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	<title>بنی‌عبدالاشهل در تاریخ اسلامی - تاریخچهٔ نسخه‌ها</title>
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		<title>Jaafari: /* منابع */</title>
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;یک سال پس از [[عقبه اول]]، در حالی که [[اسلام در مدینه]] گسترش یافته بود، [[پیامبر]]{{صل}} در آخرین حضورش در میان [[قبایل]] در [[موسم حج]]، با جمعی از [[مردم مدینه]] [[دیدار]] کردند. در این دیدار که به &amp;quot;[[عقبه]] ثانی&amp;quot; مشهور است، دومین [[پیمان]] مردم مدینه با [[رسول خدا]]{{صل}} صورت گرفت. در این سال، مصعب بن عمیر با گروهی از [[مسلمانان]] [[انصار]] به همراه جمعی از [[مشرکان مدینه]] جهت انجام موسم حچ به سوی [[مکه]] حرکت کردند. حضرت، زمانی را برای [[ملاقات]] با مسلمانان [[مدینه]] در «[[منی]]» در ایام تشریق معین کردند. پس از [[اعمال]] [[حج]]، مسلمانان در نیمه‌های شب، پنهان از چشم [[مشرکان]] از خیمه‌هایشان خارج شدند تا در عقبه با حضرت ملاقات کنند. در این جلسه که بزرگان و رؤسای [[قبایل مدینه]] حضور داشتند،&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص‌۸۵: بغدادی، المحبر، ص۲۸۶؛ طبری، تاریخ الطبری. ج۲، ص۳۶۲؛ ابن عبد البر، الاستیعاب، ج۱، ص۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] - [[حلیف بنی عبدالأشهل]] - به ایراد سخن پرداخت. وی در سخنانی خطاب به رسول خدا{{صل}} از برقراری پیمان‌هایی بین قبیله خود و دیگران و از قطع پیمان با [[یهود]] سخن گفت و سپس در ادامه از حضرت پرسید: «آیا پس از [[پیروزی]] بر دشمنانت، در کنار ما باقی خواهی ماند؟» حضرت فرمود: «الدم الدم و [[الهدم]] الهدم. أنا منکم و آنتم منی أحارب من حاربتم، و أسالم من سالمتم؛ [[خون]] من خون شماست و [[مرگ]] و [[زندگی]] من با مرگ و زندگی شما گره خورده است. من از شما هستم و شما از من. با هر کس وارد [[جنگ]] شوید جنگ می‌کنم و با هر کس از در [[صلح]] درآیید. صلح می‌کنم».&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۸۵ - ۸۳؛ طبری، تاریخ الطبری، ج۲، ص۳۶۳؛ بیهقی، دلاثل النبوه، ج۲، ص۴۴۷؛ سهیلی، الروض‌الانف، ج۴، ص۸۳؛ ذهبی، تاریخ الاسلام، بخش سیره، ص۳۰۳؛ ابن کثیر، البدایه و النهایه، بخش ۳، ص۱۵۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[سخنان پیامبر]]{{صل}} موجب دلگرمی [[مسلمانان]] [[مدینه]] شد و [[نگرانی‌ها]] را از [[دل]] ایشان مرتفع نمود. [[پیامبر]]{{صل}} جهت [[ایجاد انسجام]] و [[هماهنگی]] بین [[قبایل]] و به منظور دستیابی به اهداف عالیه خود، از همان شب [[ملاقات]]، دست به کار شد و از میان هفتاد نفر از [[بیعت کنندگان]]، [[دوازده تن]] از آنان را به عنوان [[نقیب]] برگزید تا او را در انجام بهتر رسالتش [[یاری]] دهند.&amp;lt;ref&amp;gt;نقیب بنی النجار: اسعد بن زراره، نقیب بنی سلمه، البرار بن معرور و عبدالله بن عمرو بن حرام عبادة و المنذر بن عمرو؛ نقیب بنی زریق: رافع بن مالک نقیب بنی الحارث بن الخزرج:عبدالله بن رواحة و سعد بن الربیع نقیب بنی‌عوف ین الخزرج: عبادة بن الصامت او خارجة بن زید؛ نقیب بنی عمرو بن عوف: سعد بن خیثمة؛ نقیب بنی عبدالاشهل: اسید بن حضیر و ابوالهیثم بن التیهان. برخی از منابع نقبا را بدون قبیله یاد کرده‌اند.&amp;lt;/ref&amp;gt; در واقع این [[نقباء]]، حلقه [[ارتباط]] بین پیامبر{{صل}} و مسلمانان بودند. نُه تن از [[خزرجیان]] و سه تن از [[اوسیان]] برگزیده شدند تا با افراد ارتباط داشته باشند.&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|ان رسول الله قال للنقباء: آنتم علی قومکم بما فیهم کفلاء، کكفالة الحواریین لعيسي بن مریم. و أناکفیل علی قومی - یعنی المسلمین - قالوا: نعم}}.&amp;lt;/ref&amp;gt; در جمع [[دیدار]] کنندگان [[اوسی]] این واقعه، جمعی از [[مردم]] [[بنی عبدالاشهل]] حضور داشتند که [[اسید بن حضیر]] و [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] - [[حلیف بنی عبدالأشهل]] - &amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۸۷؛ ابن عبد البر، الاستیعاب، ج۱، ص‎٩۳ و ج۴، ص۱۷۷۴؛ ابن حجر، الاصابه، ج۱، ص۸۳؛ سهیلی، الروض الانف، ج۴، ص۱۳۵؛ بیهقی، دلائل النبوه، ج۲، ص۳۴۸؛ ابوزید احمد بن سهل بلخی، البدء و التاریخ، جزء۲، ص۶۳؛ بلاذری، انساب الاشراف، ج۱، ص۲۷۸؛ ذهبی، سیر اعلام النبلاء، ج۱، ص۲۰۰ و ۳۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و شمار دیگری از [[بنی عبدالاشهل]] مانند [[سلمة بن وقش]] و [[سعد بن زید اشهلی]] از جمله آنان بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۳، ص۳۳۸: طبرانی، المعجم الکبیر، ج۷، ص۴۰ - ۴۱؛ ابن عبد البر، الاستیعاب ج۱، ص۳۳۵، ج۲، ص۵۹۲؛ ابن سید الناس، عیون الاثر، ج۱، ص۲۷۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; گفته شده که [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] نخستین کسی بود که در این [[دیدار]]، از طرف [[قوم]] خود با [[پیامبر]]{{صل}} [[بیعت]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۷۹؛ ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۱، ص۱۷۰؛ طبرانی، المعجم الکبیر، ج۱٩‌، ص۳۵۰؛ طبری، تاریخ الطبری، ج۲، ص۳۶۴؛ سهیلی، الروض الاتف، ج۴، ص۸۷؛ ابن کثیر، البدایة و النهایة، بخش ۳، ص۱۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۷ - ۱۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;یک سال پس از [[عقبه اول]]، در حالی که [[اسلام در مدینه]] گسترش یافته بود، [[پیامبر]]{{صل}} در آخرین حضورش در میان [[قبایل]] در [[موسم حج]]، با جمعی از [[مردم مدینه]] [[دیدار]] کردند. در این دیدار که به &amp;quot;[[عقبه]] ثانی&amp;quot; مشهور است، دومین [[پیمان]] مردم مدینه با [[رسول خدا]]{{صل}} صورت گرفت. در این سال، مصعب بن عمیر با گروهی از [[مسلمانان]] [[انصار]] به همراه جمعی از [[مشرکان مدینه]] جهت انجام موسم حچ به سوی [[مکه]] حرکت کردند. حضرت، زمانی را برای [[ملاقات]] با مسلمانان [[مدینه]] در «[[منی]]» در ایام تشریق معین کردند. پس از [[اعمال]] [[حج]]، مسلمانان در نیمه‌های شب، پنهان از چشم [[مشرکان]] از