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| == فهرست معارف و عقاید == | | == فهرست [[معارف]] و [[عقاید]] == |
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| === بخش دوم: [[خداشناسی]] === | | === بخش دوم: [[خداشناسی]] === |
| ==== درس سوم: [[دلایل]] وجود [[خداوند]] - [[برهان]] [[نظم]] (۱)==== | | ==== درس سوم: [[دلایل وجود خداوند]] - [[برهان نظم]] (۱)==== |
| * تقرير [[برهان]] [[نظم]] | | * تقریر برهان نظم |
| * [[برهان]] [[نظم]] در نگاه [[دانشمندان]] | | * برهان نظم در نگاه [[دانشمندان]] |
| * [[برهان]] [[نظم]] در [[آیات]] و [[روایات]] | | * برهان نظم در [[آیات]] و [[روایات]] |
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| * [[نشانهها]] در [[آفرینش انسان]] | | * [[نشانهها]] در [[آفرینش انسان]] |
| * [[نشانهها]] در [[آفرینش]] [[زمین]]، [[خورشید و ماه]] | | * نشانهها در [[آفرینش زمین]]، [[خورشید و ماه]] |
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| * تأثیر [[معنوی]] در توجه به نشانههای [[الهی]] | | * [[تأثیر معنوی]] در توجه به [[نشانههای الهی]] |
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| ==== درس پنجم: [[دلایل]] وجود [[خداوند]] - [[گواهی]] [[فطرت]] (۱)==== | | ==== درس پنجم: دلایل وجود خداوند - [[گواهی]] [[فطرت]] (۱)==== |
| * تعریف [[معرفت]] [[فطری]] | | * تعریف [[معرفت]] [[فطری]] |
| * معنای [[فطرت]] | | * معنای فطرت |
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| * ویژگی و آثار [[معرفت]] [[فطری]] | | * ویژگی و [[آثار معرفت]] فطری |
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| ==== درس ششم: [[دلایل]] وجود [[خداوند]] - [[گواهی]] [[فطرت]] (۲)==== | | ==== درس ششم: دلایل وجود خداوند - گواهی فطرت (۲)==== |
| * راههای [[ظهور]] و [[شکوفایی]] [[فطرت]] | | * راههای ظهور و شکوفایی فطرت |
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| ==== درس هفتم: [[توحید]] و [[یگانگی خداوند]] ==== | | ==== درس هفتم: [[توحید]] و [[یگانگی خداوند]] ==== |
| * اهمیت و [[جایگاه]] [[توحید]] در [[کتاب و سنت]] | | * اهمیت و جایگاه [[توحید]] در [[کتاب و سنت]] |
| * معنای [[توحید]] | | * معنای توحید |
| * مراتب [[توحید]] | | * [[مراتب توحید]] |
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| ==== درس هشتم: نشانههای [[یگانگی خداوند]] ==== | | ==== درس هشتم: نشانههای یگانگی خداوند ==== |
| * تعدد خدایان، ناسازگار با [[الوهیت]] | | * تعدد [[خدایان]]، ناسازگار با [[الوهیت]] |
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| * خبر دادن همه [[انبیا]] از یکتایی [[خداوند]] | | * خبر دادن همه [[انبیا]] از یکتایی [[خداوند]] |
| * [[گواهی]] [[فطرت]] بر [[وحدانیت]] | | * گواهی فطرت بر [[وحدانیت]] |
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| ==== درس نهم: [[علم]] [[خداوند]] ==== | | ==== درس نهم: [[علم خداوند]] ==== |
| * اثبات [[علم الهی]] | | * [[اثبات]] [[علم الهی]] |
| * ویژگیهای [[علم]] [[خدا]] | | * ویژگیهای [[علم خدا]] |
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| ==== درس دهم: [[قدرت خداوند]] ==== | | ==== درس دهم: [[قدرت خداوند]] ==== |
| * اثبات [[قدرت الهی]] | | * اثبات [[قدرت الهی]] |
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| * جسمانیت | | * جسمانیت |
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| * جهت و مکان | | * جهت و مکان |
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| === بخش سوم: [[عدل الهی]] === | | === بخش سوم: [[عدل الهی]] === |
