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| خط ۵: |
خط ۵: |
| # [[ویژگیهای آخرت]] | | # [[ویژگیهای آخرت]] |
| # [[ویژگیهای اهل آخرت]] | | # [[ویژگیهای اهل آخرت]] |
| # [[آثار باور به معاد]]
| |
| # [[آثار آبادانی آخرت]] | | # [[آثار آبادانی آخرت]] |
| # [[آثار اهتمام به آخرت]]
| |
| ====اثبات معاد==== | | ====اثبات معاد==== |
| | =====نخست: دلیل عقلی===== |
| # [[دلیل تجرد روح]] | | # [[دلیل تجرد روح]] |
| # [[دلیل تکامل انسان]] | | # [[دلیل تکامل انسان]] |
| خط ۲۱: |
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| # [[شبهه امکان ذاتی معاد]] | | # [[شبهه امکان ذاتی معاد]] |
| # [[شبهه امکان وقوعی معاد]] | | # [[شبهه امکان وقوعی معاد]] |
| | =====دوم: دلیل نقلی===== |
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| |
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| ====فواید و آثار معاد==== | | ====فواید و آثار معاد==== |
| خط ۲۷: |
خط ۲۷: |
| # تحقق وعدهها و وعیدهای الهی | | # تحقق وعدهها و وعیدهای الهی |
| # تحقق عدل الهی | | # تحقق عدل الهی |
| ====باور به معاد ([[ایمان به آخرت]])==== | | ====[[باور به معاد]] ([[ایمان به آخرت]])==== |
| =====ضرورت باور به معاد===== | | =====ضرورت باور به معاد===== |
| =====آثار و اسباب باور به معاد===== | | =====آثار و اسباب باور به معاد===== |
| | # [[آثار باور به معاد]] |
| | |
| | ======نخست: آثار عام====== |
| | # جلب شدن رزق و روزی |
| | # هدایت شدن انسان |
| | ======دوم: آثار خاص====== |
| | * '''آثار در دنیا''': |
| | * '''آثار فردی''': |
| | # آثار فکری اعتقادی |
| | # آثار رفتاری (اخلاقی و تربیتی) |
| | # آثار روحی و روانی |
| | * '''آثار اجتماعی''': |
| | |
| | * '''آثار در آخرت''': |
| | # [[جلب غفران الهی]] |
| | # [[داخل شدن در بهشت]] |
| | # [[آسان شدن مرگ]] |
| | # [[کسب ثواب]] |
| | # [[نجات یافتن انسان]] |
| | |
| =====التزام به معاد===== | | =====التزام به معاد===== |
| | # ضرورت التزام به معاد |
| | # آثار التزام به معاد |
| | * '''اهتمام به آخرت''': |
| | # گستره اهتمام به آخرت |
| | # آثار اهتمام به آخرت |
| | |
| =====مراحل معاد===== | | =====مراحل معاد===== |
| ====باور به معاد====
| | # [[مرگ]] |
| | # [[برزخ]] |
| | # [[قیامت]] |
| | |
| ===فصل اول: مرگ (موت)=== | | ===فصل اول: مرگ (موت)=== |
| ====کلیات==== | | ====کلیات==== |
| خط ۴۳: |
خط ۷۲: |
| # [[مرگ مؤمن]] | | # [[مرگ مؤمن]] |
| # [[مرگ کافر]] | | # [[مرگ کافر]] |
| ====احتضار==== | | |
| | ====نخست: حقیقت مرگ (معناشناسی)==== |
| | |
| | ====دوم: اقسام مرگ==== |
| | =====به لحاظ تعلق به موجودات===== |
| | ======مرگ انسان====== |
| | * '''مرگ انبیا''': |
| | * '''مرگ امامان''' |
| | * '''مرگ مؤمنان''' |
| | * '''مرگ کافران''' |
| | * '''مرگ ستمکاران''' |
| | * '''مرگ گنهکاران''' |
| | |
| | ======مرگ غیر انسان====== |
| | * '''مرگ فرشتگان''' |
| | * '''مرگ اجنه''' |
| | * '''مرگ حیوانات''' |
| | * '''مرگ گیاهان''' |
| | |
| | =====به لحاظ تعلق آن به نفس و بدن===== |
| | * '''مرگ بدن''' |
| | * '''مرگ نفس''' |
| | |
| | =====به لحاظ جنس===== |
| | * '''مرگ طبیعی''' |
| | * '''مرگ به سیف''' |
| | |
| | =====به لحاظ سختی و آسانی===== |
| | * '''مرگ آسان''' |
| | * '''مرگ سخت''' |
| | |
| | =====به لحاظ طبیعت و اخترام===== |
| | * '''مرگ طبیعی''' |
| | * '''مرگ اخترامی''' |
| | |
| | =====به لحاظ اختیار و عدم اختیار===== |
| | * '''مرگ اختیاری''' |
| | * '''مرگ غیر اختیاری''' |
| | |
| | ====سوم: زمان مرگ==== |
| | |
| | ====چهارم: احتضار==== |
| # [[عوامل آسانسازی مرگ]] | | # [[عوامل آسانسازی مرگ]] |
| # [[عوامل سختی مرگ]] | | # [[عوامل سختی مرگ]] |
| # [[مشاهدات هنگام موت]] | | # [[مشاهدات هنگام موت]] |
| # [[ملک الموت]] | | # [[ملک الموت]] |
| ====سکرات مرگ====
| |
| ====قبض روح====
| |
| ====آداب و مراسم میت====
| |
| # [[تغسیل]]
| |
| # [[تشییع]]
| |
| # [[تدفین]]
| |
| # [[تلقین]]
| |
| ====انتقال روح====
| |
|
| |
|
| ===فصل دوم: قبر (برزخ)=== | | ====پنجم: سكرات مرگ==== |
| ====احوال قبر و برزخ==== | | =====کیفیت سکرات===== |
| # شب اول
| | =====شدت سکرات===== |
| | =====کاهش سکرات===== |
| | # عدم وابستگی به دنیا و شهوات |
| | # انفاق مال |
| | # پرهیز از گناه |
| | # صله رحم |
| | # نیکی به والدین |
| | # روزه روز آخر ماه رجب |
| | # انتقال محتضر به مصلی |