خیمه‌هایشان خارج شدند تا در عقبه با حضرت ملاقات کنند. در این جلسه که بزرگان و رؤسای [[قبایل مدینه]] حضور داشتند،&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص‌۸۵: بغدادی، المحبر، ص۲۸۶؛ طبری، تاریخ الطبری. ج۲، ص۳۶۲؛ ابن عبد البر، الاستیعاب، ج۱، ص۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] - [[حلیف بنی عبدالأشهل]] - به ایراد سخن پرداخت. وی در سخنانی خطاب به رسول خدا{{صل}} از برقراری پیمان‌هایی بین قبیله خود و دیگران و از قطع پیمان با [[یهود]] سخن گفت و سپس در ادامه از حضرت پرسید: «آیا پس از [[پیروزی]] بر دشمنانت، در کنار ما باقی خواهی ماند؟» حضرت فرمود: «الدم الدم و [[الهدم]] الهدم. أنا منکم و آنتم منی أحارب من حاربتم، و أسالم من سالمتم؛ [[خون]] من خون شماست و [[مرگ]] و [[زندگی]] من با مرگ و زندگی شما گره خورده است. من از شما هستم و شما از من. با هر کس وارد [[جنگ]] شوید جنگ می‌کنم و با هر کس از در [[صلح]] درآیید. صلح می‌کنم».&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۸۵ - ۸۳؛ طبری، تاریخ الطبری، ج۲، ص۳۶۳؛ بیهقی، دلاثل النبوه، ج۲، ص۴۴۷؛ سهیلی، الروض‌الانف، ج۴، ص۸۳؛ ذهبی، تاریخ الاسلام، بخش سیره، ص۳۰۳؛ ابن کثیر، البدایه و النهایه، بخش ۳، ص۱۵۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[سخنان پیامبر]]{{صل}} موجب دلگرمی [[مسلمانان]] [[مدینه]] شد و [[نگرانی‌ها]] را از [[دل]] ایشان مرتفع نمود. [[پیامبر]]{{صل}} جهت [[ایجاد انسجام]] و [[هماهنگی]] بین [[قبایل]] و به منظور دستیابی به اهداف عالیه خود، از همان شب [[ملاقات]]، دست به کار شد و از میان هفتاد نفر از [[بیعت کنندگان]]، [[دوازده تن]] از آنان را به عنوان [[نقیب]] برگزید تا او را در انجام بهتر رسالتش [[یاری]] دهند.&amp;lt;ref&amp;gt;نقیب بنی النجار: اسعد بن زراره، نقیب بنی سلمه، البرار بن معرور و عبدالله بن عمرو بن حرام عبادة و المنذر بن عمرو؛ نقیب بنی زریق: رافع بن مالک نقیب بنی الحارث بن الخزرج:عبدالله بن رواحة و سعد بن الربیع نقیب بنی‌عوف ین الخزرج: عبادة بن الصامت او خارجة بن زید؛ نقیب بنی عمرو بن عوف: سعد بن خیثمة؛ نقیب بنی عبدالاشهل: اسید بن حضیر و ابوالهیثم بن التیهان. برخی از منابع نقبا را بدون قبیله یاد کرده‌اند.&amp;lt;/ref&amp;gt; در واقع این [[نقباء]]، حلقه [[ارتباط]] بین پیامبر{{صل}} و مسلمانان بودند. نُه تن از [[خزرجیان]] و سه تن از [[اوسیان]] برگزیده شدند تا با افراد ارتباط داشته باشند.&amp;lt;ref&amp;gt;{{عربی|ان رسول الله قال للنقباء: آنتم علی قومکم بما فیهم کفلاء، کكفالة الحواریین لعيسي بن مریم. و أناکفیل علی قومی - یعنی المسلمین - قالوا: نعم}}.&amp;lt;/ref&amp;gt; در جمع [[دیدار]] کنندگان [[اوسی]] این واقعه، جمعی از [[مردم]] [[بنی عبدالاشهل]] حضور داشتند که [[اسید بن حضیر]] و [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] - [[حلیف بنی عبدالأشهل]] - &amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۸۷؛ ابن عبد البر، الاستیعاب، ج۱، ص‎٩۳ و ج۴، ص۱۷۷۴؛ ابن حجر، الاصابه، ج۱، ص۸۳؛ سهیلی، الروض الانف، ج۴، ص۱۳۵؛ بیهقی، دلائل النبوه، ج۲، ص۳۴۸؛ ابوزید احمد بن سهل بلخی، البدء و التاریخ، جزء۲، ص۶۳؛ بلاذری، انساب الاشراف، ج۱، ص۲۷۸؛ ذهبی، سیر اعلام النبلاء، ج۱، ص۲۰۰ و ۳۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; و شمار دیگری از [[بنی عبدالاشهل]] مانند [[سلمة بن وقش]] و [[سعد بن زید اشهلی]] از جمله آنان بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۳، ص۳۳۸: طبرانی، المعجم الکبیر، ج۷، ص۴۰ - ۴۱؛ ابن عبد البر، الاستیعاب ج۱، ص۳۳۵، ج۲، ص۵۹۲؛ ابن سید الناس، عیون الاثر، ج۱، ص۲۷۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; گفته شده که [[ابوالهیثم مالک بن تیهان]] نخستین کسی بود که در این [[دیدار]]، از طرف [[قوم]] خود با [[پیامبر]]{{صل}} [[بیعت]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۷۹؛ ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۱، ص۱۷۰؛ طبرانی، المعجم الکبیر، ج۱٩‌، ص۳۵۰؛ طبری، تاریخ الطبری، ج۲، ص۳۶۴؛ سهیلی، الروض الاتف، ج۴، ص۸۷؛ ابن کثیر، البدایة و النهایة، بخش ۳، ص۱۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۷ - ۱۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;پس از [[رحلت رسول اکرم]]{{صل}} و در پی سیاست‌های مغرضانه خلفای [[قریش]]، [[انصار]] - همچون [[بنی هاشم]] - به حاشیه رانده شدند به گونه‌ای که جز [[حذیفة بن یمان عنسی]] – حلیف بنی عبدالاشهل - نامی از ایشان در رده‌های بالای [[حکومتی]] و نظامی [[دستگاه خلافت]] دیده نمی‌شود. با این وصف، با کنکاش در صفحات پراکنده [[تاریخ]] می‌‌توان جسته و گریخته، نشانی از حضور ایشان - از جمله بنی عبدالاشهل - در رویدادهایی مهمی همچون ردّه،&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهرة النسب، ص۶۳۶ - ۶۳۷؛ بلاذری، فتوح البلدان، ج۱، ص۱۱۰؛ خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۵۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[فتوحات]]&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهرة النسب، ص۶۳۶؛ ابن عبدالبر، الاستیعاب، ج۲، ص۶۳۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; و نبردهای [[عصر امام علی]]{{ع}}&amp;lt;ref&amp;gt;خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۱۱۰؛ دینوری، الاخبار الطوال، ص۱۴۶؛ نصر بن مزاحم منقری، وقعة صفین، ص۴۴۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; یافت. آنان در [[جنگ یمامه]] ([[سال ۱۲ هجری]]) و [[نبرد]] با [[مسیلمه]] [[کذاب]] و یارانش، حضور گسترده‌ای داشتند چندان که خلیفة بن خیاط، تعداد هفت تن از کشته‌های بنی عبدالاشهل - از جمله [[شخصیت]] نامدار این [[قوم]]: [[عباد بن بشر بن وقش]] - و احلافشان را در این [[جنگ]] بر شمرده است.