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| | {{مدخل مرتبط |
| | | موضوع مرتبط = امام حسین |
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| {{امامت}}
| | == مقدمه == |
| <div style="padding: 0.0em 0em 0.0em;">
| | [[شیعه]] یعنی پیرو. [[پیروی]] در [[فکر]]، عمل، [[اخلاق]]، مواضع سیاسی و [[عقاید دینی]]. گرچه شیعۀ حسین، شیعۀ علی و [[ائمه]] دیگر{{ع}} نیز هست و [[تشیّع]]، در خط ائمه و [[اهل بیت]] بودن است، امّا [[حسین بن علی]]{{ع}} در ابعاد خاصّی که [[زندگی]] و جانش را بر سر آنها نهاد، حالت الگویی دارد و [[اسوه]] است. آن حضرت، برای [[احیاء دین]] [[قیام]] کرد و خود را فدای [[راه خدا]] ساخت. شیعۀ او نیز باید اینگونه باشد. شیعۀ [[سید الشهدا]]، باید در خصلتهایی و اعمالی چون: [[خودسازی]]، [[خداترسی]]، گناه گریزی، [[تقوا]]، [[اطاعت امر خدا]]، [[امر به معروف و نهی از منکر]]، اقامه و احیاء [[نماز]]، تلاش در مسیر رضای [[حق]]، [[جود]] و [[کرامت]]، [[عزّت]] نفس، گریز از [[ذلّت]] و [[زبونی]] و [[سازش]] با [[طاغوتها]] و حکومتهای [[ستم]]، مبارزه با باطل، [[جهاد]] و [[شهادت]]، روحیۀ [[ایثار]] و [[شهادتطلبی]]، قاطعیّت و [[صلابت]] در راه [[عقیده]] و... به آن پیشوای [[شهید]] تأسّی کند. این، راه حسین و راه پدران و [[فرزندان حسین]] است و شیعگی یعنی [[دین داری]] و ورع. |
| : <div style="background-color: rgb(252, 252, 233); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">این مدخل از چند منظر متفاوت، بررسی میشود:</div>
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| : <div style="background-color: rgb(255, 245, 227); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">[[شیعه امام حسین در حدیث]] | [[شیعه امام حسین در تاریخ اسلامی]] | [[شیعه امام حسین در معارف و سیره حسینی]]</div>
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| : <div style="background-color: rgb(206,242, 299); text-align:center; font-size: 85%; font-weight: normal;">در این باره، تعداد بسیاری از پرسشهای عمومی و مصداقی مرتبط، وجود دارند که در مدخل '''[[شیعه امام حسین (پرسش)]]''' قابل دسترسی خواهند بود.</div> | |
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| ==مقدمه==
| | از انبوه [[روایات]] مربوط به [[اوصاف شیعه]]، تنها به یکی اشاره میکنیم، از [[امام صادق]]{{ع}} که به مفضّل فرمود: از [[فرومایگان]] بپرهیز،؛ چراکه شیعۀ علی{{ع}} شکم و [[شهوت]] خود را [[حفظ]] میکنند و [[اهل]] جهادند و تلاش برای [[خدا]]: {{متن حدیث|إِنَّمَا شِيعَةُ عَلِيٍّ مَنْ عَفَّ بَطْنُهُ وَ فَرْجُهُ وَ اِشْتَدَّ جِهَادُهُ وَ عَمِلَ لِخَالِقِهِ وَ رَجَا ثَوَابَهُ وَ خَافَ عِقَابَهُ فَإِذَا رَأَيْتَ أُولَئِكَ فَأُولَئِكَ شِيعَةُ جَعْفَرٍ}}<ref>سفینة البحار، ج۱، ص۷۲۳.</ref>. محبّتی که در [[دل]] [[شیعیان]] و [[دوستداران]] [[شهید]] کربلاست، بجاست که آنان را به همرنگی و همسویی و سنخیّت [[فکری]]، [[اخلاقی]] و عملی با مولایشان بکشد و در گفتار و [[کردار]]، شیعه حسین باشند، نه تنها در ادّعا و [[شعار]]. خود [[امام]]{{ع}} نیز هنگام حرکت از [[مکّه]] به سوی [[کربلا]]، کسانی را به [[همراهی]] خویش در این [[سفر]] [[مقدّس]] و [[نهضت]] خدایی [[دعوت]] کرد که [[اهل]] [[فدا]] کردن [[جان]] در راه [[ائمّه]] که راه خداست باشند و [[شوق دیدار]] [[الهی]] در دلشان باشد: {{متن حدیث|مَنْ كَانَ فِينَا بَاذِلاً مُهْجَتَهُ مُوَطِّناً عَلَى لِقَاءِ الله نَفْسَهُ فَلْيَرْحَلْ مَعَنَا...}}<ref>لهوف، ص۵۳.</ref>.<ref>[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ عاشورا (کتاب)|فرهنگ عاشورا]]، ص۲۸۶.</ref> |
