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	<title>هوازن در تاریخ اسلامی - تاریخچهٔ نسخه‌ها</title>
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		<title>Wasity: جایگزینی متن - &#039;فروعات&#039; به &#039;فروع&#039;</title>
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		<updated>2025-10-23T20:31:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;جایگزینی متن - &amp;#039;فروعات&amp;#039; به &amp;#039;فروع&amp;#039;&lt;/p&gt;
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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;نسخهٔ ‏۲۴ اکتبر ۲۰۲۵، ساعت ۰۰:۰۱&lt;/td&gt;
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[[بنی عامر]] در مواجهه با این جریان، به دو دسته شدند. یکی [[بنی کلاب]] به رهبری [[علقمه بن علاثه]] و دیگر بنو کعب به [[ریاست]] [[قره بن هبیره]]، هر دو گروه در [[وفاداری]] به [[دولت]] [[مدینه]] یا پیوست به طلیحه بن خالد اسدی مردد بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦١.&amp;lt;/ref&amp;gt; علقمه در [[دوران پیامبر]]{{صل}} طی وفدی به مدینه [[مسلمان]] شده بود اما دیری نگذشت که [[مرتد]] شد و در طی [[شکست]] هوازنیان در معرکه حنین و محاصره [[طائف]]، به [[شام]] گریخت و پس از دریافت خبر [[رحلت نبی اکرم]]{{صل}} به موطن خود بازگشت. با روی آوردن [[بنی کلاب]] بدو، [[ابوبکر قعقاع بن عمرو]] و به [[نقلی]] [[قعقاع بن شور]] را به [[جنگ]] آنها فرستاد. [[علقمه]] با دریافت این خبر گریخت و قعقاع [[خانواده]] و [[فرزندان]] او را [[اسیر]] کرد و به [[مدینه]] فرستاد. در مدینه آنها رو گردانی خود از [[حکومت مدینه]] را رد کردند و چون ابوبکر مدرکی در [[ارتداد]] آنها نیافت، آزادشان کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٤٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[بنی کعب]] نیز در تردید بودند تا این که [[ربیعه بن خویلد]] عقیلی که از شجاعانشان بود با یادآوری واقعه [[بئر معونه]]، آنان را به [[صبر]] فرا خواند. [[قره بن هبیره]] – [[رییس]] آنها - پس از شنیدن این سخن و نیز شنیدن [[پیروزی]] [[خالد بن ولید]] در بزاخه، نزد او رفت و اظهار [[اطاعت]] و [[فرمانبرداری]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦٢ – ٢٦٣؛ ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٥٢.&amp;lt;/ref&amp;gt; همچنین در باب مشارکت‌های [[بنی عامر]] به [[دولت]] مدینه در جنگ‌های ارتداد، گزارشی در دست است که بر اساس آن آمده: زمانی که [[مردم]] [[صنعا]] به [[رهبری]] قیس المکشوح علیه [[حاکم]] خود [[فیروز دیلمی]] سر به [[شورش]] نهادند، [[فیروز]] از آنجا گریخت اما فرزندانش به [[اسارت]] در آمدند. وی از ابوبکر [[درخواست کمک]] کرد و همزمان از باقی مانده مردم [[عک]] که به دولت مدینه [[وفادار]] مانده بودند و نیز از [[بنی عقیل بن عامر]] یاری‌طلبید و به کمک آنان نیروهای [[متخاصم]] را در هم شکست.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٣٢٣ – ٣٢٦.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۱۹۴ - ۱۹۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;مواضع [[قبیله هوازن]] و شاخه‌های متعدد آن در مورد [[ارتداد]] و جنگ‌هایشان، برحسب شرایط و [[هوس]] رهبرانشان، متفاوت بود. برخی از [[مورخان]] از حضور بعضی از &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;فروع &lt;/ins&gt;قبیله هوازن - که به آنها نام &quot;هوازن&quot; اطلاق کردند - و [[همراهی]] با [[سلیم]] و [[غطفان]] در مساعدت [[طلیحه]] بن خالد [[اسدی]] – یکی از [[پیامبران دروغین]] - خبر داده‌اند. آنها با [[خالد بن ولید]] در بزاخه رودررو شدند و پس از [[شکست]]، به [[اجتماع]] دیگری به [[رهبری]] أمّ زمل سلمی بنت مالک بن حذیفه بن بدر پیوستند. پس از شکست ام زمل، عده ای از مردان غطفان و سلیم و هوازن جهت [[تسلیم شدن]] نزد خالد بن ولید آمدند. اما چون مردانی از [[قوم]] آنان به جمعی از [[مسلمانان]] [[حمله]] کرده بودند و آنان را کشته و بعد سوزانده بودند، خالد از قبول این امر [[امتناع]] کرد و پذیرش [[تسلیم]] آنان را به تحویل آن مردان موکول کرد. آنان نیز این افراد را به خالد تسلیم کردند و وی آنها را کشت و سوزاند و [[مثله]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦٤.&amp;lt;/ref&amp;gt; و به قول ابن الاثیر از بالای کوهها انداخت و در چاهها انداخت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٥٠.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۱۹۲ - ۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; از دیگر [[طوایف]] هوازن که ذکری از آنها در واقعه موسوم به ارتداد قبایل به میان آمده، [[قبیله بنی عامر]] است. [[بنی عامر]] در مواجهه با این جریان، به دو دسته شدند. یکی [[بنی کلاب]] به رهبری [[علقمه بن علاثه]] و دیگر بنو کعب به [[ریاست]] [[قره بن هبیره]]، هر دو گروه در [[وفاداری]] به [[دولت]] [[مدینه]] یا پیوست به طلیحه بن خالد اسدی مردد بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦١.&amp;lt;/ref&amp;gt; علقمه در [[دوران پیامبر]]{{صل}} طی وفدی به مدینه [[مسلمان]] شده بود اما دیری نگذشت که [[مرتد]] شد و در طی [[شکست]] هوازنیان در معرکه حنین و محاصره [[طائف]]، به [[شام]] گریخت و پس از دریافت خبر [[رحلت نبی اکرم]]{{صل}} به موطن خود بازگشت. با روی آوردن [[بنی کلاب]] بدو، [[ابوبکر قعقاع بن عمرو]] و به [[نقلی]] [[قعقاع بن شور]] را به [[جنگ]] آنها فرستاد. [[علقمه]] با دریافت این خبر گریخت و قعقاع [[خانواده]] و [[فرزندان]] او را [[اسیر]] کرد و به [[مدینه]] فرستاد. در مدینه آنها رو گردانی خود از [[حکومت مدینه]] را رد کردند و چون ابوبکر مدرکی در [[ارتداد]] آنها نیافت، آزادشان کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٤٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[بنی کعب]] نیز در تردید بودند تا این که [[ربیعه بن خویلد]] عقیلی که از شجاعانشان بود با یادآوری واقعه [[بئر معونه]]، آنان را به [[صبر]] فرا خواند. [[قره بن هبیره]] – [[رییس]] آنها - پس از شنیدن این سخن و نیز شنیدن [[پیروزی]] [[خالد بن ولید]] در بزاخه، نزد او رفت و اظهار [[اطاعت]] و [[فرمانبرداری]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦٢ – ٢٦٣؛ ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٥٢.&amp;lt;/ref&amp;gt; همچنین در باب مشارکت‌های [[بنی عامر]] به [[دولت]] مدینه در جنگ‌های ارتداد، گزارشی در دست است که بر اساس آن آمده: زمانی که [[مردم]] [[صنعا]] به [[رهبری]] قیس المکشوح علیه [[حاکم]] خود [[فیروز دیلمی]] سر به [[شورش]] نهادند، [[فیروز]] از آنجا گریخت اما فرزندانش به [[اسارت]] در آمدند. وی از ابوبکر [[درخواست کمک]] کرد و همزمان از باقی مانده مردم [[عک]] که به دولت مدینه [[وفادار]] مانده بودند و نیز از [[بنی عقیل بن عامر]] یاری‌طلبید و به کمک آنان نیروهای [[متخاصم]] را در هم شکست.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٣٢٣ – ٣٢٦.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۱۹۴ - ۱۹۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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(بکری، معجم ما استعجم، ج۱، ص۱۲۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; تیاسه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است از بهای بنی قشیر. أبو زیاد کلابی وجه تسمیه آن را بخاطر نزدیکی به کوهی به نام &amp;quot;تیاس&amp;quot; عنوان کرده است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٦٥).