| ==== درس دوازدهم: اهمیت، تعریف و گستره [[عدل]] ==== | | ==== درس دوازدهم: اهمیت، تعریف و گستره [[عدل]] ==== |
| * اهمیت [[عدل]] | | * اهمیت عدل |
| * معنای [[عدل]] در لغت | | * معنای عدل در لغت |
| * معنای اصطلاحی [[عدل]] | | * معنای اصطلاحی عدل |
| * گستره [[عدل الهی]] | | * گستره عدل الهی |
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| ==== درس سیزدهم: [[دلایل]] [[عدل الهی]] ==== | | ==== درس سیزدهم: [[دلایل]] عدل الهی ==== |
| * [[دلیل]] کمال [[اخلاقی]] | | * دلیل کمال [[اخلاقی]] |
| * [[دلیل]] نفی منشأ [[ظلم]] | | * دلیل [[نفی]] منشأ [[ظلم]] |
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| ==== درس چهاردهم: ارتباط [[عدل الهی]] با [[اختیار انسان]] ==== | | ==== درس چهاردهم: ارتباط عدل الهی با [[اختیار انسان]] ==== |
| * امر بين امرين | | * [[امر بین امرین]] |
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| * نسبت [[عدالت]] با شباهت | | * نسبت [[عدالت]] با شباهت |
| * ناقص الخلقهها | | * ناقص الخلقهها |
| * [[حکمت]] [[آفرینش]] [[کافران]] | | * [[حکمت آفرینش]] [[کافران]] |
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| ==== درس هفدهم: [[عدل الهی]] و مجازات [[اخروی]] ==== | | ==== درس هفدهم: عدل الهی و [[مجازات]] [[اخروی]] ==== |
| * معنای جزا و خلود | | * معنای [[جزا]] و [[خلود]] |
| * تناسب [[خطا]] با خلود و [[عدل الهی]] | | * تناسب [[خطا]] با خلود و عدل الهی |
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| ==فهرست دانشنامه== | | ==فهرست دانشنامه== |
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| ###[[خفاء]] | | ###[[خفاء]] |
| ###[[غیبت]] | | ###[[غیبت]] |
| ###مغلوب شدن | | ###[[مغلوب شدن]] |
| ###[[حجاب]] | | ###[[حجاب]] |
| ###[[غفلت]] | | ###[[غفلت]] |
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| ###[[محافظت الهی]] | | ###[[محافظت الهی]] |
| ###[[پوشش الهی]] | | ###[[پوشش الهی]] |
| ###حراست الهی | | ###[[حراست الهی]] |
| ###[[وقایت الهی]] | | ###[[وقایت الهی]] |
| ###[[قاضی الحاجات بودن الهی]] | | ###[[قاضی الحاجات بودن الهی]] |
| خط ۴۰۶: |
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| ###[[بعثت الهی]] | | ###[[بعثت الهی]] |
| ###[[اقدار الهی]] | | ###[[اقدار الهی]] |
| ## [[توحید افعالی]]: | | ##[[توحید افعالی]]: |
| ###[[توحید در حاکمیت]] | | ###[[توحید در حاکمیت]] |
| ###[[توحید در برکت]] | | ###[[توحید در برکت]] |
| خط ۴۱۴: |
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| ##[[توحید عملی]]: | | ##[[توحید عملی]]: |
| ###[[توحید در عبادت]] | | ###[[توحید در عبادت]] |
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| #[[حقوق الهی]]: | | #[[حقوق الهی]]: |
| ##[[حمد و ستایش الهی]] | | ##[[حمد و ستایش الهی]] |
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| * [[اسم الهی|أسماء الله]] | | * [[اسم الهی|أسماء الله]] |
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| ==خداشناسی فطری==
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| {{اصلی|خداشناسی فطری}}
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| از خواستههای [[فطری]] [[انسان]] است. [[شناخت]] ذات، صفات و [[افعال الهی]] و [[پرستش]] [[خداوند]] در نهاد انسان ریشه دارد که خداوند در او برنهاده است<ref>مجموعه آثار استاد مطهری، ۶/ ۹۴ و ۹۵.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص۳۰۸.</ref>.