| | # قرائت سورههای یاسین و صافات نزد محتضر |
| | ====ششم: قبض روح==== |
| | =====کیفیت قبض روح===== |
| | # قبض روح انبیا |
| | # قبض روح امامان |
| | # قبض روح مومنان |
| | # قبض روح کافران |
| | # قبض روح حیوانات |
| | |
| | =====عوامل قبض روح===== |
| | ======خدای متعال====== |
| | ======فرشتگان الهی====== |
| | # عزرائیل |
| | # سابحات |
| | # ناشتات (قبض کننده روح مومنان عادی) |
| | # نازعات (قبض کننده روح کفار) |
| | # سابقات |
| | =====شدت و آسانی قبض روح===== |
| | # شدت قبض روح |
| | # آسانی قبض روح |
| | |
| | ====هفتم: آداب و مراسم میت==== |
| | =====[[تغسیل]]===== |
| | =====[[تشییع]]===== |
| | =====[[تدفین]]===== |
| | =====[[تلقین]]===== |
| | |
| | ====هشتم: انتقال روح==== |
| | =====[[وادی السلام]]===== |
| | =====[[وادی برهوت]]===== |
| | =====[[شبهه تناسخ]]===== |
| | ======به لحاظ سیر صعودی و نزولی====== |
| | * '''تناسخ صعودی''' |
| | * '''تناسخ نزولی''': |
| | # رسخ |
| | # فسخ |
| | # مسخ |
| | # نسخ (تناسخ) |
| | ======به لحاظ نسخ نفوس زکیه و ردیه====== |
| | # تناسخ نفوس زکیه |
| | # تناسخ نفوس ردیه |
| | ======بدون لحاظ====== |
| | # تناسخ مطلق |
| | # رجوع روح به جسد جدید |
| | |
| | ===فصل دوم: برزخ (قبر)=== |
| | ====نخست: حقیقت قبر و برزخ (معناشناسی)==== |
| | ====دوم: اثبات برزخ ==== |
| | ====سوم: اقسام برزخ ==== |
| | ====چهارم: احوال قبر و برزخ==== |
| | =====شب اول قبر===== |
| | =====سؤال قبر===== |
| | * '''به لحاظ مسؤول عنه''': |
| | # سؤال از اصول دین |
| | # سؤال از بدن |
| | # سؤال از جوانی |
| | # سؤال از عمر |
| | # سؤال از عمل |
| | # سؤال از فروع دین |
| | # سؤال از مال |
| | # سؤال از ولایت |
| | |
| | * '''به لحاظ مسؤول''': |
| | # سؤال از جن |
| | # سؤال قبر کافر |
| | # سؤال قبر مومن |
| | # سؤال قبر مستضعف |
| | |
| | * '''به لحاظ سائل''': |
| | # بشیر و مبشر |
| # نکیر و منکر | | # نکیر و منکر |
| # عذاب قبر | | |
| # فشار قبر | | * '''به لحاظ تکلیف مسؤول عنه''': |
| # سؤال قبر | | # سؤال قبر غیر مکلف |
| | # سؤال قبر مکلف |
| | # سؤال قبر ائمه |
| | # سؤال قبر انبیا |
| | |
| ====حیات برزخی==== | | ====حیات برزخی==== |
| | =====کیفیت حیات برزخی===== |
| | =====ویژگیهای حیات برزخی===== |
| | =====پاداش و کیفر برزخی (لذت و الم)===== |
| | ======پاداش برزخی====== |
| | # روضة من ریاض الجنة |
| | * '''کیفیت پاداش''': |
| | # پاداش قبر اولیای الهی |
| | # پاداش قبر مؤمنان و صالحان |
| | |
| | * '''نوع پاداش''': |
| | # سعه قبر |
| | # انس در قبر |
| | # زیارت اولیای الهی |
| | |
| | ======کیفر برزخی (عذاب قبر)====== |
| | # حفرة من حفر النار |
| | * '''کیفیت عذاب''': |
| | # عذاب قبر فاسق |
| | # عذاب قبر کافر |
| | # عذاب قبر مومن |
| | * '''نوع عذاب''': |
| | # ضیق قبر |
| | # فشار قبر (قبر کافر و قبر مومن) |
| | # وحشت قبر |
| | |
| | =====اختیار در برزخ===== |
| | =====شفاعت در برزخ===== |
| | =====تکامل در برزخ===== |
| | =====ارتباط اهل برزخ با اهل دنیا===== |
|
| |
|
| ===فصل سوم: روز قیامت=== | | ===فصل سوم: روز قیامت=== |
| خط ۱۰۳: |
خط ۲۷۶: |
| # [[اعراف]] | | # [[اعراف]] |
| # [[انتقال روح]] | | # [[انتقال روح]] |
| # [[اهتمام به آخرت]]
| |
| # [[اهل آخرت]] | | # [[اهل آخرت]] |
| # [[اهل اعراف]] | | # [[اهل اعراف]] |
| خط ۲۴۱: |
خط ۴۱۳: |
| # [[پایینترین منازل بهشت]] | | # [[پایینترین منازل بهشت]] |
| # [[کتاب اعمال]] | | # [[کتاب اعمال]] |
| # [[گستره اهتمام به آخرت]]
| |
| # [[گونههای شافعان]] | | # [[گونههای شافعان]] |
| {{پایان مدخل وابسته}} | | {{پایان مدخل وابسته}} |
| خط ۷۶۷: |
خط ۹۳۸: |
| ==فرهنگنامه دینی== | | ==فرهنگنامه دینی== |
| *'''معاد:''' بازگشت. در اصطلاح [[دینی]] یکی از پایههای اساسی [[اسلام]] و همه [[ادیان آسمانی]] است، یعنی [[عقیده]] به اینکه [[انسانها]] پس از [[مرگ]]، دوباره هنگام [[نیکان]] [[برپایی قیامت]] زنده خواهند شد و در [[روز رستاخیز]]، به حساب آنان رسیدگی شده، [[نیکان]] به [[بهشت]] و بدکاران به [[دوزخ]] خواهند رفت. معاد از [[اصول دین]] است و همه [[پیامبران]] [[مردم]] را به [[توحید]] و معاد [[دعوت]] کردهاند. حیات دوباره [[انسانها]]، هم با [[دلایل عقلی]] اثبات شده و هم به [[دلایل نقلی]] [[قرآن]] و [[حدیث]]. [[آیات]] بسیاری در [[قرآن]]، از اصل معاد و جزئیات روز [[حسابرسی]] و اوصاف [[بهشت و جهنم]] سخن گفته