&amp;lt;/ref&amp;gt;[[حزن]] [[بنی جعده]]،&amp;lt;ref&amp;gt;از أبو سعید الضریر نقل شده که بلاد عرب دارای سه موضع به نام حزن است: حزن غاضره، حزن بنی یربوع و حزن بنی جعده. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٢٥٤).&amp;lt;/ref&amp;gt; الخلیقه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در بالای &amp;quot;الجاده&amp;quot; در بین یمامه و مکه. این آب از متعلقات بنی العجلان (عبد الله بن کعب بن ربیعه) است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۳۸۷)&amp;lt;/ref&amp;gt; برک و نعام،&amp;lt;ref&amp;gt;أصمعی از &amp;quot;برک&amp;quot; و &amp;quot;نعام&amp;quot; به عنوان آبی از آبهای بنی عقیل یاد کرده است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۹۳) این اماکن هنوز هم به این نامها معروفند.&amp;lt;/ref&amp;gt; أشمس،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است در بلاد بنی عقیل. (بکری، معجم ما استعجم، ج۱، ص١٤٧)&amp;lt;/ref&amp;gt; حریز،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در تثلیث متعلق به بنی عقیل. (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص۷۷)&amp;lt;/ref&amp;gt; الشطبتان،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;الشطبتان&amp;quot; و &amp;quot;حرم&amp;quot; دره‌های بنی الحریش بن کعب‌اند در سرزمین یمامه (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٣٤٣).&amp;lt;/ref&amp;gt; الصداره،&amp;lt;ref&amp;gt;روستایی است در یمامه از متعلقات بنی جعده (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص۳۹۷). این موضع، هنوز هم به این نام معروف است لکن روستایی در آن بدین نام وجود ندارد.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عقیق]] تمره،&amp;lt;ref&amp;gt;موضعی است از آن بنی عقیل دارای روستاها و نخلستانهای بسیار؛ و آن منبری است از منبرهای یمامه. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص١٣٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; الغیل،&amp;lt;ref&amp;gt;وادی &amp;quot;الجعده&amp;quot; است بین دو کوه که پوشیده از نخیلات است و در قسمت بالادستش افرادی از بنی قشیر ساکنند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٢٢٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; ذقان،&amp;lt;ref&amp;gt;دو کوهند در بلاد بنی کعب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٦) که هنوز هم به این نامها معروفند. اما امروزه صحرایی بین این دو فاصله انداخته است و جهت تمییز این دو یکی را &amp;quot;ذقان العطشان&amp;quot; و دیگری را &amp;quot;ذقان الریان&amp;quot; می‌نامند.&amp;lt;/ref&amp;gt; المصحبیه،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای بنی قشیر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص١٣٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; خزبه،&amp;lt;ref&amp;gt;خزبه معدن بنی عباده بن عقیل بین عمایتین است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٣٦٧)&amp;lt;/ref&amp;gt; [[نقر]]،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;نقر&amp;quot; بمانند یک تپه شنی خطرناک است که بین آن و بین الحجر سه روز راه فاصله است. این موضع از سرزمین‌های بنی قشیر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۹۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; الینکیر،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است استوار که راهی در آن نیست. این مکان از سرزمین‌های بنی قشیر محسوب شده است. (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦٥). هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الرکاء،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی عقیل است. (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص٢٦٠) این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; حلبان،&amp;lt;ref&amp;gt;حلبان از آبهای بنی قشیر است و به جهت قلت آبش، در عرب ضرب المثل شده است. چندان که درباره‌اش گفته شده: «تروا فإنک وارد حلبان». (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۲۸۱ -۲۸۲) &amp;quot;حلبان&amp;quot; در حال حاضر در کنار شاهراه ریاض – مکه واقع بوده و هم اکنون نیز با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الخنوقه،&amp;lt;ref&amp;gt;دره ای است متعلق به بنی عقیل. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٣٩٤) هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و ماسل&amp;lt;ref&amp;gt;نخلستان و آبی است از آن بنی عقیل (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٤٢). این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; یاد کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;اما از مشهورترین آبهای [[بنی کعب]] و مواضع و مآثرشان می‌توان از الأکمه،&amp;lt;ref&amp;gt;روستایی است در یمامه. دارای منبر و بازار، از آن قوم بنی جعده. مردمانی از قشیر هم در قسمت بالادست آن زندگی می‌کنند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج١، ص٢٤١). امروزه روستایی به این نام شناخته شده نیست.&amp;lt;/ref&amp;gt; الأمرار،&amp;lt;ref&amp;gt;دره ای است در دیار بنی کعب بن ربیعه که &amp;quot;عجرد الأمراری&amp;quot; از شعرای معروف عرب، بدان منسوب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج١، ص٢٥٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; الأرسان،&amp;lt;ref&amp;gt;جمع &amp;quot;رسن&amp;quot;، و آن موضعی است مقابل &amp;quot;تثلیث&amp;quot; از بلاد بنی عقیل. (بکری، معجم ما استعجم، ج۱، ص۱۲۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; تیاسه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است از بهای بنی قشیر. أبو زیاد کلابی وجه تسمیه آن را بخاطر نزدیکی به کوهی به نام &amp;quot;تیاس&amp;quot; عنوان کرده است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٦٥).&amp;lt;/ref&amp;gt;[[حزن]] [[بنی جعده]]،&amp;lt;ref&amp;gt;از أبو سعید الضریر نقل شده که بلاد عرب دارای سه موضع به نام حزن است: حزن غاضره، حزن بنی یربوع و حزن بنی جعده. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٢٥٤).&amp;lt;/ref&amp;gt; الخلیقه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در بالای &amp;quot;الجاده&amp;quot; در بین یمامه و مکه. این آب از متعلقات بنی العجلان (عبد الله بن کعب بن ربیعه) است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۳۸۷)&amp;lt;/ref&amp;gt; برک و نعام،&amp;lt;ref&amp;gt;أصمعی از &amp;quot;برک&amp;quot; و &amp;quot;نعام&amp;quot; به عنوان آبی از آبهای بنی عقیل یاد کرده است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۹۳) این اماکن هنوز هم به این نامها معروفند.&amp;lt;/ref&amp;gt; أشمس،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است در بلاد بنی عقیل. (بکری، معجم ما استعجم، ج۱، ص١٤٧)&amp;lt;/ref&amp;gt; حریز،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در تثلیث متعلق به بنی عقیل. (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص۷۷)&amp;lt;/ref&amp;gt; الشطبتان،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;الشطبتان&amp;quot; و &amp;quot;حرم&amp;quot; دره‌های بنی الحریش بن کعب‌اند در سرزمین یمامه (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٣٤٣).