| [[شیعه]] یعنی پیرو. [[پیروی]] در [[فکر]]، عمل، [[اخلاق]]، مواضع [[سیاسی]] و [[عقاید دینی]]. گرچه شیعۀ [[حسین]]، شیعۀ [[علی]] و [[ائمه]] دیگر{{ع}} نیز هست و [[تشیّع]]، در خط [[ائمه]] و [[اهل بیت]] بودن است، امّا [[حسین بن علی]]{{ع}} در ابعاد خاصّی که [[زندگی]] و جانش را بر سر آنها نهاد، حالت الگویی دارد و [[اسوه]] است. آن [[حضرت]]، برای [[احیاء]] [[دین]] [[قیام]] کرد و خود را فدای [[راه خدا]] ساخت. شیعۀ او نیز باید اینگونه باشد. شیعۀ [[سید الشهدا]]، باید در خصلتهایی و اعمالی چون: [[خودسازی]]، [[خداترسی]]، [[گناه گریزی]]، [[تقوا]]، [[اطاعت]] [[امر]] [[خدا]]، [[امر به معروف و نهی از منکر]]، اقامه و [[احیاء]] [[نماز]]، تلاش در مسیر رضای [[حق]]، [[جود]] و [[کرامت]]، [[عزّت]] نفس، [[گریز]] از [[ذلّت]] و [[زبونی]] و [[سازش]] با [[طاغوتها]] و حکومتهای [[ستم]]، [[مبارزه با باطل]]، [[جهاد]] و [[شهادت]]، روحیۀ [[ایثار]] و [[شهادتطلبی]]، قاطعیّت و [[صلابت]] در [[راه]] [[عقیده]] و... به آن پیشوای [[شهید]] تأسّی کند. این، [[راه]] [[حسین]] و [[راه]] [[پدران]] و [[فرزندان حسین]] است و شیعگی یعنی [[دین]] داری و [[ورع]]. | |
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| از انبوه [[روایات]] مربوط به [[اوصاف شیعه]]، تنها به یکی اشاره میکنیم، از [[امام صادق]]{{ع}} که به مفضّل فرمود: از [[فرومایگان]] بپرهیز، چرا که شیعۀ [[علی]]{{ع}} شکم و [[شهوت]] خود را [[حفظ]] میکنند و [[اهل]] جهادند و تلاش برای [[خدا]]: {{متن حدیث|إِنَّمَا شِيعَةُ عَلِيٍّ مَنْ عَفَّ بَطْنُهُ وَ فَرْجُهُ وَ اِشْتَدَّ جِهَادُهُ وَ عَمِلَ لِخَالِقِهِ وَ رَجَا ثَوَابَهُ وَ خَافَ عِقَابَهُ فَإِذَا رَأَيْتَ أُولَئِكَ فَأُولَئِكَ شِيعَةُ جَعْفَرٍ}}<ref>سفینة البحار، ج۱، ص۷۲۳.</ref>. محبّتی که در [[دل]] [[شیعیان]] و [[دوستداران]] [[شهید]] کربلاست، بجاست که آنان را به همرنگی و همسویی و سنخیّت [[فکری]]، [[اخلاقی]] و عملی با مولایشان بکشد و در گفتار و [[کردار]]، [[شیعه]] [[حسین]] باشند، نه تنها در ادّعا و [[شعار]]. خود [[امام]]{{ع}} نیز هنگام حرکت از [[مکّه]] به سوی [[کربلا]]، کسانی را به [[همراهی]] خویش در این [[سفر]] [[مقدّس]] و [[نهضت]] خدایی [[دعوت]] کرد که [[اهل]] [[فدا]] کردن [[جان]] در [[راه]] [[ائمّه]] که [[راه]] خداست باشند و [[شوق دیدار]] [[الهی]] در دلشان باشد: {{متن حدیث|مَنْ كَانَ فِينَا بَاذِلاً مُهْجَتَهُ مُوَطِّناً عَلَى لِقَاءِ الله نَفْسَهُ فَلْيَرْحَلْ مَعَنَا...}}<ref>لهوف، ص۵۳.</ref><ref>[[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ عاشورا (کتاب)|فرهنگ عاشورا]]، ص ۲۸۶.</ref>.
| | == منابع == |
| | {{منابع}} |
| | # [[پرونده:13681024.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ عاشورا (کتاب)|'''فرهنگ عاشورا''']] |
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| == جستارهای وابسته ==
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| ==منابع==
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| * [[پرونده:13681024.jpg|22px]] [[جواد محدثی|محدثی، جواد]]، [[فرهنگ عاشورا (کتاب)|'''فرهنگ عاشورا''']]
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