&amp;lt;ref&amp;gt;خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۵۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; آنان در جریان [[فتوحات اسلامی]] به خصوص در [[فتوح]] بخشهایی از [[سرزمین ایران]] شرکت داشتند. گرچه [[روایات]] در این باب، در جزئیات [[هم‌داستان]] نیستند. وقتی در [[خلافت عمر بن خطاب]]، [[ابوموسی اشعری]] در نواحی [[خوزستان]] مشغول تاخت و تاز بود، [[عمار بن یاسر]] عامل [[کوفه]]، گروهی از [[کوفیان]] را به [[یاری]] او گسیل داشت که، از جملۀ آنان حذیفة بن یمان – حلیف بنی عبدالاشهل - را باید یاد کرد، که بر [[جناح چپ]] [[سپاه]] [[فرماندهی]] یافت.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۸۰؛ دربارۀ سکونت حذیفه در کوفه، نک: ابونعیم، معرفة الصحابه، ج۲، ص۲۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;در سال ۱۹ یا ۲۱ [[هجری]] چون [[خلیفه]] [[عمر]]، نُعمان بن مُقرِّن مُزَنی را به [[نبرد با ایرانیان]] گسیل داشت، [[حذیفه]] را نیز [[جانشین]] او قرار داد.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۰۲؛ نیز نک‍: خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۸۳؛ طبری، تاریخ الطبری، ج۴، ص۱۱۵، ۱۱۹، ۱۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; پس از کشته شدن نعمان، [[حذیفه]] از [[فرماندهان]] فاتح [[نهاوند]] به‌شمار رفت.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۰۴ - ۳۰۶؛ نیز نک‍: طبری، تاریخ الطبری، ج۴، ص۱۱۶، ۱۳۲؛ ابن‌حُبَیش، الغزوات، ج۲، ص۳۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; حذیفه در نواحی نهاوند بود که [[حکومت آذربایجان]] یافت و بدان سوی [[لشکر]] کشید. وی به [[اردبیل]] درآمد و گرچه [[مرزبان]] آن ناحیه لشکری گران از اهالی شهرهای گوناگون گرد آورده بود، سرانجام، حذیفه با [[تحمیل]] شرایطی، با آنان [[صلح]] کرد و شهرهای دیگری را در آن نواحی به دست آورد، اما [[خلیفه]] او را [[عزل]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۲۵ - ۳۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;مرکز دائرة المعارف بزرگ اسلامی، مقاله «حذیفة بن یمان».&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;در [[روایت]] [[ابوعبیده]]، فتح دوبارۀ شهرهایی از ناحیۀ جبال همچون دینور و [[همدان]]، در حدود [[سال ۲۲ هجری]] به حذیفه نسبت داده شده است.&amp;lt;ref&amp;gt;نک‍: خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۸۵ - ۸۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; وی همچنین از سوی [[عمر]] [[مأموریت]] یافت زمینهای ماورای دجله را به منظور محاسبۀ [[خراج]]، مساحی کند.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۲۶۹؛ نیز نک‍: طبری، تاریخ الطبری، ج۴، ص۲۳، ۱۳۹؛ یعقوبی، تاریخ یعقوبی، ج۲، ص۱۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;روایاتی نشان می‌دهند که حذیفه احتمالاً از سوی عمر [[والی مدائن]] هم بوده،&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الطبری، ج۳، ص۵۸۸؛ نیز نک‍: خطیب بغدادی، تاریخ بغداد، ج۱، ص۱۶۲؛ ذهبی، سیر اعلام النبلاء، ج۲، ص۳۶۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;و توسعۀ بنای [[مسجد]] این [[شهر]] به دست او، احتمالاً در همین دوره صورت گرفته است.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ۲۸۹؛ ابن‌فقیه، البلدان، ص۲۶۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;حذیفه در لشکرکشی‌های دورۀ [[عثمان]] نیز شرکت داشت: وقتی [[سعید بن عاص]] در [[سال ۳۰ هجری]] از [[کوفه]] [[عزم]] [[خراسان]] کرد، حذیفه در [[سپاه]] او بود و هم در این [[سفر]]، در فتح [[طبرستان]] شرکت جست.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الطبری، ج۴، ص۲۶۹؛ نیز نک‍: ابن‌حبیش، الغزوات، ج۲، ص۴۰۶؛ سهمی، تاریخ جرجان، ص۴۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; سپس عثمان او را به نواحی مرزی [[ارمینیه]] گسیل داشت و حذیفه به بردعه رفت و عاملان خویش را به نقاط گوناگون فرستاد، اما اندکی بعد، به دستور [[خلیفه]] بازگشت.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۲۰۴؛ نیز نک‍: طبری، تاریخ الطبری، ج۴، ص۲۸۱؛ یعقوبی، تاریخ یعقوبی، ج۲، ص۱۹۴؛ ابن‌فقیه، البلدان، ص۵۹۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;در پاره‌ای از [[روایات]] مربوط به حوادث اواخر [[عهد]] [[عثمان]] که غالباً به عنوان نشانه‌هایی از [[ناخشنودی]] از [[اعمال]] خلیفه تلقی می‌شود، از [[حذیفه]] هم نام برده شده است؛ مثلاً گفته‌اند او همراه شماری دیگر، خواهان [[عزل]] [[ولید بن عقبه]] از [[ولایت کوفه]] بوده،&amp;lt;ref&amp;gt;یعقوبی، تاریخ یعقوبی، ج۲، ص۱۹۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; یا همراه [[مالک اشتر]] [[نخعی]]، در بیابان [[ربذه]] بر پیکر [[صحابی]] تبعیدی، [[ابوذر غفاری]] [[نماز]] گزارده است.&amp;lt;ref&amp;gt;یعقوبی، تاریخ یعقوبی، ج۲، ص۲۰۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;با این همه، سخنان منسوب به او نشان می‌دهد که به‌رغم [[انتقاد]] از عثمان، از [[همکاری]] در جریانی که به [[قتل]] خلیفه انجامید، [[تبری]] می‌کرده است.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، انساب الاشراف، ج۴، ص۴۴، ابن‌عساکر، تاریخ مدینه دمشق، ج۱۲، ص۲۹۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;مرکز دائرة المعارف بزرگ اسلامی، مقاله «حذیفة بن یمان».&amp;lt;/ref&amp;gt; انتقاد از عثمان علاوه بر حذیفه در دیگر انصاری‌ها هم جاری و ساری بود چندان که به هنگام محاصره [[منزل]] عثمان، او را مدد نرساندند تا این که کشته شد. این امر بعدها، دستآویز [[عثمانی‌ها]] و افرادی نظیر [[معاویه]] و برخی از اطرافیانش در [[طعن]] و [[سرزنش]] آنان قرار گرفت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه دینوری، الامامه و السیاسه، ج۱، ص۱۳۰؛ بلاذری، انساب الاشراف، ج۵، ص۵۶؛ ابن اعثم کوفی، الفتوح، ج۳، ص۱۶۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;پس از [[قتل عثمان]]، [[مهاجر]] و [[انصار]] در [[بیعت با علی]]{{ع}} [[اجتماع]] کردند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن عبدالبر، الاستیعاب، ج۳، ص۱۱۲۱؛ ابن اثیر، الکامل، ج۳، ص۲۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; علاوه بر آن، از بعضی روایات چنین بر می‌‌آید که برخی افراد - نظیر [[حذیفة بن یمان]] - [[مردم]] را به [[بیعت با امام علی]]{{ع}} [[تشویق]] می‌‌کردند.