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	<title>بحث:بصیرت - تاریخچهٔ نسخه‌ها</title>
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	<subtitle>تاریخچهٔ نسخه‌ها برای این صفحه در ویکی</subtitle>
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		<title>Bahmani: /* مقدمه */</title>
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		<updated>2020-07-14T07:15:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span dir=&quot;auto&quot;&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;مقدمه&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;نسخهٔ ‏۱۴ ژوئیهٔ ۲۰۲۰، ساعت ۱۰:۴۵&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l7&quot;&gt;خط ۷:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;* از ویژگی‌های [[فکری]] و عملی [[یاران سید الشهدا]]{{ع}} در [[نهضت]] [[عاشورا]]، بصیرت و [[بینش]] بود. در [[فرهنگ دینی]] و متون [[معارف]]، از کسانی با عنوان [[اهل]] البصائر یاد شده است، یعنی صاحبان روشن بینی و بیدار دلی و [[شناخت]] عمیق نسبت به [[حق]] و [[باطل]]، [[امام]] و [[حجت]] [[الهی]]، راه و برنامه، [[دوست]] و [[دشمن]]، [[مؤمن]] و [[منافق]]. صاحبان بصیرت، [[چشم]] درونشان بیناست، نه تنها چشم سر. با [[آگاهی]]، [[هشیاری]] و [[انتخاب]] گام در راه می‌گذارند و عملکرد و موضعگیری‌هایشان ریشه [[اعتقادی]] و مبنای مکتبی و [[دینی]] دارد، جهادشان مکتبی و مبارزاتشان مرامی است، نه سودجویانه و دنیاپرستانه یا نشات گرفته از [[تعصبات قومی]] و [[جاهلی]]، یا تحریک شده [[تبلیغات]] فریبکارانه جناح [[باطل]] و [[سلطه]] [[زور]]. [[اهل]] بصیرت، راه خود را روشن و بی ابهام و بحق می‌بینند و [[باطل]] بودن [[دشمن]] را [[یقین]] دارند و با [[تطمیع]] و [[تهدید]]، نه خود را می‌فروشند و نه دست از [[عقیده]] و [[جهاد]] بر می‌دارند. شمشیرها و جهادشان پشتوانه [[عقیدتی]] دارد. به فرموده [[امام علی|علی]] {{عربی|حملوا بصائرهم علی اسیافهم}}&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه، صبحی صالح، خطبه ۱۵۰&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;* از ویژگی‌های [[فکری]] و عملی [[یاران سید الشهدا]]{{ع}} در [[نهضت]] [[عاشورا]]، بصیرت و [[بینش]] بود. در [[فرهنگ دینی]] و متون [[معارف]]، از کسانی با عنوان [[اهل]] البصائر یاد شده است، یعنی صاحبان روشن بینی و بیدار دلی و [[شناخت]] عمیق نسبت به [[حق]] و [[باطل]]، [[امام]] و [[حجت]] [[الهی]]، راه و برنامه، [[دوست]] و [[دشمن]]، [[مؤمن]] و [[منافق]]. صاحبان بصیرت، [[چشم]] درونشان بیناست، نه تنها چشم سر. با [[آگاهی]]، [[هشیاری]] و [[انتخاب]] گام در راه می‌گذارند و عملکرد و موضعگیری‌هایشان ریشه [[اعتقادی]] و مبنای مکتبی و [[دینی]] دارد، جهادشان مکتبی و مبارزاتشان مرامی است، نه سودجویانه و دنیاپرستانه یا نشات گرفته از [[تعصبات قومی]] و [[جاهلی]]، یا تحریک شده [[تبلیغات]] فریبکارانه جناح [[باطل]] و [[سلطه]] [[زور]]. [[اهل]] بصیرت، راه خود را روشن و بی ابهام و بحق می‌بینند و [[باطل]] بودن [[دشمن]] را [[یقین]] دارند و با [[تطمیع]] و [[تهدید]]، نه خود را می‌فروشند و نه دست از [[عقیده]] و [[جهاد]] بر می‌دارند. شمشیرها و جهادشان پشتوانه [[عقیدتی]] دارد. به فرموده [[امام علی|علی]] {{عربی|حملوا بصائرهم علی اسیافهم}}&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه، صبحی صالح، خطبه ۱۵۰&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;*[[قرآن]] می‌فرماید: &quot;به [[راستی]]، رهنمودهایی از جانب پروردگارتان برای شما آمده است. پس هر که به دیده [[بصیرت]] بنگرد، به سود خود او است و هر که از سر [[بصیرت]] ننگرد، به زیان خود او است، و من بر شما نگهبان نیستم&quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{متن قرآن| قَدْ جَاءَكُم بَصَائِرُ مِن رَّبِّكُمْ فَمَنْ أَبْصَرَ فَلِنَفْسِهِ وَمَنْ عَمِيَ فَعَلَيْهَا وَمَا أَنَاْ عَلَيْكُم بِحَفِيظٍ }}؛ سوره انعام، آیه ۱۰۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;. [[مفسران]] در [[تفسیر]] این [[آیه]] گفته‌اند، مراد این است که [[خداوند]] دلایلی [[آشکار]] به [[انسان]] بخشیده است تا راه [[هدایت]] را بازشناسد. هر کس در آنها بیندیشد و [[یقین]] برگیرد، به بصیرتی دست می‌یابد که سود آن نصیب خود او می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;مجمع البیان‌، ۳- ۴/ ۳۴۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص 169.