&amp;lt;/ref&amp;gt; الصداره،&amp;lt;ref&amp;gt;روستایی است در یمامه از متعلقات بنی جعده (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص۳۹۷). این موضع، هنوز هم به این نام معروف است لکن روستایی در آن بدین نام وجود ندارد.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عقیق]] تمره،&amp;lt;ref&amp;gt;موضعی است از آن بنی عقیل دارای روستاها و نخلستانهای بسیار؛ و آن منبری است از منبرهای یمامه. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص١٣٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; الغیل،&amp;lt;ref&amp;gt;وادی &amp;quot;الجعده&amp;quot; است بین دو کوه که پوشیده از نخیلات است و در قسمت بالادستش افرادی از بنی قشیر ساکنند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٢٢٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; ذقان،&amp;lt;ref&amp;gt;دو کوهند در بلاد بنی کعب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٦) که هنوز هم به این نامها معروفند. اما امروزه صحرایی بین این دو فاصله انداخته است و جهت تمییز این دو یکی را &amp;quot;ذقان العطشان&amp;quot; و دیگری را &amp;quot;ذقان الریان&amp;quot; می‌نامند.&amp;lt;/ref&amp;gt; المصحبیه،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای بنی قشیر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص١٣٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; خزبه،&amp;lt;ref&amp;gt;خزبه معدن بنی عباده بن عقیل بین عمایتین است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٣٦٧)&amp;lt;/ref&amp;gt; [[نقر]]،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;نقر&amp;quot; بمانند یک تپه شنی خطرناک است که بین آن و بین الحجر سه روز راه فاصله است. این موضع از سرزمین‌های بنی قشیر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۹۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; الینکیر،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است استوار که راهی در آن نیست. این مکان از سرزمین‌های بنی قشیر محسوب شده است. (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦٥). هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الرکاء،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی عقیل است. (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص٢٦٠) این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; حلبان،&amp;lt;ref&amp;gt;حلبان از آبهای بنی قشیر است و به جهت قلت آبش، در عرب ضرب المثل شده است. چندان که درباره‌اش گفته شده: «تروا فإنک وارد حلبان». (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۲۸۱ -۲۸۲) &amp;quot;حلبان&amp;quot; در حال حاضر در کنار شاهراه ریاض – مکه واقع بوده و هم اکنون نیز با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الخنوقه،&amp;lt;ref&amp;gt;دره ای است متعلق به بنی عقیل. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٣٩٤) هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و ماسل&amp;lt;ref&amp;gt;نخلستان و آبی است از آن بنی عقیل (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٤٢). این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; یاد کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۹.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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(همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦٧). این مکان امروز روستایی است کوچک در حدود ۱۵۰ کیلومتری جانب غرب ریاض.&amp;lt;/ref&amp;gt; ساکنند. قراوشه بر بیشتر منطقه &quot;[[الوشم]]&quot; [[تسلط]] داشتنند&amp;lt;ref&amp;gt;&quot;جرمی&quot;، الوشم را از اراضی یمامه معرفی کرده و آورده: این زمین از آن بنی نمیر است و ابتدای حدود آن ثرمداء و أثیفیه است. (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٧٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; و بنی [[ظالم]] هم در منطقه یمامه از سمت العارض در ناحیه قرماء،&amp;lt;ref&amp;gt;قریه ای است با نخل‌های بسیار در وادی قرقری یمامه و از املاک بنی نمیر. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص۳۲۹) در حال حاضر به اسم &quot;ضرما&quot; معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; العویند،&amp;lt;ref&amp;gt;قریه ای است در یمامه. أبو زیاد کلابی آن را از آبهای بنی نمیر دانسته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص۱۷۰) این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; عقرباء&amp;lt;ref&amp;gt;مکانی است از آن بنی بکر از شاخه‌های تیره بنی ظالم من نمیر (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٧٥). این مکان که در حال حاضر در حدود ۴۰ کیلومتری شمال غربی ریاض واقع است، هنوز هم به همین نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; و سپس به ریگزار الورکه&amp;lt;ref&amp;gt;ریگزاری است در غرب یمامه که در آن آبها و نخیلاتی از بنی ظالم از شاخه‌های قبیله نمیر وجود دارد. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٣٧٣). این مکان هم اکنون&quot; نفود قنیفذه&quot; نامیده می‌شود و در حدود ۶۰ کیلومتری غرب ریاض و در کنار شاهراه ریاض – مکه واقع است.&amp;lt;/ref&amp;gt; وارد شده، بخش [[غربی]] [[سرزمین]] [[بنی نمیر]] را تشکیل داده‌اند. در مورد بنی ضنه نیز شواهدی وجود دارد که نشان می‌دهد، منازل آنها در ضلع غربی سواد [[باهله]] قرار داشته است.&amp;lt;ref&amp;gt;باهله از قبایل قیسیه به شمار رفته‌اند و از مشهورترین آبهایشان در منطقه سواد می‌توان از الخاصره، عویسجه، العوسجه، القویع و جزاله یاد کرد (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦١ - ٢٦٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; از معروف‌ترین آب‌های بنی&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;بنی نُمَیر هم، تقریباً مرکز [[منطقه نجد]] را به طور کامل در تحت [[سیطره]] خود داشتند. منازل آنها از منازل [[برادران]] بنی کلابی شان در شمال، امتداد می‌یافت، تا این که با [[مساکن]] برادران شان از [[بنی کعب]] در جنوب، به هم می‌آمیخت. این [[سرزمین]] در حدود شرقی خود، از کوه‌های العارض&amp;lt;ref&amp;gt;مشهورترین کوه منطقه نجد است. این مکان هنوز هم به همین نام معروف است &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;لکن &lt;/ins&gt;امروزه نزد مردم عامه بیشتر با نام &quot;طویق&quot; شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; آغاز و تا سرزمین [[باهله]]، در سوادی که به نام آنها معروف است، ادامه می‌یافت. در این سرزمین همچنین، شاخه‌هایی از [[بنی غنی]] ساکن بودند که به همراه [[بنی نمیر]] در بخش علیای المغیرا&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در میانه الصداح. 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(یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۲۱۳) این مکان هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; البرم،&amp;lt;ref&amp;gt;البرم که به &amp;quot;برم ضنه&amp;quot; هم نامیده شده است، در موازات جانب غربی سواد باهله قرار داشته و از متعلقات بنی ضنه از طوایف بنی نمیر به شمار می‌رود (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦١).&amp;lt;/ref&amp;gt; المشقریه،&amp;lt;ref&amp;gt;نخلستانی است از آن بنی ضنه از طوایف بنی نمیر بین البرم و سواد باهله (همدانی، صفه جزیره العرب، ص۲۶۱).