&amp;lt;ref&amp;gt;نک‍: بلاذری، انساب الاشراف، ج۲، ص۱۰۰، ۱۵۵؛ مسعودی، مروج الذهب، ج۲، ص۳۸۴.&amp;lt;/ref&amp;gt;انصار از جمله اشهلی‌ها پس از [[بیعت]] با [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، - همان گونه که در [[کلام]] معاویه و برخی یارانش بدان اشاره شده است - حضوری پر رنگ و چشمگیری در [[جنگ جمل]] داشتند چندان که برخی منابع، تعداد انصاری‌های حاضر در این را ۱۸۰ نفر گفته‌اند.&amp;lt;ref&amp;gt;خلیفة بن خیاط، تاریخ، ص۱۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;در این [[جنگ]]، [[امیرالمؤمنین]]{{ع}}، برای [[انصار]] و [[قریش]] و دیگر حجازی‌ها پرچمی قرار داد و [[عبدالله بن عباس]] را بر آنان گماشت.&amp;lt;ref&amp;gt;دینوری، الاخبار الطوال، ص۱۴۶.&amp;lt;/ref&amp;gt;در [[صفین]] نیز انصاری‌ها - از جمله [[بنی عبدالاشهل]] - در کنار امیرالمؤمنین{{ع}} و در مقابل [[معاویه]] قرار گرفتند. چندان که چون از سوی [[نعمان بن بشیر]]، بدین سبب مورد ملامت قرار گرفتند، [[قیس بن سعد انصاری]] در پاسخ به او چنین گفت: {{عربی|واما معاویة فوالله لو اجتمعت علیه العرب قاطبة لقاتله الأنصار.... فنحن فی هذه الحرب کما کنا مع رسول الله صلی الله علیه وسلم نتقی السیوف بوجوهنا، والرماح بنحورنا}}، {{متن قرآن|حَتَّی جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ کَارِهُونَ}}&amp;lt;ref&amp;gt;«بی‌گمان آنان پیش‌تر هم فتنه‌جویی کردند و کارها را برای تو دگرگون ساختند تا آنکه حق فرا رسید و فرمان خداوند آشکار شد با آنکه آنان نمی‌پسندیدند» سوره توبه، آیه ۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt;؛ و اما در مورد معاویه، به [[خدا]] قسم؛ اگر تمام [[عرب]] کنار معاویه جمع شوند، انصار به [[تنهایی]] با همه آنها خواهند جنگید.... پس ما در این جنگ همچون زمانی که همراه [[رسول خدا]]{{صل}} بودیم، شمشیرهایمان را به صورت خود نگه می‌‌داریم و تیرهایمان را بر گلوهایمان حمل می‌‌کنیم {تا زمانی که [[حق]] [[پیروز]] شود و کار خدا ظهور یابد هر چند آنها ([[کفار]]) نپسندند.}»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن قتیبه دینوری، الامامه و السیاسه، ج۱، ص۱۳۰. نیز ر. ک. نصر بن مزاحم منقری، وقعة صفین، ص۴۴۹؛ ابن اعثم کوفی، الفتوح، ج۳، ص۱۶۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; علاوه بر نقل روایاتی که از حضور عمومی انصار در صفین حکایت دارد، اخباری هم از حضور برخی اشهلی‌ها همچون [[صفوان بن حذیفة]] یمان و به [[نقلی]] [[سعد بن حذیفة بن یمان]] در صفین و [[شهادت]] آنها حکایت دارد.&amp;lt;ref&amp;gt;مسعودی، مروج الذهب، ج۲، ص۳۸۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;اخباری هم، از [[هجوم]] و [[غارت]] محله بنی عبدالاشهل توسط قوای [[یزید بن معاویه]]&amp;lt;ref&amp;gt;ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۵، ص۱۹۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;و کشته شدن برخی از آنها در سال۶۳ [[هجری]] در رخداد [[حره]] در [[مدینه]] در دست است.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهرة النسب، ص۶۳۵؛ ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۳، ص۳۳۷ و ۳۲۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; از دیگر مواضعی که در [[تاریخ]] سده نخست [[اسلامی]] از اشهلی‌ها سخن به میان آمده است، [[قیام توابین]] و [[قیام مختار]] است. بر اساس برخی نقل‌ها، [[سلیمان بن صرد خزاعی]] در جریان قیام توابین، از [[سعد بن حذیفه]] که در [[مدائن]] بر [[شیعیان]] [[سروری]] داشت، [[نامه]] نوشت و از او [[یاری]] خواست.&amp;lt;ref&amp;gt;دربارۀ مکاتبات آن دو و خروج سعد به سوی عین‌الورده، نک‍: طبری، تاریخ الطبری، ج۵، ص۵۵۵ - ۵۵۷؛ نیز نک‍: ابن کلبی، جمهرة النسب، ص۴۴۷، نیز بلاذری، انساب الاشراف، ج۶، ص۳۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; اما سعد بن حذیفه به سببی که روشن نیست، از یاری [[توابین]] بازماند. او سپس به مختار ثقفی پیوست و عهده دار مأموریتی از جانب او گردید.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الطبری، ج۵، ص۶۰۵، ۶ و ۷ - ۸، ۳۴؛ قس: مسعودی، مروج الذهب، ج۳، ص۹۵.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>Jaafari</name></author>
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		<title>Jaafari در ‏۱۰ ژوئن ۲۰۲۳، ساعت ۰۸:۴۴</title>
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		<author><name>Jaafari</name></author>
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		<title>Jaafari: /* منابع */</title>
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		<updated>2023-06-10T06:39:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span dir=&quot;auto&quot;&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;منابع&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;a href=&quot;//fa.imamatpedia.com/w/index.php?title=%D8%A8%D9%86%DB%8C%E2%80%8C%D8%B9%D8%A8%D8%AF%D8%A7%D9%84%D8%A7%D8%B4%D9%87%D9%84_%D8%AF%D8%B1_%D8%AA%D8%A7%D8%B1%DB%8C%D8%AE_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;amp;diff=1237509&amp;amp;oldid=1237489&quot;&gt;نمایش تغییرات&lt;/a&gt;</summary>
		<author><name>Jaafari</name></author>
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		<title>Jaafari: صفحه‌ای تازه حاوی «{{مدخل مرتبط | موضوع مرتبط = بنی عبدالاشهل | عنوان مدخل  = بنی عبدالاشهل | مداخل مرتبط = بنی عبدالاشهل در تاریخ اسلامی | پرسش مرتبط  = }}  ==مقدمه== طایفه بنی‌عبدالاشهل از شاخه‌های قبیله اوس و از زیر مجموعه‌های قبیله بزرگ ازد است. این طایفه...» ایجاد کرد</title>