است. [[خداوند]] توانا، اجزای [[بدن]] [[انسانها]] را پس از پوسیدن و متلاشی شدن، دوباره جمع میکند و روحها به بدنها برمیگردد و همه گورها برخاسته به صحرای [[محشر]] میآیند تا در روز طولانی [[قیامت]] به حسابشان رسیدگی شود. گرد آمدن اجزاء بدنها و دمیده شدن روحها در آنها "[[معاد جسمانی]]" نام دارد. به [[روز قیامت]]، "روز حساب"، "روز جزا"، "عالم [[آخرت]]"، "[[رستاخیز]]" و "[[محشر]]" و "[[حشر]]" هم گفته میشود. منکران معاد، کافرند و [[عقیده]] به معاد، در [[تربیت]] روحی و [[اخلاقی]] [[انسانها]] و ایجاد [[انگیزه]] برای کار خوب و بازداشتن آنان از [[جرم]] و [[گناه]] و [[ستم]] مؤثر است<ref>[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگنامه دینی (کتاب)|فرهنگنامه دینی]]، ص۲۱۶.</ref>. | | *'''معاد:''' بازگشت. در اصطلاح [[دینی]] یکی از پایههای اساسی [[اسلام]] و همه [[ادیان آسمانی]] است، یعنی [[عقیده]] به اینکه [[انسانها]] پس از [[مرگ]]، دوباره هنگام [[نیکان]] [[برپایی قیامت]] زنده خواهند شد و در [[روز رستاخیز]]، به حساب آنان رسیدگی شده، [[نیکان]] به [[بهشت]] و بدکاران به [[دوزخ]] خواهند رفت. معاد از [[اصول دین]] است و همه [[پیامبران]] [[مردم]] را به [[توحید]] و معاد [[دعوت]] کردهاند. حیات دوباره [[انسانها]]، هم با [[دلایل عقلی]] اثبات شده و هم به [[دلایل نقلی]] [[قرآن]] و [[حدیث]]. [[آیات]] بسیاری در [[قرآن]]، از اصل معاد و جزئیات روز [[حسابرسی]] و اوصاف [[بهشت و جهنم]] سخن گفته است. [[خداوند]] توانا، اجزای [[بدن]] [[انسانها]] را پس از پوسیدن و متلاشی شدن، دوباره جمع میکند و روحها به بدنها برمیگردد و همه گورها برخاسته به صحرای [[محشر]] میآیند تا در روز طولانی [[قیامت]] به حسابشان رسیدگی شود. گرد آمدن اجزاء بدنها و دمیده شدن روحها در آنها "[[معاد جسمانی]]" نام دارد. به [[روز قیامت]]، "روز حساب"، "روز جزا"، "عالم [[آخرت]]"، "[[رستاخیز]]" و "[[محشر]]" و "[[حشر]]" هم گفته میشود. منکران معاد، کافرند و [[عقیده]] به معاد، در [[تربیت]] روحی و [[اخلاقی]] [[انسانها]] و ایجاد [[انگیزه]] برای کار خوب و بازداشتن آنان از [[جرم]] و [[گناه]] و [[ستم]] مؤثر است<ref>[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[ فرهنگنامه دینی (کتاب)|فرهنگنامه دینی]]، ص۲۱۶.</ref>. |
| ==نویسنده: آقای یوسفی==
| |
| ==مقدمه==
| |
| *معاد از [[اصول اعتقادی]] [[دین اسلام]] است که با همه [[شئون]] [[زندگی]] [[انسان]] ارتباط دارد. بر مبنای این [[باور]]، [[عمر]] [[دنیا]] زمانی به پایان میرسد و همهچیز فنا و نابود میشود و سپس دگربار آفریده خواهد شد و هستی دوباره خواهد یافت. در این میان، [[انسانها]] مورد [[حسابرسی]] قرار میگیرند و [[تکلیف]] و وضعیت [[آینده]] آنها مشخص میشود<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 717.</ref>.
| |
| *موضوع معاد با موضوع [[آخرت]] و [[قیامت]]، چندان درآمیخته است که نمیتوان تنها به یکی از آنها، جدای از دیگری، پرداخت و به [[شناخت]] رسید. [[آخرت]] پس از [[آفرینش]] و نابود شدن آن در [[قیامت]]، همزمان با معاد و [[آفرینش]] دوباره آن، آغاز میشود و تا زمانی که [[خداوند]] بخواهد، ادامه خواهد یافت. [[آخرت]] [[انسان]] [در مقابل دنیای آن] نیز با [[مرگ]] او آغاز میشود و با [[قیامت]] و معاد [زنده شدن جسمانی مجدد] و [[حسابرسی]] و [[زندگی]] در [[جهان آخرت]] تداوم مییابد. [[قیامت]] نیز، زمان فنا و نابود شدن [[جهان]]، از جمله [[انسان]] است و پایانی برای [[دنیا]] و همه موجودات، اما سرآغازی برای معاد و شروع [[جهان آخرت]]. موضوع معاد در گفتار و [[کردار]] [[علی]] {{ع}}، بهعنوان کسیکه از اعماق [[جان]] موضوع معاد را [[درک]] کرده و به آن توجه دارد، به دفعات مطرح شده است<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 717-718.</ref>.
| |
| ==[[آفرینش دنیا]] و [[آخرت]] ([[جهان هستی]] و معاد)==
| |
| *[[حضرت علی]] {{ع}} معاد، [[آخرت]] و وقوع [[قیامت]] را ادامه [[آفرینش جهان]] هستی و [[دنیا]] معرفی میکند، ولی توجه و محور [[کلام امام]] در مواردی همچون سرگذشت و [[سرنوشت]] [[دنیا]] و [[آخرت]]، [[دلیل]] [[آفرینش]]، مالک [[دنیا]] و [[آخرت]]، مقایسه و ارزیابی [[دنیا]] و [[آخرت]] و نیز دنیاجویان و آخرتپیشگان، نمود بیشتری مییابد<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 718.</ref>.
| |
| ۱. [[دنیا]] و [[آخرت]] ([[آفرینش]] و معاد) پرتوی از [[تدبیر]] [[خداوند]]: [[جهان هستی]] در سه مرحله پدیدار میشود:
| |
| #[[آفرینش]] نخستین ([[جهان]] کنونی)؛
| |
| #فنا و نابودی کامل همه اجزای [[آفرینش]]؛
| |
| #معاد و [[آفرینش]] مجدد.