&amp;lt;/ref&amp;gt; ملاع،&amp;lt;ref&amp;gt;آن را از آبهای بنی نمیر گفته‌اند. این موضع دارای تپه ای است که در منطقه نجد تپه ای طولانی‌تر از آن شناسایی نشده است. نام این منطقه در برخی امثال عرب وارد شده چندان که گفته‌اند: &amp;quot; أبصر من عقاب ملاع&amp;quot; (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۱۸۹).&amp;lt;/ref&amp;gt; تبراک،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;تبراک&amp;quot; از آبهای بنی نمیر است در پایین دست المروت و چسبیده به الورکه. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۱۲) این مکان هنوز هم به این نام معروف است و در حال حاضر روستایی است کوچک که در کنار بزرگراه ریاض – مکه واقع است.&amp;lt;/ref&amp;gt; ثهلان،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است دارای آب و نخل و از املاک بنی نمیر. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۸۸) هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; عکاش،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است در پشت سر حظیان در الشریف که در کنار آن نخل و نیز قصرهایی از بنی نمیر وجود دارد (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص١٤١).&amp;lt;/ref&amp;gt; الشبکه، ابودخن،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای بنی نمیر است در الشریف که به نام &amp;quot;شبکه أبو دخن&amp;quot; (أبو دخن نام کوهی است) شناخته شده و معروف است (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٣٢٢). این آب و کوهش هنوز هم بدین اسامی خوانده می‌شوند.&amp;lt;/ref&amp;gt; أف ـ ـ ـرع،&amp;lt;ref&amp;gt;موضعی است نزدیک یمامه و از متعلقات بنی نمیر (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۲۲۸).&amp;lt;/ref&amp;gt;مظلومه،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای بنی نمیر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان ج۵، ص١٥٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; [[جبله]]،&amp;lt;ref&amp;gt;جبله از اماکن بسیار مشهور در جاهلیت است در نزدیکی أضاخ بین الشرف و الشریف. (بکری، معجم ما استعجم، ج٢، ص۱۲).&amp;lt;/ref&amp;gt; [[روضه]] أمراش،&amp;lt;ref&amp;gt;از باغ‌های [[نمیر]] است و یکی از شعرایشان در این باره سرود:&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[نمیر]] و آثار آنها می‌توان به اضاخ،&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;أضاخ&amp;quot; و به نقلی &amp;quot;وضاخ&amp;quot; که در لسان مردم عامی &amp;quot;أُوضاخ&amp;quot; تلفظ می‌شود. حموی آن را از روستاهای یمامه و از املاک بنی نمیر برشمرده است. 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		<author><name>Wasity</name></author>
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و همراه با او بیش از ۳۰۰ تن از ثقیفیان از هر دو شاخه [[احلاف]] و [[بنی مالک]] در این [[جنگ]] کشته شدند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهره النسب، ص۳۹۰؛ ثقفی، الغارات، ج۲، ص‌۵۱۷؛ ابن اثیر، اسدالغابه، ج۵، ص‌۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عثمان بن ابی العاص ثقفی]] هم از دیگر [[رجال]] برجسته این [[قوم]] بود که [[فرماندهی]] [[عرب]] را در جنگ‌های [[ارمینیه]]، [[فارس]] و ناحیۀ سند بر عهده داشت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن حزم، جمهره انساب العرب، ص۲۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[سائب بن اقرع ثقفی]] هم در [[فتوح]] [[نهاوند]] نقشی مؤثر داشت که به [[پاس]] این حضور [[قوی]]، [[تقسیم غنایم]] این جنگ به او واگذار شد. او چندی بعد، به [[اصفهان]] گسیل، و به عنوان [[والی]] آنجا به فعالیت پرداخت.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۰۴، ۳۰۹؛ ابونعیم، احمد، ذکر اخبار اصبهان‌، ج۱، ص‌۷۵، ۳۴۲؛ ابن اثیر، الکامل، ج۳، ص‌۱۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;دائره المعارف بزرگ اسلامی، مقاله ثقیف، احمد پاکتچی، ج۴، ص۱۶۲۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; حضور [[مغیره بن شعبه]] در [[فتوحات]] [[ایران]] [[ساسانی]]&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ج۲، ص۲۹۸، ۳۱۳؛ ابن حبان، الثقات، ج۲، ص۲۰۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[آذربایجان]]،&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ج۲، ص۳۱۷ - ۳۱۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ابومحجن مالک بن حبیب ثقفی]]&amp;lt;ref&amp;gt;دینوری‌، الاخبار الطوال، ص۱۱۳، ۱۲۲؛ بلاذری‌، فتوح البلدان، ص۲۴۸؛ ابن عبدالبر، الاستیعاب، ج۴، ص۱۷۴۸.&amp;lt;/ref&amp;gt; در [[قادسیه]] و جنگ با [[ساسانیان]] و نیز [[عثمان بن ابی‌العاص]] - [[حاکم عمان]] و [[بحرین]] - (۱۵ - ۲۹ق.)&amp;lt;ref&amp;gt;ابن سعد، الطبقات الکبری، ج۵، ص۵۰۹ - ۵۱۰؛ دینوری، الاخبار الطوال، ص۱۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; در فتح [[ارمنستان]] در [[سال ۱۹ هجری]]&amp;lt;ref&amp;gt;ابن عبدالبر، الاستیعاب، ج۴، ص۱۰۳۵ - ۱۰۳۶؛ ابن اثیر، الکامل، ج۲، ص۵۳۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; از دیگر نمونه‌های حضور مؤثر [[ثقفیان]] در دوره فتوحات به شمار آمده است.&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;در میان جبهه‌های مختلف [[فتوح]]، [[هوازن]] و بخصوص شاخه ثقفی آن، بیش از همه به جبهۀ [[ایران]] [[گرایش]] داشتند&amp;lt;ref&amp;gt;مثلاً نک: دینوری، الاخبار الطوال‌، ص۱۲۱ - ۱۲۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; و این به سبب [[قرب]] منازل هوازن و نیز به مدد [[روابط تجاری]] [[قبیله ثقیف]] با ایران در دورۀ پیش از [[اسلام]] بود. آنان همچنین، در [[فتح عراق]] و نیز [[فتوحات]] [[ارمنستان]] نقشی چشمگیر ایفا نمودند.&amp;lt;ref&amp;gt;ر.ک: ابن حزم، جمهره انساب العرب، ص۲۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;ابوعبید &lt;/ins&gt;بن مسعود ثقفی]] - پدر مختار - در [[یوم]] جسر که [[جنگی]] خونین در جریان فتوح [[عراق]] و ایران بود، [[رشادت]] بسیار نشان داد و تا پای [[جان]] جنگید. او در قُسُّ الناطِف بر [[ساحل]] [[فرات]] کشته شد&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری‌، فتوح البلدان، ص۳۵۱ ـ۳۵۲؛ ابن‌خلدون‌، تاریخ، ج۲، ص۵۲۰ ـ۵۲۴؛ ثقفی‌، الغارات، ج۲، ص۵۱۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; و همراه با او بیش از ۳۰۰ تن از ثقیفیان از هر دو شاخه [[احلاف]] و [[بنی مالک]] در این [[جنگ]] کشته شدند.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن کلبی، جمهره النسب، ص۳۹۰؛ ثقفی، الغارات، ج۲، ص‌۵۱۷؛ ابن اثیر، اسدالغابه، ج۵، ص‌۷۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عثمان بن ابی العاص ثقفی]] هم از دیگر [[رجال]] برجسته این [[قوم]] بود که [[فرماندهی]] [[عرب]] را در جنگ‌های [[ارمینیه]]، [[فارس]] و ناحیۀ سند بر عهده داشت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن حزم، جمهره انساب العرب، ص۲۶۶.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[سائب بن اقرع ثقفی]] هم در [[فتوح]] [[نهاوند]] نقشی مؤثر داشت که به [[پاس]] این حضور [[قوی]]، [[تقسیم غنایم]] این جنگ به او واگذار شد. او چندی بعد، به [[اصفهان]] گسیل، و به عنوان [[والی]] آنجا به فعالیت پرداخت.&amp;lt;ref&amp;gt;بلاذری، فتوح البلدان، ص۳۰۴، ۳۰۹؛ ابونعیم، احمد، ذکر اخبار اصبهان‌، ج۱، ص‌۷۵، ۳۴۲؛ ابن اثیر، الکامل، ج۳، ص‌۱۸۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; 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		<author><name>Wasity</name></author>