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		<updated>2023-06-10T06:28:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;صفحه‌ای تازه حاوی «{{مدخل مرتبط | موضوع مرتبط = بنی عبدالاشهل | عنوان مدخل  = بنی عبدالاشهل | مداخل مرتبط = &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%D8%A8%D9%86%DB%8C_%D8%B9%D8%A8%D8%AF%D8%A7%D9%84%D8%A7%D8%B4%D9%87%D9%84_%D8%AF%D8%B1_%D8%AA%D8%A7%D8%B1%DB%8C%D8%AE_%D8%A7%D8%B3%D9%84%D8%A7%D9%85%DB%8C&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;بنی عبدالاشهل در تاریخ اسلامی (صفحه وجود ندارد)&quot;&gt;بنی عبدالاشهل در تاریخ اسلامی&lt;/a&gt; | پرسش مرتبط  = }}  ==مقدمه== &lt;a href=&quot;/wiki/%D8%B7%D8%A7%DB%8C%D9%81%D9%87_%D8%A8%D9%86%DB%8C%E2%80%8C%D8%B9%D8%A8%D8%AF%D8%A7%D9%84%D8%A7%D8%B4%D9%87%D9%84&quot; class=&quot;mw-redirect&quot; title=&quot;طایفه بنی‌عبدالاشهل&quot;&gt;طایفه بنی‌عبدالاشهل&lt;/a&gt; از شاخه‌های &lt;a href=&quot;/wiki/%D9%82%D8%A8%DB%8C%D9%84%D9%87_%D8%A7%D9%88%D8%B3&quot; class=&quot;mw-redirect&quot; title=&quot;قبیله اوس&quot;&gt;قبیله اوس&lt;/a&gt; و از زیر مجموعه‌های &lt;a href=&quot;/wiki/%D9%82%D8%A8%DB%8C%D9%84%D9%87&quot; title=&quot;قبیله&quot;&gt;قبیله&lt;/a&gt; بزرگ &lt;a href=&quot;/wiki/%D8%A7%D8%B2%D8%AF&quot; title=&quot;ازد&quot;&gt;ازد&lt;/a&gt; است. این طایفه...» ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;صفحهٔ تازه&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{مدخل مرتبط&lt;br /&gt;
| موضوع مرتبط = بنی عبدالاشهل&lt;br /&gt;
| عنوان مدخل  = بنی عبدالاشهل&lt;br /&gt;
| مداخل مرتبط = [[بنی عبدالاشهل در تاریخ اسلامی]]&lt;br /&gt;
| پرسش مرتبط  =&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==مقدمه==&lt;br /&gt;
[[طایفه بنی‌عبدالاشهل]] از شاخه‌های [[قبیله اوس]] و از زیر مجموعه‌های [[قبیله]] بزرگ [[ازد]] است. این طایفه، از مهمترین و گرامی‌ترین [[طوایف]] [[انصار]] است که در روایتی منسوب به [[رسول گرامی اسلام]]{{صل}}، مورد [[تمجید]] و [[ستایش]] آن حضرت قرار گرفته، از ایشان در کنار طایفه [[بنی نجار]] به عنوان یکی از بهترین بطون انصار نام برده شده است.&amp;lt;ref&amp;gt;بیهقی، دلائل النبوه، ج۵، ص۲۳۹؛ بخاری، التاریخ الکبیر، ج۷، ص۲۹۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; این تیره کوچک، همپای قبیله [[مادری]] خود [[اوس]]، در جریانات و وقایع دوران [[جاهلی]] از جمله جنگ‌های آن [[دوران حضور]] داشت و بعد از تابش [[خورشید]] [[اسلام]]، بواسطه داشتن قلوبی مستعد و [[پاک]]، به سرعت اسلام پذیرفتند. آنان پس از [[هجرت رسول خدا]]{{صل}} به [[مدینه]]، از [[دل]] و [[جان]] به [[خدمت]] ایشان در آمدند و همراه با [[رییس]] بزرگ و [[عظیم الشأن]] خود [[سعد بن معاذ]]، همواره از حامیان حضرت و اهداف عالیه‌شان بودند و بدین ترتیب، نقشی بزرگ در [[حیات]] اسلام و [[مسلمین]] ایفا نمودند.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[نسب]] ==&lt;br /&gt;
بنی عبد الأشهل تیره‌ای از انصار و از شاخه‌های قبیله اوس است که نسب از عبد الأشهل بن جشم بن حارث بن خزرج بن عمرو بن مالک بن اوس می‌‌برند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهرة النسب، ص۶۳۳. و با اندک اختلاف: ابن حزم، جمهرة انساب العرب، ص۳۳۹.&amp;lt;/ref&amp;gt; عبد الأشهل بن جشم دارای فرزندانی با اسامی زید، کعب، زعوراء، [[وحشی]] و درج بود که [[نسل]] وی از ایشان ادامه یافت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، نسب معد و الیمن الکبیر، ج۱، ص۳۷۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; امروزه شاخه‌هایی از این طایفه [[انصاری]]، در برخی بلاد [[عربی]] در قالب عشایر [[زندگی]] می‌‌کنند. این عشایر در حال حاضر، به بطون‌هایی تقسیم می‌‌شوند که از جمله آن می‌‌توان از: [[بنی سلامة]]، [[بنی زغبه]]، [[آل شمسه]]، البو مفرج، السویدی، الصفار، الدباغ، الجبور، العبید، الدراج، آل ثابت، آل کعب و آل خلیفة یاد کرد. ضمن این که عشایر آل بدیر - که در ناحیة آل بدیر ساکنند، - نیز، از دیگر بطونی به شمار رفته‌اند که [[نسب]] شان به [[عبد]] الاشهل برمی گردد.&amp;lt;ref&amp;gt;سلالات الأوس فی العراق والوطن العربی، علی الربیعی، منتدی العشائر العربیة.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[مساکن]] و منازل==&lt;br /&gt;
[[مدینه]] میان دو رشته [[حره]] (سنگلاخ) قرار دارد. در طرف شرق، «حرَةُ واقم» قرار دارد که از شمال به [[کوه]] [[احد]] ختم می‌شود و تا جنوب این [[شهر]] ادامه دارد. در طرف غرب نیز، «[[حرة]] وبر» قرار دارد؛ که از شمال تا [[بئر رومه]] و از جنوب تا مقابل محلة قباست. این دو حره، [[شهر مدینه]] را از دو طرف [[حفظ]] کرده‌اند. بیشتر منازل مدینه در گذشته، از سنگ، آجر و خشت ساخته شده بود. هر قبیله‌ای افزون بر خانه‌های معمولی، [[دژ]] و چندین قلعة مستحکم داشت که «أطم» نامیده می‌شد.&lt;br /&gt;
منطقة بین [[قبا]] و مدینه، سبزترین مناطق بود و بهترین میوه‌ها و سبزی‌ها را داشت و [[مردم]] برای [[استراحت]]، گردش و [[تفریح]] به این منطقة آباد می‌آمدند.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام ج۴، ص۱۳۲؛ احمد ابراهیم الشریف، مکة و المدینة فی الجاهلیة و عهد الرسول، ص۲۸۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; «حرة واقم» در شرق مدینه، دارای بیشترین [[عمران]] و [[آبادی]] بود. در این منطقه، منازل مسکونی [[قبایل]] متعددی از جمله قبایل [[یهود]] مانند «[[بنی نضیر]]» و «[[بنی قریظه]]» و تعدادی از عشایر یهود قرار داشت. همچنین مهم‌ترین بطون [[اوس]] در این منطقه سکونت داشتند مانند بنی عبدالاشهل، بنی‌ظفر، [[بنی حارثه]] و بنی زعوراء که منازل آنان بیشتر در جانب غرب تا «[[حره واقم]]»&amp;lt;ref&amp;gt;احمد ابراهیم الشریف، مکة و المدینة فی الجاهلیة و عهد الرسول، ص۲۸۸؛ عبدالعزیز بن ادریس، مجتمع المدینة فی عهد الرسول، ص۱۵۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; قرار داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[سمهودی]] گوید: در جنوب شرقی مدینه محله بنی عبدالاشهل قرار داشت و آنان آطمی ساختند که واقم خوانده می‌شد. این آطم به [[حفضیر بن سماک]] تعلق داشت. به همین سبب به آن ناحیه «واقم» می‌گفتند. برای بنی عبدالاشهل آطم‌های دیگری از جمله آطم «[[رعل]]» را ذکر کرده‌اند.