| |
| *[[امام علی]] {{ع}} میفرماید: [[خداوند سبحان]] پس از فنای [[دنیا]] یگانه مانَد و کس با او نباشد و همانگونه که در آغاز یگانه و تنها بود، پس از فنای آن هم چنین باشد<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۲۸</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 718.</ref>.
| |
| *در این بین، [[دلیل]] اصلی [[آفرینش]]، [[لطف]]، [[قدرت]] و [[اراده خداوند]] است که به حفظ و [[تدبیر]] [[جهان هستی]] پرداخته: اما [[خداوند سبحان]]، آن [[جهان هستی]] را از روی [[لطف]] خود [[تدبیر]] کرده و به امر خود نگه داشته و با [[قدرت]] خود، [[استوار]] و [[نیکو]] ساخته است<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۲۸</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 718.</ref>.
| |
| *[[انسان]] نیز همگام با [[جهان هستی]] در هر سه مرحله [[آفرینش]]، محکوم و مقهور [[مشیت]]، تقدیر و [[تدبیر]] [[خداوند]] است: بندگانی که با [[قدرت]] [[خداوند]] آفریده شوند و بیاراده خویش پرورش یابند و در قبضه [[احتضار]] گرفتار آیند و در [[دل]] [[گور]] جای گیرند و متلاشی و نابود شوند. سپس جداگانه برانگیخته شوند و [[پاداش]] خود را ببینند و حسابشان مشخص شود<ref>نهج البلاغه، خطبه ۸۳</ref>. گویی [[انسان]] و هستی هیچ دخالت و قدرتی در این امور ندارند و همهچیز در سیطره [[خداوند]] است<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 718.</ref>.
| |
| ۲. '''ارتباط [[آفرینش]] و معاد ([[دنیا]] و [[آخرت]]):''' [[امام]] {{ع}} [[آفرینش]] و معاد را دو امر مرتبط و در کنار هم میداند و در مواردی به این [[پیوستگی]] و [[همبستگی]] اشارت دارد:
| |
| #'''[[یگانگی]] مالک [[جهان آفرینش]] و معاد:''' [[خداوند]] مالک [[جهان آفرینش]] و معاد است. حرکت [[جهان آفرینش]] رو بهسوی [[جهان]] [[آخرت]] دارد و [[صاحب]] و مالک هر دو یکی [[خداوند]] است. فرمود: آنکه میآفریند همان است که میمیراند و آنکه نابود میسازد آن است که بازمیگرداند<ref>نهج البلاغه، نامه ۳۱</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 718.</ref>.
| |
| #'''[[دنیا]]، نشانه [[آخرت]]:''' و در شگفتم از کسی که منکر [[روز رستاخیز]] است، حال آنکه پدید آمدن نخستین را میبیند<ref>نهج البلاغه، حکمت ۱۲۶</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>.
| |
| #'''[[آخرت]]، [[هدف]] [[آفرینش دنیا]]:''' [[هدف]] از [[آفرینش دنیا]] حرکت بهسوی [[آخرت]] است. ظرف [[دنیا]] برای اهداف عالی [[آفرینش]] ظرفی کوچک و کمگنجایش است. [[دنیا]] بستری را ماند که مظروف خود را مدت زمانی اندک در خود نگاه میدارد تا پرورش یابد و استعداد ظرفی بزرگتر و [[برتر]] را در خود اینجاد کند. از اینرو فرمود:[[دنیا]] را برای جز [[دنیا]] آفریدهاند نه برای [[دنیا]]؛ و راهگذاری است به [[جهان]] فردا<ref>نهج البلاغه، حکمت ۴۶۳</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>.
| |
| #'''مقایسه [[دنیا]] و [[آخرت]]:''' [[دنیا]] کوتاه و گذرا و [[آخرت]] نزدیک و پیشرو و جاودان است. امروزِ [[دنیا]] به مثابه اردوی [[آمادهسازی]] است و فردای [[آخرت]]، مسابقهای بزرگ برپا میشود. [[پاداش]] برندگان، [[بهشت]] و [[کیفر]] عقبماندگان، [[آتش]] است: [[دنیا]] روی در رفتن دارد و بانگ وداع برداشته و [[آخرت]] روی در آمدن دارد و بهناگاه رخ مینماید. بدانید که امروز، روز به تن و توش آوردن اسبان است و فردا روز مسابقه. هر که پیش افتد، [[بهشت]] جایزه اوست و هر که واپس ماند، [[آتش]] [[جایگاه]] او<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۸</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>.
| |
| #'''روش راحت رسیدن به [[آخرت]]:''' سبکباری [[انسان]] از [[گناه]] موجب سبک رسیدن [[انسان]] به [[هدف]] [[آخرت]] است: سبکبار باشید تا زودتر برسید، که پیشرفتگان را بداشتهاند و در [[انتظار]] رسیدن شما نگاه داشتهاند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۱</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>.
| |
|
| |
|
| ==ارزیابی [[دنیا]] و [[آخرت]]== | | == معاد از [[فرهنگ شیعه]] == |
| *[[امام علی]] {{ع}} گاه با توصیف [[دنیا]] و [[آخرت]]، به ارزیابی و مقایسه آن دو میپردازد، نتیجه این ارزیابی و مقایسه، [[برتری]] [[آخرت]] نسبت به دنیاست. برخی نمونههای این ارزیابی عبارتاند از<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>:
| | کلمه "معاد" را معانی متعددی است: برگردیدن، بازگشتن، رد کردن، بازگردانیدن، بازگشتگاه، آن [[جهان]]، رستاخیز و مقابل معاش. نزد [[متکلمان]]، معاد به معنای [[حشر]] است و آن بر دو نوع است: [[جسمانی]] و [[روحانی]]. [[معاد جسمانی]] از [[ضروریات دین]] است و منکر آن از [[دین]] بیرون است<ref>المعاد فی الکتاب و السنة، ۲۲۷- ۲۲۳؛ القول السدید فی شرح التجرید، ۳۸۴؛ معاد از دیدگاه قرآن، حدیث، فلسفه، ۱۸۸۸.</ref>. [[انسان]] مرکب از [[روح]] و بدن است. با پایان یافتن عمر [[دنیایی]] به [[عالم برزخ]] میرود. چون قیامت در میرسد، باری دیگر با [[جسم]] و روح خویش زنده میشود و برای [[محاسبه]] به [[محشر]] درمیآید و اگر [[نیکوکار]] باشد، [[منعم]] میشود و اگر [[بدکار]] باشد، به [[کیفر]] میرسد<ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص۴۱۲-۴۱۳.</ref>. |
| #'''[[تبیین]] و توصیف [[امور دنیا]] و [[آخرت]]:''' [[امام]] {{ع}} با توصیف برخی [[امور دنیوی]] و اخروی، بر ترجیح امور اخروی تأکید دارد: هرچه [[دنیایی]] است، شنیدنش بزرگتر از دیدن اوست و هر چه آخرتی است، دیدنش بزرگتر از شنیدن آن<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۱۴</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 719.</ref>.
