]]{{ع}} [[امامت]] را برای &amp;quot;ذریه&amp;quot;اش که [[فرزندان]] و [[نسل]] او در طول زمان هستند، درخواست کرد و گفت: {{متن قرآن|وَمِنْ ذُرِّيَّتِي}} پاسخ این خواسته منفی نبود و [[خداوند متعال]] در جواب او نفرمود که [[امامت]] تنها به تو و زمان تو اختصاص دارد، بلکه پاسخ دربردارندۀ این معنا بود که خواسته او برای ادامه یافتن [[امامت]] تنها در [[نسل]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش، پذیرفته شده است و ستم‌کاران [[نسل]] او از این [[اجابت]] و رسیدن به [[مقام امامت]] استثنا شده‌اند. پس [[آیه]] دلالت دارد که [[امامت]] در [[فرزندان]] [[صالح]] از [[نسل ابراهیم]] و با عهدی از جانب [[خداوند متعال]] ادامه خواهد داشت.&lt;br /&gt;
#یکی از طرفه‌های ظریف این [[آیه]]، آن است که توهمی را که چه بسا در خیال‌ها [[راه]] یابد پس می‌زند و پاسخ می‌گوید. ممکن است برخی بپندارند که قرار داده شدن [[امامت]] در [[فرزندان]] [[ابراهیم]] به این معناست که [[امامت]] نیز همچون پادشاهی‌های موروثی که [[فرزندان]] بی‌هیچ قید و شرط ویژه‌ای [[جانشین]] [[پدران]] می‌شوند، امری ارثی و نسلی است. اما [[آیه]] [[کریم]] در پاسخ به این [[گمان]] [[نادرست]] به تفاوت ذاتی میان این دو اشاره می‌کند و بیان می‌دارد که ادامه یافتن [[امامت]] در [[نسل ابراهیم]] یک میراث‌بری نَسَبی نیست، بلکه وراثتی [[دینی]] و رسالتی است و به همین [[دلیل]] است که [[فرزندان]] [[ستم]] کار [[ابراهیم]] به این [[مقام]] [[دست]] نخواهند یافت؛ بنابراین [[امامت]] نه با معیار &amp;quot;پیوند نَسَبی&amp;quot; که بنا بر &amp;quot;شایستگی دینی&amp;quot; به [[فرزندان]] [[ابراهیم]] داده شد؛ زیرا این [[خاندان]] [[نبوی]] [[پاک]] در طول [[تاریخ]] سرشار از [[هدایت]] می‌ماند و توان آن را خواهد داشت که رهبرانی [[صالح]] و لایق بپروراند؛ کسانی که [[خداوند متعال]] در برابر این [[پاکی]] و شایستگیِ ادامه یافته در نسلشان، ایشان را به [[لطف]] [[امامت]] ویژه گرداند. این همان معنایی است که آیۀ [[شریف]] بدان اشاره دارد؛ آنجا که می‌فرماید: {{متن قرآن|إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَى آدَمَ وَنُوحًا وَآلَ إِبْرَاهِيمَ وَآلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ * ذُرِّيَّةً بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«خداوند، آدم و نوح و آل ابراهیم و آل عمران را بر جهانیان برگزید. دودمانی از جنس یکدیگر [از نظر پاکی و تقوا و فضیلت] و خداوند، شنوا و داناست» سوره آل عمران، آیه ۳۳-۳۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در این آیۀ [[شریف]] مقصود از عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} این است که هر یک از [[فرزندان]] این [[نسل]] در [[شایستگی]] و سزاواری [[رهبری]] و [[گزینش الهی]] همانند دیگری هستند و مقصود از این عبارت، [[پیوستگی]] نَسَبی نیست، که اگر بود اصلاً نیازی به بیان و تصریح بر عبارت {{متن قرآن|بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ}} وجود نداشت.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۴۷-۵۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] دوم===&lt;br /&gt;
*{{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟ ما به آل ابراهیم، کتاب و حکمت دادیم؛ و حکومت عظیمی در اختیار آنها قرار دادیم» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*در دلالت این [[آیه]] چند نکته، شایان توجه است:&lt;br /&gt;
#بنا بر این [[آیه]]، [[خداوند]] به [[خاندان ابراهیم]] دو [[مقام]] داده است؛ نخست، [[منصب]] [[نبوت]] است که با این عبارت به آن اشاره شده است: {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ}} [[منصب]] دوم نیز، [[منصب امامت]] است که با عبارت {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} از آن یاد شده است. &amp;quot;مُلک&amp;quot; در واژه‌شناسی به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و بنابراین، مقصود از &amp;quot;ملک عظیم&amp;quot; [[امامت]] است. افزون بر بکارگیری واژه [[مُلک]]، موارد زیر نیز [[گواه]] این معنا است:&lt;br /&gt;