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;*[[امام علی]] {{ع}} درباره [[بصیرت]] می‌فرماید: &quot;[[بصیر]] کسی است که بشنود و بیندیشد، و بنگرد و ببیند و [[عبرت]] بیاموزد و آن‌گاه راه‌های روشن را بپیماید و از لغزیدن به پرتگاه‌ها مصون ماند&quot;&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه‌، خ ۱۵۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;. دستاورد این گونه [[بینش]]، بازگشت به [[فطرت]] و بهره‌مندی از [[ایمان]] و [[محبت]] و [[امید]] به [[خدا]] و [[پرهیزگاری]] است. [[جایگاه]] این گونه [[بینش]] بسی والا است و [[حقیقت]] را مستقیم و بی‌واسطه به [[انسان]] بازمی‌شناساند&amp;lt;ref&amp;gt;جهان‌بینی در فلسفه ما، ۱۰- ۱۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص 169.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==مفهوم‌شناسی بصیرت==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==مفهوم‌شناسی بصیرت==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>Bahmani</name></author>
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		<id>https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB:%D8%A8%D8%B5%DB%8C%D8%B1%D8%AA&amp;diff=332816&amp;oldid=prev</id>
		<title>Bahmani: صفحه‌ای تازه حاوی «==نویسنده: آقای واثق== &#039;&#039;&#039;بصیرت&#039;&#039;&#039; بینش، آگاهی، هوشیاری و زیرکی، روشند...» ایجاد کرد</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB:%D8%A8%D8%B5%DB%8C%D8%B1%D8%AA&amp;diff=332816&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2020-06-29T12:36:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;صفحه‌ای تازه حاوی «==نویسنده: آقای واثق== &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بصیرت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;a href=&quot;/wiki/%D8%A8%DB%8C%D9%86%D8%B4&quot; class=&quot;mw-redirect&quot; title=&quot;بینش&quot;&gt;بینش&lt;/a&gt;، &lt;a href=&quot;/wiki/%D8%A2%DA%AF%D8%A7%D9%87%DB%8C&quot; class=&quot;mw-redirect&quot; title=&quot;آگاهی&quot;&gt;آگاهی&lt;/a&gt;، &lt;a href=&quot;/wiki/%D9%87%D9%88%D8%B4%DB%8C%D8%A7%D8%B1%DB%8C&quot; title=&quot;هوشیاری&quot;&gt;هوشیاری&lt;/a&gt; و &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%D8%B2%DB%8C%D8%B1%DA%A9%DB%8C&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;زیرکی (صفحه وجود ندارد)&quot;&gt;زیرکی&lt;/a&gt;، روشند...» ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;صفحهٔ تازه&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==نویسنده: آقای واثق==&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بصیرت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; [[بینش]]، [[آگاهی]]، [[هوشیاری]] و [[زیرکی]]، [[روشندلی]] و [[چشم خِرَد]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[الهه هادیان رسنانی|هادیان رسنانی، الهه]]، [[دائرةالمعارف قرآن کریم ج۵ (کتاب)|دائرةالمعارف قرآن کریم]]، ج۵، ص۵۷۳- ۵۸۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==واژه‌شناسی لغوی==&lt;br /&gt;
*این واژه برگرفته از ریشه [[عربی]] &amp;quot;ب ـ ص‌ ـ ر&amp;quot; است&amp;lt;ref&amp;gt;لسان‌العرب، ج‌۲، ص‌۴۱۸‌ـ‌۴۱۹، «بصر»؛ لغت نامه، ج‌۳، ص‌۴۲۰۶، «بصیر».&amp;lt;/ref&amp;gt;. در [[نثر]] و [[شعر]] قدیم [[فارسی]] فراوان یافت می‌شود&amp;lt;ref&amp;gt;لغت نامه، ج‌۳، ص‌۴۲۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و غالباً به صورت ترکیبی اضافی با واژه چشم به کار می‌رفته و در برابر [[بینایی]] [[حسی]] و ظاهری، به معنای [[بینایی]] [[قلبی]] و [[شهودی]] بوده است.&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