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| #'''تلخیها و شیرینیهای [[دنیا]] و [[آخرت]]:''' [[امام]] {{ع}} تلخیها و سختیهای [[دنیا]] را در برابر راحتی [[انسان]] در [[آخرت]]، شیرین بیان میکند. مَثَل [[آدمی]] در [[دنیا]]، مَثَل [[کشاورزی]] است که هنگام کاشت به خود [[سختی]] میدهد تا هنگام برداشت محصولی [[نیکو]] درو کند. از اینرو سختیهایی که [[انسان]] در راه رسیدن به [[سعادت اخروی]] [[تحمل]] میکند، در برابر آنچه بهدست میآورد، [[بهایی]] اندک است. [[امام]] {{ع}} بهای [[جان]] [[آدمی]] را تنها [[بهشت]] میداند و سفارش میکند که [[انسانها]] خود را جز به [[بهشت]] نفروشند<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 720.</ref>.
| | [[فلاسفه]] درباره [[معاد جسمانی]] بحثهای مفصلی پیش کشیده و با اشکالاتی [[عقلی]] برخوردهاند. یکی از این اشکالات اصل "المعدوم لایعاد" است بدین معنا که آنچه معدوم شود، قابل اعاده نیست. بدین روی، برای حل این مسئله به راههای دیگر جز [[عقل]] [[متوسل]] شدهاند. [[متشرعان]] و بیشتر [[متکلمان]]، معاد جسمانی را از باب [[تعبد]] پذیرفتهاند و بر آناند که [[خداوند]] [[قادر]] است [[بندگان]] را باری دیگر بیافریند همان سان که نخست آفرید. [[ابن سینا]] بر آن رفته است که [[اثبات]] معاد جسمانی از راه [[اخبار]] و [[آیات]] آسان است؛ ولی آن را بدان ترتیب که مورد بحث فلاسفه است نمیتوان از راه عقل ثابت کرد<ref>شفا، ۲/ ۴۴۶ و ۶۳۴.</ref>. ملا صدرای شیرازی کوشیده است به این مسئله با همان معنا که [[شرایع]] بیان کردهاند، صورت [[فلسفی]] ببخشد آن سان که نه [[قواعد]] فلسفی بر هم خورد و نه در اصول شرایع خللی پدید آید<ref>اسفار، ۴/ ۱۵۱- ۱۴۸، ۱۵۸، ۱۲۸، ۱۲۹، ۱۴۶ و ۲/ ۶۲، ۶۶ و ۶۹ به نقل از فرهنگ معارف اسلامی، ۴/ ۲۶۴- ۲۶۲.</ref>.<ref>فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه، ص۴۱۳.</ref> |
| #'''توصیف [[دنیا]] ([[دنیا]] گذرگاه [[آخرت]]):''' [[انسانها]] همه از مسیر [[زندگی دنیوی]] به [[سعادت]] یا [[شقاوت]] اخروی میرسند. از این نظرگاه [[امام]] به توصیف [[دنیا]] پرداخته است. دنیای [[پرهیزکاران]] [[دنیایی]] پر از [[نیکی]] و [[عدل و داد]] است که آنان را بهسوی حیاتی [[نیکو]] و جاودان [[هدایت]] میکند:[[دنیا]] برای کسی که گفتارش را راست انگارد، سرای [[راستی]] است و برای کسی که [[حقیقت]] آنرا دریابد، سرای عافیت است و برای کسی که از آن برای آخرتش توشه برگیرد، سرای [[توانگری]] است و برای کسی که از آن [[پند]] پذیرد، سرای [[اندرز]] و [[موعظه]]، [[دنیا]] نمازگاه [[دوستان]] [[خدا]]، مصلای [[ملائکه]] [[خدا]]، محل [[نزول وحی]] [[خدا]] و بازارگاه [[دوستان]] خداست که در آن کسب [[رحمت]] کنند و سودشان [[بهشت]] است<ref>نهج البلاغه، حکمت ۱۲۶</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 720.</ref>.
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| *[[انسانها]] در مسیر [[زندگی]] دوگونه نگاه به [[دنیا]] دارند: [[مردم]] [[دنیا]] در کار [[دنیا]] دوگونهاند: آنکه برای [[دنیا]] کار کند و [[دنیا]] او را از آخرتش بازدارد، بر بازماندهاش از درویشی ترسان است... و آنکه در [[دنیا]] برای پس از [[دنیا]] کار کند، پس بیآنکه کار کند بهره وی از [[دنیا]] بهسوی او تازد و هر دو نصیب را فراهم کرده و هر دو [[جهان]] را بهدست آورده. چنین کس را نزد [[خدا]] آبروست و هرچه از [[خدا]] خواهد از آنِ اوست<ref>نهج البلاغه، حکمت ۲۶۹</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 720.</ref>.