##ساختار خود [[آیه]] نشان می‌دهد که مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; [[امامت]] است؛ زیرا در آن کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَا}} دو بار به کار گرفته شده است و درست نیست که مقصود از دومی همان معنایی باشد که در اولی نیز آمده است؛ چرا که در این صورت تکراری بی‌فایده است. از سویی صحیح نیست که از عبارت اول معنایی جز [[نبوت]] قصد شده باشد؛ زیرا افزون بر اینکه این معنا با کتاب و [[حکمت]] هم خوانی دارد، در [[آیات]] پرشمار دیگری نیز [[مقام نبوت]] با مفهوم عطا کردن کتاب و [[حکمت]] بیان شده است؛ مانند: {{متن قرآن|وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُمْ مِنْ كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنْصُرُنَّهُ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، از پیامبران، پیمان مؤکد گرفت، که همانا کتاب و دانش به شما دادم، پس آنگاه که پیامبری به سوی شما آمد که آنچه را با شماست تصدیق می‌کند، به او ایمان بیاورید و او را یاری کنید» سوره آل عمران، آیه ۸۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنابراین جز [[امامت]] که [[خداوند]] برای [[ابراهیم]] و فرزندانش قرار داده است، معنای دیگری از عبارت دوم {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} برداشت نمی‌شود.&lt;br /&gt;
##این آیۀ شریفه نیز [[گواه]] دیگری بر مدعا است: {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و آنگاه که خداوند، ابراهیم را با کلماتی آزمود. پس او به خوبی از عهدۀ این آزمایش‌ها برآمد. خداوند به او فرمود: من تو را امام و پیشوای مردم قرار دادم ابراهیم گفت: و از دودمان من؟ خداوند فرمود: پیمان من، به ستمکاران نمی‌رسد» سوره بقره، آیه ۱۲۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این [[آیه]] به صراحت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] به [[حضرت ابراهیم]]، افزون بر [[نبوت]]، [[منصب امامت]] را نیز عطا فرموده و آن را در نسلش هم قرار داده است و از آنجا که برخی از [[فرزندان]] او [[پیامبر]] بودند، برای [[خاندان ابراهیم]] دو [[منصب]] گرد آمد؛ [[نبوت]] و [[امامت]]. این [[فضل]] و بخششی [[الهی]] است که بنا بر این [[آیه]] [[خداوند سبحان]] تنها به [[آل ابراهیم]]، و نه دیگران، این ویژگی را بخشیده و با آن ایشان را [[تکریم]] فرموده است.&lt;br /&gt;
##آیۀ پیش از آیۀ مورد بحث، شاهدی دیگر است. [[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«مگر برای آنها (مدّعیان) نصیبی از حکومت است؟ که در آن صورت حتی به اندازۀ نقطۀ پشت هستۀ خرما به مردم نمی‌دادند» سوره نساء، آیه ۵۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. &amp;quot;نقیر&amp;quot; به معنای نقطه‌ای است که پشت هستۀ خرما قرار دارد و در اینجا استعاره‌ای برای بیان مقدار بسیار ناچیز است. مقصود از [[آیه]] این است که اگر آنها ([[عالمان]] [[یهود]]) [[نصیبی]] از [[مُلک]] داشتند، حتی مقدار بسیار ناچیزی از [[ملک]] را هم به دیگران نمی‌دادند. پس بی‌شک [[مُلک]] در اینجا به معنای [[سلطنت]] و [[حکومت]] است. این [[آیه]] دلیلی روشن است بر اینکه مقصود از [[مُلک]] در آیۀ بعدی که ما از آن بحث می‌کنیم، [[سلطنت]] و [[حکومت]] است و هرگز به معنای [[نبوت]] نیست.&lt;br /&gt;
#دومین نکته‌ای که آیۀ مورد استناد ما به روشنی بر آن دلالت دارد این است که [[امامت]]، یعنی همان &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot;، [[عهد الهی]] ویژه‌ای است که [[خداوند]] آن را در هر جا بخواهد قرار می‌دهد و [[انسان]] در آن [[حق]] [[انتخاب]] یا سهم و [[نصیبی]] ندارد. آنچه بر این نکته دلالت می‌کند عبارت است از:&lt;br /&gt;