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		<title>Wasity: /* هوازن و جریان موسوم به ارتداد قبایل */</title>
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[[بنی عامر]] در مواجهه با این جریان، به دو دسته شدند. یکی [[بنی کلاب]] به رهبری [[علقمه بن علاثه]] و دیگر بنو کعب به [[ریاست]] [[قره بن هبیره]]، هر دو گروه در [[وفاداری]] به [[دولت]] [[مدینه]] یا پیوست به طلیحه بن خالد اسدی مردد بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦١.&amp;lt;/ref&amp;gt; علقمه در [[دوران پیامبر]]{{صل}} طی وفدی به مدینه [[مسلمان]] شده بود اما دیری نگذشت که [[مرتد]] شد و در طی [[شکست]] هوازنیان در معرکه حنین و محاصره [[طائف]]، به [[شام]] گریخت و پس از دریافت خبر [[رحلت نبی اکرم]]{{صل}} به موطن خود بازگشت. با روی آوردن [[بنی کلاب]] بدو، [[ابوبکر قعقاع بن عمرو]] و به [[نقلی]] [[قعقاع بن &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;سور&lt;/del&gt;]] را به [[جنگ]] آنها فرستاد. [[علقمه]] با دریافت این خبر گریخت و قعقاع [[خانواده]] و [[فرزندان]] او را [[اسیر]] کرد و به [[مدینه]] فرستاد. در مدینه آنها رو گردانی خود از [[حکومت مدینه]] را رد کردند و چون ابوبکر مدرکی در [[ارتداد]] آنها نیافت، آزادشان کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٤٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[بنی کعب]] نیز در تردید بودند تا این که [[ربیعه بن خویلد]] عقیلی که از شجاعانشان بود با یادآوری واقعه [[بئر معونه]]، آنان را به [[صبر]] فرا خواند. [[قره بن هبیره]] – [[رییس]] آنها - پس از شنیدن این سخن و نیز شنیدن [[پیروزی]] [[خالد بن ولید]] در بزاخه، نزد او رفت و اظهار [[اطاعت]] و [[فرمانبرداری]] کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦٢ – ٢٦٣؛ ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٥٢.&amp;lt;/ref&amp;gt; همچنین در باب مشارکت‌های [[بنی عامر]] به [[دولت]] مدینه در جنگ‌های ارتداد، گزارشی در دست است که بر اساس آن آمده: زمانی که [[مردم]] [[صنعا]] به [[رهبری]] قیس المکشوح علیه [[حاکم]] خود [[فیروز دیلمی]] سر به [[شورش]] نهادند، [[فیروز]] از آنجا گریخت اما فرزندانش به [[اسارت]] در آمدند. وی از ابوبکر [[درخواست کمک]] کرد و همزمان از باقی مانده مردم [[عک]] که به دولت مدینه [[وفادار]] مانده بودند و نیز از [[بنی عقیل بن عامر]] یاری‌طلبید و به کمک آنان نیروهای [[متخاصم]] را در هم شکست.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٣٢٣ – ٣٢٦.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۱۹۴ - ۱۹۷.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;مواضع [[قبیله هوازن]] و شاخه‌های متعدد آن در مورد [[ارتداد]] و جنگ‌هایشان، برحسب شرایط و [[هوس]] رهبرانشان، متفاوت بود. برخی از [[مورخان]] از حضور بعضی از فروعات قبیله هوازن - که به آنها نام &quot;هوازن&quot; اطلاق کردند - و [[همراهی]] با [[سلیم]] و [[غطفان]] در مساعدت [[طلیحه]] بن خالد [[اسدی]] – یکی از [[پیامبران دروغین]] - خبر داده‌اند. آنها با [[خالد بن ولید]] در بزاخه رودررو شدند و پس از [[شکست]]، به [[اجتماع]] دیگری به [[رهبری]] أمّ زمل سلمی بنت مالک بن حذیفه بن بدر پیوستند. پس از شکست ام زمل، عده ای از مردان غطفان و سلیم و هوازن جهت [[تسلیم شدن]] نزد خالد بن ولید آمدند. اما چون مردانی از [[قوم]] آنان به جمعی از [[مسلمانان]] [[حمله]] کرده بودند و آنان را کشته و بعد سوزانده بودند، خالد از قبول این امر [[امتناع]] کرد و پذیرش [[تسلیم]] آنان را به تحویل آن مردان موکول کرد. آنان نیز این افراد را به خالد تسلیم کردند و وی آنها را کشت و سوزاند و [[مثله]] کرد&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦٤.&amp;lt;/ref&amp;gt; و به قول ابن الاثیر از بالای کوهها انداخت و در چاهها انداخت.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٥٠.&amp;lt;/ref&amp;gt; - &amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۱۹۲ - ۱۹۳.&amp;lt;/ref&amp;gt; از دیگر [[طوایف]] هوازن که ذکری از آنها در واقعه موسوم به ارتداد قبایل به میان آمده، [[قبیله بنی عامر]] است. [[بنی عامر]] در مواجهه با این جریان، به دو دسته شدند. یکی [[بنی کلاب]] به رهبری [[علقمه بن علاثه]] و دیگر بنو کعب به [[ریاست]] [[قره بن هبیره]]، هر دو گروه در [[وفاداری]] به [[دولت]] [[مدینه]] یا پیوست به طلیحه بن خالد اسدی مردد بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;طبری، تاریخ الرسل والملوک، ج٣، ص٢٦١.&amp;lt;/ref&amp;gt; علقمه در [[دوران پیامبر]]{{صل}} طی وفدی به مدینه [[مسلمان]] شده بود اما دیری نگذشت که [[مرتد]] شد و در طی [[شکست]] هوازنیان در معرکه حنین و محاصره [[طائف]]، به [[شام]] گریخت و پس از دریافت خبر [[رحلت نبی اکرم]]{{صل}} به موطن خود بازگشت. با روی آوردن [[بنی کلاب]] بدو، [[ابوبکر قعقاع بن عمرو]] و به [[نقلی]] [[قعقاع بن &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;شور&lt;/ins&gt;]] را به [[جنگ]] آنها فرستاد. [[علقمه]] با دریافت این خبر گریخت و قعقاع [[خانواده]] و [[فرزندان]] او را [[اسیر]] کرد و به [[مدینه]] فرستاد. در مدینه آنها رو گردانی خود از [[حکومت مدینه]] را رد کردند و چون ابوبکر مدرکی در [[ارتداد]] آنها نیافت، آزادشان کرد.&amp;lt;ref&amp;gt;ابن اثیر، الکامل، ج٢، ص٣٤٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[بنی کعب]] نیز در تردید بودند تا این که [[ربیعه بن خویلد]] عقیلی که از شجاعانشان بود با یادآوری واقعه [[بئر معونه]]، آنان را به [[صبر]] فرا خواند. 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		<author><name>Wasity</name></author>
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(یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص١٤٧) این مکان هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و قسمت علیای وادی [[لیه]] ساکن بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;زمشخری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص٢٨٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; ضمن این که برخی از آنها هم در [[معادن]] البرم&amp;lt;ref&amp;gt;روستایی است بین مکه و طائف با نخل‌ها و زراعت و آبهای بسیار (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص١٥٤) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در جوار [[قریش]] -تقریبا در همین جایی که اقامتگاه‌های فعلی برخی از آنان است - [[زندگی]] می‌کردند. اما بنی نصر؛ منازل شان در پایین وادی لیه و در کنار پسر عموهایشان از [[قبیله ثقیف]] بود. یاقوت به نقل از اصمعی ذکر کرده که آنها انشعاب آبی به نام &quot;الرکایا&quot; داشتند.&amp;lt;ref&amp;gt;انشعابی است در ناحیه &quot;السی&quot;. و آن ناحیه ای است مرتفع (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٦٣) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; و اما بنی سعد در صحرای &quot;البوباه&quot; در شمال طائف [[منزل]] داشتند.&amp;lt;ref&amp;gt;صحرایی است در تهامه و سرزمین سعد بن بکر.(زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص۴۴) این مکان امروزه به نام &quot;البهیتاء&quot; شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; لکن چنین به نظر می‌رسد که بخش زیادی از آنان پس از زاد آوری و کثرت یافتن، به سمت مناطق جنوبی طائف و به سراتی که معروف به نامشان است، کوچیدند.&amp;lt;ref&amp;gt;الفاسی، العقد الثمین فی تاریخ البلد الأمین، ج٥، ص٥٤١.