&amp;lt;ref&amp;gt;سمهودی، وفاء الوفا باخبار دارالمصطفی، ج۱، ص۱۹۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; «قرصه» مکانی بود در طرف شمال شرق حره که منازل بنی عبدالاشهل در آن واقع شده بود. این مکان به سعدبن [[معاذ]] تعلق داشت.&amp;lt;ref&amp;gt;سمهودی، وفاء الوفا باخبار دارالمصطفی، ج۳، ص۱۲۸۸ و ۰۱۳۹۰&amp;lt;/ref&amp;gt; به مرور [[زمان]] و در پی درگیری [[بنی حارثه]] با [[بنی‌عبدالاشهل]]، بنی حارثه مجبور به ترک منازل خود شدند و آن را به [[بنی عبدالأشهل]] واگذاردند. این [[مساکن]] در زمان [[سمهودی]] به «دار بنی عبدالأشهل» مشهور بود.&amp;lt;ref&amp;gt;سمهودی، وفاء الوفا باخبار دارالمصطفی، ج۱، ص۱۹۲&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; منازل بنی عبدالأشهل، بنی حارثه و بنی [[ظفر]] در شرق و جنوب شرق [[مدینه]]، به‌ویژه در مناطق «[[عوالی]]» و «[[قباء]] و «[[عصبه]]»، از سرسبزی و طراوت خاصی برخوردار بود و آب فراوانی از چاه‌های آن استخراج می‌شد&amp;lt;ref&amp;gt;عبدالعزیز بن ادریس، مجتمع المدینه فی عهد الرسول، ص۱۵۳&amp;lt;/ref&amp;gt; شاید علت درگیری بین [[اوس و خزرج]]، در آغاز، ناشی از [[حسادت]] [[خزرجیان]] به [[اوسیان]] و [[هم‌پیمانان]] [[یهودی]] آنان ([[بنی قریظه]]) به خاطر در [[اختیار]] داشتن همین زمین‌های حاصل‌خیز باشد. هر چند، عوامل دیگر هم در درگیری بین اوس و خزرج دخالت داشته است.&lt;br /&gt;
[[پس از ظهور اسلام]] و آغاز [[فتوحات اسلامی]]، برخی از [[مردم]] [[بنی عبدالاشهل]]، رفته رفته در سایر بلاد و [[مناطق اسلامی]] از جمله [[عراق]] و [[مصر]] منتشر شدند. بر پایه برخی [[اخبار]]، [[جمعیت]] قابل توجهی از [[انصار]] پس از تشکیل شهرهای نوین [[اسلامی]]، در این [[شهرها]] بخصوص [[کوفه]] ساکن شدند. چندان که در تقسیم‌بندی شهری کوفه، انصار در کنار [[ازد]] و [[بجیله]] و [[خثعم]] یکی از اسباع کوفه را در زمان [[حکمرانی]] [[امام علی]]{{ع}} تشکیل می‌‌دادند.&amp;lt;ref&amp;gt;لویی ماسینیون، خطط الکوفه و شرح خریطها، ص۲۱ - ‌۲۲. از جمله ساکنان اشهلی این شهر، می‌‌توان به نام حذیفة بن یمان (ابونعیم، معرفة الصحابه، ج۲، ص۲۶.) و ابوجبیر بن ضحاک (ابن کلبی، جمهره النسب، ص۶۳۵) اشاره کرد.&amp;lt;/ref&amp;gt; همچنین جمعی از انصار، در ایام [[خلافت عمر بن خطاب]]، همراه با [[عمرو بن عاص]] در [[فتوحات]] مصر شرکت داشتند. اما چون تعداد آنها برای داشتن [[رایت]]، [[دیوان]] یا محله‌ای خاص کافی نبود، با برخی تیره‌های [[عرب]] تحت یک [[رایت]] گرد آمده، به اهل‌الرایه معروف شدند و در محله رایة واقع در [[فسطاط]] [[مصر]] در کنار مردمانی از [[قبایل]] [[قریش]]، [[خزاعه]]، [[اسلم]]، [[غفار]]، [[جهینه]]، [[ثقیف]]، [[عبس بن بغیض]]، أشجع و... [[سکونت]] گزیدند.&amp;lt;ref&amp;gt;یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص۲۲. نیز ر. ک. ابن عبدالحکم، الفتوح، ص۹۸، ۱۱۵ - ۱۱۶؛ نیز ر. ک. مقریزی، الخطط، ج۲، ص۶۰ - ۶۱؛ الحدیثی، أهل الیمن، ص۱۶۷؛ الجبوری، الجوار، ص۱۲۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; امروزه در بلاد نجد، [[حجاز]]، مصر، [[یمن]] و [[شام]] عشایری وجود دارند که به نامهایی مانند اشهلی، سویدی و... خوانده می‌‌شوند و [[نسب]] همگی آنان به این [[طایفه]] بر می‌‌گردد.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==روزگار پیش از اسلام==&lt;br /&gt;
===[[تاریخ]] [[جاهلی]] ===&lt;br /&gt;
تاریخ جاهلی بنی عبدالاشهل نیز بمانند دیگر [[قبایل]] و [[طوایف]] [[عرب جاهلی]] خالی از زد و خورد نظامی و حرکات مسلحانه نبود. منشاء درگیرهای قبایل با یکدیگر در جاهیت، عمدتاً ریشه در [[تصرف]] [[زمین]] یا مرتع و یا به جهت کشته شدن فردی از [[قبیله]] داشت. این گونه [[درگیری‌ها]] در [[دوران جاهلیت]]، گاه ریشه‌دار و مستمر بود که از جمله این نوع درگیری‌ها، می‌‌توان از [[نزاع]] میان دو قبیله [[اوس و خزرج]] در [[مدینه]] - قبل از [[اسلام]] - نام برد. این [[جنگ]] فرسایشی و بنیان بر افکن درون قبیله‌ای که صد و بیست سال به درازا کشید، مشتمل بر درگیری‌های [[خرد]] و کلانی می‌‌شد که از جمله آنها می‌توان از «[[حاطب]]»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۱؛ جاد المولی بک، ایام العرب فی الجاهلیه، ص۷۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; «[[یوم]] [[البقیع]]»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۲۳. رئیس اوسیان در این جنگ ابوقیس بن الاسلت بود. وی اوسیان را جمع کرد و گفت: در زمان ریاست من بر شما غالباً ما شکست خوردیم. الان چه کسی را دوست دارید رئیس کنید؟ آنان حضیر بن سماک را برگزیدند. او امور جنگ را به عهده گرفت و در «غرس» بار دیگر اوس و خزرج درگیر شدند و اوسیان بر خزرج پیروز شدند.&amp;lt;/ref&amp;gt;» یوم السراره»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۲۸؛ جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام ج۴، ص۱۳۹. نبرد میان بنی عمرو بن عوف از اوس و بنی الحرث از خزرج بود که مردی از بنی الحرث به دست فردی از قبیله بنی عمرو بن عوف کشته شد و آنان هم قاتل را ترور کردند. وقتی قبیله او از نحوه قتل او آگاه شد، برای جنگ آماده گردید و در «سراره» به هم برخوردند. رئیس اوس، حضیر بن سماک و رئیس خزرج در این جنگ عبدالله بن سلول، رئیس منافقان در عهد رسول خدا{{صل}} بود. جنگ چهار روز به شدت ادامه داشت تا این که اوسیان به خانه‌های خود برگشتند و خزرجیان به این پیروزی مباهات کردند.ر.ک: ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; «[[حرب]] فارع»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۲۸ و ۰۵۲۹ سبب وقوع جنگ کشته شدن جوانی از قضاعه بود که در جوار معاذ بن نعمان، پدر سعد بن معاذ زندگی می‌کرد او به دست مردی از بنی نجار کشته شد. معاذ شخصی را نزد آنان فرستاد تا دیه مقتول را بپردازند یا قاتل را تحوبل دهند. آنان نپذیرفتند. مردی از بنی عبدالاشهل گفت: اگر این کار را انجام ندهند با عامر بن الاطنا - که از بزرگان خزرج بود - می‌جنگیم. معاذ وقنی امتناع بنی النجار را دید با آنان در «فارع» که اطم حسان بن ثابت بود جنگید. جنگ میان دو طرف ادامه داشت تا این که آنان دیه مقتول را فرستادند و میان آنان صلح برقرار شد.