##این بخش از آیۀ شریفه: {{متن قرآن|أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَى مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«یا اینکه نسبت به مردم (پیامبر و خاندانش)، و بر آنچه خدا از فضلش به آنان بخشیده، حسد می‌ورزند؟» سوره نساء، آیه ۵۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این عبارت نشان می‌دهد که [[خداوند متعال]] گروهی از [[مردم]] ([[خاندان ابراهیم]]) را با آنچه از [[فضل]] خویش به ایشان داده [[برتری]] بخشیده است. سپس &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; را مصداقی از آن [[فضل]] برشمرده است. حال اگر [[امامت]]، مسأله‌ای بود که دیگر [[مردمان]] نیز در آن سهم و بهره‌ای داشتند، دیگر این [[مُلک]]، فضلی نبود که [[خداوند]] آن را تنها به [[خاندان ابراهیم]] داده باشد و آنها به واسطه آن بر دیگران [[برتری]] یافته، مورد [[حسادت]] واقع شوند.&lt;br /&gt;
##بکارگیری واژۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} در این سخن [[خداوند متعال]] {{متن قرآن|وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}}، نشان می‌دهد که [[امامت]]، منّت و لطفی [[الهی]] است که [[خداوند]] آن را تنها به گروه مشخصی از [[مردم]] [[عنایت]] فرموده و نیز عهدی ویژه است که فقط به کسی می‌رسد که [[خدا]] بخواهد؛ زیرا آنچه از کلمۀ {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ}} فهمیده می‌شوده، این است که این واژه در [[مقام]] توضیح لطفی است که [[خداوند متعال]] تنها به [[خاندان ابراهیم]] عطا فرموده و با آن ایشان را بر دیگران [[برتری]] بخشیده، به گونه‌ای که مورد [[حسادت]] واقع شده‌اند. حال اگر &amp;quot;مُلک عظیم&amp;quot; چیزی بود که بدون [[لطف خدا]] و به شکلی غیر از [[عهد]] ویژه [[الهی]] به کسی داده می‌شد، دیگر دلیلی وجود نداشت که [[خداوند]] با اعطای آن به [[خاندان ابراهیم]]، بر آنها منّت نهد و این‌گونه ابراز لطفی ویژه کند.&lt;br /&gt;
##عطف &amp;quot;اعطای [[مُلک]] عظیم&amp;quot; بر &amp;quot;اعطای کتاب و حکمت&amp;quot; و قرار دادن آنها در یک [[سیاق]] و ترکیب مفهومی قرینۀ روشن دیگری است بر اینکه [[امامت]] نیز همچون [[نبوت]] است و به هیچ کس داده نمی‌شود مگر کسی که [[خداوند]] او را به‌طور ویژه برگزیند و با این [[مقام]] او را بر دیگران [[برتری]] بخشد.&lt;br /&gt;
##اینکه &amp;quot;مُلک&amp;quot; به &amp;quot;عظیم&amp;quot; توصیف شده است نیز به روشنی نشان می‌دهد که این [[مُلک]] [[موهبت الهی]] بزرگی است که [[خدا]] هر یک از [[بندگان]] مخلصش را که بخواهد بدان ویژه می‌گرداند؛ زیرا [[وصف]] [[عظمت]] برای [[مُلک]] تنها با [[مُلک]] [[الهی]] مناسبت دارد و [[مُلک]] و [[سلطنت]] بشری که در آن [[انسان‌ها]] خود هر که را بخواهند برمی‌گزینند و آن را به هرکه میلشان باشد می‌دهند، چیزی نیست که در [[کلام]] [[خدای سبحان]] به [[عظمت]] توصیف شود.&lt;br /&gt;
*حال اگر این همه را - با [[چشم‌پوشی]] از [[روایات]] رسیده از [[رسول خدا]]{{صل}} دربارۀ این موضوع - تنها به همان مباحثی که دربارۀ آیۀ شریفه {{متن قرآن|وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ}} و دیگر [[آیات]] گذشت بیفزاییم، جای هیچ [[شک]] و تردیدی باقی نخواهد ماند که دلالت آیۀ کریمه این است که [[امامت]] و [[حکومت]] عهدی [[الهی]] است که [[خداوند متعال]] آن را برای گروه مشخصی از [[مردم]] قرار داده است و آنها را با صفاتی توصیف نموده و شخص آنان را نیز معیّن فرموده است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این در [[تفسیر]] این [[آیه]] [[روایات معتبر]] پرشماری از سوی [[امامان]] [[خاندان وحی]] - که به مقاصد [[وحی]] و معانی [[تنزیل]]، از همه [[آگاه]] ترند - به [[دست]] ما رسیده است که همین معنا را [[تأیید]] می‌کند. در این میان تنها یکی از آن بسیار را بیان می‌کنیم: &lt;br /&gt;