| | == معاد در [[فرهنگ]] [[مطهر]] == |
| ==راهکار [[اصلاح]] امور==
| | برای [[آخرت]] هم لفظ معاد نیامده است. مادهاش: {{متن قرآن|هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ}}<ref>«اوست که (آفرینش را) میآغازد و باز میگرداند» سوره بروج، آیه ۱۳.</ref>. {{متن قرآن|يُبْدِئُ وَيُعِيدُ}} معنایش این است که «بر میگرداند». {{متن قرآن|يُبْدِئُ وَيُعِيدُ}} یعنی آغاز کرده است و باز میگرداند. یعید در اینجا معنای [[رجوع]] میدهد<ref>شرح مبسوط منظومه، ج۲، ص۲۵۸.</ref>. یکی از اصول [[جهانبینی اسلامی]] که از ارکان [[ایمانی]] و [[اعتقادی]] [[دین اسلام]] است، اصل [[ایمان]] به [[زندگی]] جاوید و [[حیات اخروی]] است. [[ایمان به آخرت]] [[شرط مسلمانی]] است؛ یعنی اگر کسی این ایمان را از دست بدهد و [[انکار]] کند از زمره [[مسلمانان]] خارج است. [[پیامبران الهی]] - بدون استثناء- پس از اصل [[توحید]]، مهمترین اصلی که [[مردم]] را به آن متذکّر کردهاند و ایمان به آن را از مردم خواستهاند، همین اصل است که در اصطلاح [[متکلّمان اسلامی]] به نام “اصل معاد”، معروف شده است<ref>مجموعه آثار، ج۲، ص۵۰۱.</ref>.<ref>[[محمد علی زکریایی|زکریایی، محمد علی]]، [[فرهنگ مطهر (کتاب)|فرهنگ مطهر]]، ص۷۴۰.</ref> |
| *پیوندی که در بیان [[امام]] میان [[دنیا]] و [[آخرت]] وجود دارد، [[انسان]] نیکاندیش را بر آن میدارد که بیش از [[امور دنیوی]]، [[آخرت]] را مدنظر قرار دهد و در راه آن بکوشد.از اینرو چنین انسانی برخی از کامرواییهای [[دنیا]] را به کناری مینهد و در راه [[اصلاح]] [[آخرت]] میکوشد. در این صورت بنابر [[سنت الهی]]، [[خداوند]] [[امور دنیوی]] [[انسان]] را سامان میدهد: و هر کس امور [[آخرت]] خود را [[اصلاح]] کند، [[خداوند]] امور دنیای او را [[اصلاح]] کند<ref>نهج البلاغه، حکمت ۸۹</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 720.</ref>.
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| ==[[سفر آخرت]] و [[قیامت]] و رهتوشه آن==
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| *[[امام علی]] {{ع}} [[آخرت]] و [[قیامت]] را بهسان سفری میداند که باید پیوسته به یاد آن بود و برای آن [[آمادگی]] داشت و رهتوشه آنرا فراهم کرد<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 720.</ref>.
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| #'''بیان [[سفر آخرت]] و [[قیامت]]:'''
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| ##'''یاد سفر:''' [[مردم]] زمانه چهار گونهاند: سه دسته اول به شیوههای مختلف در [[زندگی دنیوی]] خویش فرورفتهاند، اما دسته چهارم که به [[زندگی پاک]] دست یافتهاند، [[سفر آخرت]] را همیشه در یاد خویش زنده نگاه میدارند: گروهی اندک باقی ماندهاند که یاد [[قیامت]]، چشمهایشان را بر همهچیز فرو بسته است<ref>نهج البلاغه، خطبه ۳۲</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 721.</ref>.
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| ##'''ترسیم سفر:''' [[امام علی]] سفر آخرتپیشگان و [[دنیاطلبان]] را به تصویر میکشد: آنانکه [[دنیا]] را واقعبینانه نگریستند... مسافرانی را مانند که از سرزمینی سخت و قحطیزده به تنگ آمده و آهنگ مرز و بومی پرنعمت و حاصلخیز کرده و رهسپار منطقهای پر [[آب]] و گیاه گشتهاند... ولی آنانکه در چنگال [[فریب]] [[دنیا]] [[اسیر]] شدند، چونان مردمی هستند که در منزلی فراخ و آسوده روزگار میگذراندند و ناگهان بهسوی خانهای تنگ و رنجآور بیرون رانده شدند که روزشان شب و شبشان بیسحر است. پس هیچ چیز زشتتر و جانکاهتر از جدایی "منزل سابق" و ورود اجباری به "منزل لاحق" نیست<ref>نهج البلاغه، نامه ۳۱</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 721.</ref>.
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| ##'''[[آمادگی]] برای سفر و [[ضرورت]] آن:''' [[امام]] {{ع}} [[انسانها]] را برای [[سفر آخرت]] آماده میکند: آماده و مجهز شوید برای سفر [[[آخرت]]]<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۰۴ و نیز خطبههای ۱۱۳ و ۲۲۳</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 721.</ref>.
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| #'''رهتوشه [[سفر آخرت]] و [[قیامت]]:''' پس برای [[سفر آخرت]] باید رهتوشهای فراهم آورد. [[امام]] {{ع}} به [[انسانها]] سفارش میکند که برای [[سفر آخرت]] توشه برگیرند و نیز، [[بهترین]] و بدترین اندوخته را معرفی میکند<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 721.</ref>.
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| ##'''فراخوانی به رهتوشه برگرفتن:''' [[امام]] {{ع}} در چند مورد به زاد و توشه گرفتن [[دعوت]] میکند: پس در این [[دنیا]]، رهتوشهای برگیرید که شما را فردای [[رستاخیز]] نگهبان باشد<ref>نهج البلاغه، خطبه ۶۴ و نیز خطبه ۲۸</ref>. در توصیف [[پرهیزکاران]]، توشهبرگیری را از ویژگیهای آنان میداند: مهلت [[دنیا]] را [[غنیمت]] شمرد و پیش از [[مرگ]] خود را آماده ساخت و از [[اعمال]] [[نیکو]]، توشه [[آخرت]] برگرفت<ref>نهج البلاغه، خطبههای ۸۶ و ۲۳۰ و نامه ۳۱</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 721.</ref>.