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| [[شناخت خدا]] برخاسته از انگیزههایی است که عبارتاند:
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| #'''[[حقیقتطلبی]]:''' خداوند انسان را چنان [[آفریده]] است که او همواره در پی راه یافتن به [[حقیقت]] است و جز از این گذر ارضا نمیشود و بخشی از [[پیشرفت]] [[دانش]] [[انسانی]] وامدار این [[انگیزه]] است. حقیقتطلبی را «[[غریزه کنجکاوی]]» نیز میگویند که انسان را به شناخت [[آفریدگار جهان]] وامیدارد. [[قرآن]] نیز بر وجود این انگیزه در انسان اشارت برده و از آن برای [[هدایت]] او بهره میبرد<ref>{{متن قرآن| الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلاَ تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ}}؛سوره بقره، آیه ۱۴۷ و {{متن قرآن|كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُواْ فِيهِ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلاَّ الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ فَهَدَى اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُواْ لِمَا اخْتَلَفُواْ فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ وَاللَّهُ يَهْدِي مَن يَشَاء إِلَى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ}}،آیه ۲۱۳؛ {{متن قرآن| وَإِذَا سَمِعُواْ مَا أُنزِلَ إِلَى الرَّسُولِ تَرَى أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُواْ مِنَ الْحَقِّ يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ}}؛ سوره مائده، آیه ۸۳.</ref><ref>فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه، ص۳۰۹.</ref>.
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| #'''[[حب ذات]]:'''انسان در نیل به کمال و [[فضیلت]]، از حب ذات نیرو میگیرد. در دیدگاه [[فلسفه]] و [[علم]] النفس، یکی از آثار حب ذات این است انسان در پی [[حفظ]] [[انسانیت]] خویش است و میخواهد با حیوانات تفاوت یابد و این را «کرامتخواهی» نامیدهاند. [[کرامت]] و [[منزلت]] انسانی آنگاه محفوظ میماند که انسان بر پایه [[خردمندی]] و [[رفتار]] [[عقلانی]] زیست کند. این [[گرایش]]، انسان را وامیدارد تا از [[خدا]] و هستی درکی درست به دست آورد و در پی آن [[رفتاری]] [[شایسته]] از خویش نشان دهد. [[قرآن کریم]] از همین رو است که برخی [[انسانها]] را از [[حیوان]] [[پستتر]] میشمارد. این گروه، آناناند که از [[قوای ادراکی]] خویش بهره نمیگیرند <ref>{{متن قرآن|وَلَقَدْ ذَرَأْنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرًا مِّنَ الْجِنِّ وَالإِنسِ لَهُمْ قُلُوبٌ لاَّ يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌ لاَّ يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ آذَانٌ لاَّ يَسْمَعُونَ بِهَا أُوْلَئِكَ كَالأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ أُوْلَئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ}}؛ سوره اعراف، آیه ۱۷۹؛ {{متن قرآن|إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِندَ اللَّهِ الَّذِينَ كَفَرُواْ فَهُمْ لاَ يُؤْمِنُونَ}}؛ سوره انفال، آیه ۵۵ و {{متن قرآن| إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِندَ اللَّهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِينَ لاَ يَعْقِلُونَ}}، آیه ۲۲.</ref>. [[قرآن]] از این گذر میخواهد [[انسان]] را وادارد تا [[اندیشه]] خویش را به کار بَرَد و به [[شناخت خدا]] و [[ایمان]] دست یابد<ref>{{متن قرآن| أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ إِنْ هُمْ إِلاَّ كَالأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلا}}؛ سوره فرقان، آیه ۴۴.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص۳۰۹.</ref>.
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| #'''[[حقسپاسی]] و [[شکر مُنعم]]:'''انسان ذاتاً مایل است هر کس را که بدو [[احسان]] میکند، [[سپاس]] بگزارد و [[نعمت]] را شکر کند. این [[انگیزه]] از انگیزههای [[توانمندی]] است که انسان را مجبور میسازد تا ولینعمت خویش را بازشناسد. [[متکلمان]] [[مسلمان]] نیز از دیرباز «[[شکر منعم]]» را از انگیزههای اصلی شناخت خدا دانستهاند<ref>قواعد المرام فی علم الکلام، ۲۸؛ پیام قرآن، ۲/ ۳۵.</ref>. آیاتی از قرآن که [[نعمتهای الهی]] را برمیشمارند، در [[حقیقت]] میخواهند این خواسته درونی انسان را بیدار سازند<ref>{{متن قرآن| وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ الْعَزِيزُ الْعَلِيمُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الأَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ وَالَّذِي نَزَّلَ مِنَ السَّمَاء مَاء بِقَدَرٍ فَأَنشَرْنَا بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا كَذَلِكَ تُخْرَجُونَ وَالَّذِي خَلَقَ الأَزْوَاجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ الْفُلْكِ وَالأَنْعَامِ مَا تَرْكَبُونَ لِتَسْتَوُوا عَلَى ظُهُورِهِ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ}}؛ سوره زخرف، آیه ۱۴- ۹.</ref>. از [[امام صادق]]{{ع}} نقل کردهاند: «چه [[زشت]] است که از [[عمر انسان]] هفتاد یا هشتاد سال بگذرد و در ملک [[الهی]] [[زندگی]] کند و از نعمتهایش بهره بَرَد؛ [[ولی خدا]] را، آن سان که میشاید، نشناسد. [[برترین]] [[فریضه]] [[انسان]] این است که [[خدا]] را بشناسد و به بندگیاش [[اقرار]] کند»<ref>بحارالانوار، ۴/ ۵۴.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص۳۰۹-۳۱۰.</ref>.