*[[کلینی]] با سندی صحیح از [[ابوجعفر محمد بن علی الباقر]]{{ع}} دربارۀ آیۀ {{متن قرآن|فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} [[نقل]] می‌کند که ایشان فرمود: مقصود از این [[آیه]] آن است که برخی از [[خاندان ابراهیم]] را [[رسول]] و [[نبی]] و [[امام]] قرار داد. حال چگونه است که برخی [[امامت]] را برای [[خاندان ابراهیم]]{{ع}} می‌پذیرند، اما برای [[دودمان]] [[محمد]]{{صل}} [[انکار]] می‌کنند؟! [[راوی]] می‌گوید: گفتم: مقصود از {{متن قرآن|آتَيْنَاهُمْ مُلْكًا عَظِيمًا}} چیست؟ فرمود: [[مُلک]] [[عظیم]] این است که امامانی را در میان ایشان قرار داد که هر که از آنان [[اطاعت]] کند، [[خداوند]] را [[اطاعت]] کرده و هر کس از ایشان [[سرپیچی]] نماید از [[اطاعت خداوند]] سر باز زده است. این، آن [[مُلک]] [[عظیم]] است&amp;lt;ref&amp;gt;اصول کافی، ج١، ص٢٠۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۰-۵۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===[[نصّ]] سوم===&lt;br /&gt;
*[[خداوند متعال]] می‌فرماید: {{متن قرآن|قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ وَتَنْزِعُ الْمُلْكَ مِمَّنْ تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ بِيَدِكَ الْخَيْرُ إِنَّكَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بگو: بارالها! ای یگانه مالک مُلک [و فرمانروایی]! تو به هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] عطا می‌کنی و از هر کس بخواهی، مُلک [و حکومت] را می‌ستانی و هر که را اراده کنی عزت می‌دهی و هر کس را بخواهی ذلیل می‌کنی؛ خیر، به دست توست و تو بر هر چیز توانایی» سوره آل عمران، آیه ۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
*این [[آیه بر]] این دلالت دارد که [[امامت]] عهدی [[الهی]] است که تنها در [[اختیار]] [[خداوند متعال]] است و این، اوست که با [[حکمت]] خود آن را در آنجا که بخواهد قرار می‌دهد و [[مردم]] در این مسأله هیچ اختیاری ندارند. *توضیح این مطلب بدین شرح است:&lt;br /&gt;
#مقصود از &amp;quot;مُلک&amp;quot; در [[آیه]]، بنا بر معنای لغوی آن، [[حکومت]] و [[سلطنت]] است و این مطلب در نهایت روشنی است.&lt;br /&gt;
#مقصود از مفهوم &amp;quot;ایتاء؛ عطا کردن&amp;quot; در عبارت {{متن قرآن|تُؤْتِي الْمُلْكَ مَنْ تَشَاءُ}}، اعطای [[تشریعی]] است و منظور از اعطای [[تشریعی]] این است که [[خداوند سبحان]] گروهی از [[بندگان]] [[صالح]] و [[شایسته]]‌اش را به عنوان [[رهبران]] و [[حاکمان]] [[مردم]] برمی‌گزیند و به ایشان[[حق]] [[امر و نهی]] و [[حکومت]] و [[فرمانروایی]] بر [[جامعۀ انسانی]] را می‌دهد؛ اما اعطای [[تکوینی]]، حکمرانی‌هایی است که تاکنون در [[جوامع انسانی]] روی داده - و پس از این نیز روی خواهد داد - و بنا بر وقایع [[تاریخی]] در بیشتر موارد و به استثنای بازه‌هایی بسیار اندک، حکومت‌های ناحقی بوده که تنها [[طاغوت‌ها]] را بر [[ملّت‌ها]] مسلط کرده است؛ بنابراین مقصود از اعطا در این [[آیه]]، اعطای [[تکوینی]] نیست که به معنای مطلق [[حکومت]] به هر شکل ممکن است، حتی اگر به ناحق باشد، بلکه مقصود اعطای [[تشریعی]] است؛ یعنی [[واجب]] ساختن [[شرعی]] [[اطاعت]] و [[پیروی]]. این سخن چنین [[دلایل]] و قرائنی دارد:&lt;br /&gt;
##[[آیه]] دربردارندۀ [[سپاس]] و [[ستایش]] [[خداوند متعال]] برای این ویژگی‌ها است و آنچه با [[سپاسگزاری]] از [[خداوند متعال]] و [[ستایش]] او هماهنگ است بیان [[رحمت]] و یاد کرد نعمت‌های او بر [[بندگان]] است. در این میان تنها اعطای [[تشریعی]] [[مُلک]]، نعمتی [[الهی]] و رحمتی از سوی او بر [[بندگان]] است؛ زیرا [[رهبری الهی]] [[صالح]] را در پی دارد که از بزرگترین [[نعمت‌های خداوند سبحان]] بر [[بندگان]] است و در این امر میان آنان که خود به این [[تکریم]] [[الهی]] مشرَّف شده، [[منصب]] [[رهبری]] را به [[دست]] آورده‌اند، با دیگر مردمانی که از [[نعمت]] این [[رهبری]] برخوردار می‌شوند و در سایۀ [[عدالت]] گسترده‌اش آرام می‌گیرند و از زلال گوارای حکومتش بهره می‌گیرند، تفاوتی نیست. [[آیات]] بسیاری از [[قرآن]] [[حکیم]] اشاره دارد که [[امامت]] و [[رهبری الهی]] نعمتی بزرگ از سوی [[خداوند]] است؛ از جمله آیاتی که در اُم الکتاب، سورۀ مبارکۀ [[حمد]]، آمده است: {{متن قرآن|اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ * صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«ما