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| ##'''[[ضرورت]] توشه برگرفتن:''' [[امام علی]] {{ع}} [[ضرورت]] سفارش خود را اینگونه بیان میدارد: در روزگار فناپذیر، برای ایام [و [[آخرت]]] جاوید، توشه فراهم آورید، زیرا شما بهسان کاروانی متوقف هستید که نمیدانند چه وقت [[فرمان]] به حرکت مییابند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۵۷</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| ##'''بدترین و [[بهترین]] رهتوشه:''' [[امام]] {{ع}} بدترین رهتوشه معاد را [[دشمنی]] با [[بندگان خدا]] میداند<ref>نهج البلاغه، حکمت ۲۲۱</ref> و تقوای [[خداوند]] را [[برترین]] [[ذخیره]] [[آخرت]] معرفی میکند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۳۰</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| ==توصیف معاد (و [[آخرت]] و [[قیامت]])==
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| *[[امام علی]] {{ع}} به توصیف معاد و ترسیم صحنههای [[قیامت]] و ذکر نشانههای [[آخرت]] و بیان ویژگیها و [[دلیل]] وقوع و [[ضرورت]] [[شناخت]] آن میپردازد<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| #'''توصیف معاد و ترسیم [[قیامت]]:''' [[امام علی]] {{ع}} به فرا رسیدن [[قیامت]] و [[برانگیخته شدن]] [[انسانها]] و ترسیم صحنههای شکوهمند و وحشتزای [[قیامت]] و بیان حالات [[مردم]] میپردازد: چون رشته [[کارها]] از هم گسست و روزگاران سپری شد و [[رستاخیز]] [[مردم]] فرا رسید، [[خداوند]] آنها را از درون گورها یا آشیانههای پرندگان یا کنام درندگان یا هر جای دیگر که [[مرگ]] بر زمینشان زده است، بیرون آورد<ref>نهج البلاغه، خطبه ۸۳</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| #'''توصیف حالات [[مردم]] در [[قیامت]]:'''[[مردم]] در آن روز ([[روز رستاخیز]]) خاضعانه بر پای ایستادهاند و عرق از چهرههایشان به دهانهایشان روان است. لرزش [[زمین]] میلرزاندشان. [[نیکو]] حالترین آنها کسی است که برای خود جای پایی بیابد و برای [[آسایش]] خود مکانی فراخ<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۰۲</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| #'''ترسیم صحنههای [[قیامت]]:''' [[آسمان]] را در جنبش آورد و بشکافد و [[زمین]] را به لرزه درآورد و باژگونه کند و کوههایش را از جای برکَنَد و پراکنده سازد و از هیبت جلال او و از [[خوف]] سطوت او بر یکدیگر کوبیده شوند و هر چه در آنهاست بیرون افتد و آنها را پس از کهنه شدن، نو کند و پس از پراکنده، گردآورد<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۰۹ و نیز خطبههای ۱۵۷، ۱۹۰ و ۱۹۵</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| #'''توصیف [[بهشت]]:''' اگر بهچشم [[دل]] خود، توصیفی را که از [[بهشت]] برای تو میشود بنگری، از آن که دنیاست، از خواهشها و لذتها و مناظر آراستهاش، [[دل]] برخواهی کند و اندیشهات حیران ماند. چون در آواز بههم خوردن برگهای درختانش بیندیشی، درختانی که برکنارههای رودهایش روییدهاند و ریشه در تپههای مشک فروبردهاند، خوشههای مرواریدتر از شاخههای نازک و درشت آنها آویزان است. میوههای گونهگون در غلاف گلها جای گرفتهاند و بیهیچ رنجی آنها را [[توان]] چید و همانگونه که چیننده را آرزوست و در درسترسش قرار میگیرند. برای [[بهشتیان]] در پیرامون قصرهایشان عسلهای پالوده و شرابهای صافی در گردش آرند. اینان مردمی بودهاند که در این دنیای فانی، مشمول [[کرامت]] پروردگارشان بودهاند تا به سرای [[آخرت]] رسیدند و از [[رنج]] سفر بر آسودند. ای شنونده، اگر برای رسیدن به آن مناظر زیبا [[دل]] مشغول داری، هر آینه به [[شوق]] وصال آن، [[جان]] از تنت به پرواز آید و برای رفتن و رسیدن چنان شتاب کنی که از همین مجلس من رخت به کنار مردگان کشی<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۶۴</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 722.</ref>.
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| #'''تصویری از [[جهنم]]:''' و دشوارتر چیز آنجا، بلای فرود آمدن است در گرمی [[جهنم]] و بریان شدن در آتشی که زبانه زند، پی هم، و تیز گشتن بانگ آن هر دم. نه لختی آسوده بودن و نه راحتی، تا بدان [[رنج]] را زدودن؛ نه نیرویی بازدارنده تا در [[امان]] ماند و نه مرگی تا او را از این [[بلا]] برهاند و نه خوابی سبک تا آرامشی رساند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۸۲</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| #'''نزدیک بودن [[قیامت]]:''' [[امام]] {{ع}} وقوع امر [[قیامت]] را نزدیک و ماندن در [[دنیا]] را کوتاه میداند: زمان کوچ [و سفر [[قیامت]]] نزدیک است<ref>نهج البلاغه، حکمت ۱۸۷ نیز حکمت ۱۶۸</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| #'''سرای [[آخرت]]، سرای باقی:''' [[آخرت]] برای ماندن است<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۰۳ و نیز خطبههای ۱۳۳ و ۱۸۸</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| #'''[[دنیا]] محل عمل، [[قیامت]] محل [[حسابرسی]]:''' امروز، روز عمل است نه حساب و فردا، روز حساب است نه عمل<ref>نهج البلاغه، خطبه ۴۲</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| ==[[مرگآگاهی]]==
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| *[[مرگ]] و پایان [[زندگی]] این جهانی امری حتمی است که همه [[انسانها]] از وقوع آن آگاهاند، گرچه [[انسانها]] به [[دلیل]] کامجوییها و [[غرق]] شدن در فریبایی [[دنیا]] از آن غافل میشوند و خود را به [[غفلت]] میزنند. [[امام]] بر این موضوع تأکید دارد و هشدار میدهد: به [[خدا]] [[سوگند]]، سخنی است به جد، نه بازیچه، سخنی است راست، نه [[دروغ]]؛ و آن، سخن [[مرگ]] است، که چاوش آن بانگ [[دعوت]] خد به گوش همه رسانید و ساربان خداخوانش مسافران را با شتاب فراخواند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۳۲</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| *فرارسیدن زمان [[مرگ]] و آغاز سفر [[انسان]] به [[جهان آخرت]] امری ضروری و حتمی است و جز [[خداوند]] هیچکس از زمان و شرایط و کیفیت وقوع آن [[آگاهی]] ندارد. از اینرو در سفارشهای خود به [[امام حسن مجتبی]] {{ع}} فرمود: تو صید در کمین نشسته صیادی که هیچت گریزگاهی نیست؛ پس بههوش باش و بترس از اینکه [[مرگ]] درحال [[گناه]] و [[زشتی]] در رسد<ref>نهج البلاغه، نامه ۳۱</ref>. حال که [[سفر آخرت]]، سفری حتمی و طولانی است، پس [[آدمی]] باید خود را برای این سفر آماده کند: هر که دوری سفر را در نظر آورد، خد را برای آن مهیا دارد<ref>نهج البلاغه، حکمت ۲۸۰</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 723.</ref>.