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| #'''[[کمالطلبی]]:''' میلی در انسان نهفته است که همواره او را به سوی تعالی و کمال میکشاند و این موجب شده است که او پیوسته بکوشد تا خویش را به خدا نزدیک کند؛ زیرا [[خداوند]]، کمال و [[متعال]] مطلق است<ref>فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه، ص۳۱۰.</ref>.
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| #'''[[جلب منفعت]] و [[دفع ضرر]]:''' از طبیعیترین نیروهای درونی انسان این است که او همواره در پی جلب منفعت و دفع ضرر است. بیشتر [[مردم]] در [[رفتار]] و [[کردار]] خویش تحت تأثیر این نیرویند و همین که در نشناختن خداوند برای آنان احتمال زیان به میان آید، کافی است تا آنان را به سوی [[شناخت خدا]] سوق دهد. انسان از این گذر میخواهد [[پروردگار]] و [[صاحب اختیار]] [[جهان]] را بازشناسد و از او [[فرمان]] برد و زیان را از خود برهاند و به [[منفعت]] دست یابد. [[قرآن کریم]] نیز- چون [[انگیزه]] جلب منفعت و دفع ضرر در بیشتر [[انسانها]] [[توانمند]] است- از آن در مسیر [[تربیت]] آنان [[سود]] برده است و به ویژه در عرصه [[تربیت اجتماعی]] از انگیزه دفع ضرر بهره گرفته است<ref>{{متن قرآن| الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِّنْهُمَا مِائَةَ جَلْدَةٍ وَلا تَأْخُذْكُم بِهِمَا رَأْفَةٌ فِي دِينِ اللَّهِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَائِفَةٌ مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ}}؛ سوره نور، آیه ۲؛ {{متن قرآن|لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍ وَشِمَالٍ كُلُوا مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ}}؛ سوره سبأ، آیه ۱۵ و {{متن قرآن|ذَلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا وَهَلْ نُجَازِي إِلاَّ الْكَفُورَ}}، آیه ۱۷؛ {{متن قرآن| وَلاَ تَدْعُ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لاَ يَنفَعُكَ وَلاَ يَضُرُّكَ فَإِن فَعَلْتَ فَإِنَّكَ إِذًا مِّنَ الظَّالِمِينَ وَإِن يَمْسَسْكَ اللَّهُ بِضُرٍّ فَلاَ كَاشِفَ لَهُ إِلاَّ هُوَ وَإِن يُرِدْكَ بِخَيْرٍ فَلاَ رَادَّ لِفَضْلِهِ يُصِيبُ بِهِ مَن يَشَاء مِنْ عِبَادِهِ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ}}؛ سوره یونس، ۱۰۶ و ۱۰۷؛ {{متن قرآن|الَّذِي خَلَقَنِي فَهُوَ يَهْدِينِ وَالَّذِي هُوَ يُطْعِمُنِي وَيَسْقِينِ وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ وَالَّذِي يُمِيتُنِي ثُمَّ يُحْيِينِ وَالَّذِي أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِي خَطِيئَتِي يَوْمَ الدِّينِ}}؛ سوره شعراء، آیه ۸۲- ۷۸؛ پیام قرآن، ۲/ ۲۴.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص۳۱۰.</ref>.