را به راه راست هدایت کن * راه کسانی که آنان را مشمول نعمت خود ساختی» سوره فاتحه، آیه ۶-۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;. اما اعطای [[تکوینی]] با [[مقام]] [[سپاس]] و [[ستایش]] مناسبتی ندارد؛ زیرا بیشتر مصداق‌های آن، هم برای [[حاکمان]] [[سلطه]] یافته و هم برای [[مردمان]] تحت [[سلطه]]، [[عذاب]] و [[عقاب الهی]] است. از آن رو برای [[سلطه]] یافتگان [[عقاب]] و [[عذاب]] است که باعث افزایش [[گمراهی]] و [[خسران]] ایشان می‌شود. برای [[مردم]] نیز [[عذاب]] است؛ چرا که [[حکومت]] [[طاغوت‌ها]] آنها را از [[سعادت دنیا]] [[محروم]] می‌کند و [[راه خدا]] را بر ایشان می‌بندد و آنها را از [[دست]] یافتن به رضای [[خدای سبحان]] و برخورداری از آن نعمت‌های [[دنیوی]] و [[اخروی]] که [[خداوند متعال]] برای [[نیکان]] فراهم آورده، باز می‌دارد؛ مگر شماری اندک از آنان که بتوانند به‌طور کامل جانب [[حق]] را نگه دارند و در &amp;quot;صراط مستقیم&amp;quot; پایدار بمانند.&lt;br /&gt;
##این بخش از سخن [[خداوند متعال]] که فرمود: {{متن قرآن|تُعِزُّ مَنْ تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَنْ تَشَاءُ}} نیز [[گواه]] مدعا است؛ زیرا یکسانی [[سیاق]] [[سخن]]، بایسته می‌دارد که بین &amp;quot;عزت بخشیدن و [[ذلیل]] نمودن&amp;quot; با &amp;quot;اعطای [[مُلک]] و گرفتن آن&amp;quot; به این شکل [[ارتباط]] و همانندی وجود داشته باشد که اعطای [[مُلک]]، [[عزت]] و ستاندن آن، [[ذلت]] قلمداد شود. و بی‌شک همان‌سان که [[خداوند متعال]] تنها [[کافران]] و سرکشان را [[خوار]] می‌کند، [[عزت]] بخشی او نیز جز به [[بندگان]] مؤمنش نمی‌رسد. این مطلبی است که [[آیات]] پرشماری از [[قرآن مجید]] بر آن تصریح می‌کند؛ از جمله:{{متن قرآن|يَقُولُونَ لَئِنْ رَجَعْنَا إِلَى الْمَدِينَةِ لَيُخْرِجَنَّ الْأَعَزُّ مِنْهَا الْأَذَلَّ وَلِلَّهِ الْعِزَّةُ وَلِرَسُولِهِ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَلَكِنَّ الْمُنَافِقِينَ لَا يَعْلَمُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«آنها می‌گویند: اگر به مدینه بازگردیم، عزیزتر، ذلیل‌تر را بیرون می‌کند، در حالی که عزت مخصوص خدا و رسول او و مؤمنان است؛ ولی منافقان نمی‌دانند» سوره منافقون، آیه ۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ {{متن قرآن|بَشِّرِ الْمُنَافِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا * الَّذِينَ يَتَّخِذُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ أَيَبْتَغُونَ عِنْدَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا}}&amp;lt;ref&amp;gt;«به منافقان بشارت ده که مجازات دردناکی در انتظار آنهاست * همان‌ها که کافران را به جای مؤمنان، به عنوان ولی خود انتخاب می‌کنند. آیا با اینکه همۀ عزت‌ها از آن خداست، عزت و آبرو نزد آنان می‌جویند؟» سوره نساء، آیه ۱۳۸-۱۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;. این مطلب، قرینه‌ای روشن است بر اینکه اعطای [[مُلک]] که در [[آیه]] از آن سخن رفته است، اعطای [[تشریعی]] و به معنای [[واجب]] ساختن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است که از بزرگترین مصداق‌های [[عزت]] بخشی [[الهی]] است. پس مقصود، اعطای [[تکوینی]] نیست؛ چرا که بیشتر مصادیق اعطای [[تکوینی]] &amp;quot;سرکشی&amp;quot; و &amp;quot;کفر&amp;quot; و &amp;quot;عصیان&amp;quot; و &amp;quot;اعتداء&amp;quot; است که بنا بر این [[آیه قرآن]] موجب [[خوار]] گشتن از سوی [[خداوند متعال]] است: {{متن قرآن|وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ وَالْمَسْكَنَةُ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ الْحَقِّ ذَلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«و [مهر] ذلت و نیاز، بر پیشانی آنها زده شد؛ و گرفتار خشم خدا شدند؛ چرا که آنان نسبت به آیات الهی، کفر می‌ورزیدند؛ و پیامبران را به ناحق می‌کشتند. اینها به خاطر آن بود که گناهکار و متجاوز بودند» سوره بقره، آیه ۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;. بنا بر این [[آیه]]، گناهکاری، [[تجاوز]]، [[کفر]] ورزیدن نسبت به [[آیات الهی]] و کشتن به ناحق [[صالحان]] و فراخوانندگان به [[عدالت]] که در [[صدر]] همۀ ایشان [[انبیا]] هستند، سبب آن شد که [[خداوند متعال]] آن مهر [[ذلت]] را بر پیشانی [[یهودیان]] بنشاند و ایشان را دچار [[خشم]] خویش کند. این ویژگی‌ها معمولاً در حکومت‌های طاغوتی وجود دارد و بنابراین مهر [[ذلت]] از سوی [[خداوند متعال]] بر پیشانی این [[طاغوت‌ها]] که در ویژگی هایشان همانند [[یهودیان]] هستند نیز زده شده است و ایشان هم گرفتار [[خشم]] [[خداوند سبحان]] هستند و بی‌اندازه از آن [[عزت]] [[الهی]] و [[رحمت]] خدای [[کریم]] به دورند. با وجود این، چگونه ممکن است مقصود از اعطای [[مُلک]] که [[عزت]] بخشی [[الهی]] است، همان اعطای [[تکوینی]] باشد که بیشتر مصداق هایش حکومت‌های [[طاغوت]] است؟&lt;br /&gt;
##بخش سوم سخن [[خدای سبحان]] {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} نشان روشن دیگری است بر [[درستی]] آنچه گفته شد. [[سیاق]] [[سخن]] و [[قوانین]] عرفی [[حاکم]] بر [[کلام]]، حاکی از آن است که &amp;quot;خیر&amp;quot;ی که در [[آیه]] بیان شده با [[مُلک]] و عزتی که در همان [[آیه]] است، منطبق بوده، عبارت {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} بیان مفهوم کلی بعد از مصداق جزئی است و بر این اساس مقصود [[آیه]] چیزی جز این نیست: [[مُلک]] و [[عزت]] و همۀ خیرها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و او خیر را به هر که بخواهد می‌دهد؛ که او بر هر کاری توانا است.&lt;br /&gt;
*بنابراین از آنجا که مقتضای این قرینه آن است که [[مُلک]] و عزتی که در [[آیه]] آمده در قلمرو مفهوم &amp;quot;خیر&amp;quot; باشد، تنها احتمال ممکن در مورد اعطای [[مُلک]]، اعطای [[تشریعی]] خواهد بود که به معنای [[واجب]] بودن [[اطاعت]] و [[پیروی]] است؛ چرا که فقط همین معنا &amp;quot;خیر&amp;quot; است، نه اعطای [[تکوینی]] که بیشتر مصداق‌های آن [[شر]] و [[عذاب]] است.&lt;br /&gt;
*افزون بر این، در [[آیات]] پیشین و پسین نیز قرینه‌هایی وجود دارد که مقصود بودن اعطای [[تشریعی]] را [[تأیید]] می‌کند، اما همین قرینه‌ها و شاهدهایی که بیان کردیم، بس است.&lt;br /&gt;
#شکی در این نیست که [[آیه]] با عبارت {{متن قرآن|مَالِكَ الْمُلْكِ}}  در ابتدا، که نشان از مخصوص بودن [[مُلک]] به [[خداوند متعال]] است، و نیز جمله {{متن قرآن|بِيَدِكَ الْخَيْرُ}} در انتها، که بیان می‌دارد خیر جز به [[دست خدا]] نیست، و دیگر قرینه‌هایی از این [[دست]]، بر انحصار دلالت می‌کند و به روشنی و صراحت بیان می‌دارد که زمام [[سلطه]] و [[حکومت]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در آن [[شریک]] او نیست و فقط اوست که [[مُلک]] و [[سلطنت]] را به هر کس بخواهد می‌دهد و از هر که [[اراده]] کند باز می‌دارد و [[مردم]] نمی‌توانند [[مُلک]] و [[عزت]] را به هر کس میلشان باشد بدهند، بلکه این [[اختیار]] تنها به [[دست]] [[خداوند متعال]] است و نه هیچ کس جز او. اگر زمام [[حکومت]] به [[دست]] [[مردم]] بود و آنان هر که را می‌خواستند برای آن [[انتخاب]] می‌کردند، درست نبود که در [[آیه بر]] این انحصار تأکید شود که [[اختیار]] اعطای [[مُلک]] و [[عزت]] تنها از آن [[خداوند متعال]] است و هیچ کس در این مسأله با او شراکتی ندارد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[ گفتگوی دو مذهب (کتاب)| گفتگوی دو مذهب]]، ص:۵۵-۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==منابع==&lt;br /&gt;