&amp;lt;/ref&amp;gt; این دو منطقه در حال حاضر هم از [[مساکن]] آنهاست. [[بنی جشم]] هم، در شرق [[طائف]] در مرزهای نجد در اطراف &quot;[[جبل]] [[حضن]]&quot; [[مسکن]] داشتند&amp;lt;ref&amp;gt;کوه حضن از کوههای پهناوری است که در دورترین نقطه قسمت علیای نجد قرار داشته و از مرزهای بین نجد و حجاز محسوب می‌شود. نام این مکان در ضرب المثل معروف «أنجد من رأی حضنا» به کار رفته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٢، ص۲۷۲) زمخشری این کوه را از مواضع اختصاصی بنی جشم دانسته است. (زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص۹۸) این کوه هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و چه بسا ممکن است به سرزمین‌های نجد، همان جایی که به نجد علیا معروف است، نیز رفته باشند.&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و اما [[بنومره]] (سلول)، مساکن شان در [[بیشه]]&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی سلول بلکه به نقل أبو زیاد کلابی، از بهترین سرزمین‌های بنی سلول است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص٥٢٩). بیشه امروزه از شهرهای بزرگ در جنوب عربستان است.&amp;lt;/ref&amp;gt; بود و تا کنون نیز احفادشان در این منطقه ساکنند. الحضنان،&amp;lt;ref&amp;gt;دو کوهند در بلاد سلول بن صعصعه. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۲۷۱).&amp;lt;/ref&amp;gt; المجتبیه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی بود متعلق به بنی سلول در الضمرین. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٥٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; قرقد،&amp;lt;ref&amp;gt;موضعی است در مجاورت معدن البرام و یسوم. قرقد در گذشته، از أراضی بنی سلول بود. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٣٢٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; الوشل،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی بود از آن بنی سلول در کوهی به نام الضمر. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۳۷۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; الضمرین&amp;lt;ref&amp;gt;منظور الضمر و الضاین است که از سرزمین‌های اصلی بنی سلول به شمار می‌رفت. (زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص٢٠٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; و الشبیکه&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است از آن بنی سلول (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٣، ص٣٢٤). هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; از جمله مناطقی هستند که نشانه‌هایی از وجود آنها را در خود جای داده‌اند. تیره [[بنی عامر]] هم، از [[طوایف]] عشایری نجد به شمار رفته، تعیین دقیق محل سکونت آنها بسیار مشکل است. از معروف‌ترین آب‌ها و آثار آنها می‌توان به البجاده،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای أبی بکر بن کلاب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۲۳۸) اکنون به نام &quot;البجادیه&quot; معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; بیدان،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است سرخ و دراز در حمی ضریه، که در آن آبی از متعلقات بنی جعفر بن کلاب قرار دارد. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص٥٢٣).&amp;lt;/ref&amp;gt; الحفیره،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای الضباب است و کوهی منسوب به آن دارد که بدان عمود الحفیره می‌گویند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۲۷۷). این مکان امروزه از روستاهای عربستان سعودی است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[الریان]]،&amp;lt;ref&amp;gt;دره ای است در ضریه از اراضی بنی کلاب که قسمت علیای آن متعلق به بنی الضباب و پایین دست آن، متعلق به بنی جعفر بود. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص۱۱۰).&amp;lt;/ref&amp;gt; الزج،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی بود از آن قرطاء از تیره‌های بنی کلاب، که در ناحیه ضریه واقع است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص۱۳۳).&amp;lt;/ref&amp;gt; الشرف،&amp;lt;ref&amp;gt;اماکنی هستند در میانه نجد که حمی ضریه در آنها قرار دارد. این دو منطقه در شرق ربذه که حمی الأیمن است واقعند و منطقه الشریف در جنب آن قرار دارد و توسط تسریر از هم جدا می‌شوند. با این توضیح، ناحیه ای که در قسمت شرقی قرار دارد الشریف و آنچه در غرب قرار دارد الشرف نامیده می‌شود. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٣، ص٣٣٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; ساجر و ساحوق،&amp;lt;ref&amp;gt;از [[همدانی]] نقل شده که: ساجر و ساحوق از سرزمین‌های بنی عامر است. (همدانی، صفه [[جزیره العرب]]، ص۲۹۹). و یاقوت در [[شعر]] [[سلمه بن خرشب]] آورده است: وأمسوا حلالا ما یفرق بینهم علی کل [[ماء]] بین [[فید]] وساجر ([[یاقوت حموی]]، معجم البلدان، ج۳، ص١٦٩).&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;هوازن با توجه به [[شهرت]] شاخه‌های آن، به شش نام: [[ثقیف]]، [[بنی‌نصر]]، [[بنی‌سعد]]، [[بنی‌جشم]]، [[بنی‌مره]] (سلول) و [[بنی عامر &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;بن صعصعه|بنی‌عامر&lt;/ins&gt;]] تقسیم می‌شود. ازمیان این شش دسته، [[ثقیف]] زودتر به یکجا نشینی روی آوردند. [[ثقفیان]] در [[طائف]] و دره‌های مجاور آن مانند [[وادی وج]]،&amp;lt;ref&amp;gt;&quot;وج&quot; نام دره ای است که شهر طائف در آن واقع است. برخی وج را برگرفته از نام وج بن عبد الحق از شاخه‌های عمالقه دانسته‌اند. وج، نام قدیم طائف بود و چون بر گرد آن دیواری کشیده شد، از آن پس، نام طائف به خود گرفت. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٣٦١).&amp;lt;/ref&amp;gt; [[وادی]] جفن&amp;lt;ref&amp;gt;دره ای است در طائف. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص١٤٧) این مکان هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و قسمت علیای وادی [[لیه]] ساکن بودند.&amp;lt;ref&amp;gt;زمشخری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص٢٨٩.&amp;lt;/ref&amp;gt; ضمن این که برخی از آنها هم در [[معادن]] البرم&amp;lt;ref&amp;gt;روستایی است بین مکه و طائف با نخل‌ها و زراعت و آبهای بسیار (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص١٥٤) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; و در جوار [[قریش]] -تقریبا در همین جایی که اقامتگاه‌های فعلی برخی از آنان است - [[زندگی]] می‌کردند. اما بنی نصر؛ منازل شان در پایین وادی لیه و در کنار پسر عموهایشان از [[قبیله ثقیف]] بود. یاقوت به نقل از اصمعی ذکر کرده که آنها انشعاب آبی به نام &quot;الرکایا&quot; داشتند.&amp;lt;ref&amp;gt;انشعابی است در ناحیه &quot;السی&quot;. و آن ناحیه ای است مرتفع (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٦٣) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; و اما بنی سعد در صحرای &quot;البوباه&quot; در شمال طائف [[منزل]] داشتند.&amp;lt;ref&amp;gt;صحرایی است در تهامه و سرزمین سعد بن بکر.(زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص۴۴) این مکان امروزه به نام &quot;البهیتاء&quot; شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; لکن چنین به نظر می‌رسد که بخش زیادی از آنان پس از زاد آوری و کثرت یافتن، به سمت مناطق جنوبی طائف و به سراتی که معروف به نامشان است، کوچیدند.&amp;lt;ref&amp;gt;الفاسی، العقد الثمین فی تاریخ البلد الأمین، ج٥، ص٥٤١.