&amp;lt;/ref&amp;gt; «[[یوم]] معبس و مضرس»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۵ و ۵۳۶. خزرج در کنار «مضرس»، و اوس در جانب «معبس» همسایه بودند و مدت‌ها میان آنان جنگ شدیدی بود که به اوسیان شکست فاحشی وارد شد و به خانه‌ها و قلعه‌های خود بازگشتند. بعضی از بنی عمرو بن عوف پیشنهاد صلح به خزرج دادند؛ اما عده‌ای دیگر مانند بنی عبدالاشهل و بنی‌ظفر گفتند ما تا انتقام نگیریم صلح نمی‌کنیم. از طرفی خزرج بر غارت و آزار و اذیت کردن اصرار داشت. بنو سلمه اموال بنی عبدالاشهل را در موضع «رعل» غارت کردند و در تتیجه درگیری رخ داد که سعد بن معاذ الاشهلی جراحت شدیدی برداشت و او را نزد عمرو بن جموح خزرجی بردند. وی سعد را جوار داد و اموال آنان را از آتش زدن و قطع درختان برحذر داشت.&amp;lt;/ref&amp;gt; یا «یوم [[رعل]]»&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; و «[[یوم بعاث]]» نام برد. «یوم بعاث» آخرین [[جنگ]] از این سلسله [[جنگ‌ها]] میان [[اوس و خزرج]] بود. [[رئیس]] [[خزرج]] در این [[نبرد]]، [[عمرو بن نعمان بن صلاة]] و [[رئیس]] [[اوس]]، حضیر بن [[سماک]] معروف به حضیر الکتائب بود. در این [[نبرد]]، [[قبیله اشجع]] از قبیله [[غطفان]] و تیره [[جهینه]] از [[قضاعه]] به کمک [[خزرج]] شتافتند و تیرة [[مزینه]] از قبیل [[طلحة بن ایاس]]، و [[بنی قریظه]] و [[بنی نضیر]] به [[یاری]] [[اوسیان]] آمدند. این [[جنگ]] سرانجامی جز، کشته شدن رئیس [[خزرجیان]] و [[شکست]] آنان نداشت.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام، ج۴، ص۱۴۰.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt; همچنین در [[جنگی]] که در [[زمان جاهلیت]]، میان [[بنی‌عبدالاشهل]] و [[بنی حارثه]] به وقوع پیوست، [[بنی ظفر]] به [[حمایت]] از بنی عبدالاشهل برخاستند. [[سماک بن رافع]] از قبیله بنی عبدالاشهل به دست [[مسعود ابومحیصه حارثی]] کشته شد و بنی حارثه در این نبرد [[پیروز]] میدان شدند. بنی عبدالاشهل به ناچار به [[سرزمین بنی‌سلیم]] رفتند و در [[پناه]] آنان قرار گرفتند. تا اینکه سرانجام موفق شدند در جنگی، به [[فرماندهی]] حضیر بن سماک بر بنی حارثه فائق آمده، بسیاری از آنان را کشته و ما بقی آنان را در محاصره قرار دهند. [[بنی عمرو بن عوف]] و [[بنی خطمه]] به سوی آنان رفتند و و از آنها خواستند یا آنجا را رها کنند، یا دیه سماک را بپردازند و یا [[مصالحه]] کنند. آنان پذیرفتند و منازل خود را خالی کردند و به سوی [[خیبر]] رفتند. پس از یک سال، حضیر بن سماک به آنان مهر ورزید و درخواست [[صلح]] کرد. میان آنان سفیرانی رد و بدل شد تا این که صلح میان دوطرف برقرار شد؛ ولی بنی حارثه برای [[پرهیز]] از اینکه منازل‌شان با بنی عبدالاشهل در کنار هم باشد از آمدن به آنجا خودداری کردند.&amp;lt;ref&amp;gt;سمهودی، وفاء الوفا باخبار دارالمصطفی، ج۱، ص۱۹۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر اساس گزارشی دیگر از [[یوم بعاث]]، اوسیان از بنی قریظه و بنی نضیر برضد خزرجیان کمک گرفتند اما [[یهودیان]] جانب خزرجیان را گرفته، کسانی را نزد خزرجیان روانه کردند و گفتند: [[اوسیان]] از ما کمک خواسته‌اند و ما نمی‌خواهیم آنان را بر ضد شما [[یاری]] نماییم. [[خزرجیان]] حدود چهل [[نوجوان]] به عنوان وثیقه از [[یهودیان]] گرفته بودند و در خانه‌های خود تقسیم کرده بودند. [[عمرو بن بیاضه]] پس از دریافت [[پیام]] یهودیان، به [[قوم]] خود گفت: [[پدران]] ما در زمینی شوره‌زار و خشک [[زندگی]] می‌کردند در حالی که [[بنی قریظه]] و [[بنی نضیر]] در محلی سرسبز و دارای آب و باغ سکونت دارند. از این رو، کس نزد یهودیان فرستاد تا آن [[سرزمین]] را خالی نمایند در غیر این صورت [[فرزندان]] وثیقه را خواهند کشت. سران [[یهود]]، پیشنهاد آنان را نپذیرفتند و خزرجی‌ها وثیقه‌ها را کشتند. به همین سبب، یهودیان در [[جنگ]] بین [[اوس و خزرج]]، به [[حمایت]] از اوسیان برخاستند. خزرجیان، نخست، موفقیت‌هایی به دست آوردند و حتی حضیرالکتائب - [[رئیس]] اوسیان - فرار کرد. خزرجیان فریاد برآوردند: «ای حضیر؛ کجا فرار می‌کنی؟» وی بازگشت و گفت: می‌جنگم تا کشته شوم و فریاد برآورد: «ای اوسیان! اگر می‌خواهید مرا [[تسلیم]] کنید». سخنان حضیر، [[غیرت]] اوسیان را به [[جوش]] آورد به گونه‌ای که دو تن از [[جوانان]] بنی عبدالاشهل که تازه [[ازدواج]] کرده بودند به نام‌های محمود و یزید (از فرزندان [[خلیفه]]) به میدان [[نبرد]] برگشتند و جنگیدند و کشته شدند. در این حین، تیری به [[عمرو بن نعمان]] - رئیس خزرجیان - اصابت کرد و او کشته شد. در پی این واقعه، خزرجیان متواری شدند و اوسیان در تعقیب آنان، بسیاری را کشتند و [[خانه‌ها]] و باغ‌های‌شان را به [[آتش]] کشیدند. در این هنگام، [[سعد بن معاذ]] أشهلی به [[تلافی]] [[پناه دادن]] [[بنی سلمه]] به او در نبرد «[[رعل]]»، به آنان و [[اموال]] شان [[پناه]] داد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۸؛ جاد المولی بک، ایام العرب فی الجاهلیه، ص۷۳ - ۰۷۸&amp;lt;/ref&amp;gt; [[یوم بعاث]]، مقارن با [[بعثت]] [[نبی خاتم]]{{صل}} در [[مکه]] است.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۲ ص۴۵۳؛ المزی، تهذیب الکمال فی اسماء الرجال، ج۲، ص۲۶۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===[[ادیان]] [[جاهلی]]===&lt;br /&gt;