#[[پرونده:11142.jpg|22px]] [[محسن اراکی| اراکی، محسن]]، [[گفتگوی دو مذهب (کتاب)|&#039;&#039;&#039;گفتگوی دو مذهب&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1414.jpg|22px]] [[فرهنگ شیعه (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ شیعه&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:10119661.jpg|22px]] [[مسلم محمدی|محمدی، مسلم]]، [[فرهنگ اصطلاحات علم کلام (کتاب)|&#039;&#039;&#039;فرهنگ اصطلاحات علم کلام&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:440259451.jpg|22px]] [[علی ربانی گلپایگانی|ربانی گلپایگانی، علی]]، [[امامت ۱ (مقاله)|امامت]]، [[دانشنامه کلام اسلامی ج۱ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;دانشنامه کلام اسلامی&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:978964298273.jpg|22px]] [[محمد حسن قدردان قراملکی|قدردان قراملکی، محمد حسن]]، [[امامت ۲ (کتاب)|&#039;&#039;&#039;امامت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده: 1100453.jpg|22px]] [[هادی اکبری ملک‌آبادی|اکبری]] و [[رقیه یوسفی سوته|یوسفی]]، [[ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی (کتاب)|&#039;&#039;&#039; ولایت از دیدگاه علامه طباطبایی &#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
# [[پرونده:1100538.jpg|22px]] [[محمد علی میرعلی|میرعلی، محمد علی]]، [[اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت (کتاب)|&#039;&#039;&#039;اطاعت از حاکم جائر در نظام امامت و خلافت&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==جستارهای وابسته==&lt;br /&gt;
{{فهرست اثر}}&lt;br /&gt;
{{ستون-شروع|3}} &lt;br /&gt;
* [[مبادی امامت]]&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصوریه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[اله]] ([[الوهیت]])&lt;br /&gt;
*** [[رب]] ([[ربوبیت]])&lt;br /&gt;
*** [[ملک]] ([[مالکیت]])&lt;br /&gt;
*** [[حکم]] ([[حاکمیت]] و [[حکومت]])&lt;br /&gt;
*** [[ولی]] ([[ولایت]])&lt;br /&gt;
*** [[حجت]]&lt;br /&gt;
*** [[رسالت]]&lt;br /&gt;
*** [[خلافت]]&lt;br /&gt;
*** [[امارت]]&lt;br /&gt;
*** [[قدوه]] ([[اسوه]])&lt;br /&gt;
*** [[رهبری]] ([[قیادت]])&lt;br /&gt;
** [[مبادی تصدیقیه امامت]]:&lt;br /&gt;
*** [[حق عبادت و اطاعت]]&lt;br /&gt;
*** [[حق امر و نهی]]&lt;br /&gt;
*** [[حق الزام]]&lt;br /&gt;
*** [[حق پاداش و کیفر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق ابلاغ و تبیین امر]]&lt;br /&gt;
*** [[حق نصرت الهی]]&lt;br /&gt;
* [[ویژگی‌های لازم امامت]] ([[صفات ضروری امام]]) &lt;br /&gt;
* [[نصب امام]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام بر خدا]]&lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام از سوی خدا]]&lt;br /&gt;
** [[وجوب نصب امام پس از پیامبر]] &lt;br /&gt;
** [[تحقق نصب امام پس از پیامبر]]&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
{{پایان}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پانویس==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:مدخل]]&lt;br /&gt;
[[رده:امامت]]&lt;br /&gt;
[[رده:مفاهیم در کلام اسلامی]]&lt;br /&gt;
[[رده:مقاله‌های اولویت سه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0011.webm&amp;diff=392289</id>
		<title>پرونده:V0011.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0011.webm&amp;diff=392289"/>
		<updated>2020-11-10T16:11:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: افسانه تأبیرالنخل

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
افسانه تأبیرالنخل&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>پرونده:V0010.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0010.webm&amp;diff=392288"/>
		<updated>2020-11-10T15:30:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: توهم جدایی دین از دنیا

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
توهم جدایی دین از دنیا&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0009.webm&amp;diff=392287</id>
		<title>پرونده:V0009.webm</title>
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		<updated>2020-11-10T15:22:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: آیا حقیقت امامت ریاست است؟