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| #'''[[آرامشطلبی]]:'''[[انسان]] برای آرام یافتن و رسیدن به [[احساس امنیت]] در برابر خطرهای [[زندگی]] [[دنیایی]]، به [[سختی]] خویش را محتاج آن میبیند که تکیهگاهی [[استوار]] بیابد و به او [[پناه]] برد<ref>{{متن قرآن|الَّذِينَ آمَنُواْ وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُم بِذِكْرِ اللَّهِ أَلاَ بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ}}؛ سوره رعد، آیه ۲۸؛ اخلاق در قرآن، ۱/ ۲۹۹- ۲۸۰.</ref>.
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| ==[[جایگاه]] [[شناخت]] [[خدا]]==
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| از آن رو که [[خداوند]] مبدأ هستی و [[کمالات]] است، [[شناخت]] او ارزشمندترین گونه [[شناخت]] است. [[شناخت]] [[خدا]]، بستر [[استواری]] برای دیگر شناختها نیز فراهم میکند و درکی درست از هستی و روابط میان پدیدههای [[جهان]] به [[انسان]] میبخشد. از [[روایات]] نیز برمیآید که گرانبهاترین [[شناخت]] آن است که [[آدمی]] [[خدا]] را بشناسد<ref>میزان الحکمة، ۳/ ۱۸۸۶.</ref>. [[شناخت خداوند]]، [[کاملترین]] و روشنترین مصداق [[دانش]] است و [[آیات]] و [[روایات]] فراوانی از [[فضیلت]] آن یاد کردهاند<ref>پیام قرآن، ۱/ ۸۱- ۵۶؛ اخلاق در قرآن، ۱/ ۲۷۷.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۰-۳۱۱.</ref>.
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| نخستین گام در [[دین]]، [[شناخت خداوند]] است<ref>نهج البلاغه، خ ۱.</ref>. [[شناخت خداوند]]، [[هدف آفرینش]] هستی است<ref>{{متن قرآن|اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ سَبْعَ سَمَاوَاتٍ وَمِنَ الأَرْضِ مِثْلَهُنَّ يَتَنَزَّلُ الأَمْرُ بَيْنَهُنَّ لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ وَأَنَّ اللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا }}؛ سوره طلاق، آیه ۱۲؛ پیام قرآن، ۱/ ۶۰.</ref>. پیش رفتن در مراتب و منازل [[قرب الهی]]، در گرو [[شناخت خداوند]] است و هر [[قدر]] این [[شناخت]] افزون شود، تقربی بیشتر حاصل میآید<ref>{{متن قرآن|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قِيلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا فِي الْمَجَالِسِ فَافْسَحُوا يَفْسَحِ اللَّهُ لَكُمْ وَإِذَا قِيلَ انشُزُوا فَانشُزُوا يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ }}؛ سوره مجادله، آیه ۱۱.</ref>.[[شناخت خداوند]]، مایه [[ایمان]] و [[فضیلتهای انسانی]] است. [[ایمان]] جز از رهگذر [[شناخت]] حاصل نمیآید<ref>اخلاق در قرآن، ۱/ ۲۷۵؛ پیام قرآن، ۱/ ۷۲؛ {{متن قرآن| قُلْ آمِنُواْ بِهِ أَوْ لاَ تُؤْمِنُواْ إِنَّ الَّذِينَ أُوتُواْ الْعِلْمَ مِن قَبْلِهِ إِذَا يُتْلَى عَلَيْهِمْ يَخِرُّونَ لِلأَذْقَانِ سُجَّدًا وَيَقُولُونَ سُبْحَانَ رَبِّنَا إِن كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولاً }}؛ سوره اسراء، آیه ۱۰۷ و ۱۰۸؛ {{متن قرآن|وَيَرَى الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ الَّذِي أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ هُوَ الْحَقَّ وَيَهْدِي إِلَى صِرَاطِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ }}؛ سوره سبأ، آیه ۶؛ {{متن قرآن| وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ أَنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَيُؤْمِنُوا بِهِ فَتُخْبِتَ لَهُ قُلُوبُهُمْ وَإِنَّ اللَّهَ لَهَادِ الَّذِينَ آمَنُوا إِلَى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ}}؛ سوره حج، آیه ۵۴؛ {{متن قرآن|هُوَ الَّذِيَ أَنزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُّحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاء الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاء تَأْوِيلِهِ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلاَّ اللَّهُ وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلاَّ أُوْلُواْ الأَلْبَابِ}}؛ سوره آل عمران، آیه ۷.</ref>. [[شناخت]] [[خدا]]، [[لذت]] [[معنوی]] میآفریند؛ چنان که در [[روایت]] است که [[امام صادق]] {{ع}} فرمود: "اگر [[مردم]] میدانستند که در [[شناخت]] [[خدای عزوجل]] چه لذتی نهفته است، هرگز به متاع [[دنیوی]] و آن [[نعمتها]] چشم نمیدوختند که [[خداوند]] [[دشمنان]] خویش را از آنها نصیب داده است و [[قدر]] [[دنیا]] در پیش چشمشان، از آنچه پا بر آن مینهند، کمتر مینمود و از [[شناخت]] [[خدا]] [[لذت]] میبردند؛ همانند [[لذت]] کسی که در باغهای بهشتی همراه [[اولیای الهی]] است"<ref>الفروع من الکافی، ۸/ ۲۴۷.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۱.</ref>.