[[تاریخ‌نویسان]] اشاره‌ای به وجود [[حرم]] یا خانه‌ای در یثرب که [[اهل یثرب]] در آنجا به [[عبادت]] مشغول باشند و نذرهای‌شان را برای [[تقرب]]، به مکان خاصی ببرند، نکرده‌اند، با این حال، [[سیره‌نویسان]] در بسیاری از موارد به مکان خاص [[بت‌ها]] اشاره کرده‌اند. به [[باور]] &amp;quot;[[جواد]] علی&amp;quot;، یثرب هم مانند شهرهای دیگر دارای معابدی بوده است و می‌توان گفت که اهل یثرب مانند [[مشرکان]] نه تنها به بت‌ها تقرب می‌جستند. بلکه از بت‌ها در خانه‌های‌شان [[مراقبت]] و نگهداری می‌کردند.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام، ج۴، ص۱۳۰.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[سیره نویسان]] در توصیف چگونگی [[اسلام آوردن]] [[عمرو بن جموح]] که بتی داشت و از آن [[محافظت]] می‌کرد و شکستن آن توسط برخی از [[جوانان]] [[مدنی]]، در نهایت منجر به اسلام آوردن او گردید، مطالبی را نقل کرده‌اند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن هشام، السیرة النبویه، ج۲، ص۹۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; بنابراین، [[اوس و خزرج]] و کسانی که در [[مدینه]] یا [[مکه]] فرود می‌آمدند، مکان‌هایی را گرامی داشته و برای آن [[قربانی]] و [[نذر]] می‌کردند. از ظاهر کلمه [[اوس]] بر می‌آید که این واژه برگرفته از کلمه «اوس [[منات]]» است&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; و منات بتی از بت‌های جاهلی&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، الاصنام، ص۱۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; در ناحیه مشلل نزدیک «[[قدید]]» بین مدینه و مکه بوده است. [[انصار]] جهت انجام [[مناسک حج]]، ابتدا نزد [[بت]] منات می‌رفتند و پس از گفتن تلبیه، [[محرم]] می‌شدند. سپس به طرف مکه به راه می‌افتادند تا [[اعمال]] [[حج]] را به جا آورند. مناسک حج و وقوف عرب‌های اهل یثرب و دیگران، بمانند سایر [[مردم]] بود. آنان به هنگام کوچ کردن، در نزد منات سر خود را می‌تراشیدند و نزد آن می‌ماندند و اگر این کار را انجام نمی‌دادند حج‌شان را کامل و تمام تلقی نمی‌کردند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، الاصنام، ص۱۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; بت منات جایگاه خاصی نزد ساکنان مدینه داشت و آنان هدایای خود را نثارش می‌‌کردند و برای آن قربانی می‌کردند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از [[عایشه]] نقل است که [[انصار]] در [[موسم حج]]، نزد دو [[بت]] «[[اساف]]» و «[[نائله]]» در [[ساحل]] دریا [[محرم]] می‌شدند، سپس سعی و [[صفا]] انجام می‌دادند و بعد سر خود را می‌‌تراشیدند.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام، ج۶، ص۳۸۲.&amp;lt;/ref&amp;gt; نقل است که انصار زمانی که همراه [[پیامبر]]{{صل}} برای انجام [[مناسک حج]] به [[مکه]] آمدند، نخست، از انجام سعی بین [[صفا و مروه]] [[اکراه]] داشتند و آن را از مشاعر [[قریش]] در [[زمان جاهلیت]] می‌دانستند از این رو قصد در ترک آن را داشتند. تا این که [[آیه]] ۱۵۸ [[سوره بقره]] نازل شد.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، جامع البیان، ج۲، ص۷۰؛ بغوی، تفسیر بغوی، ج۱، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[نزول]] [[آیة]] «ان الصفا و [[المروه]] من [[شعائر الله]]» دلیلی بود بر آنکه این دو مکان [[ارزش]] والایی دارند.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام، ج۶، ص۳۸۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[اوس و خزرج]] همواره با یکدیگر درگیر بودند. با این حال، هرگاه شخصی از دشمنان‌شان، [[عزم]] [[حج]] یا [[عمره]] [[سفر]] می‌‌کرد، مزاحمش نمی‌شدند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج۱، ص۵۳۵.&amp;lt;/ref&amp;gt; بر پایة آنچه گفته شد، اوس و خزرج هیچ‌کدام به [[دین]] حنفیه شناخته نشده‌اند.&amp;lt;ref&amp;gt;جواد علی، المفصل فی تاریخ العرب قبل الاسلام، ج۷، ص۷۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; امکان دارد در بین تیره‌هایی از این [[قبایل]] افرادی متمایل به [[اهل کتاب]] بوده باشند، ولی [[سیره نویسان]] و [[تاریخ نگاران]] کم‌تر به آن پرداخته‌اند. بنابر این [[قبیله]] [[بنی عبدالاشهل]] در [[جاهلیت]]، تایع [[پدران]] خود و ظاهراً [[مشرک]] بودند و با [[ظهور اسلام]] در یثرب همگی [[اسلام]] آوردند.&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۳.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==روزگار در صدر اسلام==&lt;br /&gt;
===حیات اقتصادی===&lt;br /&gt;
[[بنی عبدالاشهل]] مانند [[طوایف]] دیگر در [[مدینه]] به [[کشاورزی]] و پرورش [[نخل]] [[اشتغال]] داشتند. [[واقدی]] گوید که [[اسید بن حضیر]] در ناحیةٌ «عرض»&amp;lt;ref&amp;gt;وادی، در ناحیة مدینه، در طرف حره واقم قرار گرفته است. ر.ک: محمد محمدحسن شراب، المعالم الاثیره فی السنة و السیره، ص۱۹۱&amp;lt;/ref&amp;gt;[[زمین]] کشاورزی داشت و در آن جو می‌کاشت و برای آبیاری آن از بیست شتر آبکش استفاده می‌کرد. [[سلمة بن سلامه اشهلی]] نیز، در همین ناحیه زمین زراعتی داشت و به کشت [[غلات]] مشغول بود.&amp;lt;ref&amp;gt;واقدی، المغازی، ج۱، ص۲۰۷و ۰۲۰۸&amp;lt;/ref&amp;gt; وجود زمین زراعتی و شتران آبکش بسیار، می‌تواند حاکی از وجود آب فراوان در این ناحیه باشد؛ آبی که پس از استخراج با دلو یا حیوانات آبکش از [[چاه]]، از آن جهت [[زراعت]] استفاده می‌کردند. از دیگر شواهد متکی بودن [[اقتصاد]] مدینه به کشاورزی، واقعه [[جنگ احد]] است. در این [[جنگ]] که بین ماندن در مدینه یا خارج شدن از آن میان [[اصحاب]] [[اختلاف]] شد، [[ایاس بن اوس]]، از [[جوانان]] بنی عبدالاشهل به [[پیامبر]]{{صل}} گفت: «... ما [[دوست]] نداریم [[قریش]] بگوید: محمد را در قلعه‌ها محاصره کردیم و این موجب [[گستاخی]] آنان می‌شود. آنان زمین‌های زراعتی ما را زیر پا گذاشته‌اند؛ اگر آنها را بیرون نرانیم نمی‌توانیم زراعت کنیم».&amp;lt;ref&amp;gt;نقش بنی عبدالأشهل در تحولات مدینه در دوران رسول‌اکرم{{صل}}، حسین مرادی نسب، ص۱۱۱.&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;ref&amp;gt;[[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]].&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== منابع ==&lt;br /&gt;
{{منابع}}&lt;br /&gt;
# [[پرونده:13681302.jpg|22px]] [[سید علی اکبر حسینی ایمنی|حسینی ایمنی، سید علی اکبر]]، مکاتبه اختصاصی با [[دانشنامه مجازی امامت و ولایت]]&lt;br /&gt;
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== پانویس ==&lt;br /&gt;
{{پانویس}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Jaafari</name></author>
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