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
آیا حقیقت امامت ریاست است؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0008.webm&amp;diff=392286</id>
		<title>پرونده:V0008.webm</title>
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		<updated>2020-11-10T15:17:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: اسلام  جاهلی و تحریف حقیقت امامت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
اسلام  جاهلی و تحریف حقیقت امامت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0007.webm&amp;diff=392285</id>
		<title>پرونده:V0007.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0007.webm&amp;diff=392285"/>
		<updated>2020-11-10T15:11:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: تعریف امام نزد شیخ صدوق

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
تعریف امام نزد شیخ صدوق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>پرونده:V0006.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0006.webm&amp;diff=392284"/>
		<updated>2020-11-10T15:01:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: امامت در لغت  

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
امامت در لغت  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0005.webm&amp;diff=392283</id>
		<title>پرونده:V0005.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0005.webm&amp;diff=392283"/>
		<updated>2020-11-10T13:24:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: اختلاف در جامعه

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
اختلاف در جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0004.webm&amp;diff=391412</id>
		<title>پرونده:V0004.webm</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0004.webm&amp;diff=391412"/>
		<updated>2020-11-09T09:43:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: امامت به معنای ولایت امر


آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
امامت به معنای ولایت امر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:V0003.webm&amp;diff=391405</id>
		<title>پرونده:V0003.webm</title>
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		<updated>2020-11-09T09:08:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: رابطه امامت با سرنوشت انسان ها

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
رابطه امامت با سرنوشت انسان ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<updated>2020-11-08T10:23:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: امامت عامل وحدت جامعه

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
امامت عامل وحدت جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<updated>2020-11-07T15:54:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: اهمیت مباحث امامت

آیت الله اراکی&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
اهمیت مباحث امامت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;br /&gt;
== اجازه‌نامه ==&lt;br /&gt;
{{خود|cc-by-4.0}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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		<updated>2020-11-07T15:12:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Seyedmahdi: Seyedmahdi صفحهٔ پرونده:V000002.webm را بدون برجای‌گذاشتن تغییرمسیر به پرونده:V0002.webm منتقل کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== خلاصه ==&lt;br /&gt;
اهمیت مباحث امامت &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آیت الله اراکی&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Seyedmahdi</name></author>
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