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| ==امکان و حدود [[شناخت]] [[خدا]]==
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| [[انسان]] از نیروهای [[عقلی]] و فطری و ابزارهای درونی [[شناخت خداوند]] بهرهمند است و از آن سو نیز [[پیامبران الهی]] او را در این راه مدد میرسانند و بدین کار وامیدارند. این [[بهترین]] [[دلیل]] برای امکان [[شناخت]] [[خدا]] است. با این همه، وجود [[خدای متعال]] را حد و مرزی نیست و بدین روی، دست ادراکات بشری از احاطه به او کوتاه است. [[انسان]] را [[توان]] آن نیست که به کنه ذات و [[صفات]] [[خداوند]] راه یابد و برخی [[روایات]] بزرگان [[معصوم]] {{ع}} نیز بدین [[حقیقت]] اشارت بردهاند؛ همانند روایتی که [[پیامبر اسلام]] {{صل}} میفرماید: "خداوندا! آن سان که میشاید، تو را نشناختم و به [[عبادت]] تو نپرداختم"<ref>مرآة العقول، ۸/ ۱۴۶.</ref>. نیز از [[امام سجاد]] {{ع}} [[نقل]] است: "خِرَدهای [[آدمیان]] از راه یافتن به کنه [[جمال]] تو ناتواناند"<ref>میزان الحکمة، ۳/ ۱۸۹۳.</ref>. اما چنین هم نیست که [[خداوند]] راه [[شناخت]] خویش را بر [[انسان]] بسته باشد؛ چنان که در روایتی از [[امام علی]] {{ع}} آمده است که [[خداوند متعال]]، [[عقل]] [[آدمی]] را بر نهایت اوصاف خویش [[آگاه]] نساخته است؛ اما او را چنان نیز از آن [[محروم]] نساخته است که راه به [[خوشبختی]] [[نبرد]]<ref>نهج البلاغه، خطبه ۴۹.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۱-۳۱۲.</ref>.
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| ==تشبیه و تعطیل==
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| {{اصلی|تشبیه|تعطیل}}
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| برخی فرقههای [[مسلمانان]] برای [[شناخت]] [[خدا]]، [[ظواهر]] [[آیات قرآن کریم]] را برگرفته و او را به موجودات مادی شبیه کردهاند و برای [[خداوند متعال]]، صفات جسمانی پنداشتهاند. اینان را "مشَبهَه" یا "مُجَسمَه" نام نهادهاند. در برابر این گروه، برخی دیگر برای اینکه به وادی [[تشبیه]] و تجسیم نغلطند، به کلی امکان [[شناخت خداوند]] را رد کردهاند و بر آن رفتهاند که [[عقل]] [[آدمی]] را [[توان]] دستیابی به هیچ گونه شناختی از ذات و [[صفات]] [[خداوند]] نیست و بدین سان [[عقل]] را در [[شناخت]] [[خدا]] تعطیل کردهاند. بنابراین دیدگاه، درباره [[خداوند]]، تنها باید سر [[تسلیم]] و [[تعبد]] فرود آورد و به تحقیق و [[تفکر]] پشت کرد و حتی پرسیدن در این عرصه، [[گناه]] و [[بدعت]] و [[حرام]] است. [[اشاعره]] و [[حنابله]]- که خود را "[[اهل حدیث]]" میخوانند- هواخواه این نظریهاند<ref>مجموعه آثار استاد مطهری، ۶/ ۸۷۹؛ محاضرات فی الالهیات، ۱۰۰.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۲.</ref>.