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| ==راههای [[آخرتگرایی]]==
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| *[[امام]] {{ع}} برای گرایش به [[آخرت]]، راهکارهایی ارائه میدهد، همچون عمل و [[تلاش]] در [[دنیا]] [در مسیر [[آخرت]]]، برخورداری از فرصتهای آن همچون [[توبه]] و نیز پرهیز از [[گناهان]] و پرداختن به [[طاعت]] [[خداوند]] و...<ref>نهج البلاغه، خطبه ۲۳۷</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 724.</ref>.
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| ==معاد و [[حسابرسی]]==
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| *[[حسابرسی]] از ویژگیهای اصلی معاد است: ... فردا، روز حساب است نه عمل<ref>نهج البلاغه، خطبه ۴۲</ref>.
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| *[[حسابرسی]] در معاد، با مطالبی همراه است:
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| #'''[[حسابرسی]] همه افراد:''' شخصی از [[امام]] پرسید که [[خداوند]] چگونه از [[مردم]] حساب میکشد، در حالیکه [[مردم]] او را نمیبینند؟ [[امام]] فرمود: همانگونه که روزیشان میدهد و حال آنکه نمیبینندش<ref>نهج البلاغه، حکمت ۳۰۰</ref>. همانگونه که [[خداوند]] [[رزق و روزی]] افراد را ضمانت کرده است و در هر شرایطی آنرا [[اجابت]] میکند و آنان او را نمیبینند، همانگونه به حساب و کتاب آنها نیز رسیدگی میکند<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 724.</ref>.
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| #'''[[حسابرسی]] دقیق همه [[اعمال]]:''' [[اعمال]] و رفتار همه [[انسانها]] در [[دنیا]] موجب [[حسابرسی]] سخت در [[قیامت]] است:...در [[حلال]] [[دنیا]] حساب است و در حرامش، عقاب<ref>نهج البلاغه، خطبه ۸۲</ref>. همه اعمال [[دنیا]] در [[آخرت]] [[محاسبه]] میشود. ([[خداوند]] شما را) را به حساب آنچه گفتهاید یا کردهاید خواهد رساند<ref>نهج البلاغه، خطبه ۸۳</ref>. و این [[محاسبه]] بسیار دقیق است: [[خداوند تعالی]]، شما بندگانش را از اعمالتان میپرسد، چه [[خرد]] باشد و چه کلان، چه [[آشکار]] و چه [[پنهان]]<ref>نهج البلاغه، نامه ۲۷</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 724.</ref>.
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| ==[[احوال انسانها در قیامت]]==
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| *[[امام علی]] {{ع}} برخی حالات [[انسانها]] را در [[قیامت]] توصیف میکند<ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 724.</ref>.
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| #'''توصیف احوال عموم افراد:''' [[مردم]] در آنروز خاضعانه بر پای ایستادهاند و عرق از چهرههایشان به دهانهایشان روان است. لرزش [[زمین]] میلرزاندشان. نیکوحالترین آنها کسی است که برای خود جای پایی بیابد و برای [[آسایش]] خود مکانی فراخ<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۰۲ و نیز خطبه ۸۳</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 725.</ref>.
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| #'''وصف حال اهل [[طاعت]] و اهل [[معصیت]]:''' [[انسانها]] پس از حسابرسی در [[قیامت]] به دو دسته اهل [[طاعت]] و اهل [[معصیت]] تقسیم میشوند. [[امام]] {{ع}} حالات هر یک را توصیف میکند: اما آنان را که اهل طاعتاند، در جوار خویش، [[پاداش]] دهد و در سرای خود جاودان گرداند. جایی که فرود آمدگانش رخت به جای دیگر نبرند و احوالشان دگرگون نشود و [[ترس]] به سراغشان نیاید و [[بیمار]] نگردند و با خطری رویاروی نشوند و [[رنج]] سفر [[تحمل]] نکنند. اما [[معصیتکاران]] را در بدترین خانهها فرود آورد و زنجیر به گردنهایشان بسته شود، آنسان که پیشانیهایشان رسد. جامهای از قطران و تکههای [[آتش]] سوزان بر آنها پوشند. گرفتار [[عذاب]] شوند، عذابی سخت و سوزان. در خانهای محبوس شوند، در آتشی غران با نفیری وحشتآور. چون زبانهاش بالا گیرد و بانگی هولناک از آن برآید، گرفتار آن، رخت به جایی نتواند برد و [[اسیر]] آن را کس قدیه [[آزادی]] ندهد و بندهایش را کس نگشاید. [[زندانیان]] را مدتی نیست که به پایان رسد و برای آن [[قوم]] زمانی نیست که سرآید<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۰۹</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 725.</ref>.
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| #'''توصیف احوال ستمکاران:''' احوال [[ستمگران]] در [[قیامت]]، بسی سختتر از کسانی است که در [[دنیا]] بر آنها [[ستم]] روا داشتند. روز بازخواست ستمدیده بر [[ستمکار]]، سختتر است از روز [[قدرت]] [[ستمکار]] بر ستمدیده<ref>نهج البلاغه، حکمت ۲۴۱</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 725.</ref>.
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| #'''توصیف [[بهشتیان]]:''' [[امام علی]] {{ع}} در خطبهای، پس از ترسیم صحنههای [[قیامت]] و ذکر نشانههای آن، به توصیف [[اهل بهشت]] در [[دنیا]] و [[آخرت]] میپردازد: و آنانرا که از پروردگارشان ترسیدهاند گروهگروه به [[بهشت]] میبرند. از [[عذاب]] ایمناند و از [[عتاب]] و [[سرزنش]] آزاد و از [[آتش]] دور. سرایشان مطمئن و از [[جایگاه]] و قرارگاه خود [[خشنود]]. اینان، کسانی بودهاند که اعمالشان در این [[دنیا]] [[پسندیده]] بود و چشمانشان اشکبار. آنکه به یافتن [[آب]] [[اطمینان]] دارد، هرگز از [[تشنگی]] هلاک نمیشود...<ref>نهج البلاغه، خطبه ۱۹۰</ref><ref>[[سید حسین دینپرور|دینپرور، سید حسین]]، [[دانشنامه نهج البلاغه ج۲ (کتاب)|دانشنامه نهج البلاغه]]، ج۲، ص 725.</ref>.
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| ==پانویس== | | ==پانویس== |
| {{یادآوری پانویس}} | | {{پانویس}} |
| {{پانویس2}}
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