&amp;lt;/ref&amp;gt; این دو منطقه در حال حاضر هم از [[مساکن]] آنهاست. [[بنی جشم]] هم، در شرق [[طائف]] در مرزهای نجد در اطراف &quot;[[جبل]] [[حضن]]&quot; [[مسکن]] داشتند&amp;lt;ref&amp;gt;کوه حضن از کوههای پهناوری است که در دورترین نقطه قسمت علیای نجد قرار داشته و از مرزهای بین نجد و حجاز محسوب می‌شود. نام این مکان در ضرب المثل معروف «أنجد من رأی حضنا» به کار رفته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٢، ص۲۷۲) زمخشری این کوه را از مواضع اختصاصی بنی جشم دانسته است. (زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص۹۸) این کوه هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; و چه بسا ممکن است به سرزمین‌های نجد، همان جایی که به نجد علیا معروف است، نیز رفته باشند.&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۴.&amp;lt;/ref&amp;gt; و اما [[بنومره]] (سلول)، مساکن شان در [[بیشه]]&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی سلول بلکه به نقل أبو زیاد کلابی، از بهترین سرزمین‌های بنی سلول است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص٥٢٩). بیشه امروزه از شهرهای بزرگ در جنوب عربستان است.&amp;lt;/ref&amp;gt; بود و تا کنون نیز احفادشان در این منطقه ساکنند. الحضنان،&amp;lt;ref&amp;gt;دو کوهند در بلاد سلول بن صعصعه. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص۲۷۱).&amp;lt;/ref&amp;gt; المجتبیه،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی بود متعلق به بنی سلول در الضمرین. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٥٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; قرقد،&amp;lt;ref&amp;gt;موضعی است در مجاورت معدن البرام و یسوم. قرقد در گذشته، از أراضی بنی سلول بود. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٣٢٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; الوشل،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی بود از آن بنی سلول در کوهی به نام الضمر. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۳۷۸).&amp;lt;/ref&amp;gt; الضمرین&amp;lt;ref&amp;gt;منظور الضمر و الضاین است که از سرزمین‌های اصلی بنی سلول به شمار می‌رفت. (زمخشری، الجبال والأمکنه والمیاه، ص٢٠٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; و الشبیکه&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است از آن بنی سلول (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٣، ص٣٢٤). هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; از جمله مناطقی هستند که نشانه‌هایی از وجود آنها را در خود جای داده‌اند. تیره [[بنی عامر]] هم، از [[طوایف]] عشایری نجد به شمار رفته، تعیین دقیق محل سکونت آنها بسیار مشکل است. از معروف‌ترین آب‌ها و آثار آنها می‌توان به البجاده،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای أبی بکر بن کلاب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۲۳۸) اکنون به نام &quot;البجادیه&quot; معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; بیدان،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است سرخ و دراز در حمی ضریه، که در آن آبی از متعلقات بنی جعفر بن کلاب قرار دارد. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص٥٢٣).&amp;lt;/ref&amp;gt; الحفیره،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای الضباب است و کوهی منسوب به آن دارد که بدان عمود الحفیره می‌گویند. 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(همدانی، صفه [[جزیره العرب]]، ص۲۹۹). و یاقوت در [[شعر]] [[سلمه بن خرشب]] آورده است: وأمسوا حلالا ما یفرق بینهم علی کل [[ماء]] بین [[فید]] وساجر ([[یاقوت حموی]]، معجم البلدان، ج۳، ص١٦٩).&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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(همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦٠) این مکان امروزه از روستاهای عربستان سعودی است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[محدثه]]،&amp;lt;ref&amp;gt;این مکان که به محدثه سواج معروف است از آبهای أبی بکر بن کلاب در نزدیکی العفلانه است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٦١). این موضع هنوز هم به نام سواج شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; مدعا،&amp;lt;ref&amp;gt;از أبو زیاد کلابی نقل شده که مدعا بهترین آب بنی جعفر در حمی ضریه است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۷۷).&amp;lt;/ref&amp;gt; ناصفه،&amp;lt;ref&amp;gt;أبو زیاد کلابی آن را از آبهای بنی جعفر در حمی ضریه دانسته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٤، ص٢٥٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; الوضح،&amp;lt;ref&amp;gt;زمینی است سفید که النوسی بین حمی ضریه و النیر که در آن گیاهی به نام النصی (گیاهی سخت که از آن خیزران هندی به‌دست می‌آید) می‌روید. این سرزمین از منازل بنی جعفر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۳۷۹).&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عروی]]،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است متعلق به بنی بکر بن کلاب. برخی هم عروی را نام کوهی گفته‌اند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص۱۱۲). این موضع، اکنون روستایی در مرکز نجد است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ظلم]]،&amp;lt;ref&amp;gt;اصمعی آن را کوهی سیاه در جنوب الدفینه از منازل أبی بکر بن کلاب دانسته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٦٢) این مکان، هنوز به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[حره]] راهص،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های تابعه بنی قریط بن عبد بن کلاب است و تپه ای است پیوسته و کم ارتفاع. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٢٤٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; دمخ،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است از جبال ضریه. ارتفاعش یک میل است عرب آن را مثل قرار داده و گفته: &amp;quot;أثقل من دمخ الدماخ&amp;quot;. دمخ از منازل بنی عامر در جاهلیت بود. (البکری، معجم ما استعجم، ج٢، ص٢٦١، ١٧٥) حموی آورده که در آن آبی وجود دارد که به آن ذیاد گفته می‌شود و از متعلقات بنی عمرو بن کلاب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٩) دمخ هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; الاخراب و سجا،&amp;lt;ref&amp;gt;از متعلقات بنی الأضبط بن کلاب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۲۰). &amp;quot;سجا&amp;quot; هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; الاخرجان و المردمه،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی أبی بکر بن کلاب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۲۰) که هنوز هم &amp;quot;المردمه&amp;quot; به همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[اذن]]،&amp;lt;ref&amp;gt;صحرایی است در السماوه که الرحی از آن منقطع است. اذن از بلاد أبی بکر بن کلاب بوده (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۳۲) و هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; -&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۵ -۷۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; الکناس،&amp;lt;ref&amp;gt;ریگزاری است در بلاد عبد الله بن کلاب (بکری، معجم ما استعجم، ج٤، ص٢٥).