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| {{ویرایش غیرنهایی}}
| | #تغییر_مسیر [[لشکر]] |
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| : <div style="background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">اين مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی میشود:</div>
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| : <div style="background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">[[سپاه در قرآن]] | [[سپاه در حدیث]] | [[سپاه در فقه اسلامی]] | [[سپاه در فقه سیاسی]] | [[سپاه در معارف دعا و زیارات]] | [[سپاه در معارف و سیره سجادی]] | [[سپاه در معارف و سیره رضوی]]</div>
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| : <div style="background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">در این باره، تعداد بسیاری از پرسشهای عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل '''[[سپاه (پرسش)]]''' قابل دسترسی خواهند بود.</div>
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| ==مقدمه==
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| پس از شکلگیری [[حکومت اسلامی]] در [[مدینه]]، [[پیامبر]]{{صل}} درصدد تشکیل نیروهای رزمی برآمد. با گذشت زمان، این نیروها در امور [[جنگی]]، از تجربههای کافی برخوردار گشتند و همین امر، [[زمینهساز]] سپاهی [[عظیم]] از [[قبایل عرب]] - به ویژه [[مردم مدینه]]، طایف و دیگر [[شهرها]] - گردید. اوج شکلگیری سپاه [[منظم]] و منسجم [[اسلام]] در [[فتح مکه]] بود که برخی از واحدهای آن عبارت بودند از<ref>تاریخ التمدن الاسلامی، ج۱، ص۱۶۱.</ref>:
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| #سپاه هزار نفری از [[بنی سلیم]]؛
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| #سپاه پانصد نفری به [[فرماندهی]] [[زبیر بن عوام]] از [[مهاجران]]؛
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| #سپاه پانصد نفری از بنی کعب؛
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| #سپاه هزار نفری از تیره مزینه؛
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| #سپاه هشتصد نفری از تیره [[جهینه]] و.... | |
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| تمامی این [[سپاهیان]]، دارای [[فرماندهی]] [[قوی]] و نیروهای منسجم و [[منظم]] سازمان یافته بودند. مهمترین گروه از این نیروها، حدود پنج هزار تن از رزمآوران بودند که با دو هزار سرباز زرهپوش و ساز و برگ و [[سلاح]] کامل، همراه با تعداد زیادی اسبان [[تندروی]] [[عربی]] و شتران سرخ مو، تشکیل یافت و نام دیگر آن "کتیبۀ خضرا" - [[لشکر]] سبز - بود<ref>المغازی، ح۲، ص۸۰۱-۷۷۹؛ شرح نهج البلاغه، ج۱۷، ص۲۷۱-۲۷۰.</ref>. چنین سپاه عظیمی، پشتوانۀ [[سیاسی]] و [[امنیتی]] مهمّی بود که [[کافران]] را به [[تسلیم]] واداشت. [[امام علی]]{{ع}}، نیروهای نظامی و [[ارتش]] [[قوی]] را عامل قوام و دوام [[حکومت]] و سبب [[عزت]] [[دین]]، [[امنیت]] و [[استقلال]] [[دارالاسلام]] میداند<ref>نهج البلاغة، نامۀ ۵۳.</ref><ref>[[اباصلت فروتن|فروتن، اباصلت]]، [[علی اصغر مرادی|مرادی، علی اصغر]]، [[واژهنامه فقه سیاسی (کتاب)|واژهنامه فقه سیاسی]]، ص ۱۲۱.</ref>.
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| ==منابع==
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| * [[پرونده:11677.jpg|22px]] [[اباصلت فروتن|فروتن، اباصلت]]، [[علی اصغر مرادی|مرادی، علی اصغر]]، [[واژهنامه فقه سیاسی (کتاب)|'''واژهنامه فقه سیاسی''']]
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| ==پانویس==
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| [[رده:سپاه]]
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| [[رده:مدخل]]
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