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| نظریه [[شیعه]]، هیچ یک از این دو نظریه را برنمیتابد؛ نه از گذر [[تشبیه]] به [[شناخت خداوند]] رو میکند و نه دست [[عقل]] [[آدمی]] را به کلی از آن کوتاه میداند<ref>الاصول من الکافی، ۱/ ۸۵ و ۱۰۰.</ref>. [[عقل انسان]] میتواند به مسائل کلی [[شناخت خداوند]] راه یابد و به ویژه در [[اثبات وجود]] [[خداوند]]، تنها راه را [[عقل]] و روش [[عقلانی]] میشمارد<ref>آموزش عقاید، ۳۸.</ref>. در نظر [[عارفان]]، هر چند [[شناخت]] [[خدا]] دستیافتنی است، تنها راه مطمئن، راه تصفیه [[باطن]] و [[سیر و سلوک]] قلبی است. [[عارفان]]، [[عقل]] و [[برهان عقلی]] را ناکارآمد نمیدانند؛ بلکه راه [[دل]] را از آن کارآمدتر میدانند و بر آن ترجیح میدهند.
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| بنابر این نظریه، دستاورد کوششهای [[عقلانی]]، از حد مفاهیم پا فراتر نمینهد؛ اما [[معرفت]] افاضی- که عرفان با خود میآورد- بسی پیشتر میرود و به "وصول" میانجامد. [[معرفت]] استدلالی [[عقل]] را ارضا میکند؛ اما [[معرفت]] افاضی، همه وجود [[آدمی]] را برمیانگیزد و شور میآفریند و [[تقرب]] میآورد. البته ترجیح راه [[دل]] بر راه [[عقل]] و [[برهان]] بیهوده است؛ زیرا هر یک از این دو مکمل دیگری است<ref>مجموعه آثار استاد مطهری، ۶/ ۸۷۹.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۲.</ref>.
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| ==تنزیه ذات و صفات الهی==
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| {{اصلی|تنزیه}}
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| [[ذات خدا|ذات]] و [[صفات خداوند]] از هر گونه [[نقص]] و عیبی مبرا است. مفاهیمی که ما برای [[شناخت]] [[خدا]] به کار میبریم محدودند و با [[نقص]] و [[حاجت]] همراهاند. از این گذر باید در به کار بردن این مفاهیم، ذات و [[صفات خدا]] را از آنچه [[شایسته]] او نیست [[پاک]] دانست. در بین [[صفات خدا]] "صفات سلبیه" و در بین اذکار نیز ذکر "[[تسبیح]]" نمایانگر تنزیه [[خدا]] از نقائصاند<ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۳.</ref>.
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| ==مراتب [[شناخت]] [[خدا]]==
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| [[شناخت]] [[خدا]] مراتب متعددی دارد از پایینترین مراتب که شناختی سطحی است تا والاترین مراتب که [[خداوند]] به چشم [[دل]] دیده میشود؛ چنان که [[امام علی]] {{ع}} فرموده است: "خدایی را که به چشم [[دل]] نبینم، نمیپرستم"<ref>توحید صدوق، ۳۰۵.</ref>. [[شناخت]] [[خدا]] در یک تقسیم کلی دارای دو مرتبه است:
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| #[[عقلی]] و استدلالی؛
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| #قلبی و شهودی.
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| ===[[خداشناسی عقلی]]===
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| [[شناخت عقلی]]، به گونه کلی است و از گذر مفاهیم ذهنی فراچنگ میآید و از استدلالهای ابتدایی تا [[براهین]] سنگین [[فلسفی]] را میپوشاند.