&amp;lt;/ref&amp;gt; المضیح،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است متعلق به بنی البکاء (بکری، معجم ما استعجم، ج٤، ص٩٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; مریفق،&amp;lt;ref&amp;gt;أبو زیاد کلابی آن را از آبهای أبی بکر بن کلاب برشمرده است (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۱۱۹). این مکان هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[کرش]]،&amp;lt;ref&amp;gt;از کوههای أبی بکر بن کلاب است (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٤٥٢) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; النسار،&amp;lt;ref&amp;gt;سلسله جبالی است نزدیک به هم که به آنان &amp;quot;الأنسر&amp;quot; گفته می‌شود و در آن آبی از بنی کلاب قرار دارد. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۸۳) هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الدخول&amp;lt;ref&amp;gt;گفته شده که &amp;quot;الدخول&amp;quot; و &amp;quot;حومل&amp;quot; از بلاد أبی بکر بن کلاب هستند (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص١٦٨) و هنوز هم به این نام معروفند.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[طخفه]]&amp;lt;ref&amp;gt;از اماکن مشهور در جاهلیت است؛ &amp;quot;حربی&amp;quot; این موضع را مختص بنی عامر دانسته است. (الحربی، کتاب المناسک وأماکن طرق الحج ومعالم الجزیره، ص٥٩٣). این سرزمین که در میانه کشور عربستان واقع است، امروز نیز به همین نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; اشاره کرد.&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;ساحوق هنوز به این نام معروف است و ساجر اکنون شهری کوچک در [[کشور]] [[پادشاهی]] [[عربستان]] است.&amp;lt;/ref&amp;gt; عرفجاء،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است از آن بنی جعفر بن کلاب فی قسمت غربی الحمی. این آب همان چاه مطویه است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٤، ص١٠٥) نزدیک محل آن، قریه ای وجود دارد به نام &amp;quot;عرجاء&amp;quot; که احتمال دارد نام تحریف شده عرفجاء باشد.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[الغدیر]]،&amp;lt;ref&amp;gt;غدیر از آبهای الضباب است که در سه میلی جنوب حمی ضریه قرار دارد. قسمت سفلای الغدیر از مساکن ربیعه بن کلاب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٤، ص١٨٨).&amp;lt;/ref&amp;gt; الحنابج،&amp;lt;ref&amp;gt;از آبهای النیر است در سرزمین بنی عمرو بن کلاب. (همدانی، صفه جزیره العرب، ص٢٦٠) این مکان امروزه از روستاهای عربستان سعودی است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[محدثه]]،&amp;lt;ref&amp;gt;این مکان که به محدثه سواج معروف است از آبهای أبی بکر بن کلاب در نزدیکی العفلانه است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص٦١). این موضع هنوز هم به نام سواج شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; مدعا،&amp;lt;ref&amp;gt;از أبو زیاد کلابی نقل شده که مدعا بهترین آب بنی جعفر در حمی ضریه است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۷۷).&amp;lt;/ref&amp;gt; ناصفه،&amp;lt;ref&amp;gt;أبو زیاد کلابی آن را از آبهای بنی جعفر در حمی ضریه دانسته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج٤، ص٢٥٢).&amp;lt;/ref&amp;gt; الوضح،&amp;lt;ref&amp;gt;زمینی است سفید که النوسی بین حمی ضریه و النیر که در آن گیاهی به نام النصی (گیاهی سخت که از آن خیزران هندی به‌دست می‌آید) می‌روید. این سرزمین از منازل بنی جعفر است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۳۷۹).&amp;lt;/ref&amp;gt; [[عروی]]،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است متعلق به بنی بکر بن کلاب. برخی هم عروی را نام کوهی گفته‌اند. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص۱۱۲). این موضع، اکنون روستایی در مرکز نجد است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ظلم]]،&amp;lt;ref&amp;gt;اصمعی آن را کوهی سیاه در جنوب الدفینه از منازل أبی بکر بن کلاب دانسته است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٦٢) این مکان، هنوز به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[حره]] راهص،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های تابعه بنی قریط بن عبد بن کلاب است و تپه ای است پیوسته و کم ارتفاع. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۲، ص٢٤٦).&amp;lt;/ref&amp;gt; دمخ،&amp;lt;ref&amp;gt;کوهی است از جبال ضریه. ارتفاعش یک میل است عرب آن را مثل قرار داده و گفته: &amp;quot;أثقل من دمخ الدماخ&amp;quot;. دمخ از منازل بنی عامر در جاهلیت بود. (البکری، معجم ما استعجم، ج٢، ص٢٦١، ١٧٥) حموی آورده که در آن آبی وجود دارد که به آن ذیاد گفته می‌شود و از متعلقات بنی عمرو بن کلاب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۳، ص٩) دمخ هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; الاخراب و سجا،&amp;lt;ref&amp;gt;از متعلقات بنی الأضبط بن کلاب است. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۲۰). &amp;quot;سجا&amp;quot; هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; الاخرجان و المردمه،&amp;lt;ref&amp;gt;از سرزمین‌های بنی أبی بکر بن کلاب (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۲۰) که هنوز هم &amp;quot;المردمه&amp;quot; به همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[اذن]]،&amp;lt;ref&amp;gt;صحرایی است در السماوه که الرحی از آن منقطع است. اذن از بلاد أبی بکر بن کلاب بوده (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۱، ص۱۳۲) و هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; -&amp;lt;ref&amp;gt;عباس بن غالب بجران العصیمی، «قبیله هوازن نسبها ودورها السیاسی والإجتماعی حتی نهایه العصر الاموی»، ص۷۵ -۷۷.&amp;lt;/ref&amp;gt; الکناس،&amp;lt;ref&amp;gt;ریگزاری است در بلاد عبد الله بن کلاب (بکری، معجم ما استعجم، ج٤، ص٢٥).&amp;lt;/ref&amp;gt; المضیح،&amp;lt;ref&amp;gt;آبی است متعلق به بنی البکاء (بکری، معجم ما استعجم، ج٤، ص٩٩).&amp;lt;/ref&amp;gt; مریفق،&amp;lt;ref&amp;gt;أبو زیاد کلابی آن را از آبهای أبی بکر بن کلاب برشمرده است (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۱۱۹). این مکان هنوز هم به این نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[کرش]]،&amp;lt;ref&amp;gt;از کوههای أبی بکر بن کلاب است (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۴، ص٤٥٢) که هنوز هم به این نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; النسار،&amp;lt;ref&amp;gt;سلسله جبالی است نزدیک به هم که به آنان &amp;quot;الأنسر&amp;quot; گفته می‌شود و در آن آبی از بنی کلاب قرار دارد. (یاقوت حموی، معجم البلدان، ج۵، ص۲۸۳) هم اکنون نیز این مکان با همین نام شناخته می‌شود.&amp;lt;/ref&amp;gt; الدخول&amp;lt;ref&amp;gt;گفته شده که &amp;quot;الدخول&amp;quot; و &amp;quot;حومل&amp;quot; از بلاد أبی بکر بن کلاب هستند (بکری، معجم ما استعجم، ج۲، ص١٦٨) و هنوز هم به این نام معروفند.&amp;lt;/ref&amp;gt; و [[طخفه]]&amp;lt;ref&amp;gt;از اماکن مشهور در جاهلیت است؛ &amp;quot;حربی&amp;quot; این موضع را مختص بنی عامر دانسته است. (الحربی، کتاب المناسک وأماکن طرق الحج ومعالم الجزیره، ص٥٩٣). این سرزمین که در میانه کشور عربستان واقع است، امروز نیز به همین نام معروف است.&amp;lt;/ref&amp;gt; اشاره کرد.&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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