* از ویژگی‌های [[فکری]] و عملی [[یاران سید الشهدا]]{{ع}} در [[نهضت]] [[عاشورا]]، بصیرت و [[بینش]] بود. در [[فرهنگ دینی]] و متون [[معارف]]، از کسانی با عنوان [[اهل]] البصائر یاد شده است، یعنی صاحبان روشن بینی و بیدار دلی و [[شناخت]] عمیق نسبت به [[حق]] و [[باطل]]، [[امام]] و [[حجت]] [[الهی]]، راه و برنامه، [[دوست]] و [[دشمن]]، [[مؤمن]] و [[منافق]]. صاحبان بصیرت، [[چشم]] درونشان بیناست، نه تنها چشم سر. با [[آگاهی]]، [[هشیاری]] و [[انتخاب]] گام در راه می‌گذارند و عملکرد و موضعگیری‌هایشان ریشه [[اعتقادی]] و مبنای مکتبی و [[دینی]] دارد، جهادشان مکتبی و مبارزاتشان مرامی است، نه سودجویانه و دنیاپرستانه یا نشات گرفته از [[تعصبات قومی]] و [[جاهلی]]، یا تحریک شده [[تبلیغات]] فریبکارانه جناح [[باطل]] و [[سلطه]] [[زور]]. [[اهل]] بصیرت، راه خود را روشن و بی ابهام و بحق می‌بینند و [[باطل]] بودن [[دشمن]] را [[یقین]] دارند و با [[تطمیع]] و [[تهدید]]، نه خود را می‌فروشند و نه دست از [[عقیده]] و [[جهاد]] بر می‌دارند. شمشیرها و جهادشان پشتوانه [[عقیدتی]] دارد. به فرموده [[امام علی|علی]] {{عربی|حملوا بصائرهم علی اسیافهم}}&amp;lt;ref&amp;gt;نهج البلاغه، صبحی صالح، خطبه ۱۵۰&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
* اینگونه مدافعان بینادل و [[پیروان]] [[دل]] [[آگاه]]، هم در رکاب [[امام علی|علی]] با [[معاویه]] می‌جنگیدند، هم در همه حال [[امام حسن|امام مجتبی]] را [[حمایت]] می‌کردند، هم در [[عاشورا]] [[جان]] خویش را فدای [[امام]] خویش و [[نصرت]] [[قرآن]] می‌کردند. این از سخنرانی‌ها و رجزها و پاسخ‌هایشان روشن بود. [[امام حسین|سید الشهدا]]{{ع}} را امامی می‌دانستند که باید یاریش کرد و [[جان]] در راهش باخت و دشمنانش را کافردلان [[نفاق]] پیشه‌ای می‌شناختند که [[جهاد]] با آنان همچون [[جهاد]] با [[مشرکان]] بود و [[اجر]] داشت. سخنان [[امام حسین]]{{ع}}، [[امام سجاد]]{{ع}}، [[حضرت اباالفضل]]، [[علی اکبر]]، [[جوانان]] [[بنی هاشم]]، [[یاران امام حسین|یاران ابا عبدالله]] همه گویای عمق بصیرت آنان است. [[امام صادق]] درباره [[حضرت عباس]]، تعبیر نافذ البصیرة دارد، که گویای عمق [[بینش]] و [[استواری]] [[ایمان]] او در [[حمایت]] از [[امام حسین|سید الشهدا]]ست: {{عربی|کان عمنا العباس بن علی نافذ البصیرة صلب الایمان}}&amp;lt;ref&amp;gt;اعیان الشیعه، ج ۷، ص ۴۳۰&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[زیارتنامه]] [[حضرت]] [[عباس]] است: {{عربی|انک مضیت علی بصیرة من امرک مقتدیا بالصالحین...}} سخن [[علی اکبر]] خطاب به [[امام]] که مگر ما بر [[حق]] نیستیم؟ مشهوراست. در [[جبهه]] مقابل، کوردلانی [[دنیا]] طلب و [[فریب]] خوردگانی بی [[انگیزه]] و تحریک شدگانی [[نادان]] بودند که [[تبلیغات]] [[اموی]] [[چشم]] بصیرتشان را بسته بود و لقمه‌های [[حرام]]، [[گوش]] [[حقیقت]] نیوش را از آنان گرفته بود&amp;lt;ref&amp;gt;ر. ک. [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ عاشورا (کتاب)|فرهنگ عاشورا]]، ص۸۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مفهوم‌شناسی بصیرت==&lt;br /&gt;
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===بصیرت و [[بصر]]===&lt;br /&gt;
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===بصیرت و [[نور]]===&lt;br /&gt;
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===بصیرت و [[حکمت]] و [[عقل]]===&lt;br /&gt;
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==ویژگی‌ها و موانع بصیرت==&lt;br /&gt;
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==پانویس==&lt;br /&gt;
{{یادآوری پانویس}}&lt;br /&gt;
{{پانویس2}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bahmani</name></author>
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