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| ===[[خداشناسی قلبی]]===
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| [[شناخت قلبی]]، حضوری و بیوساطت مفاهیم است. این گونه [[شناخت]] در عرصه [[تعلیم و تعلم]] نمیگنجد؛ زیرا [[تعلیم و تعلم]] تنها از رهگذر الفاظ و مفاهیم تحقق میپذیرد. با این حال، هر دو گونه [[شناخت]]، در نهاد [[بشر]] ریشه دارند و با مجاهدات [[علمی]] و عملی میبالند و تعالی مییابند. در [[خداشناسی]] [[عقلی]] فطری، [[انسان]] با [[عقل]] فطری بیآنکه به تلاش و اکتساب [[نیازمند]] شود، به وجود [[خدا]] پی میبرد؛ اما در [[خداشناسی]] قلبی فطری، [[انسان]]، توجه خویش را از [[دنیا]] میبُرد و دلبستگیاش را میگسلد و گاه در حال [[اضطرار]] چنین میشود و تعلقات خویش را رها میکند و در [[جان]] خود، [[خدا]] را مییابد. بدین سان، توجه به غیر [[خدا]] و [[دل]] بستن به زینتهای [[دنیوی]]، مایه [[غفلت]] و قطع رابطه با [[خدا]] است. این گونه [[شناخت]] کما بیش در همه [[انسانها]] نهفته است و از گذر ذکر و فرمانبرداری [[خدا]] یا پیشامدهایی ویژه، ژرفا میگیرد و گسترش پیدا میکند. مراد از "رؤیت قلبی" که برخی [[روایات]] بر آن اشارت بردهاند، همین [[معرفت]] شهودی است. در برخی [[روایات]] نیز از [[شناخت]] [[خدا]] به وساطت خود او- نه آفریدگان- سخن رفته است که مراد همین [[معرفت]] است و همچنین، "[[معرفت نفس]]"، که در [[روایات]] بزرگان [[معصوم]] {{ع}} نزدیکترین راه به [[شناخت]] [[خدا]] شمرده شده است، بر این پایه [[استوار]] است<ref>التوحید، ۲۹۲- ۲۸۵؛ المیزان، ۶/ ۱۷۸- ۱۶۵؛ معارف قرآن، ۴۶- ۲۰.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۳-۳۱۴.</ref>.
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| پایفشاری [[قرآن کریم]] بر [[ضرورت]] [[شناخت]] [[خدای متعال]]، تنها برای نیل [[انسان]] به [[معرفت]] مفهومی و کلی از اسماء و [[صفات]] [[خداوند]] نیست. [[هدف]] [[قرآن]] این است که [[انسان]] از درون با [[خدا]] آشنا گردد و به [[معرفت]] حضوری و شهودی راه یابد<ref>معارف قرآن، ۲۰.</ref>. برخی [[دانشمندان شیعه]]، مراتب [[شناخت]] [[خدا]] را به مراتب [[شناخت]] [[آتش]] [[تشبیه]] کردهاند<ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۴.</ref>.
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| پایینترین مرتبه [[شناخت]] [[آتش]] آن است که [[آدمی]] از وجود و اوصاف [[آتش]] [[آگاه]] شود و این همانند [[شناخت]] کسی است که بی [[دلیل]] و از روی [[تقلید]]، وجود [[خدا]] را [[تصدیق]] میکند. مرتبه بالاتر این است که [[آدمی]] [[دود]] [[آتش]] را ببیند و از این طریق بر وجود [[آتش]] دلیل آورد. این همانند [[شناخت]] کسی است که از گذر [[براهین]] و استدلالهای [[عقلی]] به وجود [[خداوند]] پی میبرد. مرتبه والاتر آن است که کسی کنار [[آتش]] رود و گرمایش را [[حس]] کند و با [[نور]] آن، دیگر موجودات را بیند و این همانند مرتبه کسی است که به [[خدا]] [[ایمان]] دارد و [[قلب]] او به وجود [[خدا]] [[اطمینان]] یافته و [[یقین]] کرده است که [[خدا]]، [[نور]] [[آسمانها]] و [[زمین]] است. [[برتر]] از این، مرتبه کسی است که در [[آتش]] میسوزد و با همه هستی خویش، وجود آن را لمس میکند و این همانند مرتبه اهل [[شهود]] است که در [[خدای متعال]] فانی گشتهاند و از خود- جدا از [[خدا]]- هیچ ندارند<ref>اربعین، شیخ بهائی/ ۶۳.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۴.</ref>.
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| [[شناخت]] [[خدا]]- به ویژه در مراتب بالا- تأثیر چشمگیری در [[خُلق و خوی]] و [[رفتار]] [[انسان]] دارد و حالاتی همانند [[خوف]]، [[خشیت]]، [[محبت]] و [[شوق]] میآفریند<ref>اخلاق در قرآن، ۱/ ۴۲۰- ۳۴۲.</ref><ref>[[فرهنگ شیعه (کتاب)|فرهنگ شیعه]]، ص ۳۱۴.</ref>.
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| == پانویس ==
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| {{پانویس}}
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